नेपाली अभिलेख

रामायण

महाकाव्य

नेपालक

[ रध
च्व
गअ
( मूलपाठ सहित हिन्दी अनुवाद )
इल. चिनेढ चन्दर पाण्डे खासैनेपाली

तिये उत्तराधिकनरी

सरवि दमी जगुर

क्य
तैशीर वपट दसध प,¶ भुश्म)रु्रतुते४)
४)॥

छद ५

अनुवादक

श्री नन्दकुमार आसात्यसुश्री तपेश्वरी आमात्य

प्रकाशक

भुवन वाणो ट्रस्टवतमान पताः- मौसम बाग (सीतापुर रोड), लखनॐऊ-२२६०२०
1111,
१न
=
(र
त ~- (स(0)
! प्रत्येक क्षेत्र, प्रत्येक पत की वानी ।

सम्पूणे चिष्व मे घर-घर है पदटूंवानी ॥ '

प्रथम संस्करण~ १९७९ ई०

--८पृष्ठसंख्या-- १८०८२२ ==दे

मूत्य~-- ३०.००

रुपया

मद्रकवाणो प्रंश्रघ्राकर निलयम्‌", ४०११२०८१ चौपियां सोर, लखनऊ-२२६००३
स ०5२२९
०५.९ <€<[1
“<:
„द,९ <सस न
कर्नाटक प्रदेश के महामहिमश्री पऽ उमाशंकरकर-कमलों
नि

राज्यपाल

दीक्षित केद्वारा ।
विषय-सृचींविषयपुष्ठ-संख्याग्रन्थ-विमोचन-महामहिम राज्यपाल श्री उमाशंकर दीक्षित ३

विषयसूची

माल्यापेण डां ० राजेन्द्रकुमारी बाजपेयी

समपेण

भारत-नेपाल मैत्री युग-युग सम्म अमर रहोस्‌उपहार
प्रकाशकीयआमुख-अनुवाद
९-१६१७
ग्रस्थारम्भ एवं ' श्रीरामपजञ्चायतन ` का चित्र
१८

बालकाण्ड

१९

अयोध्याकाण्ड

५४
अरण्यकाण्डकिष्किन्धाकाण्डसुन्दरकाण्ड
८४११२१४७
-
१८५
युद्धकाण्डउत्तरकाण्ड
|
२८१
परमविदुषी डो० रजेन्द्रकुमारीं वाजपेयीको
4~€ॐ५1~: $ >+

नेपाली काव्य

+

दु पं र

माननीया स्वायत्तशासन मंत्री, उत्तरप्रदेश, परमविदुषी डं राजेन्द्रकुमारीवाजपेयी को भुवन वाणी टृस्ट, लखनऊ की ओर से, अपने अद्वितीय- भाषाई-सेतुबन्ध में नवीन शिलापंण स्वरूप नेपाली का यह्‌अनुपम ग्रन्थ भानुभक्त रामायणः सादर माल्यापित ।
२९ जून, १९७६
=
९६ २०.८१८}
रथयात्रा दिवसप्रतिष्ठात्ता--भुवन वाणी टूस्ट, लखनऊ-३
श्री भानुभक्त !
संसत भापामंदही परिसीमित पुष्कल रामचरित्रको, विभिन्न भाप अञ्चलोंके अन्य रामायण-रचविताभोंकी भाति, आपने भी जनभापा में प्रस्तुत कर्के, सामान्यजनता के प्रति अनस्य उपकार्‌ किग्राट
हे नेषाल के तुलसी !आपके अनुपम काव्य का मूल नेपाली पाठ सहितयह्‌ हिन्दी अनुवादसादर समपितहे।

भानुभक्त रामायण

आपही

को
नन्दकुमार अवस्यीमख्यन्यासी सभापतिभुवन वाणी टृस्ट लक्षनञ-३
4
भारत-नेपालि मति |युग्‌-युग॒ सम्म अमर=|छा

गटोस

क)
श्री ५ महाराजाधिराज वीरेन्द्र विक्रमशाह्देव, नेपाल को भारत कीओर से सस्नेह उपहार ।
र.
11
0|„१
9०१०१०११
9७७०७१०
७०१४००
११०००००१
०१५०५५०००७०५
४०१०१००१
१०४
1११११117.

$ क ००७४

{६
१०१०१०९०
५4०१०१०४
००९
७३४१
०१०५०१०५ ०५००१०५१५००५०९०१०११५०९००५००८००५० ५५०००५०००.५११०००१न११

# ७०९००

०५००१०ॐ०ॐ१०५१५

क १०४१०

०००१९००१०४
५५०७०१५०
१०१११५००द
117171511111.1.1.11.111.1111111111.111111151111111.1.11111/.111.;
* @ ॐ
१७००१०१५
17१)3711771)
2.117.,
(३१)
01111111111 1111.1111111111111 1
प्रस्तावलावाणी, भाषा भौर लिपि,
मन के भावों ओर उद्गायोको मुखस प्रकट करना, यही वाणीहै।

पशु, पक्षी अथवा

मनुष्यों मे जब कोई वे, एक प्रकारक वाणी

बोलता है, उस बोली से परस्पर भावोंको कहता, सुनता ओर समज्नता
है, तब वाणी के उस श्रकार' को उस विशिष्ट-वगंकी भाषाकीसंज्ञादी
जातीहै। ओौर उसी भाषाको जब चिह्लो-आकृतियों मेः लिखकर प्रकटकिया जाता है, तब उन्हीं चिह्वो ओर आकृतयो को उस भाषा-विश्ेष कीलिपि कहा जाता है |#कुछ विद्वानों के मत से धरातल पर पृथक्‌-पृथक्‌ भरुखण्डो मे विभिन्नसमयो परर मानवों की सृष्टि आौरविकास होतास्हाहै। वै सब एकही स्थान पर एक ही मानव से उत्पन्न
नहीं ह। फलतः उन सब की- भाषाएं भी एक दूसरे से बिलकुलपृथक्‌ ओौर स्वतंवहैं। इन पृथक्‌कूलो को ये विदान्‌ आयं, मंगोल,सैमेटिक, हेमेटिक, द्रविड आदि कीसं्ञादेतेदह।,किन्तु भारतीय सत की घोषणाइसके विपरीत है, भौर इस्लामी तथा
सख्मरीष्ट मान्यता भी उसका अनुमोदनकरती है। इस मत के अनुसारसारी मानव जाति एकही मूल पुरुषमनु अथवा आदम की सन्तान होकर मानव अथवा आदमी कहलायी ।कालान्तर में विभिन्न भूखण्डों में फलने, एक दूसरे से अलग-थलग होने,ओर वहाँ की विशिष्ठ जलवायु ओर संस्कारों से प्रभावित होने के फलस्वरूप वह मानव जाति अनेक रूप, रंग, आकार ओर बोलियों मे विभक्तहोती गथी । यह्‌ परिवतेन लाखों वर्षो से चलते आ रहे हँ ओर इसलिएउन मानव-समृहों के रूप, रंग, आकार ओौर बोलियों के अन्तर भी इतने
जट्लि हो गये हैँकि ज्ञान कौ उपेक्षा करनेवाले ओौर केवल तकं,
[ १० |अनुमान,

प्रयोग, अनुसंधान आदि भौतिक

साधनोकोदही

ज्ञान मानकर

उन पर निर्भर रहनेवाले पाश्चात्य विद्वानों तथा उनके धनृरवर्ती भारतीयंका श्रमिततहयो जाना स्वाभाविक हीरहै। यह बात इनसे क्षल हौजातीदहै कि कितना भी वड़ा वैषम्य इन जातियों के लक्षणोंमें दिखाई
देता हो, उनकी आक्ृति्यो भौर भाषाओं में कुष एसे तथ्य लाखी वर्षबाद भी क्षलकतेहैँ जो सारी मानव जाति को किसी पुरातन कालमेंएक मूल मानव का पितृत्व प्रदान करते है ।भारतीय वाङ्मय के सृष्टिक्रम-सम्बन्धी विणाल.ज्ञानकोण को विस्तार-
भयसेकिनारेभी रवद, तो भी जन-साधारण की समक्ञमे आनेवालीकुछ वाते तो हमारे मत की पुष्टि करतीही हैँ। उदाहरण के लिए-
(१) द्रविड्कूल की भाषां आयंकुल की भापाओंसे पाश्चात्य मतमें
मूलतः प्रथक्‌ मानी गयी हँ । किन्तु संस्कृत की वर्णाक्षिरी, उनका वर्गीकरणतथा लिपिका बयेसे दाहिने लिखा जाना दोनों कुलोमे समानदहीदहै।इसके विपरीत, आय॑कूल की फ़ारसी जसी अनेक भाषाभों का खरोष्टी लिपिमे (दाये से बाये) लिखा जाना भौर वर्णो की संख्या, क्रम, वर्गीकरण आदिमेँ वड़ा अन्तररहै। (२) अरबी भौर संसृत की शब्दावली ओर लिपिमें
नाममात्र को भी मेल नहीं है, किन्तु उनकी व्राकरणमें वड़ी समानता है,
जबकि संस्कृत का अपने आयकल ही की अन्य भाषाओंके व्याकरणसेसाम्य नगण्यसारहै! (३) उत्तर-प्िममे सुदूरस्थ ईरान की अवेस्तामौर गाथायोकौ भापामे असुर का अहुर उच्चारणहै।! वीचके पूरेआर्याव्तं में इसका जभाव होने के वाद उत्तरपूर्वं मे असम प्रदेशमे फिरदस को दह भौर गोसाई को गोहाई बोलते है ।
(४) नेपाल के आदिम
निवासी तथाकथित आ्य॑कूल के रूप, आकृति से सर्वथा भिन्न हैँ। किन्तु वहं
कुठ ही समय से आवाद आयंकुल के राज-परिवार तथा साना-परिवार कीआक्ृतियों पर नेपाली प्रभाव प्रत्यक्ष है; आदि, आदि ।भारतीय भाषां
ह अस्तु, जव मानव मान्न एक मनु (आदम) की सन्तान

भौर आज

पृथ्वी पर उपलब्ध विविध भाषाओं ओौर बोलियों का आदि-सखोत एक है,
तव भारत के निवासियों ओर भारतीय भाषाओं को मूलतः पृथक्‌ मानना,उनका बुनियादी वर्गीकरण करना कहां तक समुचित है? जहां तकहिन्दी, गुरुमुखी, सिन्धी, राजस्थानी, ओडिया, बंगला, असमिया, गुजराती,मराठी, कष्मीरी, मैथिली, नेपाली, सहली आदि भाषाओं, लिपियीं
अथवा योलियों का सम्बन्धहै इन सव की वणंमाला, शब्दावली, व्याकरणंमादि में इतना अधिक साम्यदहै कि उनको एक परिवार से बाहर समक्चने
[ ११॥
~
की रत्ती भर गुंजाइण नहीं । ये सभी प्राचीन संसृत की पौत्री भौरभारतीय जनपदो मे शौरसेनी, मागधी, महाराष्ट्री आदि प्राकृत अथवा उनके

अपभ्रंशो की पृचियां है|

उर्दकोतो हिन्दीसे पृथक्‌ माननादही भ्रूलदहै। उसकातो हिन्दीसे वही सम्बन्धरहैजोएक रूह का दो क्रालिबसे-एकप्राणकादो शरीरसे। अरबी लिपिमें लिखी जाने अथवा अरबी-फ़ारसी भाषां के शब्दोंके अधिके समाविष्ट हौ जने से उसे ओैर भाषा समञ्चना भूलहै।कदाचित्‌ लोगोंको कम पताह कि नगरोंमे नहीं, ग्रामो तक में नित्यबोली जानेवाली ओर हिन्दी कही जनेवाली भाषामे एक तिहाईसेअधिक शब्द अरबी, फारसी, तुर्की मादिके बार-बार बोले जाते हैं|उनमेपेसेभी अरबी शब्दोकी भरमार रहै जिनको लोग ठेठ हिन्दीकी- सम्पत्ति समक्चने लगे है, उनके अरबी-फ़ारसी होने कौ कल्पना भी नहींकरते । जसे हलुज, साइत (मृहृत्तं), महरिया, हमेल, तरह, अन्दरअगर, अचार, अजगर, अतलस, अनीर, अमीर, गरीब, अरक, मेवा, मत्लाह,मसखरा, मक्कर्‌, लाला, लहास, स्याही, `संहुक, रुमाल आदि 1
अलबत्ता भारत की दक्षिणौ भाषाओं--मलयाक्रम, तलुगु, कन्नडओर तमिद्-का शेष भारतीय भाषाओं भौर लिपियोंसे भेद अधिक दूरकाहै। रकरिन्तु उनके अक्षरोंका वर्गीकरण देवनागरी वणंमाला के समानहै।

इसके अलावा

संस्कृत के शब्द तत्सम भौर तद्धव रूप में इतने
अधिक दक्षिणी भाषाओं में घृलमिल गये ह फ उनका अस्य भारतीयभाषाओं से तादात्म्य प्रत्यक्ष है, भले ही कलेवर पृथक्‌ दिखाई दे ।उहेश्य
उपर्युक्त भाषाई पहलुभों के अलावा, सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनंतिकओौर धामिकद्ष्टिसेधी सारा देश परस्पर -एेसा गुथगया दहैकि उसमेंˆ एकात्म-भावके सर्व॑ दर्शन होते दहै उसके प्रभावकी छापं सभी भराषानोंके साहित्य पर मौजददै। इसलिए अपने-अपने क्षेत मे विभि लिपियों, के फलते-फूलते रहने के वाव्रजूद, यह जरूरी दहै कि राष्ट मे सबसे अधिक
सुपरिचित भौर व्याप्त देवनागरी लिपिके माध्यमसे प्रत्येक क्षेत्रीय भाषाओर साहित्य को भारत के ,कोने~कोने तक पहुंचाया जाय । भारत भूमिकेहुर कोने मे प्रस्फुटित वाङ्प्यको हर भारतवासी तक पहुंचाया जाय।' लिपि ओौर भाषाके सेतुकरण द्वारा सारे राष्ट का एकीकरण-यही

'ुवन वाणी टूस्ट' क उदहेष्य हे)

'[ १२उदेश्य-पूति का माध्यम देवनागरी लिपि
मसितु हिमालय, सारे देश के साहित्य, संस्कृति, आचार-विचार ओौरसन्तो की वाणी को, किसी एक क्षेत्र अथवा समदाय तक सीमितन रहने
देकर, सारे भारतीयों की सामूहिक सम्पत्ति बनाना ही राष्टरीय एकीकरण
की उपलच्ि है । नरसी मेहता के भजन, टंगोर कौ गीताञ्जलि, तिरुवल्लुवरका तिरक्कररषट्‌ भौर सन्त नानक की अमर वाणी करमशः गुजरात, वंगाल,
तमिकछनाड्‌ भौर पञ्जाव को ही नहीं, अपितु सारे देश को प्राण प्रदान करे,
यहु उनके अनुवाद मारके द्वारा संभव नहीं। जिस भाषार्पी सुधाभाण्डसे यह्‌ अभृत प्रवाहित हुए है उस भाषाके बोध के विना वह्‌ प्राण सुलभनहीं । किन्तु यह भीसत्यटै कि एक व्यक्तिके लिए इतनी लिपियोको
सीखकर उन भाषाओं पर अधिकार प्राप्त करना संभव नहीं ।प्रव्यक्ष-प्रणाली (डाइरेक्ट मेड)
अस्तुएकहीमागंहै। देवनागरी लिपि, जो सारे देश मे अपेक्षाकृतसर्वाधिक व्याप्त है, भारतीय प्राचीन वाङ्मय की भापा-देवभाषा संस्कृतकी अपनी लिपिरहै, उसके माध्यमस्षे हम आरभिक ज्ञान प्राप्त करे!देवनागरी लिपिं क्षेत्रीय भाषाोंकी वणंमाला, उनके विदोष अक्षर,उच्चारण, मात्रां, सामान्य व्याकरण, वाक्यरचना, देणज शब्द एवं संस्कतसे प्राप्त तत्सम ओौर तद्धव शब्दों के उदाहुरण आदि का कामचलाञ ज्ञानप्राप्त करने के उपरांत सम्बन्धित क्षेत्रीय भाषाके किसी मान्य लोकप्रिय
ग्रंथ को चूनकर उसके अध्ययन द्वारा अपने अजित उपर्युक्तं ज्ञान का
अभ्यास किया जाय । धीरे-धीरे, अभ्यास के वारा उस भाषा मेंअभीष्ट ज्ञान सुलभ होगा। ग्रन्थ के चयन में यह ध्यान रखना जरूरीहैकि उसका कथानक देशक दूसरे क्षेत्रों मे पूवपरिचितदहो। रामायण,महाभारत, इस्लामी हदीस, पारसी गाधा, सिख गुरुओ की वाणी आदि रएेसेविषय हँ जिनमें वणित कथानक ओर उपदेश सारे देश की जनता को भलीभति मालूम है| अक्षर-वोध, सामान्य शब्द-परिचय ओौर व्याकरण-बोधके साथ-साथ, कथा का विषय जाना-ससञ्ला होने पर शिक्षार्थी को-लिपि,भाषा ओर साहित्य के माध्यम से अपने को-- सारे राष्टर्‌ का व्यावहारिक
दृष्टि से सच्चा नागरिक वनने के अभिलाषी को-- उस भाषा अथवा ग्रन्थ कोसमक्न मे सरलता हौीगी ।

इस मागं से एक क्षेत्र का निवासी, सव अथवा

अधिकसमे अधिक क्षें कौ भाषाओं ओर वहां के लोक-साहित्य कोआत्मसात्‌ कर सकता है । अलवत्ता यदि किसी भाषा-विश्ेष मेँ अधिकपारंगत होने की अभिलाषादहै,
अपनाना जरूरी होगा ।

तो उस भाषा के विरेष अध्ययन का मार्ग

|
|
,
`
11
देवनागरी लिपि केःयह तो हुई भावात्मक एकता. की बात।माध्यम से अन्य भारतीय भाषाओं के पठने-समक्चने की एक ओौर जरूरत भीवैदाहो गयी है। बहृत्त बड़ी संख्यामें एक क्षेत्र या राज्य के निवासी
दूसरे क्षे अथवा राज्यम स्थायी तौर पर बस गये ओर बसतेजा रहेरहै।वहु अपने परिवार ओर सक्षेच्रीयो के साथ परस्पर तमि, बंगला, सिन्धीआदि अपनी मातृभाषा वोलते है, ओर परम्परा के अभ्यास से सदेव बोलतेभी रहैगे, किन्तु उस क्षे्र-विशेष मे शिक्षा-दीक्षा पाने के कारण वच्चे अपनीलिपिके ज्ञान से अपरिचित रह्‌ जाते हैँ । फलतः निव्य की बोलचाल कोछोडकर अपनी मातृभाषा के सम्पन्न ओौर बहुमूल्य वाङ्मय से वे अपरिचित
होते जा रहै है, ओर इस प्रकार अपनी क्षेत्रीय संस्कृति से दिन-प्रतिदिन दुरहोते जागे । अन्य क्षें में आवासित्त उन परिवारो, जिनकी सख्याआज के आजाद भारत मे घपरिमित है, के लिए तौ अनिवायंतः-आवश्यकटहै कि देवनागरी लिपि मे भपनी मातृभाषा के अमूल्य साहित्यको पढ़कर अपनी क्षेचीय साहित्यिक निधि को अपने बीच संजोये रखें ।
उपर्युक्त प्रयास से यह्‌ किसी प्रकार अभीष्ट नहीं कि भारतम प्रयुक्तअन्य लिपियों के शिक्षण अथवा प्रचारमेंजराभीक्मीहौ। वह्‌ वैसेही, वरन्‌ अधिक फलती-फूलती रहं । किन्तु यह भी न भुलना चाहिएकि मन्य भाषाओं ओौर लिपियों से सम्बन्धित जन, अथवा आपको लिपि
आओरभाषाकेही लोग जो परिस्थिति-वश दूसरेक्भेलो में स्थायी तौर परवस गये ह, उनको आपके प्रचुर साहित्य से वञ्चित होने की परिस्थिति पदानहोनेपाये।द्रो हजार वषं पूर्वं तमिलनाडु के अमर सन्त तिरुवल्लुवरका "पञ्चम वेद' समज्ञा जानेवाला नीति-ग्रन्थ 'तिस्क्कुरद््‌' अपनी लिपिके साथ-साथ, देवनागरी लिपि के कलेवर में राष्ट के कोने-कोनेमेंलोकश्रिय होने के स्थिति मेंआ जाय, यहु संकल्प भी कम पुनीत नहाँ।चेपाली लिपि मौर भाषा
हिमाज्चल.मे -सरोवर-स्वरूप नेपाल का भव्य राष्ट शोभायमान है ।

भगवान्‌ पञयुपतिनाथ ओर

माता गु्येश्वरी का पावनधामदहै।
उस
पुनीत क्षे मे एक्‌ बार मूञ्े जाने का सौभाग्य प्राप्त हृभादहै। वह्मकीआदिम लिपि ओर भाषा नेवारी है। किन्तु धामिक अर सास्छृतिकप्रभावों के फलस्वख्प संस्कृत भाषा ओर नागरी लिपि का बोलबाला हआ;ओर कोने-अंतरे के अच्चलों मँ नेवारी' के वतंमान रहने के बावजृद,नागरी लिपि मौर संस्छृतं भाषा से उद्भूत नेपाली भाषाका दही प्राचृयंहै।ज्ञातव्य है कि नागरी लिपिको नेपाली लिपिकी संज्ञा वर्हादीजाती दहै । एक अति मनोरञ्जक प्रसङ्कदै। विगत फरवरी १९७४ ई०
[ १४.मे पवनार आश्रम (वर्धा) में हौनेवाले "नागरी लिपि' समारोह मे भारतमें
नेपाली दूतावास के सांस्कृतिक सहचारी प्रो श्री मानन्धर धूस्वां सायमिनेभाग लियाथा। उन्होने अपने भापणमें चर्चा कीकि प्रथम वार दिल्लीआने पर, उनकी धर्मपत्नी ते हिन्दी साइनवौडा पर दुष्टि डालकर वड़ेकुतूहल से कहा, “अरे ! यहा तो ये सारे बोडं नेपाली" म लिे हृए्‌ 1 “1सारांश यह कि नेपाल की सम्प्रति लिपि नेपाली है, उस्काल्पवहीरहैजोनागरी लिपिका।भानुसक्त रामायण
जन साधारणकी यह्‌ धारणाद कि नेपालमें शिव भौर शक्तिकीउपासनाकादही प्राधान्यहै। भगवान्‌ रामकी चर्चा, यदिदहैमभी ततोनगण्यसी। संयोग से उत्तरप्रदेण प्रच्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष
प्र्यात विद्वान्‌ डं० रामकुमार वर्माजीसे एक वारमभेट हुई मेरे ओौरभुवन वाणी टृस्ट्के भापाई सेतुबन्ध के विपुल कायं को देखक्रर वै अत्तिमुग्ध हुए । उन भापाई कार्योमें, देण के समस्त भापाई रामायण-साहिव्यको नागरी लिपि के माध्यमसे,

एक मञ्च पर बनाते देखकर, उन्होने

“भानुभक्त रामायण' कौ मुञ्लसे चर्चाकी। उनके सृुञ्चाव पर ही नेपालीका यह्‌ ग्रन्थरतत्‌ "नानुभक्त रामाग्रण", आज पारकं के सम्पूख प्रस्तुत हे।नेपाल में धगवान्‌ शिव के अतिरिक्त रामकी मी इतनी विशद चर्चा
मौर भक्तिहैः इसकी पृष्ठि इसी वपं के आरभ में दिली में पुनः हुई।नेपाली दूतावास के सास्कृतिक सहचारी प्रो° धृस्वां सायसि ने चर्चाकी कित केवल नेपाली में भानुभक्त रामायण, वरन्‌ नेवारी भावा भी एक
रामायण लिखी गयी हे, आौर उसकी प्रति काठमाण्डू जाने पर भेजने काउन्होने अशएवासन भी दिया है ।भक्तशिरोमणि भानुभक्त
, नैपाल राज्यके एक छोटे से पवंतीय प्रदेश के परिचिममे समप्तगण्डङी
सलिला द्वारा सिच्चित "तनह" उपत्यका के ‹रम्धा' नामक ग्राम में विक्रमसवत १८७१ आपाढ़ २९ गते के पुण्यदिवस् पर भानुः का

उदय हुआ 1

परमविद्धान्‌ त्राह्मण-करुल के प्रष्यात आचायं श्रीकृष्ण के छः पुत्रों में ज्येष्ठ
धनञ्जय जी के एकमन्न पत्र श्रीभानुभक्तजौ हुए 1 इनका अधिकांश
समय पितामह के साथ व्यतीत होने के फलस्वरूप वे संस्कृत के प्रकाण्डपण्डित हुए 1 किंशोरावस्था के आरंभ होतत-टोते व्याकरण, ज्योतिष एवंपुराणादि पर अधिकार प्राप्त कर लियाया।किवदन्तीहै कि रर व्ष॑की आयु में, एकं दिन एक वृक्ष की छायामें
[१५]उनका एक श्रमिक घसियारेसे साक्षात्‌ हुआ । वह्‌ अपनी दीन-हीन
भवस्थामें भी अपने ग्राम मे सार्वजनिक उपयोगके लिए एकं कूं बनवानेहेतु, कठिन कमाई में से धन सञ्चित कर रहाथा। इसने भानुभक्त केमन में सार्वजनिक सेवा की प्रवृत्ति को जन्म दिया । उस समय वालमीकिःअध्यात्म आदि संस्कृत रामायणोंका ही सवंत आदर था। क्षेत्रीयभाषाओं मे धार्मिक चरित्रं का गान पवित्र नहीं समञ्ञा जाता था।
यह बात कुछ तेपालमें नई नहींथी।

हिन्दी मेँ तुलसी, बंगला-मे

कृत्तिवास, तेलुगु मे कुम्हारिन मोल्ल आदि सभी के सामने संस्छृताभिमानीपण्डितो की ओर से यह्‌ अवरोध उपस्थित हुआ ।किन्तु इन्हीं सबके अनुसार, श्री भानुभक्तने भी जनभाषा मेंरामायण की रचना करके समाज-कल्याण का व्रतत लिया। इस सद्भावनाकासखरोत वही श्रमिक घसियाराथा। अस्तु, भानुभक्त-रामायण की रचनाहर । लिपि नागरी, भानुभक्त रामायण की भाषा नेपाली, किन्तु छन्दरचना मे संस्कृत छन्दो का अनुकरण है। शिखरिणी, शाद्लविक्रीडित,वसन्ततिलका आदि संस्कृत छन्दो की शैली परही कान्यकी र्चनारहै।पाठकों को पृते समय ध्यान रखना चाहिए कि हलन्त ओर सस्वर को
लेखानुसार पाठ करे। रराम" गौर भ्याम्‌" का भेद ध्यानम रखनाआवश्यक है। हिन्दी के अनुसार "राम" लिखकर "राम्‌" जेसा उच्चारण
करने पर छन्दोभङ्ख हो जायगा।

भानुभक्त रामायणः का आधार

अध्यात्म रामायणदहै।
नेपाल के तुलसी, भानुभक्त महाराज की पुण्यलीला विण सं° १९२५आश्विन शुक्ल पञ्चमीके दिन ५४ वषेकी अवस्थामें समाप्त हुई ।प्रति वषं १३ जुलाई को उनकी जयन्ती मनाई जाती है ।
काशी में कष्ठ नेपाली प्रकाशकोंने भी भानुभक्त रामायण केसंस्करण प्रकाशित किये हं । किन्तु उनमें उन्होने व्यवसायिक लक्ष्यसेजनरुचि को मधिक' आकर्षित करने के लिए अनेकं अन्तकंथाएं प्रक्षिप्त कृर
दी है; अपनी ओर से भानुभक्त की शली पर रच करजोडदीरहैँ। दूसरेउनमें हिन्दी मनुवाद का अभावहोनेसेवे नेपाली पाठकके ही प्रयोजन कीरहं जाती हँ । भस्त, प्रस्तुत ग्रन्थ 'सानुवाद भानुभक्त रामायणः को पाकर
हिन्दी-जगत्‌ धन्यः है। भुवन वाणी टूस्ट' के भाषाई सेतुबन्धन मे एकओर शिलारोपण हुआ ।अनुवाद
नेपाली रोमायण के अनुवादक को सुलभ करनेमें कु कटिनाईहई । हम श्री नन्दकुमार आमात्य ओौर उनकी धमंपत्नी सुश्री तपेश्वरी
[ १६आमात्य कै अनुग्रहीत ट कि उन्दोनि इस कार्यभार को सू्चारुटंग सेसम्हाला।
यह्‌ हिन्दी भनुवाद उन्दींकीदेनदं।

विभोचन

श्री उमाशंकर जी दीक्षित, महामहिम राज्यपाल, कर्नाटक प्रदेण की,इन पक्तियोंके लेखक पर एक वडे समयसे कृपा रहीह। दृष्ट कैकार्यक्रम को भी उनसे सराहना प्राप्त है। एक साथ हमारे तीन
प्रकाशनों-- १. (मराठी) श्रीराम-विजय, २. (तमिद) तिरुवल्लुवर्‌ कृततिरक्कुर््‌ ओर ३. (नेपाली) श्रीभानुभक्त रामायण-- का विमोचनअपने पुष्कल करकमलों से उन्होने स्वीकृत किया।सहायक है, अनन्य अनुग्रहुकर्ता है ।

वे हमारे अनन्य

मामार-प्रदशंन

ट्स्टको, करई उदार सदाश्यो, विदानो, एवं उत्तरप्रदेश शास्षनसेप्राप्त सहायता से वड़ा सहारा मिलता राहु! अस्य ग्रन्थों के साथ,नेपाली "भानुभक्त रामायणः भमी अपनी सहज गतिसे प्रकाशित हो रहा थासौभाग्यसे केन्द्रीय उपरिक्षामंत्री माननीय्‌ श्री डी० पीऽ यादव, भारतसरकार के राष्ट्रभाषा सलाहकार वहुभाषासरमन श्री रमाप्रसन्न नायक भौरशिक्षा एवं समाजकल्याण

मंत्रालय

के शिक्षानिदेशक

श्री सनत्कुमार चतुर्वेदी जी की अनुकम्पा हुई)

एवं उपसचिव

उसके परिणाम-स्वरूप

ग्रन्थ परिपूणंता को प्राप्त हुमा । हम उनके भतिशय अनुग्रहीतहैँ।
हम
विश्वास के साथ निवेदन करते किं -भुवन वागी दृष्ट की भाषाई
सेतुकरण की विशाल भौर अद्ितीय योजना उत्तरोत्तर फलवती हौकरशासन जौर जनता को संतुष्ट करती रहेगी ।
,
श्री रघुमलदृस्ट, कलकत्ता के भी हम अत्यन्त आभारी हँ । उन्होने

पाच हजार क

कौ राशि सेट्स्टकी सहायताकी।!
इस ग्रन्थ मेंकिया गया।अतिशय कृतन्न है ।

उसका उपयोग

प्रशंसित टृस्ट एवं न्यास्ीगण के प्रति हम

४+
~&
मुख्यन्यासी सभापति,

भुवन वाणी दृष्ट, लखनऊ

|
भर्ति मक्त सयसाचय(नेपाली काव्य)

|अनुव्रादक-नन्दकूमार आमात्य|

अमससंतकवि भानुभक्त का जन्म विक्रम संवत १८७१ आषाढ़ २९ गते कृष्णाष्टमीतदनुसार १३ जुलाई १८१४ को पश्चिम नेपाल के तनह उपत्यका के रम्घा -नामकग्राम मे हृभाथा। उनके पिता का नाम धनञ्जय आचाय था। उनके पितामहश्रीकृष्ण आचाय संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान्‌ थे, फलस्वरूप भानुभक्त को प्रारम्भिकशिक्षा संस्कृत में उन्हीं से प्राप्त हुई ।उस समय अधिकांश कवि अपनी रचनादि संस्कृतम हीकरतेथे ओर पर्वतीय
अथवा क्षेत्रीय भाषा मे रचना करनेवाले कवियों का मान नहीं था । परन्तु भानुभक्त कोइसकी परवाह नहीं थी । मनमे
दृढ संकल्प था।

इसलिए उन्होने जनसाधारण के

समञ्च मे आनेवाली भाषा में शादृलविक्रीडित ओर वसन्ततिलका जसे संस्कृत छन्दंके ठंग पर सुन्दर ओर सुमधुर ग्रामीण शेलीमें, अध्यात्म रामायणके सातो काण्ड का
अनुवाद कर नेपाली जगत्‌ के हृद्य को जीता ।स्व० मोतीराम भद्र ने अथक परिश्रम से इस सम्बन्ध मेंखोज कीहै।
कवि की जीवृन-कथा में लिखा है कि भानुभक्त को कविता रचनेकी प्रेरणा एक गरीवघसियारा सेमिली थी 1 इस प्रसंग पर विद्वानों के अलग-अलग मतरहै। भानुभक्त नेलगभग २०.२२ वर्षं के अकथ परिश्रम से अन्य रचनाओं के साथ रामायण क सातों
काण्डों का; मञ्जुल काव्य पूणं क्िया। सरल भाषा ओर सरल शैली में भानुभक्तकरत रामायण की उपलन्धि से नेपाली जगत्‌ कृतथं हुआ है । सवत १९२५ आश्विन
शुक्लपक्ष पंचमी के दिन ५४ वषं कौ अवस्था मे अमर कवि भानुभक्त का देहावसानहुआ । प्र्तिवषे, १२३ जुलाई उनका जयन्ती-दिवस है ।सौभाग्यसे भुवनवाणी टृष्ट, लखनऊ के प्रतिष्ठाता श्रीनन्दकुमार अव्स्थीसेभेंट होने पर वाणी सरोवर" त्रैमासिक के माध्यमसे राष्ट की समस्त भापांओंकेसद्ग्रन्थों भौर विशेष कर रामायणो के हिन्दी अनुवाद सहित देवनागरी ज्लिप्यन्तरणके उनके महान्‌ आयोजन

को देखा । नेपाली की भानुभक्त-रामायण

कोभी नेपाली

क्षेत से वढ़ाकर समग्र देशके सम्मुख प्रस्तुत कर देनेका पुनीत संकल्प ओर प्रस्तावउन्होने मेरे :सामने रखा 1 सुतरां भगवान्‌ का ध्यान कर उनके प्रस्ताव को स्वीकारकेर, नेपाली रामायण का मूल-पहित हिन्दी-अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूं।आशा है पाठकवृन्द मेरी कमियों कीओर ध्यान न देकर पावन ग्रंथ काःप्रसादग्रहण करेगेजर्हा तक नेपाली लिपि मौर भाषा-की बात है, वह हिन्दी-भाषी केलिए अपने ही परिवार जसी है। उच्चारण के सम्बन्ध मे एक वात उतल्लेखनीय है किकिसी शब्द के अन्तिम अक्षर मे हलन्त-चिह्लन लगा होने पर उसे सस्वर ही पदठें।हिन्दी के समान हलन्त न पढें! “राम! लिखा होने पर "रम्‌" नही, वरन्‌ राम(1.2.113. ) उच्चारण करे ।

नन्दकुमार आमात्य

9८ 0८ २

पदर न

1
+
४८
+

श्या म-पञ्चायतनल

६;
{द
ह८५
"०
७ह2
१ विं
६4
"न 9४
~

ल (नि

॥५ भ

८3
€ ५
~
ॐ;
1धः
० +.
=ौ
[म
मार

=र[भाधय्‌

|6बा्लक्रायह्व

~
;
--

ब्रह्मा-चारद-सवाद

एक्‌ दिन्‌ नारद सत्यलोक पुभिगया लोक्क गरू हत्‌ -भनी 1पनि ॥ब्रह्मा ताहि धिया पव्या चरणमा'. खणी गरायाक्याःसोष्छौ तिमि सोधभन्छसःभनी सर्जी -भयेथ्यो.-जंसं \ब्रह्माको करुणा बु्षेर ऋषिले ` विन्ती ग्घ्य यो तसं ।(१।हे ब्रह्मा !' जति हृत्‌ शुभाशुभं सवै सूती -रह्याष्टु : `कषु 1:

बकी "छैन .तथापि. सुच अहिले. :इच्छा म यो

गरदा

आञ्ला. जव यो क्ली बखतसा प्राणी. -दुराचार्‌ भूरई.।गर्न्याछठिन्‌ सब -पाप्‌ अनेक्‌ तरहका . नीचका सतीमा गई ।\२॥साँचो.-बात गर्न .;कोहि अरूकं . गर्नन्‌ः. त्ति निन्दा पनिअक्को. -धन॒ -खानलाईइ ,अभिलाष्‌ गनैन्‌. असल्‌ :.हो भनी.॥कोही जन्‌ तं परस्तरमा रत हनन्‌ - कोही त॒ -हिसामहां +देहैलाद्‌ `त आत्म जानि 'रह्नन्‌' नास्तिक कः तहा ॥३।।'ब्रह्मा-नारद-संबाद
(
9
04
एङ्र दिन नारदजी लोकदित के. लिएः स्वगंलोक पहुचे । नरह्याजी वहांविराजमान थे, तत्कालं उनके "चरणों में ज्लुककरनारदने उन्हं 'प्रसच्चकिया । , ब्रह्माजी द्वारा जंसेदही 'आज्ञा.हुई, तुंम क्या पूना "चाहते `हीःपुष्टो, तैसे ही ब्रह्माजी की. अनुकम्पा समक्षकर ऋषि ने. इस: प्रकार 'विनती
की १ हेब्रह्या! [संसारमे।जो कुछ भीशुभाजुभ हो स्हाहै वह मै सुन.रहाह; 'मु्ये सुनने कोक भीबवकी नहींहै)फिरभी गै इस संम्बन्धमेजानने का इच्छक हुं कि जवे कलियुग-का संमय अयेगा तोप्रणी दुराचारी
आरःबुद्धिश्रष्ट होकर अनेकः "प्रकार के पाप करेगे! २ ` .सच्चीः बातोंक कभी पालन नहीं करेगे वरत्‌ 'ओौरोकी निन्दाकरेगे 1. दूसरोःकेःधन .को हडपना ही ठीक 'समन्नकर उसकी कामना. करेगे 1 "कुछ लोग तोपरस्त्री पर आकषित
होगे 1 नास्तिक लोगशपंञु के समार्न.शरीरको हीः

आत्मा समञ्ते रहगे। ३

भोग-विलास कै सेवक `बनकेरः स्वी को देवता

भायुभक्त-रामायण

२०
कामका चाकर ज्ञं भयेर रहनन्‌माच्न्‌ पित्र र मातृलाइ वृक्नि खुम्‌ब्राह्मण्‌ भँकन वेद वेचि रहनन्‌धन्‌ ट्लो छ पनी भन्या सहज धन्‌जाती धमं रहैन क्षविहरुमाशूद्रादी त॒ तपस्वि होद्‌ रहनन्‌स्तरी.धेर्‌ भ्रष्ट हनन्‌ पतीर ससुरा-
यस्ता नष्ट कसोरि मक्त त हुनन्‌यो चिन्ता मनमा भयो र॒ अहिलेआयाको छुं दथानिधान ! कसरीयस्तालाद्‌ उपाय तनं सजिलोमेरो ' . चित्त वबुन्ञाइवक्सनुहवस्‌
स्तीलाई दयौता सरी)शत्रू सरीको गरी॥कोही पदुन्‌ तापनि।आजंन्‌ गरौला भनी ।।४॥जो छन्‌ इ नीचाहुरू।ब्राह्मण्‌ सरीका वरु ॥को द्रोह टूलो गरी।;संसार सागर तरी ।॥*५॥सोधँं उपायै भनी।तनंन सहज
ई पनि ॥
कन्‌ हो उ आज्ञागरी।क्याले इ जान्छन्‌ तरी ।॥!६॥
नारदुले दुनिर्यांउपर्‌ गरि दया विन्ती गस्था यो जसं।ब्रह्माजी पनि खुप्‌ प्रसन्न हुनुभं मर्जी भयो यो तसं।हं नारद्‌! सब पाप हर्नकन ताआर्कोः मुख्य उपाय छेन सबको

रामायणैने

सरी!

दित्‌ यै छ अमृत्‌ सरी 1७]

के;समान्‌ मानेंगे । माता-पिता को उपेक्षा कर उन्हे शतु के समान मानेंगे.
ज्राह्मण- होकर भी वेदों को बेचकेर [अर्थात्‌ लोभवश वेदोंके अथंकाअनर्थं कर| धनोपाजेन को ही सब कुछ समञ्चेगे । ४ क्षत्रियो मे व्याप्तजाति-धमे भी नहीं रहेगा वरन्‌ शूद्र लोग ब्राह्मणों की तरह तपस्वी वनेगें ।पति ओर ससुर से द्रोह कर अनेक स्तर्या भ्रष्ट होंगी । इसप्रकार नष्टहए, लोग: करस तरह संसार-सागर कोपार करके मूक्त हो सकंगे ? ५.
यही च्रिन्ता मेरे मन में उत्पन्न हुई है, अतः मै आपसे इसका. उपाय पुते'
आयाहुं।
है दयानिधान ! ये प्राणी सहन ही कंसे पारदहौोगे?

रएेसोंः

के लिए वह.कौन सा उपायै, आज्ञा करके मेरे चित्त को समज्ञाइए कि

ये"कंसे पार होगे।६

नारद नेजंसे ही संसार की इन समस्याओंके

व्रिषय मे. विनती की, `ब्रह्माजी ने अच्यन्त प्रसन्न होकर इस. प्रकार आज्ञादी ।:.-हैनारद ! सवके पापोंको मिटाने के लिए रामायण के सिवायौर.कोई मुख्य उपाय नही है । अमृत के समान सवके दित इसी मे निटित
ह । ७. महादेवजी से [उपर्युक्त | इन सव,तत्व की बातों को सुन कर पा्व॑तीजी रामनाम
की. अपार महिमा जानकर गान करती हैँओर आनन्दित
` नैपाली-हिन्दी.
९१
शम्भू देखि सूनेर तत्व: सब यो गान्‌ः पारवती गदेष्िन्‌ 1“पदंछिन्‌ ॥'रामको. नाम. अपार जानि बहते . जानन्दमाजस्ले गान्‌कन ` गरदैछन्‌ त ति .सहज्‌ संसार पार्‌ ` तदेछन्‌. 1
कालैको पनि तप्‌ ` हुँदेन ` भयः सब्‌ ` तिन्का सहज्‌ टदेछन्‌ ॥८॥।.
यो सब्‌'शास्तरविषे बड़ो छ रघूनाथू्‌- को रूप्‌ ` जनार्ईदिन्या1-

जो छन षब इःपुराण्‌ हरू इ सवमा

गन्‌ कीर्तन -सुन्दछन्‌' पनि भन्या

मुख्य जानीलिन्या ।

यो पाडंछन्‌ फल्‌ भनी । '

तिन्को पुण्य बखानः गनं त सवे ' सक्तीनं ` मैले" पनि.॥९।।.
सून्याथ्यां शिव देखि यसूकि महिमा एक्‌. लोक्‌ पून्‌ तापनिं.[.भक्तीलेः यदि थो पडयो पनि भन्या पाप्‌ छुटतछन्‌ सब्‌ भनी ॥जो एक्‌ चित्त गरेर पाठखृशि भै गछन्‌ सदा ये भन्या।`
जीवनुमृक्त तिनै त हुन्‌ नर भर्ई ` ईश्वर्‌ सरीकाबस्या॥१०॥पजा पृस्तकको गग्या पनित फलू एक्‌ अश्वमेधृका -सरी 4 ,पान्‌ सुनि यो करीं -पनि -भन्या पाप्‌ द्ृट्‌तछन्‌ तेस्‌ धरी ॥,जो ती पस्तकंका नजीक्‌ गद नमस्‌- कारं फगत्‌ गदंछन्‌ 1.तेस्ता जन्‌ सब देवता पुजि हन्या फल्‌ भोगमा पदंछन्‌ ।॥ ११।।चारे वेद `परं शास्व्रहरको व्याख्यान -गर्दा पनि.पाईदेन,उ फल्‌ त पाउंछ सहन्‌ पुस्तक्‌ . दिनाले - पनि...
होती दहै! जो उनका गुण-गान ध्यान से करता है वह सहज हीसंसारसागरसेपार उतर जाताहै। उसे कालकाभी, भय नहीं होता 1 ८रघुनाथ का परिचय कराने वाले ये सब शास्त्रादि ' महान्‌ हैँ। पुराणम
जोभीदैउसी को मुख्य मानकरजो कीतेन करतेहै ओौर सुनतेहै याजानते हँ कि -उन्हँं अवश्य फलः प्राप्त होगा, उनके पुण्यो कां पुरा वर्णनं

करने मे मै समथं नहींहं।९

इसकी महिमा मने शिवजी से सुनी

थी जो कि प्रस्नतापूवेक सदेव एकाग्र मन से (रामचरित का) पाठ करते
है। भक्ति भाव से [रामचरित.का] एक-ही श्लोक पठने पर, संब पापों
से छटूटकारा मिलता है ओर जीवन से मुक्त होकर पुरूष ईष्वर के समानं
हो जाता हैः! १२ (रासचरिति की) पृस्तकपूजा से भी एकं अश्वमेधय्न के समान 'फल मिलता'है. उसी क्षण पापमिटजाताहै। जो उसपुस्तक के निकट जाकर केवल नमरस्कारही करते वेजन भी सनदेवताओं के पूजन से मिलने वाले फल को-भोग करते है। ११ चासं११
२९

भानुभक्त-रामायण

भक्तीले कंहि, -भक्तका

घर ` गई

एकादशीमा

चौबीस्‌ .पल्ट पुरश्चरम्‌ गरि हन्या ; गायत्तिका फल्‌ भया
कल्या ।
१२):
जसूले -रामूनवुभी उपासि वुशिति .`जाग्रन्‌ समेतंतै गरी ।:यो रामायण पार्‌ गरोस्‌ कि त सूनोस्‌. . तन्‌. मन्‌ .यसमा. धरीं॥उस्ने ती्थपिषठे तुलापुरुष दान्‌ ूर््यग्रहण्‌मा . गव्यो 1.यस्मां संशय छेन जान्नु सवने आनन्दमा त्यो पञ्यो ।1 १३।।.रामायण्‌ कन .गाडउन्या पुरूषको अज्ञाः त: इन्द्रे पनि.मान्छन्‌ श्रीरघुनाथका त्रियडइ्‌ हुत्‌ माच्या इनं हृन्‌ भनी ॥रोज्‌-रोज्‌ यस्‌ कन पाट्‌ गरेर.जनले सत्‌ कमं गछन्‌ जति ।कोटीगुण्‌ फल वढ़ति मिल्छ सवको घट्तंन तिन्‌का रति ॥ १४यस्मा राम्‌ हृदये छ पाप्‌ हरि लिन्या क्वे ब्रह्मघाती पनि.शुद्धात्मा बनिजान्छ तीन्‌ दिन पड़ा . गछन्‌ कृपा राम्‌ धनी ॥रोज्‌, रोज्‌ तीन पटक्‌ अगाडि हनुमान्‌ राखेर पाट्‌ गं जो।जस्तो भोग्‌कन गनं खोज्दछ उ. भोग्‌ सम्पूणं 'पाञछ सो | १५जो यो पाट्‌ तुलसी पिपल्‌ वरिपरी -गष्ठेन्‌ प्रद्िण्‌ -गरी।.तिनूका पाप्‌ सव जेन्मका जतितछन्‌ ुटृख्न्‌ ति तेसं घरि.।1वेदों को पढ़कर व्याख्या करने पर भी वह्‌ फल प्राप्त नहीं होता जो केवलपुस्तक का दान करने सेप्राप्त होता है। एकादशी में भक्तोंके घरजाकर 'भक्तिपूवंकं ' (कथा) कहने से तथा चौवीस वार गायत्री का
पुरश्चरण जाप करतेसे प्राप्त होने वाले फल के समान पुण्य प्राप्तहौगा +, १२. रामनवमी मे, उपवास करके तथा प्रसन्नतापूवेक
जागरण करके जो व्यक्ति इस रामायण कापाठ कृरे अथवा ध्यान देकर.
इसे सूने, उसको (सूंग्रहण मे}, तीर्थं के पश्चात्‌ तुलादान करने के तुल्य.पृण्य तथा परम्‌ आनन्द प्राप्त्‌ ˆ होता है, इसमे कोई सन्देह नहीं । १३रामायण गाने वाले पुरुषको श्रीरघुनाथ का प्रिय जानकर इन्द्र -भीउसको आज्ञा का पालन करते है। मनुष्य प्रतिदिन इसका पाठ कर,
जितने भी सत्कमं करते है उन सवके फल की करोड़ों गुणा वृद्धि को प्राप्त
होते है, उसमे. किञ्चित्‌ मात्र भी कमी, नहीं. होती । १४ इसमें ब्रह्मघातक केपापोंकोभी.नष्ट करने वाला, राग्रहूदयं .है। . रामकी कृपासे तीन्‌दिन णाठ करने पर्‌ आत्मशुद्धि होती दै । प्रतिदिन हनुमान का आवाहनकरकेजो पाठ करते है.वे जिस प्रकारके, भोगों को प्राप्तं करना चाहते है
वैसभी भोग उन्हे पूर्णतया प्राप्त होते ह,। १५

जो तुलसी तथा पीपल

नेाली-हिन्दी'

२३

तेस्मा रामगिता छ स्न्‌ अत्ति दलो ` जस्को

महास्स्ये ` पनि.
सब जान्नथा शिवमाच छत अरुतकोः जान्नया छ यस्तो भनी।। १६॥

_ आधा पावेति जाच्दछ्िन्‌ मत

सबं
गीता पाठ गरेर नाश नहून्यारामूले वेद मथन्‌ :गरीकन कविकालक्ष्मण्‌ लाइ दवियां यही पटिलियामार निश्चय कातेवीयं .भनति खुप्‌पट्थ्या श्रीशिवथ्ये गयी परशयुराम्‌पद्थिन्‌. पावेति राम्‌गिता तहि सुनीरामगीता तहि देखि पार्‌ गरि लिया
मद्वा दिन्‌. यहि राम्‌गिता` पडिलियाछंटच्न `तिश्चयं छटत्तछतन सकल पाप
शालिग्राम्‌ तुलसी पिपलू कित बडारामगीताकन पाठ गम्यो पनि भन्या
चौथाइ्‌ पो जान्द्ठ\पाप्‌ छेन यो मान्दे ॥

गीता र. अमत्‌

सरी।
जाइन्छ संसार तरी ।। १७॥
रलो इरादा `गरीं।दिन्‌-दिन्‌ चरण्‌ मापरी।।पार्‌ गनं लागी गया।नारायणे ती भया`।१८]]संब्‌ ` ब्रह्महत्याहरू +भंत्या बखान्‌ क्या गण ॥]
सन्यासिंथ्ये जो गई 1“ठ्लो महात्मा भई 1}१९.
~~ ~~~“ ~~~~~^~ ~~~
"~
के चारों ओर धूमकर इसका पाठ करते है उनके सब जन्मों के किये हुएपाप उसी क्षण नष्ट हौ जाति है । इसमे अच्यन्त महान्‌ ओर माहात्म्यपूणंरामगीता है। [ब्रह्माने कहा] इसको पूणंरूप से जानने वाले केत्रल'शिव ही
है. १६ [इसको महिमा का ]अरदधश पावती जानती है, मै तो केवलं चौधाईही जनतांमैँ'यह मानता हूं किंसंसारमें कोई एेसा पाप नहींजोंरामगीताका

पाठ करनेसेनष्टन

ही।

-रामने वेदों का.मंथन केर

गीता ओर अमृत को निकाला ओौर लक्ष्मण को'दियां, इसे पठने से सभीप्राणी संसार सागरसे तर जायेगे 1 १७ कातंवीयं" (तथा उसके वीरो)कों मारने का निष्चय कर वहत बड़ी 'इच्छाले करके परशुराम प्रतिदिन
श्रीशिव के चरणों की वन्दना करते गये! वहीं पावती रामगीता पठतीथी, इसी को सुनकर वे भी रामगीता कारपाठःकरने लगे ओर [फलंतः |नारायण-रूप हो 'गये । १८ जव एक `महीना यह राम गीता पढनेसेब्रह्महत्यादि सभी पाप समाप्तहो जातेदहैँतो ओर सभी पापोंकेमिटने-केवारे मे क्या वर्णन करं] शालग्राम, तुलसी, पीपल .या महान्‌संन्यासियो कै पास जाकर रामगीताकापाठकरनेसेभी बहुतसे लोगंमहात्मा वन गये ह.1 १९ जिस फलके बारेमे मंहसे वणन नहीं कियाजा सक्ता है-उसी फल का वह्‌ [रामगीता कौ पढ़ने वाला | भोग करतां

भानुभक्त-रामायणं

२४
जुन्‌ फल्‌ छन मूखले भनी न सकिन्याकोटी श्राद्धविषे पुन्‌ त तिनका

ल्हे खूब नियम्‌ गरी दशमिमा

आसन्‌ वाधि अगरस्ति-वृक्ष-मुनि पाट्‌रामगीता उपवास्‌ गरीकन वहत्‌तेस॒लार्ईद त नभन्न मानिस भनीदान्‌ ध्यान्‌ तीर्थं कदापि केहि नगरीवस्छन. जो ति अनन्तका

पदविमा'

सो फल ति भोग गदन्‌ ।पितसवतदशछन्‌ ॥

एकादश्ीमा

पनि 1

गर्छ म गीता भनी ।२०॥
आदरः गरी पढ्छ जो।रामे सरीकोत्यो ॥योरामगीतापदी
पुरन्‌ सहज्‌ पार्‌ तरी।।२१॥
धरे वात गरेर हुन्छ अव क्या रामाप्रणे हो जवर्‌ ।अवर्‌ ॥पाप्‌ हर्नाकन छेन केहि वुञ्चियो येसे सरीकोजो छन्‌ तन्त्र पुराण्‌ श्रुति स्मृतिइता सोद्ठं कलामा पनि ।पुग्देनन्‌ 'त वखान्‌ कहांतक गरू यो फेरि ट्ूलो भनी 1२२जो रामायणको

महात्म्य विधिले

नारदजिलारईकल्या |.नारद्‌-पनी खश्‌ भया 1
जन्‌ सूनीकन चित्तले वुर्खिलिदापाट्‌ गछन्‌ कित सुन्दछठन्‌ यदि भन्या यो येति सुन्दा पनि। .जान्छन्‌ सब्‌ उहि विष्णुका पुरिमहां खुप्‌ पूज्य सव्‌का वनी।।२३॥है। को श्रद्धके वारेमे भीपषटतो उसके सव पितर तर जाते है!प्रथमं नियमों का पालन करके दएमी या एक्रादणी मे आसन रवाधकरअगस्ति वृक्ष के नीचे वैठकर मँ रामगीताकापाठकरता हूं) २० जौ
उपवासं करके रामगीता को वहत आदर के साथ पढ़ता है. उसे मनुष्य नहींकहना चाह्विए वह तो राम के समानदहै। दान, ध्यान, तीथं आदि कुष्ठःभी.न केर केवल इसी रामगीता को पट्कर जो रहता है वह॒ अनन्त-पदों

को.सहज -ही पार करके तर. जाताहै। २१

अधिक वात क्याकरना

जव यह जान लिया किं रामायण ही वलिष्ठ (सर्वश्रेष्ठ) है ओर दसकेसमानं पापको हरण-करने वाला (दूसरा) कु नही, जो भी तन्त्र, वेद,पुराण ओर धर्मशास्त्रादि हैँ वे इसकी सोलहवीं कला के भी समान नहीं.तो फिर इसकी महता का कहाँ तंक वणेन करं ? २२ ` विधिवत्‌ कहेगये रामायण के इस माहात्म्य को चित्त से समञ्लकर नारद अत्यन्त प्रसन्नहए ओौर इतना कहा कि जो भी इसका पाठं करते अथवा सुनते हैँवे सवकेअत्यन्त पूज्य बनकर विष्णुलोक में जाते हैँ २३ भगवान्‌ सदाशिव
कलाशमे. बैठे हुए, बायीं ओर अपनी ,गोद मे अति प्रिय तथा हितैषिणी

. नैपाली-हिन्दी

; द्‌
केलासूमा.भगर्वान्‌ सदाशिव थया ` ध्यान्‌मा बहूत्‌ मन्‌ दिई ।बार्यां काखमहाँ पियारि हितकी श्री पाववेतीजी लिई॥एक्‌. दिन्‌ पावंतिले . तहं शिवजिथ्यं सोधिन्‌ . चरणूमां परी ।आर्‌ ता. सब -जान्दथिन्‌ तर्‌ दया सम्पुणे लोक्मा गरी ॥ २४1हे नाथ्‌ ! बिन्तिम्‌ गरदेष्ट्‌ हजुरमा ` राम्‌ हुन्‌ जगत्‌का पति ।राम्‌देखी ` अरु , कोहि . छैन जनक्रा संसार . तर्न्यां . गति॥सागरमहां ।:जसूमा भक्ति गव्यो भन्या अति गंभीर , संसार .नौका ज्ञ तरिजान्छ स्चट्पट ` ग॑री.. तेस्‌नरको देह तहां ॥२५॥यस्ता राम्‌कन,. लोकमाः जनहरू. एक्‌ . ईश्वरे -मान्दछन्‌ ।कोहि तत्तव॒ नपाइ मूखंहरु ता मानिस्‌ सरी जान्दछन्‌ ॥क्या भन्छन्‌ ति. कि राम ईश्वरः भया ` शोकं क्यान तिनूले ग्या |.सीताः ` रावणले .जसं हरिदियोः रल विपत्‌मा पत्या ॥२६॥ईश्वरलाइ त शोक्‌' हुदेन र भन्‌ हैदेन ` ` अज्ञान्‌ पनि।'इनूमा ` यो -सब देखियो त कसरी जान्‌ इ ईश्वरं भनी ।॥लोक्‌ यस्तो पनि भन्छ कोहि भ॑गवान्‌ यस्मा विचार्‌ खुप्‌ गरी।जस्तो हौ सब यो ` बताउनुहवस्‌ं सन्देह मेरो हरी ।२७।पावती जी को बैठाये अत्यन्त ध्यानमग्न थे । `.एक दिन पावैतीजीःनेचरणों में श्लुककर, स्वयं सव जानते हुये भी, सम्पूणं . लोक के .प्रति दयालुहोक र-कहा--। २४. हेनाथ. मै विनती करती हं कि रोम जगत्‌पतिहै. । - साम केः सिवा, [भक्त-] जनों को संसारसे तारने वाला ओरं कोईनहीं है1: उनकी भक्ति रूपी त्नौका के सहारे मनुष्य ` अयन्ते गंभीरंसंसारसागर सेः तुरन्त परह जातादहै। २५ .एेसे रामको जगत्‌ में.(बुदिमान्‌ )मनुष्य केवल ईश्वर हीः मानते.है ।. पर मूखं लोग तो कोई तत्वन पाकर [उनको मनुष्य की तरह ही जानते हैँ । उनका कहना है क्रि यदि
राम'ईश्वर.हैँ तो रावण के.सीताहरण करने पर उन्होने शोक क्यो कियाओर इतनी. विपत्ति में क्यो पड़ गये ! २९ ईश्वर को शोक नहीं-होता
ओर अज्ञान भी नहीं होता । राम मेँ.शोक, अन्नान~दोनों ही. देखा गया;
फिर इन्दं ईश्वर कंसे माने--कोई मनुष्य एेसा भी कहते. हैँ । ` भगवन्‌ |इस पर विचार क्ररके,..जसेभीहो, मेरे मनके सदेहकोद्ुरकरने केलिए यहं सब बताने की छपा :करें । २७ पाववैतीजीं के: एसे प्रश्नोंको सुनकर शिवजी अत्यन्त प्रसन्न हुए

रामदेसेही परभुर, . यह कहते

२६

भानुभक्त-रामायण

यस्ता प्रर्न ` सून्या, र पावेतिजिकोराम्‌ यस्ता प्रभु हुन्‌ भनेर शिवेसून्यौ .पा्वंति { राम्‌ अनादि परमेसन्‌ ढाकीकन ` वस्तछन्‌ अधिविराद्‌जस्त सम्बकका नजीक्‌ परिगयातेस्ते जस्कन पाइ नाच्तछ जगत्‌यस्तो तत्व नजानि मानिस सरीसंसारक्रा इ अनन्त तापृहर . तिनैबादलूले.अरु ढाक्छ टाक्छ अरु व्यालोक्‌ ता भन्छ उठ्यो र बादल दलो
णम्भू खुशी घुष्‌ ..भया।सव्‌ तत्व :ताहीं क्या ॥
वर्‌ हुन्‌ ति याकाश सरी ।सम्पूणं सृष्टी गरी ।२८॥नाच्छन्‌ इ लोहा. पनि ।नाना प्रकार्‌ को वनी ॥राम्‌लाइ्‌ -जो गदंछन्‌ ।लाई सदा पदंछन्‌ ।।२९।॥।श्रीसू््यलाई _ पनिसव्‌ सूर्यं ढाक्यो भनी.॥व्यस्तं तत्व न जानि बोल्छजन जो ' सो भन्छ मानिस पनि ।ग्रोगी ज्ञानि त चिन्दछन्‌ इ रघुनाध्‌ तेलोक्यका नाथ्‌ भनी।।३०॥।जस्लाई रिड्टा छ भन्छ उ फगत्‌ धुम्छन्‌ उ पवत्‌ भनी ।घुम्देनन्‌ इ त चुम्छ तेहि रिङ्टा जान्देन. कोहि : पनि ॥अन्नान्‌ रूप्‌ रिडटा हन्या जनहरू ` भन्छन्‌ ति मानिस्‌ पनि ।राम्‌ ता हुन्‌ परमेश्वरे सकल , यस्‌ ..चौधै भुवनूका धनी ।1३१॥
हुए शिवजी ने सव तत्व कह सनाया । सुनो पावती, राम आकाशकीभाति जति महान्‌ दैँ.जर सम्पूणं सृष्टि को उत्पन्न करके सवक्रो आच्छादितकर रहने वाले अनादि परमेश्वर रँ । २८ जसे चुम्बक के निकट जानेपर लोहा नाचने लगता है,वैसे ही जिसके आधार पर जगत्‌ अनेक `प्रकारके रूपोंमे होकर नाच.रहादहै, रसे ,तत्वकोन जानकर, जो लोग राम
को मनुष्य, की भांति ' समन्षते हैँ उन्हीं को संसार की ये अनन्त. पीड़ासदा -दखीः करती रहती हैँ 1.२९वादल सबको पतोढक ही लेता'है\यहां तक ॒किसूयंको .भीढक
लेताहै।!

जग तो कहता है कि.घना

के. नाथ कहकर ही: पहचानते' है । ३०

जिसको चकेकर आता-हैवही

बादल उठा है.ओर उसने पूरे.सूयं को ठक लिया है ` जौ जन तत्व,.कोनही-जानते वेही एेसा कहते है । योगी ज्ञानी तो. इन रघुनाथ, को चिलोक
कहता है किं पर्व॑त. घूमता. है, परन्तु वह घूमता नहीं । कोई नहीं जान पाताकि.वही स्वयं चक्कर में. घूमता दै 1" .अनानरूपी चक्कर से. युक्तमनृष्य ही राम को मनुष्य कहते है । : रामः तो इन चौदह भुवनो के स्वामी

साक्षात्‌ परमेश्वरः ही है ३१

सूयमेभीकही संधेरा है, क्याेसादही

नैपाली-हिन्दी

२७
सर्खयेमा पनि अन्धकार्‌ छ कहि क्या : तस्त. .छ रामूमा पनि.शोक्‌ अज्ञान्‌ रति छेन जानन सबले आत्मा ` इनं हुन्‌ भनी ॥सितारामको-,आर्को गोप्य रहस्य भन्छ सुन -यो सम्वाद्‌भूभार्‌ हनु थियो हव्या जब सबं छिनृान्‌ भयो कामको।।३२॥भूमीको सव भार्‌ हरेर्‌ रधुनाथ रोज्‌ गनं लाग्या जसै।प्रभूको. तसे.देख्या श्रीहुनुमानलाइः र दया आयोसीतालाईइ हुकूम्‌ तहां दिनुभयो सीते.! हनूमान्‌ बडा ।हाग्रा भक्तं भयाः इ तत्त्वं लिनका -खातिर्‌ यहाँ छन्‌ खडा।।३२॥

ईनूलाई पिमि कच्च देड भनि यो हुक्म

भयेथ्यो जसे ।सीतले ` . हुनुमानलाइदिनुभो जुन्‌ तततव हौ सो तसै"॥आर्को तत्र त॒ केहि छेन हनुमान्‌ कृन्‌ . "आज, आर्को कहूं 4 राम्‌ हन्‌ ब्रह्म इनैकरि शक्ति बलियो ` माया भन्याकी स हू! ३४।।रामको सच्चिधि पाद्‌ ग्ट सबको सृष्टी ` रं पालन्‌ पनिआरोप्‌ं रामविषे गरिन्छं सब यो गर्न्या . इने हुन्‌ भनी .॥समके संव॑धमें भी नहीं है ? शोक, अज्ञान आदि दोषोंकाउनमें लेशमात्र भीनहीं । सभी यह जान लँ कि वही सवकी आत्माहं । दूसरा गोपनीय रहस्यकहता हू, यह्‌ सीताराम का सम्वाद सुनो । -पृथ्वीके भारको हरण, करनेवाला कौन था) जब उन्होनेःही पृथ्वी'को भार से रहितःकिया-तभी सबकायं पूर्ण.हुए । ३२ [असुरोंकोमार कर [पृथ्वीके भारको हरण करके जबश्रीरघुनाथ राज्य-सिहासन पर बैठे तो उन्होने श्रीहनुमान कौ देखा । उन्होनेकृपा करके उसी समयसीताकोआज्ञादी, है सीते! हमारे महान्‌भक्त हनुमान .तत्वज्ञान को प्राप्त करनेके लिए खड़े! ३३-जेसेहीसाम का यहं आदेण हुभा कि इन्द तुम तत्वज्ञान .दो, वसे .ही,.सीता 'नै-जो

हे हनुमान {` -राम के ` अतिरिक्त

भी तत्वःथा 'हनूमान को प्रदान किय ।
संसारमें ओौर कोई दूसरा तत्व नहीं!
हे हनुमान,!

ओौर.क्या कह

राम ही साक्षात्‌ पखत्रह्म्है जौरमै इन्दी की गाक्ति-स्वरूप हं । ३४राम काआश्चयं प्राकर |[प्रकृति-स्वरूपा ] नै सब प्राणियों की सृष्टि करतीह, सवका पालन करती हूं! वस्तवमे सव कुं करने व्राले रामदहीदहँविद्वान्‌ लोगों का रेसा ही कथन है 1
[किन्तु राम ब्रह्मस्वरूप)

पृथ्वी

परजो कुष उनकी लीलाएं है, वेः तो. उनको प्रकृति-स्वरूपा मेँ. करसही हं 1] अत्यन्त पवित्न रषृवंश मं प्रभ: रामचन्द्रं जी ने जन्म
५2
~
3
यसूनि्मेल्‌ रघुवंशमा ` प्रभुजिने जो जन्म याही चिया।यज्ञह॒रमा राखी दया मन्‌ दिया।।३५॥निमित्तविष्वामिवजो पाप्‌ गौतमपल्तिका हरिदियाः जो भांचिदीया धनु1जो यैलाइद विहा गव्या सब कुरा यस्ता कहां तक्‌ भनूं |जोता गवैहय्याति वीर्‌ परययुराम्‌- का जो अयोध्या व॑स्या।बाहौ ब्षं विहा गय्यापछि बसी जो ता वनेमा परस्या।३६॥यस्ता काम्‌ जति काम्‌ भया ति सब काम्‌ गर्न्याम हूं तापनि।भन्छन्‌ लोक त रामलाद्‌ सबका कर्ता इनं हृन्‌ भनी ॥

न्तर्यामि ` अनादि साक्षि तिनिहुन्‌

कर्ता कहाँ ती, धिया ।कर्ता भनी पो दिया ।॥२३७॥
मेरा गुण लिदा त॒ लोकहरुलेयेती ताहि सिताजिबाट उपदेश पाई सक्याथ्या जसै।आफ राम्‌ प्रभृले पनी दिनुभयो फर्‌ तत्त्वको ज्ञान्‌ तसे ॥यस्तो हुन्छ परात्म आत्म यहि दही यो हयो अनात्मा भनी।आत्मा ओर परात्मलाइ बुक्चदा पारन्छ मुक्ती पनि 11३८॥आत्माको र परात्मको छ कति फर्‌ त्यो एक जानीलिनू ।जुन्‌ जड चीज अनात्म हुन्‌ उ त ब्मुटा. जानैरःछोडीदिन्‌ ॥लिया, जिन्होने विषएवमित्र दवारा

को अपित किया। ३५

आयोजित

जिन्होने गौतम-पत्नी

यज्ञोमे दया कर

मनं
(अहिल्या) के पापों
का निवारण किया, जिन्होंने शिवधनुषं तोडा ओर जिन्होने मृद्चेविवाहा-इस प्रकार की सब बातोंको कहाँ तक कहूं । जिन्टोने उनवीर परलुराम केदपं को शांत किया, जिन्होने विवाह के.पश्चात्‌ ही

वारह्‌ वषं के लिएवन मेप्रवेश किया । ३६

इस प्रकार के जितने

कायं हैँउन सवको व्रास्तवमेमेदही करती हूं। .जग कहता है कि राम इनसभी कार्योकेकर्तादहं। वे तो अन्तर्यामी, अनादि, द्रष्टा [मात है; वह्‌ कर्ताकहां? मेरे इन [प्रकृतिके] गुणों क्रो जानकर ही संसारने [द्रष्टाराम को] कर्ता कहु दिया । ३७ जब हनुमान सीता से इतना ज्ञानोपदेशप्राप्त कर चुके तो स्वयं प्रभुने भी उन्हें पुनः तत्व का ज्ञान दिया |. आत्माही परमात्मा है 1 अत्मा ओर परमात्मा को समक्षनेसे दही मुक्ति प्राप्तहोती है! ३८ अत्माओौर परमात्मामेंक्याभेददहैइसे ज्ञात कर लेनाओरजो जो वस्तुएँ जड़ ओर आत्मासे परे हैँउन्है मिथ्या जान कर्‌ छोडदेना [यही तत्वज्ञान रहै]आत्मा ओर परमात्मा को विचार कर

. नेपाली-हिन्दी

२९
आत्माको र परात्मको गरि विचार्‌ एक्‌ तत्व जान्यो, जसे ।'
अन्नान्‌ सन्‌ छुटिजान्छ ती पृरुषको मै तुल्य हृन्छन्‌ तसं ॥३९॥ग्रो मेरो हृद्यैतहो भिय छयो खुप्‌ गुप्त राख्नू पनि।'
तत्तवज्ञान्‌ भनि यैकटिन्छ बुक्षिल्यौ सून्यौ हनुमान्‌ { भनी ॥

तत्त्वज्ञान्‌ . हनुमानलाइ

रघुनाथ्‌-. ले यै दिनूभो तहाँ.'

सोही ज्ञान्‌ तिमिथ्ये कहीकन सक्या सम्पूणं मेले यहाँ 1४सून्यौ पार्वति. { रामको हृदय यो जो जो त पार्‌ गदन्‌ ।:जो. छन्‌ जन्म सहस्रका सकल पाप्‌ तिन्‌का सबे टदछनू ॥जाति भ्रष्ठ अधम्‌ हवस्‌ तपनि लौ यस्लाई्‌ खुप्‌ पाट्‌ गरी।रामको ध्यान्‌ पनि गं यो पनि' भन्या त्यो जान्छ संसार्‌ तरी।।४१॥
सूनिन्‌ पावेतिले अपार महिमा यो रमजीकौ जसे!फर्‌ विस्तार्‌ गरी युच्लाइमन भो ती पावेतीकोतसै ॥बिन्ती फोर्‌ शिवथ्यै गरित्‌ पनि तहां हे नाथ्‌ ! -सवे रामको ।लीला सृन्न मलाई मन्‌ हुन गयो येही वबु्यां कामको ।॥४२।।बहुत धरी ।सूनोस्‌ राम-लिला भनेर म उपर्‌ माया-सब्‌ लीलाहसर फर्‌ बताउन्‌ हवस्‌ नोन्‌ ति विस्तार्‌गरी।।[उनके] एक , तत्व होने काजंसे ही ज्ञान होता है वैसे ही -उस
पुरुष को सारी अज्ञानता नष्ट हौ जाती है ओर वहु ` मेरे समानहहौ जाता. है। ३९ यह जौ तत्वज्ञान मैने दिया है यहु मेरा हृदयहै, यहु मेरा त्रिय है; इसे अत्यन्त गुप्त रखना । . यह्‌ समञ्च लो कितत्वज्ञान इसी को कहते हैँ । [शंकरने कहा- | राम ने हनूमान को यहीतत्वज्ञान दिया था। हे पावती, वही मैने तुमसे कहा । ४० हे पावती, सुनो
जो लोग इस राम-हूदय का पाठकरते हैँउनके सह जन्मों मे किये गये सम्पूणं
पाप नेष्टो जाते है। जातिश्रष्ट तथा अधर्मी होने पर भी इसका पाठकरकेजो-रामका ध्यान करतादहै वह्‌ संसारसेतर जाता है ४१ पार्वतीने जव श्रीरामजी की इस अपार महिमा को सुना तो पूनः विस्तारपूवेक सुननेका उनका मन हुआ । फिर उन्होने शिवजी से विनती की, हे नाथ ! मुञ्चेरामको लीला को श्रवण करने की पुनः उच्छा हुरईहै; यै इसे ही कल्याणकारी
समञ्चती हं । ४२ रामलीला की कथा सूना कर आपने मेरेऊपर महती कृपाकीरै} फिरभी राम्‌ की यह लीला विस्तारपूर्वक सुनने की मुने उत्कण्ठा है ।"पावती जी का यह्‌ प्रेमाग्रहु सुनकर शिवजी ने बड़ प्रेम. के साथ सम्पूणं

भानुभक्त-रामायणं

३०
यो प्रेम्‌ पार्वेतिको सुन्या र शिवलेजोजो हुन्‌ सब रामू्‌-चरित्र शिवे

भूभिकन

रावणादि

खुप्‌ प्रेम रालिन्‌ भनी ।ताह वताया पति ।।४३।

विरले भारी

भारी भै ति रदे गदन्‌ उदि जरहपापी धेर्‌ भद्‌ भार्‌ भयो मकन ताआर्यां आज दयानिधान्‌ चरणमायस्तो बिन्ति सुनी दया पनि उठ्योदौडी क्षीर , समूद्रका तिर गयादन्द्रदीहर साथमा लिड स्तुतीसवत्मा भगवान्‌ प्रसन्न हनु भंदेख्या सुन्दर रूप्‌ जसे प्रभुजिकोभक्तीले स्तुति खुप्‌ गरेर खुशिभंहे नाथ्‌, रावण दुष्ट भ सकल लोक्‌इन्द्रादीहरुको त॒ तेज्‌ सहजम

वनाई्‌

दिया।
व्रह्मा वस्याका विया |यो भार द्ूटोस्‌ भनी।
यो विन्ति पारिन्‌ पनि।।४८।ती भूमिमाथी तहां।विष्णु रहुन्ध्या जहाँ ॥तहां

गस्पाथ्या

जस्र)

दर्शन्‌ दिनूभो तसं ।४५॥
ब्रह्मा चरणूमा पन्याहात्‌ जोरि विन्ती ग्या ॥लाई विपत्ती दियो ।खंचेर तेस्ले लियो ।४६॥यस्लाई अव मारिवक्क्सनु हुवसू मानिस्‌ सरीका वनी!मानिसूदेखि मन्यासू भनेर वरदान्‌ दीई र्यापनि॥+^
^~^-~--~~ ~^
~ ^~ ^ ^^
^-^~~
पापियों कौ वृद्धि होनेसे.मृक्ल पर भार अधिक-पड़ाहै। इसभार से छुटकारा तोमिले, हे-दयानिधान ! इसी आकाक्षासे आज मँ आयी हूं । -यह्‌ कहती हईपृथ्वी ने [चतुरानन ब्रह्मा के] चरणो में विनती की । ४४. इसप्रकारविनती. सुनकर ब्रह्मा को पृथ्वी पर दया उत्पन्न हुई ओर शीघ्रहीवे पृथ्वीको चिए हए क्षीरसागर को ओर चले जहां विष्णु भगवान्‌ निवासत करते
थे " इन्द्रादि देवों को साथ लेकर जैसे ही स्तुति कौ, वेमे हीसर्वात्मा भगवान्‌
नेदशंन दिया । ४५ प्रभुजी का भव्य रूप देखते ही ब्रह्माजी उनके चरणोंमे निर-पड़ । प्रसन्न-भावसे भक्तों ने स्तुति की ओौर ब्रह्मा ने हाथजोड़कर विनय की। हे नाथ ! रावण दुष्ट आचरण से सारे संसारको विपत्तिमेडलिहृए है । इन्द्रादि देवताओं के पराक्रम को तो उसनेबड़ी - सरलता से खीच लिया है अर्थात्‌ उन्हं पराजित कर दिया है 1 ४६[सोपा करके | मानव रूप धारण कर अव उसका संहार कीजिए ।

` नेपाली-हिन्दी

बरह्यांको विनती सूनर, भगवान्‌रावणलाद लम,

मारुला

सहजमा

३१
कोयो हकम्‌ भो अनि।मानिस्‌ सरीको बनी।।४७॥
माया मेरि सिताः भयेर रहनिन्‌ छोरी जनक्की भई)गई,॥छोरो भैकनः जन्मुला .स दशरथ्‌ जीका घरेमासीतालाद्‌ : ` लिधेर पूणं गरंला.. ब्रिन्ती"म तिस्रो'भनी।'
अन्तर्घान्‌ ` भगवान्‌ तहीं हुन्‌भयो. वैलोक्यका नाथ्‌ अनि।। ४८॥]
अन्तर्धान्‌ : भगवान्‌ जतै हनुभयो ˆ इन्द्रादिलाई : । पनिब्रहयाले .. खुशि भं अह्वाउन्‌भयो भूलोक , जाऊ ` भनी ॥मानिस्‌ भै भगवान्‌ ` जती त रहनन्‌; तेस्‌ पृथ्वितलूमाः ` गर्ह ।
बानर्‌ शभैकन सन्‌ तिमि "बसिरह्या . साहाय जस्ता .. भई ।।४९॥
ब्रह्माजी पनि ‹ सव्यलोक्‌ गदगया येती `... अह्ारईवरीः।:इन्द्रादी पनि वानरैः भद्‌ रह्या ,*सब्‌ पृथ्विलोक्माः:क्चरी.॥ये बीच्मा :दशरथ्‌ बडा विर धिया. राजाअयोध्यामहाँ।तिनको बद्ध उमेर्‌ भयो र पनि एक्‌ . छोरा भयेनन्‌ तहां ।॥ ५०1
तापले पूणे भर्ई' गुरूसित गया `सोध्या "` उपायं. ` पनि 1हे स्व॑ज्ञ मून!

कसो गरि हुनन्‌

छोरां . मलाई"

.भनी॥
(मनुष्य के हाथो मरेगा' एेसा वरदान भीम उसकोदे चुका हूं। : ब्रंह्याकी इतनी विनती सुनकर भगवान्‌ की यह्‌ अरनुग्रहवाणी हई, मँ मानवःरूप
धारण कर सहजः ही रावण का विनाश कर दंगा । ४७ ` मेरी शित, सीता
लाम से जनक की पत्री होगी; `मै.दश॒रथ,. के धर में, उनके पूर्व केरूप में जन्म लूंगा । सीता को लेकर मैं तुम्हारी आकांक्षा पूरी करूगाः।इतना कह कर त्िलोकीनाथ. भगवान्‌ विष्णु वहीं अन्तद्धानि हौ गये. 1:४८जसे ही भगवान्‌ अन्तर्धान. हुए, ` प्रसन्न होकर ब्रह्मा जीः ने ` इन्द्र कों-भीमानवलोक मे जने. का अदेश दिया । .जव तक; भगवान्‌, मानवलोक
पृथ्वी मे मनुष्य होकर रहँ तव तक तुम बन्दर , होकर उनके . सहायक कीतरह रहो ।*४९. इतना कहकर ब्रह्मा .जी भी स्वगंलोकः को. चले गये +
इन्द्रादि [देवता | भी पृथ्वी मेँ उतर कर.वानर बनकर ` रहने लगे! इन्हींदिनो अयोध्या में महान्‌. वीर राजा दशरथ [राज्य कर रहै] थे। , उनकी` वृद्धावस्था आजने- तक, भी कोई पत्र नहीं हुजा। ५०. - चिन्ताग्रस्तहोकर राजा दशरथः ने.गुर्‌ (वसिष्ठ). के पास जाकर अपनी चिन्ता .केनिवारण का उपाय पूषा । है मुनिवर! मून किस प्रकार पुत्तःप्राम्ति
३९

भानुभक्त-रामायण

यसूकामूले फल. मिल्छ यो भनि सबं जान््या वंशिष्ठे शियायस्तो. विन्ति सुनी वशिष्ठ गुरुले युक्ती वताई. द्या ।॥५१॥हुन्छन्‌ पत्र ` अवश्य जल्द महाराज्‌ एक्‌ यन्न॒ एेले .गव्या।शान्ताका पति ऋष्य श्यग ऋषि छन्‌ ती डाक्न ले . प्या ॥ती हामी बसि यज्ञ एक्‌ हजुरको खातिर्‌ .गरौला जसे.चार्‌ छोरा अति वीर्‌ हनन्‌ हजुरका सब्‌ ताप ष्टन्‌ तसे।।५२॥यस्तो अति वशिष्ठ को जब सुन्या राजा बहुत्‌ खुश भया ।.णान्ताका पतिलाइ्‌ डाकीकन खुप्‌ याग्‌ गनं ` लागीगया॥ऋष्यैभ्गः , वशिष्ठ दद्‌ ऋषिले होम्‌ गने लाग्या जसे,पायस्को थलियालिर्ईहकन . तहां आया ति अग्नी.तसं ।॥५२॥यस्‌ पायस्कन आज लेड महराज्‌ । छोरा हन्याछन्‌ भनी 1राजालाई दिया र पायस तहां लूक्या ति अग्नी पेनि॥राजा खूशि भईदुवं ति ऋषिका क्रोमल्‌ चरणूमा परी।कौशल्या र ति कैकयांकन दिया
पायस्‌ दुव भाग्‌ गरी।|५४॥खाने वकि थियो तसे बखतमा आदन्‌ सुमित्रा, पनि ।कौशल्या र ति केकथीसित भनिन्‌ स्वै भाग. मेरो. भनी॥
होगी । . इस कमं से यह" फल प्राप्त होगा-यह्‌ जाननेवाले गुरु वसिष्ठही
थे । [राजा कौ |एेसी विनती सुनकर गुरु वसिष्ठ ने उपाय बता दिया । ५१

महाराज

! एक [पृत्ेष्ठि] यज्ञ करतेसे शीघ्रही पत्र की निष्वय प्राप्ति
होगी । शान्ता के पति ऋष्यश्चज् एक ऋषि हैँ, उन्हँं अभी ब्रूलाना चाहिए
ओर उनके साथ. वैठकर हम लोग अआपके.लिए वैसा ही एकं यन्न करेगे |उसके फलस्वरूप ] आपके चार अत्यन्त वीर पुत्र "होगे ओर .आप..सवबतापो से मुक्त होगे । गरु वस्सिष्ठ का यह्‌ परामशं सुनकर ` राजा अत्यन्तप्रसन्न हृए । शान्ता के पति ऋष्यश्युंग को बुलाकर [उनके अदेशानुसार]
संविधि' यज्ञ का आरम्भ क्या ।` जंसे ही.-ऋष्यश्चुङ्ख मौर. वसिष्ठ, दोनों
चऋषि .हवन करने लगे, वैसे ही अग्निदेव खीर की एक थाली -हाथ मेंलिए वरहा .प्रगट हए । ५३ प्रस्तुत इस खीर को ग्रहण करे, स्वयं भगवान्‌पूत रूप मरे आपके यहाँ जन्म लेंगे । यह्‌ कहते हुए राजा को खीर देकरउसी, समय अग्नि-देव अन्तरद्धान हो गये 1 `राजा ने प्रसन्न, होकर दोनोंऋषियों के क्रोमल चरणों मे साष्टांग प्रणाम कियाखीरकेदो भागक्ररके, कौशल्या भौर कंकेयी को [एक-एक भाग] दिया मया । थ

नेपाली -हिन्दी

22५ ^
दूवैले दुद भागदेवि क्चिकिं भाग्‌ तिनको पुन्याई्‌ दिया ।तीन्‌ रानी मिलि तेहि पायस तहां सपूणं खाई लिया ॥५५॥तीच - रानिति गभिणी पनि भया तेन्‌ देवताको सरी ।देखी यो सब रानिका सकल लोक्‌ खूशी भया तेस्‌ धरी ॥कौशल्या जननी गरादइ भगवान्‌ श्रीराम पेदा भया।देखिन्‌. श्रीप्रभुको- चतुर्भुज स्वरूप स्‌ माइका ताप्‌ गया।५६॥हात्‌ जोरी बहते स्तुती पनि गरन्‌ ईष्वर इनं हुन्‌ भनी ।जान्यां नाथ! -हजूरलाद सवका आत्मा स्वरूपी भनी ॥यो ब्रह्माण्ड पनी सहज्‌ उदरमा लिन्या त आफ थियौ।मेरा. आज उदर्विषे बसि यहाँ यो जन्म एेले लिय! ५७देख्याँं भक्त-उपर्‌ दया हजुरको हे नाथ्‌ ! शरणूमा पर्या |यै मूर्ती प्रभुको सदा मनमहां सत्कोस्‌ पुकारा गव्यां ॥यस्तो दिव्य शरीर्‌ लुकाइकन बेस्‌ वालक्‌ स्वरूप्‌का वनी ।दशन्‌ देउ मलाद्‌ देष्टुं भगवान्‌ । फोर्‌ बाललीला पनि।।५८॥गरी ।तेही बालक. -म्तिलाद्‌- म यहां आलिद्धनादीसन्‌ पाप्‌ -नष्ट गराडंला र करूणा होला र जाला तरी ॥(खीर) खाने ही वाली थीं कि सुमिता भीभीउसी समय वहां आ पहुंचीओर कहा किमेरा भाग कर्हां है-। दोनों ने अपने-अपने हिस्सेमेंसे निकालकेर उसके लिए भाग-पूरा किया।

तीनों रानियोंने भिलकर सव खीर

खाई । ५५ तीनों रानियां गभेवत्ती भी हौ गईु। उनके मूखमण्डलदिव्यतेजसे पूणं. थे.। ेसा देखकर सारा ब्रह्माण्ड हर्षोल्लाससे भरगया। कौशल्या नै भगवान्‌ श्रीराम को जन्म दिया।भगवान्‌का चतुर्भुज स्वरूप देखकर माता का ताप समाप्त हौ गया। ५६राम ईश्वर है एसा समञ्षकर हाथ जोड़कर [कौशल्या ने ] उनकी स्तुति
भी को--नाथ मेँआपको पहचान गई.

आप सवके आत्मास्वरूप है|

इस ब्रह्माण्ड को भी सहज ही पेट में धारण करने वाले आपदहीथे।! आजमेरे गभे मे स्थित होकर यहां जन्म लियाहै.। ५७ ` हे' नाथ ! आपकीएेसी महान्‌ कृपा देखकर आपके चरणो मे पड़ती हूं । मेरे हृदय की यहीपुकार हैकि आपकी यह मूति सदव मेरे हृदय-पटल पर विराजमान रहे ।
इस दिव्य रूप को अदृश्य कर सुन्दर वाल-स्वरूपमें मृञ्ञे दशंन दीजिए ।
तव मेँ बाल-लीला देखकर आनन्द प्राप्त करूंगी । ५८ , आपके उसी वालरूप की सूतिक मँ आलिगन्‌ करके सव पापों से मोक्ष पाङगी। यही

भानुभक्त-रामायण

३४
यो बिन्ती महतारिको सुनि हुकूम्‌मातर्‌ ! जन्‌ छ हजूरको हित कूरोदूवै स्त्री पुरुषे भई अधि ट्लोतीमीलाइम पुत्र पाडं भनि खुप्‌हला पत्र भनेर वर्‌ पनि दि्यांतिम्रो प्र भयेर जन्मन ग्यांकौशल्यासित बात्‌ पनी यति गरीचेष्टा वालकके लिया प्रभुजिलेथाहा भो दशरथूजिलाद र गयादेख्तेमा परिपूणं मन्‌ हुन गयोततक्षणूमा तहि जातकमं पनि भोकेकेयीतिर ता भरत्‌ हुन गयाजम्त्याहा दुद्‌ पत्र पाडंदि भइन्‌जेठा लक्ष्मण ता भयाति दुद्मातीन्‌ रानीतिर चार पृत्र सुकुमार्‌भूमि रत्न सुवणं वस्त्रहुरका
यो भो प्रभूको तहां ।होयोस्‌ सवे थोक्‌ यहां।।५९॥मेरो तपस्या ` गव्यौ।इच्छा यसमा धन्यौ |

सोही

कुराले

यहा ।
व्यर्थ म गर्थ्या कहाँ ।।६०॥वालक्‌ सरीका वनी ।
खुम्‌ र्न लाम्या पनि॥दशेन्‌ गव्याथ्या जसै।आनन्द पाया तसै ॥६१॥
सव्‌ काम्‌ गुरूले गत्या ।आनन्दमा सव्‌ पन्या ॥ताहाँं सुमित्रा पनि।शतुघ्न कान्छा वनी।1६२॥जन्मी सक्याध्या जसै।भारी भया दान्‌ तसं ॥
आपको मेरे उपर महान्‌ कृपा होगी । माता की यह्‌ विनंती सुन करवरदान-स्वरूप भगवान्‌ ने कहा, है माता ! आपके हिताथं सभी कुष्ठआपकी इच्छानुसार हो जाये । ५९ किसी समय आप दोनों स्ती-पुरुष नै
इस आकांक्षा से महान्‌ तप किया था कि मुद्घे आप पत्र-रू्पमे प्राप्त करोउस समय मैने आपको वरदान देकर आपका पत्र होना स्वीकार भी कियाथा।

इसीलिए मे जापका

पुत्र बनकर

आया
हूं।

व्यर्थं ही मैँरेसा

कहां करता ! ६० . माता कोौश्रल्या से इतनी बाते करके प्रभुने वाल-रूप
धारण किया ओर वालक की र्भांति रोने लगे ओर वाल-कीडाओं सेमाताको प्रमुदित करनेलगे। राजा दशरथ को मालूम होते ही वे
दशनो के लिए आये। देखते ही 'उनका हृदय आनन्द से विभोर हौगया'। उन्हें एक तृप्ति की अनुभूति हुई । ६१ गुरुने उसी समय जाति-

कमं आदि सव॒ सम्पन्न

करवाये।
[राजा-प्रजा] सभी आनन्दित हए ।
केकेयी से भी भरत तथा सुमित्रा से जुडवे पुत्र च्येष्ठ लक्ष्मण ओर कनिष्ठशतुघ्न ने जन्म लिया। ६२ जंसेही तीनों रानियोंके चार `सूकरुमार पृउत्पन्न हुए वैसे ही [महाराज दशरथ की योरे] भूमि, .रत्नादि,. स्वणं
तथा वस्त्रोका दान कियाजाने लगा।

गुरु वशिष्ठ नै कौशत्या से

तेपाली-हिन्दी

३५
कौशत्यासुतकोवशिष्ठगुरुले नाम्‌ 'राम' भ्र भनी ।राख्या कंकथिपुत्रको 'भरत' नाम्‌ जमुल्याहूकोनाम्‌ पनि।।६३।।जेठाको शुभ नाम लक्ष्मणः गरी जुन्‌ चाहि कान्छा थिया।तिनको नाम्‌ पनि काम-माफिक असल्‌ . शत्रुघ्न", राखी दिया ॥लक्ष्मण्‌ राम्‌सित खेल्दषछन्‌ भरतथ्यं शवृघ्न वेल्दा भया ।.पायसूकं अनुसारले हुन गयो प्रीती त वदुदेगया ।६४।बालक्‌ काल्‌ वितिगेगयो प्रभुजिको सन्‌ बाललीला गरी।चारेको व्रतबन्धं भो पदटिक्षक्या सब्‌ शास्त्र खृब्‌ बोध्‌ गरी॥,वेल्या क्ये दिनमा शिकार वबनमा सच्चा शिकारी बनी.राजकाजगर्नजती थियो सकल त्यो राज्‌काज्‌ चलाया पनि।।९५॥
राम्‌ हुन्‌ परात्मा ति कहाँ विकारी ।यस्‌ लोकमाछन्‌ नररूपधारी ॥काम्‌ गनं लाग्या ति नरेसरीका।लीला अपार्‌ छन्‌ भगवान्‌ हरीका | ९६ ॥।
राम्‌ नारायण हन्‌ भनेर मनले जान्या र भट्ष््‌ भनी।विश्वामित्र ऋषी बहूत्‌ खशि हुंदे आया अयोध्या पनि॥देख्या श्री दशरथूजिले र॒ बहते ` आदर्‌ ऋषीको गरी ।सोध्या काम्‌ किन आज आउनु भयो . भन्दं बहूत्‌ प्रेम्‌ धरी।।६७॥~^
उत्पन्न बालक का नाम राम ओौर केकेयी से उत्पच्च बालक का नामं भरतरक्खा 1 ६३जुडवे बालकों में से ज्येष्ठ पू का , नाम लक्ष्मण

तथा कनिष्ठ का नाम उसके

कार्यो के अनुसार

शव्ुघ्न

[अर्थात्‌
णत का नाशन करने वले] रक्वा गया। लक्ष्मण रामके साथतोशतृष्न भरत के साथ सेलतेहँ। यह्‌सारा विधान खीरके अनुसारदी
हज । ६४ प्रभुका वात्यकराल वाल-लीलामं में व्यतीत हभ । ` चारोंभादयों का यज्ञोपवीत संस्कार हुजा । उन्होने सभी शास्त्ो का अध्ययनसमाप्त किया।एक कशल अखेटकके रूपमे कितने ही दिन वन मेंशिक्रार खेलते फिरे। राजनकाज में भी प्रवीण हुए 1 ६५रामपरमात्मा) वेतो निविकारहै,उनमें, विकार कहाँ? इस संसार मेंउन्होने मानव-हूप धारण कियादहै। वे मनुष्यकी ही तरह कायं करने.लगे! भगवान्‌ हरिकी लीला अपरम्पार दै। ६६ऋषि विष्वामितने. हृदय से यह्‌ अनुभव किया किं राम नारायण विष्णु हँ! वे वहूत हपित
२६

भानुभक्त-रामायण

यस्ता ऋषीते जसैँ।तसै ॥सोदरी वतायाईश्वरविषे मन्‌ . धरी।आयेर होम्‌ ताश्‌ गरी।1६८।गछन्‌ र॒ पापी भनी।रिस्‌ आज मेरो पनियहां ।सोही विन्ति गरू भनेर अदिले आर्यां , हजुरमाजेठा पुल मलाई वक्सनु हवस्‌ लेजान्छुं एेले , वहा)।६९॥लकष्मण्‌ साध्‌ गरि रामलाद अधिराज्‌ एेले हजुरले . दिया +सुबाहुलाइ्‌सहजं मान्या यिर्नले धिया ॥मारिचूलाइमर्हयस्मा अति वशिष्ठको लिनुहवस्‌ दीना नदीनाभन्छन्‌ दीन त बक्सनू पनि हवस्‌ यै काम आयां यहुं।७०॥विश्वामित्रजी को सुन्या वचन यो राजा सकस्मा पञ्या।दि कि नदिं यही मनमहांँ चिन्ता वहूते गव्या ॥सोध्या ताहि ,वशिष्ठथ्ये पनि गुरो यस्तो पन्यो क्या गरं)कल्याण्‌ हुन्छ कसो गरेर अहिले अर्ती मिलोस्‌ एक्‌ ब२।।७१॥
जआदरुपूवैकका सून्या प्रिय वचन्‌आपन्‌ ददं जडन्‌ धियो सनमहांहे राजन्‌ ! सव पवं पवहरमागर होम्‌हरु कमं॑तेस्‌ बखतमामारिचृलै र सुवाहुले वहुत दिक्‌उट्योमराउनाकनदूवैलाइ
हुए ओर दशंनाथं अयोध्या जये। दशरथ जीने ऋषि को देखकर उनकाभव्य स्वागत किया ओर अत्यन्त प्रेम-पूवेक आने का कारण पृष्ठा । ६७ऋषि ने दशरथ के प्रिय वचनो को सुनकर अपने मनः कीसारी व्यथा कहुसूनार्ई। है राजन्‌ । सभी पर्वोमे ईश्वर के प्रति मन लगाकर जवहवन कर्मोको करता हूं, तो राक्षसगण हूवन-कायं मे वाधा डालते । ६मारीच ओर सुबाहु अत्यधिक कष्टदेरहेटैं) आज मेरे मनमें भी इतना
क्रोध उठाहै कियै उन दोनोंको मरवा डालूं। अतः मै आपसे यहीविनती करने आया हूं कि इस कार्यं के लिए मृञ्ञे अपना ज्येष्ठ पुत्र देनेकीटृपा करे; भँ उन्हं जभी

वर्हाले जागा

९९
महाराज !
यदि
जाप लक्ष्मण सहित राम्‌ कोदेतेतो मारीच तथा सुवाहु को सरलता पूर्वकमार उालते। देनेनदेनेके विपयमे आप गुरु वशिष्ठसे परामशं करलेनेकीटृपा करे 1 इसी कामसेमेँ यहाँ जाया हूं। ७० ` विश्वामित्रके वचन सुनकर महाराजसंकटमेपडगये।दैयानदें? यही चिन्ताउनके मन में उठने लगी। उन्होने वशिष्ठसे.पूछठा, गुरुदेव!रेसीसमस्या जा पड़ी है, क्या करूं। किस प्रकार कल्याण हौगा यही वताने

कौटठृपाकरे। ७१

एक तो यही कठिनहै किराम को देते विनां

३७

नेपाली-हिन्दी

भो -अनि ।न्‌कठियैएक्‌रीकसच्छबाँिेखनदाईराम्‌ललाग्छः यस्तो पनि 1इनलाई नदिया सरप्‌ पनि दिनन्‌ कीआज्ञा जसो ।'पार'ीःचनमरयोयसेयश्रयस्मापाट्‌ छ गरन्‌कसी।।५२॥सोही काम म गदेषु हित हन्या कुत्‌गरूले ` ! पनि ।यो विन्ती .दशरथूजिको जब सृन्या ताहींइ राम्‌ हुन्‌ "भनी "॥रामूको गह्य वूरा सव भनि दिया यस्ताःपुत्रः मेरा भनी!हे राजन्‌ ! तिमि रामल अटहिले' हन्‌्‌का धनी।\७३)]भन्छो ' पुव ति हृत्‌ तथापि इत हुन्‌ चौधे भुवन
भूभार्‌ हन निमित्त आज भगवान्‌कनौशल्यात्तिर

कौशल्या

जन्मन्‌ पनि

थियो

दशरथ्‌ दुवे तिमिहरू

यस्‌ पृथ्वितत्मा श्लन्यां । |सो सत्य रएेले. गन्या॥कश्यप्‌ अदीती - धियौ ।
ईश्वरलाइ म पुत्र पाडं भनि तप्‌ गर्द समाधी लियौ।।७४खृशी भै वरदान्‌ दिया. प्रभुजिंले छोरो म॒ हला भनी.।॥यहाँ जन्म्या परात्मा ` पनिसोरी सत्य गराउनाकनचक्रावतार्‌ ।्हुन्‌ 'भरतजी' 'शतुघ्न'शेषहन्‌ 'लक्ष्मण' शवुक्च तिमी लीला प्रभूको अपार्‌॥७५।1लजान्दछ तत्त्व योइ को<
द्‌, तो एेसा लगताक्रिस प्रकार जीवित रह सककुगा। यदिमं इन्हैनकारीहै कि कहीं विश्वामिव श्रापन देदे। इसमे कौन कायं कल्याणकिसं 'होगा, आप आज्ञा दे; वही हितकर कायं मँ करू । कौन सा आदेशंविर्नतीकीःप्रकार पूणं करना है सृक्षं आना द 1७२ गुरु ने राजा दशरथ
~~~
-
ˆ ` ` ` = /~ = =°
_
=
सुनकर उन्है राम के समस्त गुणो से परिचत कराया । उन्होने कहा, हे राजन्‌!आपतो रामको अपना पृव्र कहते ह। सो तोदहैदही,'तथापिये वहीचौदह भुवन के मालिक द| ७३ पृथ्व4ी केभार को हरण करते आज
भगवान्‌ धरती पर पधारे हे। कौशल्या माता की -गोदःमे जन्मलना थासोभी अव सत्य हृआ। कौशल्या ओौर दशरथ आप दोनों पूर्वः
जन्म म अदिति ओर कश्यपये ! तपस्या मे रत होकर भगवान्‌ को अपे“पुत्रके रूपमे पाने की कामना कौ थी} ७४ प्रभ ने तपस्या से मुग्धहोकर आपका पुत्र हीने का वरदान दिया। उसी को सत्य प्रमाणितलक्ष्मण,करने के लिए प्रभु ने यहाँ जन्म लिया। शेष का (रेषनाग)णं का भरत, चक्र का शवुघ्न अवतार है । इन तत्वों को कौन जानता७५ `स्वयं प्रभु कीहे। अतः आप प्रभू की इस.अपार लीला को समन्लं । जनक.जी की पृत्रीमूल शक्ति, अनन्त गणं से पूणं दिव्य मूति वनकर
३८

भवुभक्त-रामयणं

मूल्‌ शक्ति -प्रभुको अनन्त गणकोछोरी भै ति बस्याकि छन्‌ जनककीसीता राम्‌ दुदरको विवाह विधिलेविश्वामिवजिको भयो र मनमा

दीन्यै योग्य म मान्दष््‌ भनि गुरू-

खूशी भै दशरथूजिले. पति दिया

राम्‌ लक्ष्मण्‌कन पाडंदा ऋषि पनीआशीर्वाद दशरथ्‌ जिलाद दिद राम्‌केही दूर्‌ गड रामलाइ ऋषिलेजुन्‌ विद्या पडि भोक्‌थकाद कदित्येगद्धाका तिरमां बडो बन धियोविश्वामिवजिले - क्या - प्रभुजिथ्यै"त्यो हो राक्षसि कामरूपि छ बहुत्‌गछ यसूकन. मारिवक्सनु हवस्‌विष्वामितजिको वर्चनूकन सुनी

टंकार्‌ खुप्‌ धनुको गस्यौ सुनि यहां

त्यो टंकार्‌ सुनि ताडका पनि तहांहान्या बाण्‌ प्रभूले गड़्चो हृदयमा
सो दिव्य मूर्ती .बनी।सीता
नां
पनि।।
संयोग्‌ गराॐं भनी};आई र्या छन्‌ पनि।।७६।};ले अर्ति दीया जसे ।.लक्ष्मण्‌ सदहित्‌ राम्‌ तसे ॥अत्यन्त खूशी भया;लक्ष्मण्‌ लिई ती गथा।।७७॥विद्या सिकाई्‌ दिया।.लागृदेन यस्ता धिया 11.पुग्या जसे ती तहां ।.राम्‌! ताडका छे यहाँ ।।७८॥लोक्लाइ बाधा पनि।यो पापिनी हो भनी॥श्रीरामजीनेपनि 1.त्योजल्‌दिआवस्‌भनी।1७९।1.दौडेर आईजसं।,त्यो वाण्‌, मरी त्यो तसं ॥
हेकरवेठीदहैओरनामभीसीतादहै। सीता ओौर राम दोनों का विवाह्‌का विधिवत संयोग उत्पन्न कराने की इच्छा विषएवामिच्र जी के मनम:हृर्ई.है, इसी लिएयेएहुएदहैँ। ७६ जसेदही गृरुने रेसापरामशं दियाकिदेनादही उचितदहै, वेसेदही प्रसन्न होकर दशरथ जीने भीरामकोःलक्ष्मण सहित दे दिया 1 -राम-लक्ष्मण को पाकर ऋषि.भी अत्यन्त हूषित
हए ओर दशरथजी को आगीर्वाद देते हृए राम-लक्ष्मण को लेकर चलेगए । ७७ -कृष्ठ दूर जाकर गुरने रामलक्ष्मण को एेसी मंत्र-विद्या कीःशिक्षा दी जिसे. प्राप्तकर क्षुधा तथा श्वम का अनुभव क्रभी नहींहोता । गंमाके किनारे एक व्डाजंगल धा। वेस ही वहं पहुचे
विश्वामिघ्च जीने प्रभु राम से कहा कि ताडका राक्षसी यहीं रहती है । ७८ ,यह्‌ राशसी मनमो्हिनी दहैओर वहतो के जुभ कार्यो में विघ्न-वाधापहुचाती है। यह पापिनरहै।. अतएव इसे मारने की कृपा करे.विश्वामिते के वचनो को सुनकर रामचन्द्र जी ने धनुष को जोर से ट्कारा,जित्ते सुनकर वह शीघ्र दही ञाजाय।७९धतुषकौ टंकार को सुनकर

नेपाली-हिन्दी

३९
यक्षी. थी अधिकी सराप्‌ परि तहां तेस्ती ` भयाकी धिर ।रामूले मारिदिदा त श्राप्‌ पनिटन्थो | फर्‌ यक्षिको रूपलिई।।२०।]श्रीरामूचन्द्रजिका वरीपरि घुमीः प्रेमले नमस्कार गरीस्वर्गेसमा गद रामका वचनले . वेस्‌ एक्‌ विमानमा चढी ॥विष्वामिवर ऋषि बहूत्‌ खुशि भया ` यो कायं देख्यां जसं।जो सब्‌ शास्वर-रहस्य हौ सब दिया तीः रामलाई्‌ तसं।।८१॥कामाश्चम्‌ रमणीय थल्‌ तहि थियोफर सिद्धाश्रममा गया रघुपतीतेस्‌ सिद्धाश्रममा अनेक्‌ ऋषिथियामारिच्‌ फक्त सुबाहु मानेकन राम्‌

एक्रात्‌ तदह वास्‌ गरी 1

सबलाई्‌ . मङ्कल्‌ गरी ॥पजा . सवेले ग्या ।ताह ,अगाडी सम्या।।८२॥
विश्वामितजिलाइ भनु पनि भो; मारिच्‌ युबाह करहा।वस्छन्‌ यज्ञ टृलो गरी लिनुभया ती अर्ध्या की यहाँ ॥भेट आज भयेन मानं कसरी यो `मजि: सून्या जसं ।विश्वामित्र ऋषी अरू ऋषि लिर्ई होम्‌ गनं लाग्या तसं।।८३॥ताडका ज्योही वर्ह आयी, प्रभने वाण छोड़ा । वह्‌, बाण जाकर उसकेहृदयम लगा। वह तत्काल सृत्यु को प्राप्त हृई। यह राक्षसी पूवंजन्मे यक्षिणी थी। शापके कारण वह्‌'इस दशा को प्राप्त हई थी ।रामके हाथो मरने से उसे इस भयंकर शापसेभी मुक्ति मिल गई । ८०अपते राक्षसी जीवन से मुक्त होकर ताडकाने "प्रभु को 'परिक्रमा कीओरप्रमपूवेक प्रणाम क्या! प्रभुकौ आज्ञा से वर्हां एक्‌ उत्तम विमानभस्तुत. हुआ, जिस पर चदृकर वह॒ स्वगं लोक को गई! इस कायंकोदेखकर विश्वामिन्न उनसे अत्यधिक प्रसन्न हृए ओौर जो भी शास्त-ज्ञानका रहस्य था उससे राम को परिचित कराया । ८१ इसके वाद उन्होने` कामाश्चरम नामक एक `रमणीक स्थानम एक'रात विश्राम किया।तत्पश्चात्‌ सवका कल्याण करके रधुनाथ जी सिद्धाश्रम कोगए।उससिद्धाश्रम मे अनेक ऋषिथे, उन सवलोगों ते राम का सत्कार किया।

फिर मारीच

ओर सुबाहु कोमारने

के लिएु राम अग्रसर हए 1 २

विश्वामित्र से उन्होने कहा कि मारीच ओौर सुबाहु कर्हा रहते हैँ । 'उनसेतोभंटही नहीं हुई! उन मारा किस प्रकार जाएु।.'उन्हं यहँ तक` वृलाने के लिए एक य॒ज्ञ करना चाहिए । रामचन्द्र की एेसी बातें सुनकर
विश्वामित्र अन्य सभी ऋषियोंको साथ लेकेर यज्ञ करने लगे । तदं

भानुभक्त-रामायण

४०
दिन्‌ मध्यान्ह॒ भयो तस बखतमामान्याक्रालूकनचालूनपाइ्‌ , अधिन्लं
आया ति राधस्‌ पनि।होम्‌ नाश्‌ गरौला भनी ॥यस्ते प्रकारले गरी।
आया ती जव यज्ञमा प्रभुजिलेमारिचूलाद्र त॒ वाणले जलधिकाअग्नीबाण धरी सुबाहुकन ता

हान्या अगाडी सरी।।८४

काही हाड खसारँछन्‌ कटि

रगत्‌

तिन्‌का फौज्‌ पनि ताहि लक्ष्मणजिलेखूशी भैकन . पृष्पवृष्टि

गरियो

तिर्मा पुव्याई दिया)भस्मै गराईदिया ॥मारी सक्याध्या जसे ।सव्‌ देवताते तसे।।८५।।
विश्वामित्र ` बहूत्‌ प्रसन्न हुनुभे राम्‌लाईइ काखूमा लिया ।भोजन्‌ गर्न. निमित्त राम्‌कन तहां मीठा फलादी दिया ॥

तीन्‌दिन्‌ ताहि मुकाम्‌ गग्या प्रभुजिले

चौथादिन्‌ ऋषिले गव्या विनति एक्‌

वार्तां कथाकोगरी।राम्‌का अगाडी सरी1र६॥
हेराम्‌! जाडं जनक्जिका पुरमहां राजा जनक्‌ छन्‌ बडा ।गनेन्‌ आदरभक्तिनि हजुरका साम्ने हून्याछन्‌ खडा ॥तार्हां एक्‌ शिवको धनुष्‌ पनि छ वेस्‌ देखीयला त्यो पनि।यो बिन्ती ऋषिको सुनेर रघुनाथ्‌ ¦ खूणी भया वेस्‌ भनी।1र७॥मध्याह्न का समय हा, तत्काल राधसगण वहं अये | पडयं् की चालकोन समक्ञकर सदाकी भांति हवनादिको नष्ट करने के लिए कहींअस्थिर्यां कहीं रक्तादि गिराने लगे। जंसेहीवेयन्नमें अये ओौर विघ्न-

कायं आरम्भ कियावेसे हीप्रभुने अगे बढ़कर

प्रहार किया । ८४.
मारीचंकोतो वाण द्वारा समुद्र के किनारे पहुंचा दिया ओर सुबाहु कोअग्निवाण से. भस्मकर
दिया।

उनकी समस्त सेना भी, लक्ष्मण द्वारा

मारीजा चुकी थी । तव हर्पोद्लास से पुलकित होकर - देवताओं ते पृष्प-

वर्षा की 1 ८५

विश्वामित्र ने अत्यन्त हरषित -होकर राम कोगोदमे,
उठा लिया'ओौर भोजन _-हेतु उन्हं फलादि द्यि । कथा-वार्ता करते हृएप्रभू जी वर्हा.तीन दिन रहे। चौथे दिनऋछषिने रास-के -सम्मुख आकरः
एक विनती कौ.] णद. हराम! आप जनकपुर चले, जह एक -बड़ेपरतापी राजा जनक.जी हँ । वह्‌ आपको पाकर आपके - सम्मुख उपस्थित

होकर आपका बडा, हीआदर

करेगे ओर

भक्ति-भावना से भर उठेगे।

वहाँ ` शिवजी काः एक उत्तम धनुष भीहै, जप

उसे भी देख लेगे।
ऋषि की यहु विनती सुनर्कर रधूनाथ जी- वड़े ही प्रसन्न हुएु 1 ८७
४१

नेपाची-हिन्दी

विश्वामित्र र भाई लक्ष्मण लिई श्रीराम्‌ हिडचाथ्या जसं ।.आश्रम्‌ गौतमको पन्यो नजरमो गंगा-किनार्मा . तसं ॥आश्रमूका नजिके असल्‌ फल सहित्‌ फूलूको ˆ बचा भियो ।जन्तू नाम्‌ त भियेन कोहि तपनी संभार्‌ विनात्यो थियो।तप। ।मालुम्‌ राम्‌कन क्या कहीं कमि थियो ` जो .ता जगतुका. धनी ।भनी ॥सोध्या तपनि यो असल्‌ छ किनिहौ रिक्तं. वघेचाविश्वामित्र धिया सवै गुणनिपुण्‌ विस्तार्‌ सुनाया "पनि।गौतम्‌को अधि वस्ति हो अव भन्यां
छन्‌ यहां क्वे पनि।।९॥

गुणकी

भक्तं अहिल्या थिइन्‌ |

भार्यां गौतमकी

समान

ब्रह्माकी तित पति हुन्‌ गणि हँदा' सन्‌ खुश्‌ गराई लिइन्‌ ॥गौतम्‌ का्य-निमित्त दुर्‌जव गया रूप्‌ गौतमैको सरी ।नजिकमाः इन्द्रं अगाड़ी सरी।।९०।।धारी गौतम-पत्तिकाजसे ।गयाथ्याआई भोगं- विलास्‌ गरेर खुशि भै. फक

देखता

गौतमलाई

गौतमजिले

आश्चयं

मान्या

तसे ॥
आपन्‌ रूप दुरुस्त. देखिकन सुप्‌ . गौतम्‌ रिसापा पनि ।सोध्या होस्‌ तँ कन्‌? बता नटि भने
हर्‌ भस्म ग्‌ं भनी।।९१॥
विश्वामिव तथा भाई लक्ष्मण को साथलिये श्रीराम जीजा रहै थे । उन्होनगंगा नदी के किनारे स्थित गौतम ऋषिका आश्रम देखा ` आश्रम केनिकट एक सुन्दर फूलों से भरा उद्यान देखा; सभर (हरिण) के अतिरिक्त
1
अन्य कोड भौ पशु वहाँ न था! ठठ जगत्पति रामको क्या नहीं मालूमथा तिसपर.भी उन्होने इस सुनसान उद्यान.के विषयमे पृष्ठलेनाहीउत्तम समज्ञा । , विश्वामित्र सर्वज्ञ थे, अतः उन्होने विस्तारपूवंक राम कोःवताया कि वहं कोई भी नहीं है । ८९ गौतम के हीःसमान गुणवती एवंभरक्तउनकी पत्नी भी थी जिसका नाम अहिल्याथा।
पुत्री थी जिसने ।अपने गुणों से सवको प्रसन्न किया।

वहतो ब्रह्याको

जव गोतम किसी

कार्यैवश कहीं दूर गए हए थे उस समय इन्द्र गौतम का रूप धारण करके
गौतम -पत्नी के पास आया । ९० `भोग-विलास के ` पश्चात्‌ जसे ही वहप्रसन्न होकर लौट रहा था वैसे ही गौतमी (अहि्या )दूसरे गौतम को देखकरआश्चयंचकित हो गई । अपने हौ रूप को देखकर .गौतम अत्यन्त क्रोधितहृए जर इन्द्र से प्रन किया कि बताओ तुम कौन हो; अन्यथा अभी तुमहभस्म.कृर दगा । ९१ तव भयभीत, होकर वह्‌ .बोला किं दे ब्राह्मण) इन्द
४२

भानुभक्त-रामायण

ब्राह्मण्‌ ! इन्द्रम हं भनेर उरलेगौतमले पनि रीसमा परि दियायोनीमा अति लुब्ध आज भद्छठस्‌तेरा येहि शरीरमा अव हनन्‌दीया येति सराप्‌ र इन्द्र पनि फर्‌पत्नीलाइ्‌ सराप्‌ दियेर ऋषिलेजन्तू कुछ नहुनन्‌ यहाँ अव उपर्‌जेले श्रीरघुनाथ्‌ चरण्‌ धरिदिनन्‌यस्तो सव्य सराप्‌ प्यो र पत्तिकोपृथ्वीमा गिरि गैगइन्‌ अचल
एक्‌
विन्त गव्याश्या जस ।यस्तो सराप्‌ पौ तसे ॥यत्रो वड़ो भै पनि।ह्ज्जार योनी भनी।।९२।आफ्ना स्थलैमा गया ।पत्थर्‌वनाई दिया ॥पत्थर्‌ भई तं रद्यास्‌ ।तेले तं मुक्तं भयास्‌॥९३॥ताहीं अहिल्या पनि।पत्थर्‌ स्वरूपृकी वनी 1पाप्‌ मुक्त होला भनी'।कूल्चीदिन्या हो पनी।।९४॥श्रीराम्‌ तरन्तं गया।वुल्चीर्दिदा त्यो भया]ताह अहल्या पनि ।
पादस्पशं ति खोज्दछिन्‌ हजुरकोतिनूलाई करुणा गरी हजुरलेयस्तो विन्ति सुन्या जसं ति ऋषिकादेख्ता पत्थर एक्‌ टुलो प्रभुजिलेसुन्दर्‌ मूति भरद खड़ा भद्गन्‌श्रीराम्‌चन्द्रजिले प्रणाम्‌ पति गन्या ई ब्राह्मणी हुन्‌ भनी।९१५।॥।देखिन्‌ श्री रधघुनाथलाइ र तहां खूशी अहिल्या भडइन्‌ ।पजा स्तुति गरेर रामृसित विदा सागी पति ध्यं गदन्‌ ।
ह। इसे सुनकर क्रोधित गौतमने भी शाप देदिया कि जवे इतने महान्‌होकर भी तुम यौवन के वशीभूत हृएहोतो तुम्हारे इस शरीरम हजारों

योनि-चिह्घ उत्पन्न हो जायेगे । ९२

पूनः अपने लोक को चने गए।

इस प्रकार काणाप पाकर इन्द्र

पत्नी अहिल्या

कोभी

ऋषपिने णाप

देकर पत्थर वना दिया। उन्होने कहा कि यहाँ अव कोई जीव-जन्तुनहीं रहेगा; केवल तुम्हीं यहां अकेली पत्थर वनकर रहोगी ।! जव रघुनाथअपने चरणों से तुम्हे स्पशं करेगे तभी तुम इस णाप से मूक्त होगी । ९३पति के इस शाप से अहिल्या धरती पर गिर पड़ी ओर एक निश्चल पत्थर
हो गई ।. वह शाप से मुक्ति पाने के लिए आपके चरणों का स्पशं चाहतीहै, कृपा करके उसे अपने चरणोंसे स्पणंकरदें। ९४ ऋषिकीरेसी
विनती सुनकर श्रीराम तुरन्त वहाँ गये । रघुनाथ जी ने एक वड़ी शिलादेखी ओौर उसे अपने पाव से स्पशं किया । अहिल्या तुरन्त ही एक सुन्दरस्त्री वन कर खड़ीदहो गईब्राह्मणी जान करश्रीराम ने उसे प्रणाम
८३

नेपाली-हिन्दी

ताहाँ देखि चल्या र जल्दि रघुनाथ

गद्खाजिका तीर्‌ क्म्या ।

येती बात गरयौ भने त तिमिता

गंगाजिका पार्‌ तरयौ ।
तर्नाको प्रभुले जसे मन ग्या माञ्षी चरणूमा पर्या) ९६]खवामित्‌! ई दूइ पाठको अति असल्‌ धूलो जसे ता पव्यो।पत्थर हो तपनी मनुष्य सरिको सुन्दर्‌ स्वरूपे धव्यो ॥तेस्तै पाठ यहाँ भयो पनि भन्या उद्धा स्वरूप्‌ धदंछन्‌ ।इद्काले पनि रूप्‌ धन्यो यदि भन्या हास्राजहान्‌मरदछन्‌ ॥९७॥तस्मात्‌ पाड पलालि वारि तिरमा हास्रा शिरोपर्‌ धम्यौ।यस्तो बिन्ति घुनी तहां प्रभुजिले

पाऊं

अगाडी

दिया!
माञ्चीले -जलले पखालि उहि जल्‌ ' आप्नाशिरोपरलिया))९न))यस्ता रित्‌ सित नाउमा-चहि सहज्‌ गंगाजिका पार्‌ गया)शयाम्‌ सुन्दर्‌ रघुनाथ बहुत्‌ खुशि हंद दाखिल्‌ जनक्पुर्‌ भया ॥
विश्वामिब ऋषी बहुत्‌ खृशि हदं दुई कुमार्‌ साभ. गरी ।आया यस्‌ पुरिमा भनी जब चुन्या दौडयाजनक्‌ तेस्‌घरी।।९९॥।पुग्या प्रएन ग्या सवे कूशलको पाऊमहां शर्‌ धरी ।देख्या सुन्दर राज्‌कूमार्‌ जनकले पूज्या ति ईश्वर्‌ सरी॥~^
^~
~~~
~~~ ^ ~~
भी किया। ९५ श्रीरघुनाथ जी को देखकर अहिल्या प्रसन्न हई ओर-पूजा-स्तुति के पश्चात्‌ रामसे आज्ञा प्राप्त करके पति के पास गर्ई।
वहां सेचलकर रघूनाथजी शीघ्रही गंगाजी के किनारे पर पहुचे ।जेसे ही प्रभुने तैरकर पार होने के लिए सोचा वैसे ही मल्लाह्‌ उनके
चरणोमे आपडा। ९६ दहेस्वामी ! आपकी अत्ति उत्तम चरण-रजलगते ही पत्थर भी मनुष्य-र्प धारण करलेतीरहै। उसी प्रकार यहँभी
यदिमेरीनावनेस्त्रीकारूप्‌ धारण करलियातो हमारे समस्त परिवार
नष्टहो जायेगे 1 ९८ इसलिए हेप्रभु! पहले मुञ्चे अपने चरणोंकोपखारने दे ओर वह पवित्र चरणामृत हमे मथेसे लगानेदें। तभी हमआपको ंगाके पार्‌ उतरनेदेगे। यह्‌ विनती सुनकर प्रभु ने अपनेपांव आगे वहा दिये ओर मल्लाहौं ने उनके चरण पखार कर जल को मायेमे लगाया । ९८

इसप्रकार विधिप्वंक नाव मे चढ़कर

सेगंगाजौकेपारहो गये]

श्रीराम सरलता

श्याम-स्वरूप वाले रधुनाथ जौ जनकपुर

जाये) विश्वाभि के दोनों राजकरुमारों सहित जनकपुर की नगरीम आने का समाचार सुनकर राजा जनक तुरन्त ही प्रसन्न होकर दौडपड़ । ९९ वहां पहुंच कर चरणों मे ल्ुककर कुशल-समाचार जात

भानुभक्त-रामायंणं

ऋषिध्यं पनि।

पक्का ग्नः निमित्त फर्‌ जनक्ले

सोध्या

ब्रह्मन्‌ ! पत्र इ हुन्‌ कन्‌ पुरुषकाव्लेशुको लश ॒नराखि यस्‌ बखतमाविश्वामितजिले सून्या विनत्तियोयस्ता हृन्‌ इ भनेर सबूति ऋषिलेहे राजन्‌ ! दशरथूजिका इ सुत हन्‌भनछन्‌ मानिसले गरी . नसकिन्यामारिच्‌लाईइ ` सुवाहुलाद्‌ अरु तारामूले सारिचलाईइ फेकि सहजैःपत्थर भे कति वषेसम्म रहूंदापाउल तहि कुल्वेदा उठि गदन्‌याहाँ एक्‌ शिवको धनुष्‌ छभनियोदेख्नाको मतलब्‌ छ आज त यहाँचांडो आज जर्‌ गराउ भनियोमन्तीलाइ हकम्‌ दिया जनकले
विस्तार्‌ हवस्‌ वेस्‌ गरी ।मेरो लग्या मन्‌ हरी ॥राजा जनक्को जतै ।विस्तार्‌ बताया तसे।१०१॥नाम्‌ राम लक्ष्मण्‌ भनीगेन पराक्रम्‌ . पनि॥को जितून सकृन्या. धिया।सवाह . मारीदिया।।१०२॥गौतम्‌ कि नारी धिद्न्‌।जस्ता कि तस्ती भडइन्‌ ॥यहाँसूनर अयाराखी रह्याछठौ कहां।। १०३॥विस्तार्‌ गन्याथ्या जस ।लौ ल्या भन्त्या तसे ॥
विष्णूदन हुन्‌ भनी।।१००॥

जान्यां जाच्च त चित्तले त भगवान्‌

किया।
~~~“
~~~
~~~ ~~~ ~~ ~~~ ~~~
~“ ^-^
~~~
~~~
~~ ^~
सुन्दर राजकुमारों को देखकर राजा जनक ने उनकी ईष्वर
सदश पूजाकी।

अपने मन में निश्चय करने के चिएु जनकजी

ने
ऋषि से पृष्ठा करि क्या भगवान्‌ विप्णु यही हैँ1 १०० ब्रह्मन्‌ !- येकिन महापुरूप के पुत्र है, विस्तारपूवेक कहने की. कृपा करे । इस समयमेरा मन क्लेश-रहित हरिके ध्यानमें लगाहुभादहै। विश्वामित्र नेराजा जनक की यह्‌ विनती सुनते. ही श्रीराम के विषय में सविस्तारंवणेन किया । १०१ हे राजन्‌ ! ये दशरथ जी के पत्र राम तथालध्मणदहे।
लोग कहूतेदै किये अभूतपूवं पराक्रमीदै, जौ मनुष्यके
लिए सम्भव नहीं । मारीच ओौर सुबाहु को दूसरा कौन पराजित करसक्ताथा। रामनेदही मारीच को पटक कर सुवाहु क्रा वघ किया १०२
इनके चरणो काही प्रताप इतना हैकि कितनेदही वर्पो से शिला हुईगौतम कौ पत्नी को केवल इनका चरण-स्पशं पाकर ही पुनः अपना पूर्वंरूप प्राप्त . हौ गया । यहां एक शिव-धनुष है, एेसा सूनकर उसे देखने
की. आर्काक्षा से यहां आधे हुए है; सौ कपया उसे दिखाने का कण्ट
करे । १०३ने दी)
एसा आग्रह सुनकर मंदी को धनुष. लाने की आज्ञा जनक

इसी वीच जनक

ने ऋषि से कहा कि मै अधिक

क्या

नेपाली -हिन्दी

यै बीचमा ऋषिथ्ये भन्या जनकले राम्‌ले उचालून्‌ धनू ।सीता छोरि म दिन्छु राम्‌कन गरन्‌ बीहा बहृत्‌ क्या भन्‌। १०४॥।साचा बाणि , सून्या र सोहि रितका बात्चित्‌ गभ्याथ्या जसे.)पाँच हज्जार्‌ विरले उचालि बलले . त्याया . धनूषे “.“ तसै ५1धनूर्ध्यं गयाताहां श्री रघुनाथ्‌ उठेर नजिकं..सोहीव्राम्‌ हात्मा सहजै उचालि धनु त्यो राम्‌ ले त लीदाभया।। १०५॥3}
तांदो जल्दि चढाद्‌ खैचनुभयोदुई टक भई गिरयो उ धनुताहर्षेहषं .भयो तसै बखतमा
वाहां धनुष्कं जसेखृशी भया सब. तसै)सारा जनकपुर्‌ :भरी)।
आदर्‌ खुप्‌ प्रभुको गभ्या जनकलेसीताजी पनि रामका, शिर-उपर्‌
आलिगनादी गरी।1१०६॥साला . कनक्को धरी ।

छमृछठम्‌ पाड गरी फिरिन्‌ घरमरहां

मंगल्‌ भयो . तेस्‌ घरी. ॥
मालिकहुन्‌ दशरथ्‌ ` खवर्‌ दिनुपव्यो. ती. छन्‌ अयोध्याम्हां

जाउन्‌ पव - लिएर

मानिसहरू चांडो तिआउन्‌ यहां।। १०७

यस्तो बिन्ति जनक्जिले पनि गन्था लेवेर॒विस्तार्‌. दिया ।विस्तार्‌ पत्र लियेर दुतृहर पनीः जल्दी अयोध्या
गया ॥
निवेदन करं । : राम शिवधनुष को उठःलेंतो मै जपनी पुत्री सीता
का विवाह रमसे करद्‌ । १०४ ज्योंही इन सत्य वचनो को सुना "भौरयह्‌ बातचीत हई । जंसेही पांच हजार वीरों ने बल लगा कर धनुष` लाकर रक्खा । उसी समय श्रीरघुनाथ जी उठकर उस धनुष के पास आये ।बायें हाथ से राम ने सहज ही धनुषे को उठा लिया! १०५

वाणं चंहा

करजंसे ही धनुष को खीचा, वह दो टुकड़े होकर रह मयी} यहं देख' कर सभी अत्यन्त हित हुए । उस समय सम्पूण जनकपुर मे हर्षोल्लासछाग्या। प्रभु कौ आलिगनमे लेकर जनकनजी ने उनका बडाः हीआदर सत्कार किया । १०६

सीताजीनेभी रामके गले मेँ.स्वर्णमाला

पहनाई ओर छम-छम करती हुई लौट गई । दरवार म उत्सव हभ ।उनके स्वामीतो दशरथ ` जी. हैँअतः

उन्हं अयोध्या में यह्‌ शुभ समाचार

भेजना चाहिए । प्र लेकर तुरन्त जाओ ओौर यह्‌ शुभसन्देश शीघ्र
वहाँ पहुंचा, जिससे वह्‌ यहाँ गीघ् आ जायें । १०७

इस प्रकार जनक

जीने यह्‌ विनतीकी ओर सविस्तारं पत्र लिखकर दिया । दूत लोगभी पत्र लेकर तुरन्त जयोध्याचले गये! राजा दशरथ पत्र को सुनकर

भानुभक्त-रायायर्णं

टद्‌
यो विस्तार .सुन्या. जसे नुपत्तिले आनन्दमा ती पन्या)सन्ने . जानु पम्यो . जनकपुरमहीं भन््याहुकूम्‌ योगस्या।) १०८॥।जम्मा लश्कर भै गयो क्षणमहां जल्दी जनक्पुर्‌ पुग्योः।क्या ` वणेनूभिडको गरू त्यस वखत्‌ खाली अयोध्या भयो ॥यस्ता रीत्‌सित्त सब्‌ गया जत्तिथिया सेना जनक्पुर्‌ मही ।दाचिल्‌ भौ दशरथ्‌जिको हुकूमले हषं बढयो खुप्‌ तहा।।१०९॥।तहँ श्री दशरथूजिको जनकले आदर्‌ बहूते गस्या।लक्ष्मणूले संग राम्‌ पनी तहि पिता- जीका चरणूमा पर्या॥बस्नालाई हवेलि सुन्दर जनक्‌- जीले खटाया जहाँ

खूशी भै दशरथ्‌ प्रनी गद्‌ वस्या

तसे

सुन्दर लग्न खटन्‌ गव्या जनकले

मंगल्‌ सहरमा

नाच कीतेन्‌ सितका प्रकाए्कन हुन्थाजो मण्डप्‌ छ विवाहको तेस उपर्‌मूगा ` मोति जुहार्‌ जनक्‌पूरमहांयस्तं रीत्‌ गरिभो विवाह विधिलेहर्षेले

परिपणे

मन्‌ . हन, गयो

हबेली मह ११०॥
चल्या ।
रात्मा चिराक्‌ खुप्‌ बल्यो ॥सुम्का हिराका स्ुल्या।घर्घर्‌ सबका स्ुल्या\ १११॥चारे जनाभाडको।सीताजिकी
मादको ॥
;आनन्दमग्न हौ गये ओर सबको जनकपुर चलने की आज्ञा. दी। १०८-दशरथ.जी की अज्ञा पाकर

क्षणभर

मेही सेनाकी सेना एकल हौ

गई ओर जनकपुर चलपड़ी। भीडका वणन तो किस प्रकार किया-जाये! यही कहना पर्याप्त होगा कि पूरी अयोध्यादही खाली हो गई थी।इस प्रकार अपने सव दल सहित दशरथ जी जनकपुर पूवे ओर दशरथ जीकोञनासेसमी लोग हषित.होकर अन्तःपुर मे जा कर विराजमानं हए । १०९वहां जनक जीनेश्री दशरथ जी का भव्य स्वागत-सत्कार किया। लक्ष्मण
के साथ राम नेभी पिता केचरणों मे ज्ञुककर प्रणाम किया! श्रीदशरथ जी के ठ्ह्रनेके लिए जनकजीने बहुत ही सुन्दर महल का
प्रनन्ध करवाया, जहां उन्होने प्रसत्चतापूवेक निवास किया । ११२जनक जी ने उत्तम मुहुत्तं निकलवाया। नगर मै मंगलगान, उच्सव,कीर्तन तथा नृत्य आदि का सुन्दर आयोजन हज! राचिमें दीपकजलाकर सुजाया गया | विवाह्‌-मण्डप में हीरे-मोती-मुंगा तथा जवाहसें
कौ ज्ञालरं लटकाई गई । नगर के घरो-घरोंको मालाओं से सजयागया । १११

इस प्रकार चारों भादयो, का

विधिवत विवाह सम्पन्न

नेपाली-हिन्दी

४५
रम्‌ . लक्ष्मण्‌ दुदलाद्‌ ता जनकले आप्नाति छोरी दिया।भार्टूका त भरत्‌जिलाईइ रति वीर्‌ णतुष्नलाई दिया। ११२॥सीता पत्ति भडन्‌ रमापतिकि ता लक्ष्मणजिकी उमिला'।माण्डवी |पत्ती हुन्‌ श्रुतकीति ता भरतकी शतरुघ्नकी..
जस्ते ` आपु भिया अनन्त गुणकाअभ्यन्तर्‌. मनले

विचार

गरदा

चौधे

भूवन्‌का ` धनी । `

तस्ततिपत्नी पनि।।११३॥
विश्वामित्र वशिष्ठ. दूद्‌ ऋषिथ्यै ` यस्ती सिता हुन्‌ भनी ।उत्पत्ती अधिको सबै जनकले विस्तार्‌ बताया पनि.जान््यौ भूमि पवित्र गनं भनि एक्‌ क्वे यज्ञ॒ गद्मि्हा.।.जोत्तामा त सिताजि निस्किन गडइन्‌ ` आश्चयेमान्यां तह।। ११४५ `` राखीदियां।पार्त्यां छोरि भनेर नाम्‌ पनि असल, सीताजिगथिन्‌ बालकमा अनेक्‌ तरहका लीला म खृूशी धियां ॥अयोध्यामहां ।राम्‌ नाम्‌ले . दशरथूजिका सुत भई खेल्छन्‌
तिस्र. पुति सिता उनैः प्रभूजिकी साया ति आइन्‌ याँ।। ११५॥।यो लीलाबु्ली सिताकन तिनं ` रासूलाद्‌ दीया भनी।नार्द्जी उठि गै गया, उहि 'सूनी याद्‌ ` भो मलाई `पनि॥करसीताजी की माताका मन हषं से भर, गया।

राम ओौर लक्ष्मण

को तो जनक ने अपनी ही पृियों को विवाहा ओौर अपनी भतीजियों कोवीर भरत तथा श्रतुघ्न को समपित किया 1११२ सीता राम की, उमिलालक्ष्मण की, माण्डवी भरत कौ तथा श्नुतिकीति शतुघ्न की पत्नी हुई
जैसेवेस्वयं अनन्त गुणों से युक्त चौदह भूवन के स्वामी ये उसी प्रकारअन्तर मन से विचार -करनेसे पत्तियां भी वैसीदहीथीं। ११३
ऋषि
विश्वामित्र ओर .वंशिष्ठ दोनों को सीता जी की उत्पत्ति के विषयमे
सविस्तारं बताया गया । एक यज्ञ हतु. भूमि को पवित्र करने के लिएजोतते समय सीता जी प्रकट हुई, जिसे देख सभी आश्चयं-चक्रित "रहगये । ११४ पुत्री-रूप में ग्रहण करके इन्हे पाला ओर नाम भी सीता रखदिया 1 बाल्यावस्था मे ये अनेकं प्रकार की लीलां: करती थीं जिसे
देख कर म वड़ा प्रसन्न होता था। उधर. राम दशरथ-पुत्र वनकरंअयोध्या मे खेलते थे । आपकी पृत्रवधू सीता जो यहाँंआ गई "यह उसी
भभु की शक्ति है। ११५ सीता को इन सव लीलाओं कौ समक्न कर ही रामसेउसका विवाह कर दिया । एसा [एक दिन | कह कर नारद जी उठकर
चले गएु 1 यही सुनकर सृन्ञे भी स्मरण हुआ ओर सोचा कि किस

भानुभक्त-रामायण

कन्‌ .पाट्ले अब रामलाइ म सिताथीयो यो शिवको धनुष्‌ यहि यसंतादो. यस्‌ धनुको

चढाउन

जयन्‌

सीता छोरि दन्य तेस्‌कन फिकाजानुन्‌ सन्‌ विरले भनीकन गन्यां
यो

सूनीकन

देशका

विरहृरू

को सक्थ्यो धनु त्यो उठाउन विनाहिक्मत्‌. हारि सवं घरे फिरिगयारामूले , पूणंगराइवक्सनुभयोयो चीन्ह्या पनि सव्‌ कृपा चरणले
पार विचार्‌ यो गरयाँ।मायो प्रतिज्ञागर्यां।।११६॥वीरले त सक्ला यहं.होवेन यस्‌ बात्‌महां।।'यस्तो
प्रतिज्ञा . जसे ।
आया तुरून्तं तसे।।११७॥ :श्रीराम्‌ अगाड़ी सरी।
दशन्‌ धनूकोः गरीः।,मेरो प्रतिज्ञा पनि।,गर्दा भयाको भनी।।११८॥।विन्ती अगाडी गरी,
विश्वामितजिथ्यंजनकलेपनीसीतानाथ्‌ रघुनाथको, स्तुति गय्या अननन्दमा ती परी॥दार्ईजो सय कोटि दौलत सदहित्‌ वेस्‌ वेस्‌ अयत्‌ रथ दिया । `घोडा ता सय लाख्‌ दिया छ सयता खुप्‌ मत्तहात्ती थिया।) ११९॥।.पैदल्‌ लष्कर एक लाख्‌ र सय तीन्‌ कोटी दियाथ्या जसं ।;पूजां फेरि वशिष्ठको पनि गस्या भारी उबलूले तसै ॥पनि |.पूजा ताहि भरत्‌जिको पनि भयो लक्ष्मण्हरूकोइच्छा भो रघुनाथ॑ंको अव फिरौँ जाऊ अयोध्या भनी।। १२०॥विधिस अवमे राम का सम्बन्ध सीता से कर्‌
इसी कारण शिव के इस:
धनुष की एसी [कठिन|प्रतिज्ञा रक्ली । ११६ जो.वीर इस धनुष की प्रत्यंचाचट़ा-सकेगा उसी के साथ मै अपनी पत्री सीताका विवाह कर दुगा
मेरे.इस वचन मे किसी प्रकार का अन्तर नहीं अयेगा। जनक -की इसप्रतिना को सुनकर देश-विदेश के वीर वहां -आषएु। ११७ , श्रीरामके,अतिरिक्त. ओर कौन आगे बढ़कर उस धनुष को. उठा सकताथाःसभी -वीर अपना साहस खोकर शिव धनुष का केवल दशन करके
ही अपने-अपने देश लौट गए । मेरी .प्रतिना कोपुणं करने कीकृपाकेवल रामनेकी।
यह्‌ भी जान लिया किः ये सव इन्हीं चंरणोंकी

कृपासे हभ दहै 1 ११८

जनक ने आगे वठ्कर. विश्वामित्र से विनती

की, -आनन्दमग्न होकर सीतापति श्रीरघुनाथ. की स्तुति की, ओर दहेजमे एक पद्म धन सहित दस-हनार उत्तम रथ, एक करोड घोडे ओरछः सौ मत्त हाथी दिए । ११९ एक लाख. पैदल सेना तथा तीन सौःसेविका देकर पुनः वशिष्ठ एवं भरत तथा -लक्ष्मण की.-भी भव्य पजा की ।

नेपाली -हिन्दी

जानाको , मतलब्‌

बी
४९

जनकजी

रामको चरण्मा प्या ।घूशी ` मन्‌ सबको गराइ्‌ वहते वीदा जनक्ले गव्या॥, गरी।सीताजीमहतारिका अगि गई अलिद्खनादीलागिन्‌ ख्नर सोहि सूनि सवका मू खसे वर्वरी १२१॥
सरी।सीताजीकन अत्ति यो पनि दिया सासू ससुराआर्को छैन बडो यही बुक्ञि गन्या तिन्‌को टहल्‌ नेस्‌ गरी ॥हन्‌ भनी।स्वीको धमं पतिव्रता हनु दलो जानेरर्ती - येति दिया र तेस्‌ बखतमा वीदा भया ती पनि।1१२२॥
यै बीच्मा नगरा बज्या प्रभुजिकास्वमा पनि हषे भो प्रभु गया
रामृको लश्कर बाद कोश्‌ जनकपुर्‌सबका चित्तमहां वडो भय दित्या

भेरी

मृदद्धा

पनि।
फेरीदेखी
अयोध्याजसं ता
भनीगयो।
उल्का वहते भयो।।१२३॥
गरी।यस्‌ पृथ्वीतलका ति क्षचिहर्को ट्ूलो विनाशेआया तेस्‌ विचमा तहां परशुराम्‌ उल्का भयो जुन्‌ धघरी॥सबेमा परी।पृथ्वी. कम्प भडन्‌ तसं बखतमा हाहाराजाका. मनमा विचार्‌ यहि पन्यो छोरा वचन्‌ क्या गरी।। १२४सबकोअव श्रीरघुनाथ की इच्छा अयोध्या लौटने की हुई 1 १२०अत्यन्त प्रसन्न करके जनक ने विदाई दी!सीताजी की माताआगे बढ़कर पुत्री को आलिगनमे भरकररोने लगीं) यह देख सभीकीरओंखों से अश्रं प्रवाहित होने लगे। १२१ सीताजी को यह्‌ सीखभीदीकि सास-ससुर के समान महान्‌ ओर कोई नहीं । अतः उनकी
सेवा-टहल भली प्रकार करना।

पत्ित्रता स्त्री का मूल धमं तथा

उसका पालन

आदि उपदेश देने के पश्चात्‌ उन्होने सीता को विदा

.किया । १२२

इसी समय प्रभु [केकटक का] नगाडा बज उठा ओर यह
जानकर कि प्रभु (राम) पूनः अयोध्या चले गए, स्वगे मे भी मृदंगादि वजउठे । जनकपुरसे वारह कोस दही लम्बे राम का जलूसगयाथा कि सवकेमन में एक भयानक विघ्न उत्पन्ने होने की आशंका हुई । १२२ इसपृथ्वी-तल पर तमाम क्षत्रियो का विनाश करने वाले परशुराम का
उसी समय आगमन हुजा।

उस समय पृथ्वी कपि उठी ओौर चहँ

ओर हाहाकार मच गया, सभी भयभीत होगए।

राजा दशरथ सनम

सोचने ले कि पूते की रक्षा किस प्रकार हो १२४ इसप्रकार विचलित

भानुधक्त-र।मायण

५९
यस्तो च्ल चित्ते परशुराम्‌- का पाउमा लट्‌ पन्था ।मेरा पुत्र वचून्‌ प्रभो पर्ुराम्‌। भन्न्या इ वन्ती गम्या ॥यस्तो विन्ति पनी अनादर गरी कालाग्नि जस्ता भयारामको गवे हरू भनी परशुराम्‌ . रामूके अगाडी गया।। १२५॥पुरान्‌ धनूक्स्को पुत्र तें होस्‌ बता मकन लौ जावो
माच्तैमा अति गवे भो तंक्न. ता धरे कुरा क्या भन ॥चडा।योताहो हरिको धन्‌ विर भया तादो यसमाभन्दे खप्‌ रिसले र्या परश्ुराम्‌ रामकं अगाडी खडा।।१२६॥तदि आज चढाङछस्‌ त॒ यसमा संग्राम्‌ रेध्ये गदेषु |सक्तैनस्‌ तव हर्‌ म राख्तिन सवे- को प्राण्‌ सहज्‌ दरद्‌ ॥यस्ता क्रूर वचन्‌ गरी परशुराम्‌ कालाग्नि रूप्‌ धन्या।पुथ्वी कम्प गराई लोकहरुको सम्पूणं सातो हस्या।। १२७॥यस्तो करूर वचन्‌ सुनेर रघुनाथ्‌ करोधूले अगाडी सरी।खोसी लीनुभयो धनुष परलुराम्‌- को त्यो बलेले गरी॥तादो जत्दि चढाइ्‌ बाण्‌ पनि तहां लीनूभयेथ्यो` ` जसे ।ट्लो वल्‌ रघुनाथको वुक्च सवै. घृशी भयो लोक्‌ तसे।। १२८॥होकर दशरथने परलुरामके चरणों मे पड़कर विनती कीक हे प्रभुपरथुराम ! मेरे पत्र वच जाये! ेसी विनय को भी टकरा करकालाग्नि की भाँति क्रोधितो, रामके वलके

गवं की परीक्षा लेने

के लिए परशुराम उनके सम्मुख गए) १२६ तुम किसके पृत्र हो?मृद्चे वता । एक साधारण पुराना धनुष तोडने से ही तुम पर अच्यन्तगवेषठा गयादहै; ओर ज्यादा क्या कहूं! यह तो हरि का धनुष हैः;यदि वीर होतो इसकी प्रव्यंचा चढाओ । यह्‌ कहते हुए परशुराम अत्यन्तकोधित होकर रामक ही सम्सुख आकर खड़े हो गए । १२६

यदि आज

तू इसमे प्रत्यंचा चढ़ा देताहैतो तुन्नसेमै युद्ध करूणा ओर यदि चढ़ानहीं सकेगातो किसी कोम जीवित नहीं छोङ्गा। सहजदहीसव कावध
कर
डउालुंगा।

एसे कूर वचनों का उच्चारण

कालाग्निकारूप धारण किया।को भयन्नीत कर दिया । १२७

करके परशुरामने

पृथ्वी को कञ्पित कर सम्पूणं मानवंएसे क्रूर वचनों को सुनकर

श्रीरघुनाथ

जी क्रोधित हो कर आगे वढ़े मौर परजुराम के धनुष को वलपूर्व॑क `छीन
लिया। शीघ्रतासे जैसे ही प्रत्यंचा चाकर उन्होने बाण-भी ले लिए, वैसेही भ्रीस्वूनाथ जी की शक्ति कौ समञ्चकर सव लोग अत्यन्त हृपित

नेपाली-हिन्दी

हकम्‌ श्री. रघुनाथको परशुराम्‌तारो आज बताउ हानु अहिलेचांडो उत्तर

देउ. यस्‌ बखतमा

५१
लाई
भयो
यो तहां ।
ब्राह्मण्‌ म हानं करां ॥यसलाई लौ हान्‌ भनी ।

तारो क्यै नदिया त काटृष्ु अहिले

तिस्रा द्‌गोडा पनि।।१२९॥
परश्ुराम्‌-'हकम्‌ येति गरेर .तेज्‌
को खंचनूभो, जसं ।वृत्तान्त सम्भ्या., तसे ॥
चिन्ह्या श्रीरधुनाथलाइ्‌ अधिकोबिन्ती येति. तहां गध्या पनि ह्रे चिन्ह्यां , जगन्नाथ्‌ भनी ।मैपनी १३०))जस्को अंश मिल्यो र केहि भगवान्‌ यस्तो भयांपापी भो. अत्ति कीतेवीयें ञ्जवता यसलाई माष भनी ।बालक्‌ पो स धियां ग्यां हजुरको र्लो तपस्या पनी ॥त्रस्तो. वर्‌ खशि भे मलाई दिनुभो शक्ती, समेतं. गरी.।इच्छा पूणं हुन्याछ जाड अवता वये शक््तिमेरो धरी १३१।।पैल्हे मार. र कातंवीर्यकन फर्‌ सब्‌ क्षचिको नाश्‌ पनी ।एक्काईस वखत्‌ , गव्या प्रभुजिको हकम्‌ छ यस्ते भनी,॥क्षती शून्य भयाकि पृथ्वि तिमिल क्श्यप्‌जि लाई दिया ।येती. कमे गरी सकेर अधिको सेखी पुन्याई लिया।। १३२हए । १२८
परराम को श्रीरघुनाथ की यह आज्ञा हुई कि हे ब्राह्मण!
इसी ` समय कोई, लक्ष्य बताभो जिस परमै प्रहार करूंसे उत्तरदो कि इस समय इस पर प्रहार करो, अन्यथा

पाव काट डालगा । १२९

. शीघ्रतातुम्हारेये

यह्‌ आज्ञादेकरजैसेही परशुराम की शक्ति

भगवान्‌ ने खींच ली, वसे ही उन्हें (परशुराम को) पूवेजन्म कौ वात स्मरणहो। आई ओर उन्होने श्रीरवुनाथ को पहिचान लिया । उसी समय इस प्रकारविनती की-है हरि ! मैने पहिचान लिया कि आप वही जगन्नाथ ' हैजिनका कुछ अंश पाकर मेराभी अवतार हुदै । १३० कातंवीयंअत्यन्त पापी हो गया है।! अव मै इसका वध करूगा, यह्‌ निष्वय करके, मैने वालपन मेही अआपकौ घोर तपस्या की। उससे प्रसन्न ' हयेकरआपने मुने शक्ति सहित एेसा वर दिया कि अव जायो, मेरी कुष शक्ति कौधारण करनेसे तुम्हारी इच्छा पूणं होगी । १३१ सर्व॑प्रथम कातंवीयंका वध करो, ततूपश्चात्‌ सव क्षत्रियो कानाशकरो।मेरीटेसी आज्ञादै। तुम क्षियो पर इक्कीस वार (प्रहार) करोगे। क्षत्रियों से रिक्तहोते ही पृथ्वीको पुनः कश्यपजी को अपित कर दोगे। इतने कर्मोकोपूरा कर अपनी अभिलापाओं कौ पूणं करोगे! १३२तेतायुग में
५२

भानुभक्त-रामायर्णं

तरेतामा अवतार्‌ लिन्याष्ल नरमाभेट्‌ होला तिमिथ्यं' उही वखतमाताहाँ देखि तपै गरेर र्न्‌येती अति मलाइ दिर्दकन गयामैले काम्‌ पनि सो सवं गरिस्यांमेरो शक्तिं हज्रले हरि लिदामेरो जन्म सफल्‌ भयो सहजमावुक््यां तततव पनी सवै हजुरकोजो छन्‌ भक्त हजुरका ति संगकोयो भक्ति दृढ प्रभू! हजुरकायेती विन्ति तहां गरी सकल पाप्‌इच्छत्‌ वर्‌ प्रभुले दिदा परशुराम्‌ताहश्रीरघूनाथकरावरिपरी
रामूनाम्‌. जगत्‌मा धरी ।
देख्या तेज्‌ दशरथूजिले र॒सुतकोप्रेमूुका सागरमा तहां इविगया
यो शक्ति ल्युंला हरी.॥ब्रह्माजिका दिन्‌ भरी।वेकुण्ठ घाम्‌मा हरि।। १३३५राम्‌लाइई भे्ट्यां पनी।चिन्ह्यां प्रभ्‌ हुन्‌ भनी ॥पायां परात्मा पनी]पाते करपाको बनी।। १३४सत्‌सद्ध॒ मेरो हवस्‌.।येही चरण्‌मा . रहोस्‌.\पृण्यै सम्पेण्‌ ग्याआनन्दमा ती पव्या! १३५॥घूमी नमस्कार गरी।मन्‌ राम्‌चरण्‌मा धरी ॥हर्षश्रुधाराधरी ।आलिङ्घनादी गरी।॥। १३६॥

येती काम्‌ गरि राम्‌ गया सहजमा

पुग्या

मर्जलि ति गया

महेन गिरिमा

सीतालाइ लियेर राज्य सूखभोग्‌

रामकेनामसे

मनुष्य होकर

अयोध्या

महाँ ।
राम्‌ले गन्या क्ये तहँ ॥

जन्म लूंगा

उसी समय तुमसे भेट

होगी । यह शक्ति पुनः हरण होने के पश्चात्‌ दिन भर ब्रह्मा का
ध्यान करते रहना । मूङ्ञे इस प्रकार शिक्षा देकर भगवान्‌ हरि वेकुण्ठलोक को चले गए । १३३

मनिउन सव

कार्यो कोपूणं किया।
राम
सेभटभीदहो गई 1 आपस्ते मेरी शक्ति हरण किये जाने परञआपकोप्रभु जानकर पहिचाना। मेरा जन्म सफल हुजा । सहज ही परमात्माकोभीपालिया। आपका कृपा-पात्र वन उस सभी तत्व-जान कोभीसमञ्ञ लिया । १३४ आपके जो भक्त जनै उनसे मेरी संगति रहे।अपके इन्दी चरणों मे यह्‌ भक्ति दृढ़ रहै। इतनी विनती करके पापएवं पुण्य वहीं समपित कर दिया, तथा प्रभु से वांछिति वर पाकर परशुराम

जनन्दमग्न हौ गये । १३५

श्रीरघुनाथ जी के चारों ओर परिक्रमा

कर्‌ परशुराम ने नमस्कार किया।

रामके चरणों मे अपने मनको

अपित कर वे प्रसन्नता-पू्व॑क महेन्द्र पवत पर चलेगये। पुत्र राम कीदिव्य ज्योति को देखकर नेतो मेँ हुर्पाशरु भरकर प्रेम-सागर मे मग्न दशरथ
५९

नेपाली-हिन्दी

क्यैदिन्‌ भानिज हुन्‌ भरत्‌कन यहीं

व्याड

घरेमा

भनी ।

विहा गरेर पुरिमा

जस्ये

उठेथ्यो

खबर्‌ ।
भानिज्‌लाईइ लिना निमित्त खुशिले आया युधाजित्‌पनि।। १३७॥।बीदा श्रीदशरथूजिले पनि दिया बीदा मिथ्यो जसे ।एक्‌ शबुष्न लिई भरतुजि त गया -मामा कहाँ पो तसे ॥आया
राम
सारा रेयतको प्रसन्न मन भो हुन्ध्यो खुशी क्याअवर्‌।। १३८१सीताराम्‌ अधितप्‌ गरिन्‌ रत यहां छोय बृहारी भया. 1
कौशल्याकन ता मिल्यो अदितिकोसीताराम्‌ पनि लोकमा सकलकोचेष्टा

मानिसको

गरीकन

रह्या

शोभा सबै ' ताप्‌ गया॥आनन्द म्खल्‌._ गरी ।वैलोक्यकानाथ्‌ हरि।१३९॥
वालकाण्ड समाप्त ,.0जीने उन्हे आलिगन में भर लिया । १३६ - इतना कायं समाप्त कर
राम सहज ही अयोध्या पहुंच गये । .रामने सीता को लेकर राजसीसुख भोग करने लगे । भरत जी के मामाके मनम भाज्जे को अपनेघरनलेजाने की इच्छा हर्द ओर वे उन्हें लिवाने के लिए अये । १३७श्री दशरथ जी ने सहषं विदा दी ओर भरत शतुघ्न को साथ लेकर मामाके
यहां चले गये 1! राम के विवाह करके नगर मे आने की सूचना जसेहीप्राप्त हुई सारी प्रजा आनन्द से विभोरहो उटी। १३८ पूवेजन्म मेंकियितप के प्रभावसे राम ओर सीता का पूर तथा वधू.के रूपमे यहाँ
अवतार हा । माता कौसल्या को सूये के समान शोभा प्राप्त हुई ओर
सभी दुःख व विताओं का नाश हुञा । सीता-राम ने भी संसार कौ-आनन्दमंगल प्रदान किया । चिलोकीनाथ मानव-रूप मे मानवोचित कार्यो में

रत रहै । १३९

९५५
अयोध्याकाण्डएकान्त स्थंलमा - सितापति धिया सीता हजुरमा रही ।ह्‌तूमा चौमरं ली प्रभूकन तहां हांक्थिन्‌ समीपूमा गर्ह ॥आकाश्‌ मागं गरी बहृत्‌ खुशि हंद नारद्जि ताहीं गया।नारदजीकन दण्डवत्‌ गरि तहां रामजी वहृत्‌ खुश्‌ भया ।। १॥संसारी म थियं बडो हुन ग्यां दशन्‌ मिलेध्यो जसै।थो भीग्योदय हो बुक््यां पनि यर्हां दशन्‌ मिल्याको उसे ॥मैले गर्नु छ काम्‌ कउन्‌ हजुरको चांडो उ आज्ञा हवस्‌ ।त्यो काम्‌ सिद्ध गराञंला हजुरको आनन्द मनूमा रहोस्‌।२॥यस्ता बात्‌ प्रभुका सुनीकन जवाफ्‌ सोही वमोजिम्‌ दिया ।, नारद्ले बहुते गन्या स्तुति तहां रामूलाइ्‌ मन्मा लिया॥बिन्ती. गर्नु कूरो थियो मनविषे विन्ती गन्या त्यो पनि।ब्रह्माको विनती लिई हजुरमा ` आई र्यां भनी २भको भारम दृष्ट मारि हरला जान्छूअयोध्यामहँं।

भन्ल्या येति वचन्‌ गरीकन हजुर्‌

पाल्न्‌ भयेथ्यो

एकान्त स्थान मे सीतापति ध्रीरामवेठेये।

यर्हा|

प्रभके निकटजा कर

सीताजीभी हाथमे चंवर ले कर इलारही थीं। आकाश-मागे से"होते हए नारद जी ने अत्यन्त हरषित होते हए उन्ह दण्डवत किया। १. मएक तुक्छ सांसारिक प्राणी हं । आपके दर्णनोंसे ही इतना महान्‌ हुमाहं। मे यह समञ्च गयां कि अपके दशेनोसेदही मृञ्चे ठेसा भाग्योदयप्राप्त हुआदहै। शीघ्र आना करे। श्रीमन्‌ काजो भी कायं करनेकोरहै,म शीघ्रहीउन स्वको सिद्ध कङ्गा; जिससे आपका मन प्रसन्नरहै।२ नारदजी नेभीराम कौ स्तुत्ति मनम हीकी ओर उनकीएेसी बातो को सुन कर [रामने] उत्तर भी उसी प्रकार दिया। सर्वभांतिमन ही मन विनती करते हुए प्रच्हने कहा कि ब्रह्मा जी की एक प्रार्थनाकोलेकर आपके पास आयां । ३ आप यह्‌ कहु कर पधारेथेकि अयोध्याजाकर दुष्टों कोमारकर पृथ्वी को भार से मूक्त कक्गा। परन्तुअवतो राजा दशरथ की इच्छा आपको राजग प्रदान करने की हृदं

नेपाली हिन्दी

५१
यस्तो हौ तर गादि दीन दशरथ्‌ख्वामित्‌ले अब ॒राज्यमा भुलिदिया
राजाजिको मन्‌ भयो ।भार्‌ हर्तकामूता रद्यो।)४।
नारंद्का ई वचन्‌ सुनी खृशि भरद उत्तर प्रभूले पनीजल्दी बक्सनुभो म राज्य नगरी भोली म॒ जान्‌ भनी ॥ख्वामित्का इ वचन्‌ सुनेर बहुत नारद्जि ` खूशी भया ।तीन्‌ फेरा प्रभुको प्रदक्षिण गरी आकाश्‌ गतीले गया ॥ ५सन्तोषले दशरथूजिको मनविषे आनन्द मङद्धल्‌ भयो ।राम्लाई अब राज्य द्यं भनि उसं मन्‌ यस्‌ लहडमा गयो ॥यस्तो मन्‌ हृनगो र डाकि गुरुथ्ये यस्तो हृकूम्‌ भो पनी ।भोली राज्यम दिन्ष्ु पृत्रकेन सब्‌ सामग्रि ल्या भनी ।।६॥मन्वी उाकि हृकूम्‌ भयो संग रह्मा जो जो कटन्छन्‌ गुर ।सोसो चीज्‌ ज्लटपट्‌ तयार्‌ गर अवर्‌ सब्‌ काम छोड्न्‌ बरू ॥मन्तीले पनि यो हुकूम्‌ सुनि तहां साथे गुरूको रह्या।` चाहिन्छन्‌ जति चीज्‌ ति खोजन गुरुले खोलेर सब्‌ चीज्‌ कल्या।।७॥मन्तीलाद्‌अदधाद्‌राघवजिका साथूमा वशिष्ठे गथा ।पले श्री रघुनाथले गुरु भनी सन्मान गर्दा भया ॥है। दहेस्वामी! यदि आप राज्य-कायेमें भूल गयेतो पृथ्वीका भारह॒रण.करनेका कायंतोरेसे ही रह जायगा 1४ नारद के इन वचनोंको सून कर प्रभु ने प्रसन्न हौ कर उत्तर दिया 1 ' राज्य यदि इतनी शीघ्रतासे दिया गया तो विना राज्यक्यि ही चल दुगा 1. स्वामी (राम) केइन वचनो को सुन कर॒ नारद जी अत्यन्त प्रसन्न हूुये। तीन बार प्रभुकी परिक्रमा कर बड़ी तीन्र गति सेआकाणशकी ओरं चले गए। ५सन्तोषसे राजा देशरथ का सन. परिपूणं था। वे आनन्द-मंगल मे मग्नथे। इसी व्रीच उन्हं रामको राजगहौ देनेकी उक्कण्ठा हू्ई। अतं:गुरु को बुलाकर कहा किं अव कल मै अपतते पुत्रे (राम) को राज्य सौपदगा, जतः सभी आवश्यकं सामग्री का संग्रह कीजिए । ६: मंत्रीको बुलाकर अदेश. दिया कि सारे कायं छोड़कर गुरुजी जो. सामग्री कहं वह्‌शीघ्रता से तेयारकरो। मंती भी इस अदेशानुसार गरु केसौथ हीरहै । जिन सामग्रियों कौ आवश्यकता. थी, गुर ने स्पष्ट. वर्णन किया 1 ७
मंत्री को. इतना भार दे कर गुरु वशिष्ठ राघव जीके संग गये। पहलेश्रीरघुनाथ ने गुरु का सम्मान किया । वशिष्ठ वोले, है त्रिलोकीपंति! "वैसे
५९

भानुभक्त-रामायण

हे वैलोक्यपते! गरू हन त हू तिम्रोमक्या हूं गरं ।दनृका हृन्‌ इ गरू भनेर इ स्वं भन्छन्‌ भनुन्‌ लौ वर्‌।८॥तिस्रो दर्शन पाडला भनी यहां प्रोहित्‌ भयाकं म हूं,गृह्यं खल्छ भनेर डर्‌ हुन गयो धेर कुरा क्या कटू ॥खोल्‌न्या छैन म गुह्य चुप्प रहंला सव्‌ जान्दष्टू तापनि ।जानी जानि म विन्ति गनं अहिले आयां हजुर्मा पनि ॥९॥भोली हुन्छ तिलक्‌ हजुर्‌कन यर्हाँ सामग्नि जम्मा भयो।पृथ्वीमा सुकला हवस्‌ हजुरको सव्‌ शास्वले भन्ठयो॥संगै ।सब्‌ इन्द्रीय जितेर आज उपवास्‌ गरन्‌ सितेआज्ञा पाड म जानुं काम्‌ छ वहतं सवृकाम्‌ विचार्‌ष््‌ म गै।॥१०॥यस्तो विन्ति गरी वशिष्ठ गुरु फर्‌ जस्स गयाथ्या पनि।राम्‌ले लक्मणथ्यै भन्या मतिमिलाइ्‌ काम्‌ गनं चला भनी॥छैनन्‌ भाद भरत्‌ पनीत तिनका खातिर्‌ छ मेरी दया।कौशल्या सनि खुश्‌ हुनिन्‌ भनितजो समचार्‌ वताड्दं गया।(११॥राजाले त खतम्‌ गव्या दिनु भनीयस्मा विघ्न कदापि पने नदिउन्‌
क्या गदंछित्‌ कंकेयी ।लक्ष्मी र दुर्गा भई ॥
-तो.रम.तुम्हारा गृरुहंही, परमै भलाक्या रुहं! हाँ, इनका गुरु अवश्य
ह्रँजोये सव [मञ्चे गुरु] कहते हँ । ८ तुम्हारे दशंन पाने के लिए रमँ यहांपुरोहित हमा हूं । कहीं रहस्योद्घाटन न हो जाये इसका भय हुआ है ओरअधिक क्या वताॐं। मै सव कुछ जानते हृए भी रहस्योदघाटन नेहींक्ररूगा। - चुप ही रहंगा। सबकुछ जानकर भीम अभी आपकीशरण मे विनतीः करने आया हं। ९ कल आपका त्तिलिक हौगा। सवसामग्री एकत्रित हो गर्ईहै। भूमिपरही सोनेकी कृपा करे, जैसा-किसभी शास्त कहते हैँ । सव इंद्रियों कों जीत कर आज सीताजी, केसाथ ही .उपवास करने कीकरुपा करे।, आज्ञा दीजिए । अत्यधिक कायंहैः जाकर कार्योके विषय में विचार करतां
१०

ठेसी विनती कर

गरु वशिष्ठ जेसेही चले गये, राम ने लक्ष्मण से सलाह की ओौर कार्यभारसौपा! भाई भरत भी जिनके प्रति मेरा अत्यधिक प्रेम है, यहाँ मौजूद नहींहै । कौशत्या माता भी सुनकर प्रसन्न होगी, ओौर उन्दः समाचार सुनाया । ११राजा नै तो समाचार समाप्त करते हुये कहा, कैकेयी क्या

दै।" लक्ष्मी ओौर भगवती दुर्गा इसमे कदापि

करती

विघ्न न. होने दे।
नेपाली-हिन्दी .

कौशल्या पनि-यो विचार गरि- तहां

५७
गथिन्‌ - पुजा . देविको ।
योताकराः मनसा. मन्या ठहरियोवाणी नँ तिमी >विष््एरिकत आडट्री -स्वीकां' घटमा. परसेर तिमिल
काम विघ्नः गर्ननिको।।१२।।ती मन्थरा.केकेयी |काम्‌ सिद्ध लाऊ गर ॥द्योताका इ वचन्‌“ सुनेर ्टपट्‌ ` तेस्‌ मन्थरीमा पसिन्‌ 4-ˆखप्‌ ˆभलाउन - भनी ` . फेर केकेयीमा पसिन्‌।।१३॥करैकेयीकरनवाणीका वश्नमा पव्याकि छदि ती. जाह यिन्‌ कंकेयी ।गगर]काम्‌ वितल भति चटपटाइं तहिक्षट्‌ । त्यो मन्थरानार्नाः छल गरि सिक्कि 'पारिकन सब्‌ ` वत्तान्त `विस्तार्‌ भनी ।
दुई वरछन्‌ तिमि मागिल्यौ भनिटूलौ ` सूचन्‌ .गरी- यो पनि॥।१४॥।।

णले तिं -भलाइयाकि. छेदि लौ

भन्दीं भदनकंकयी ।राम्लाई्‌ वनवास भरत्‌कन रजाद्‌ माण्छ म चांडो गई.।।दुद्‌ वरले. जब कामं सिद्ध गरेला.. यला सये गाड भनिन्‌ ।बीदा दी `घर .भन्थराकन फिराट्‌ रिस्‌ गने लाग्दी .भदत्‌।। १५।।सुल्दर्‌ वस्त्र निकालि फालि कपडा मेला ` शरीरमा धरिन।

आभूषण्‌ `कन पयाँ कि. खूप रिसले

खाली `जमीन्मा प॑रिन्‌ ॥
कौशल्या भी यही विचार कर देवी की पूजा करती थीं। [किन्तु] देवताओंने मन मे कायं मे विघ्न उत्पन्न करते का. ही निश्चय. किया । १२.

वाणी

(सरस्वती) को.आज्ञा हुई कि तुम जा कर मंथरा ओर कैकेयी दोनो स्त्रियोंके.र्मनमें. प्रवेश कर 'विध्न उत्पन्न करो भौर. कायं सिद्ध करके आओदेवताओं के इस वचनं को सुनकर वाणी तुरन्त मंथरा.मे प्रवेश कर गंईकेकेयी. को भीः भ्रमित करने के लिए (सरस्वती) पूनः कंकेयीमें भी प्रवेशर गई ।,१३. इस प्रकार वाणी कै वशीभूतं.केकेयी जहाँ थी, कहीं अवसर

न' निकल जाये, एेसा_ सोचकर

मथरा तुरन्त वहाँ पहुंच गुई।.

अनेक

प्रकार के छल .से.उस्ने -अपने-वण करके सब वृत्तान्त सविस्तार कहने लगी +बोली किदो'वरदहैः जो तुम अभी मांग लो, इसी मे भलार्ईहै । १४ वाणीके वशीभूत कंकेयी कहने लगी कि मै इन-दोनों वरों.कोमांग लूँंगो। एकसे रामको चौदह वप्रं का वनवास ओर दूसरे से भरत.को राज्य ` इनदो वरों'सेजव कायं सिद्ध होगातवमै तुम्हंसौ गाँव दृगी। मंथसको विदा कर धर लौटी। कैकेयी ; करोधित होने लगी ।*१५ उसं
सुन्दर वस्तो को त्याग कर मैले वस्त्र शरीर में धारण कर लिये 1 आभूषणंकौ भी.उतार फेका ओर भूमि-पर लेट गई। संसार के सज्जनो का कहना
५८

भानुभक्त-रामायण

सञ्जन्‌ वेस्‌ सुसती.पनी कुमतिका

सगले त' बिग्री गयो।
भन्छन्‌ जो दुनियां उ लक्षण यहांकेकेयी सित बस्नलाई्‌ खुशिले
ठीक कंकेयीसा भयो।। १६॥।

देख्यानन्‌ र . तहां कता गड्‌ भनी

राजा गयेथ्या जसं।चाकरनि सोध्या तसं ॥
क्रोधागार-विषे भयाकि त वुरध्या कारण्‌ छ कुन्‌ कृत्ति यो. |
सू्याको पनि छेन मै हजुरलेकेटीका इ वचन्‌ सुनीकन डराइ
बुन्‌ हवस्‌ क्यान हो।। १७।राजा नजीकृमा गया |कौकेयीक्न क्यान यो रित गय्यौ. वात्‌ खोल भन्दा भया॥जो भन्छ्यौ म पुव्याउ॑ला सनि शपथ्‌ खांदा जसे बात्‌ गरन्‌ ।राजा वृ्न सरी गिव्या पृथिविमा यस्मा बहूुत्‌ जिद्‌ गरिन्‌।। १८॥।राम्लाई बनवास भरत्‌कन रजा देऊ भनी जिद गरी!दुई वरले यहि द्यौ दिदौन त भन्या बाच्न्‌ त मूर्दय सरी॥भोली येति कुरा भयेन त भन्या मर्न्याष्ल विष्‌ खाइमता।
भन्न्या येति कुरा सुनी फिरि गिव्या. राजा जमीन्‌मा यता।। १९]त्यो रात्‌ वषं समान्‌ व्यतित्‌ हुनगयो राजा ति मूर्छा भया।सब्‌ सामग्रि तयार्‌ गरीकन बिहान्‌ मन्ती हजुरमा गया ॥है कि उत्तम, से उत्तम सुमति भी कुमति की संगति से बिगड़ जतीदहै।ठीक वही लक्षण केकेयी मे दुष्टिगोचर हुए । १६

राजा प्रसन्न हो कर जंसे

ही रानी केकेयी के. पास पहुचे वैसेही.केकेयीको न देख कर उनकीउपस्थिति के विषय में सेविका्ओोंसे पूछा) सेविकाओंने विनती कींकि वह्‌ कोपभवन
मेंजाकरवैठीहै।

किन्तु कारण

का कुठ ज्ञान नहीं

है 1 आप स्वयं जाकर जानने की कृपा करे । १७ `बालिका (सेविका)के इन वचनों को सुनकर राजा भयभीत होते हृए निकट गये । , उन्होनेकेकेयी से कहा कि यह्‌ सन क्रयाकररहीहौ ? सब वात मूञ्चे स्पष्ट करो।विवश करने पर जव राजा ने शपथ लियाकि'जो कु कहोगी मँ पूणंकरूगा, तव कैकेयी ने सव वात कहदी। उसे सुनकर राजावक्ष कीभांति पृथ्वी परगिरपड़। १८ मेरेदौवरदहै दीजिए)एकमसे रामको
वनवास ओर दूसरे से.भरत को राजगही 1 ओौर्‌ यदि नहीं देगें.तो आपका
जीवित रहना मृत केसमानदहै। यदिं कल तक वह नहीं .हुभातो मैविषपान कर प्राण व्यार दुंगी.। -रेसी बात सूनकर राजा .पुनः पृथ्वी परगिर पड़! १९. राजा मूछ्ति हो गये ओर वह्‌ राति एक वषं के समानबीती । सब सामग्री तयार कर प्रातः मंत्री राजाके "यहाँ गएसव

नेपाली हिन्दी . |

५९
देष्या चालू र वहां विचार्‌ हुन गयो _ सोध्या पर्यो क्या भनी ।विस्तार्‌ पाद्‌ सुमन्त राम्‌ लिन गया आया तहँ राम्‌ पनि।।२०॥।राजालाइ..त दुःख . सक्छ हुनको कारण्‌ तिमी .छौ.भनी।वनृमा मेः तिमि राज्य द्यौ भरतलाई भन्दी. भडइन्‌ यो पनि॥यस्ता बात सुनि बात्‌ गम्या प्रभुजिले . सृन्छयौ कि ए केकेयी ।राजा. खशि -रहुन्‌ म जान वनमा .केकाम्‌छषरुमा-र्ही।२१॥गाह्ो क्ति नमानि जान्छु वनसा राजा त बोलून्‌ भनी ।बोल्याको प्रभुको . वचन्‌ सुनि तहां . बोल्छन्‌ ति राजा पनि ॥हे रामचन्द्र |, मलाइ्‌ आज्‌ तिमीले बधिर. राज्यं.गरी।सूदादेखि ` बचाउ , पाप तिमिकनं लाग्देन यस्तो गरी ।२२॥राजा येति भन्या र फेर पनिविलाप्‌
ख॒प्‌ गनं लाण्दा 'भया।
राजाको बुक्चियो र आशय तहँकौशल्या पनि भवितले हरिजिको
रामचन्द्र माध्यं गया ॥ध्यान्‌मा रहयाकी थिइन्‌ ।

राम्जीलाइ्‌ नदेखि

ताना प्रभ॒मा दिदन्‌।।२३॥
~

क्ति नषटाइ्‌

सुमिच्राले `भन्दा 'पछि `पलक माइका खुलि गयोप्रभूलाई देख्ता अधिक मन 'सन्तोष्‌ पनि भयो ॥खूणीले काखूसा, लीकन जब -भनिन्‌ खाड कचु भनी । .सनी राम्ज्यु भन्छन्‌ अवत कति खांला नि.म पनि ।॥२४॥
स्थिति को देख कर बड़ ही असमंजस में पड़ कर उन्होने कारण पृष्ठा | पूरीपरिस्थिति को भली प्रकार समञ्चकर मंत्री सुमंत्र रामको लेने.गये। रामभी ञागए। २० केकेयी ने कहा, राजा को तुम्हारे यहाँ रहने से दुख हुआ हैँतुम भरतको राज्य सौप-कर बन चले. जाओ।इस प्रकारकी वातको सुनकर प्रभु ने कहा, माता सुनो! राजा प्रसन्न रहँ। घरमेरह करकरना हीक्याहै। मैवन को जाताहूं। २१ चिना संकोचंवन चला, जागा, महाराज आदेश.देतो। प्रभु के वचन को सुन कर राजाभी वोले, हे रामचन्द्र! मुक्षे आज बाँध कर [डाल दो ओौर |राज्य करके इसअसत्य से बचाओ । ेसा करने से तुम्हं किसी प्रकार कापापन होगा! २२राजा इतना कहकर फिर अत्यन्त विलाप करने लगे। राजाके इसआशय को समञ्च केर रामचन्द्र माताके पास गये ` कौशल्या भी हरिजीके ध्यानमे मग्न थीं। रामको न देख करप्रभुसे अनुयोग भीकिया । २३ ,सुमित्राके बौद, माता (कौशल्या) के पलक खुलते ही प्रभु

भानुभक्त-रामांयणं

६०
गयो खान्या वेला मकनं त मिल्यो राज्ये वनको । ,भरतूने राज्‌ पाथा यहि वसि गरन्‌ राज्य -जनको ॥
विदा वक्स्याजावस्‌ खुशिसित म जान्याच्लुः वनमा । `“म चाडै फिर््याछ विरह नहवस्‌ क्ति मनमा.॥२५।।वचन्‌ सुन्द मूर्च्छा परिकन उल्याकी ` छेदि तहा । `भनिन्‌ कौशत्याले अब म तिमिलाइ छोड्दषटु कहां ॥ `भन्या राजले ता तर म तिमिलाईइ ` रोक्तष्ट यहां ।कि साथे लैजाऊ मकन तिमि जान्छौ अव जहां ।।२६॥
तिमीलाईइ विदा दीम कसरि यहां दुःख सहला ।. |वरू प्राणै त्यागी यमपुरिमहां -जाइ्‌ रहुंला।विलाप्‌ कौश्चल्याको यति सुनि दयाले भरिगयो ।तहां लक्ष्मणूको मन्‌ तब अरु.उपर्‌ रिस्‌ हुन गयो ॥२७॥नजर दी रामूज्यूमा अरुसित उठ्याको रिस बढाइ ।`गव्या विन्ती राम्थ्ये अब भरतथ्ये गदेषु लडादरं `हजुर्‌का राज्‌ हर्या जति जति त छन्‌ मां सबला ।पितं ब्छ्‌ पैले भनिकन भन्या, क्या छ अरुलाइ्‌ ।२८॥को देख कर मन को अत्यधिक सन्तोष हुआं।

अति प्रसन्नतासे गोद

मे लेकर जव कृष खने को क्हातो राम बोले कि अब मै कितनाखाञ्गा। २४ मेराखने का समय निकल गया। मून्ले वन का.राज्यभिलारहै। भरतने राज्यपाया है ओर वह्‌ थही रह्‌ कर राज्य करें!
मुह्षे शीघ्र विदादेने कीष्ृपाकरे।ही लोटूगा।

मैँवन कोजाता हँ। सैशीघ्र

सनम किचित मात्र भी चिन्ता न करं । २५.

एेसा वचन

सुनकर भूछित हुई कौशल्या पुनः. सचेत टो बोली कि अव भँ तुम्हें कैसे
छोड़ सकती हूं। राजा ने तो कह दिया परन्तु मँ अव तु्हूं रोकती हूं। तुम
अव जहा जाभो मृज्ञे भी अपने साथनले चलो।२६ तुम्हं'विदा करंयहा किस प्रकार पीडा सहन करूंगी । भैँप्राण तज कर यमलोक मेंजाकर रहंगी । कौशल्या का यह्‌ विलाप सुनकर रामके हृदय.मे दया
उमड़ आई ओर लक्ष्मणके मनमें अन्य लोगों पर क्रोध ' आया । २७श्रीराम की ओर्‌ एक नजर देख अन्य लोगों पर उत्पन्न क्रोधसे उग्र हयो कर
राम-से लक्ष्मणने विनती कीक्रिअव भँ भरतके साथ युद्ध कलगा भौर
श्रीमान्‌ के राज्यको हरण करने वालेजो भीरहैसव का वध करूंगा । पितताकाही सर्वप्रथम वध क्रूगा। ओौरोंकातो कहूनादहीक्या। रन चाहे
नेपाली-हिन्दी ` ।
६१
. , .चढचाजावस्‌ गादी सकल 'रिपुको नाश म गरुलां। ' |यसे कामले मादका सकल सनको शोक ह्रुंला ।। `` सून्या लक्ष्षणजीका यिः वचन जसै राम्‌ खृशि भयां ।बञ्चाया विस्तार्ले पनि तहि टलो लीकन दया ।२९॥।
सून्यौ भाई ! संसारमा शरिर अति कच्चा छ जनको ।णशरीर्‌ कच्चा जानी नगर तिमि रिस्‌ कन्ति. सनको ॥सवे भोग्‌ चञ्चल्‌ छन्‌ विजुलिसरि एक्‌ छिन्‌ नरहन्यो ।
` . विचार्‌ यस्तो राखी सह तिमि -बडो हुन्छ. सहन्या ।३०॥भ्यागर तोखां भनि खोज्छ डंँसूमुखविषै ` सापूले धन्याको पनि.।तेस्तं भोग्‌ ` गरला. भनेर ..मनले . भन्छन्‌ , दुनीयां पनि॥क्याको रसू्‌- छ यहाँ .विचार..मनले ` कालूसपेको मूख्‌ परी 1क्या ,होला वन. जाडला इ स॒बलादइ्‌ आनन्द राखनन्‌ हरि।\३१॥देश्देश॒का बाट्लिन्छन्‌ वबुक्ञ तिमि मनने. बाटका पाटिमाहां |बात्‌चित्‌ गदं रहन्छन्‌ खृशिसित मनले बन्धुञ्चं राति तार्हँ-1भ्रातःकाल्‌ूमो जसे ता उतिकिनः ति सबै दशदिशा लागिजान्छन्‌ ।बन्धूको संग यस्तो बुक्षिकन गुणिले दुःखयसुख्‌ एक . मान्छन्‌ ॥३२॥।गही परवैठ भी- जायें, .तो भी मै.समस्त शतृओ का नाण करूंगा । इनकार्यो से. माता-के मन-के -सम्पूणे शोक का हरण कश्गा 1 -लक्ष्मण के
इन वचनो को, -सुनकरः-रामचन्द्र जी प्रसन्न हुए ओौर महान्‌ कपा कर उन्हेंभली प्रकार समन्ञाया । २९. सुनो भाई! संसार में मानव-शरीर अत्यन्तक्षणभंगुरःहै। -शरीरको एसा समञ्च कर तुम मन मे किचित्‌मात्रभीक्रोध न.करो। सभी भोग्य वस्तुएँ क्षणभंगररदहै। इन-वातोंका विचारकर तुम, कष्ट सहन करो 1 सहनशील (व्यक्ति) ही महान्‌ होता है । ३०मेढक सपं के मह्‌ को विषपान करने हेतु खोजतादै।! उसी प्रकार संसारसेभीभोग करने;ःको मनक्हताहै।मनसे यह विचार करो कि काल
रूपी सपे के मह॒ मे-किसप्रकार का रसदहै। --वनजनेसे हमारी क्याहानि हो जायेगी ।. भगवान्‌ सब को -आनन्द-मंगल से रक्खे। ३१तुम अपने मन से विचार कर देखो कि -लोग- देश-विदेश घूमते है। वहांमागं में विश्वाम-गृहुमे मित्रो की भांति प्रसन्नहो कर परस्परं वार्तालाप
करते रहते हँ ओर प्रातः.चले जते! ३२

होते ही. सब अपनी-अपनी दिशाओंकी ओर

पैसे भिरं कौ संगतिके गुणों को समन्न कर गुणी
६२९

भानुभक्त-रमायण

छाया तुल्य छ लक्षिमि, यौवन भन्या भेलं सरीको -भनी।भन्छन्‌ स्त्रीसुखलाईइ स्वप्न सरको , सांचो कुरा हो. भनी।'भृतल्दछन्‌ ।यस्ते जानि पनी मनुष्यहर सच्‌. संसारमाभुल्नैका वश्षले अनेक्‌ फजितिले संसारि भं इल्दछन्‌।३३॥जुन्‌ यस्‌ देह निमित्त यो रिस मन्यौ चिन्छौ कि कस्तो छयो।हाड मास्‌ र रगत्‌ नसा यत्ति कुरा जम्मा भरद बरन्छ यो॥विष्ठा हुन्छ कि भस्म हुन्छ पछितक्‌ वास्तैन यो ता कसे ।यस्का खातिर घात्‌ गस्यौ पनि भन्या पाप्‌ मात्र लाग्ला उसं।।३४॥कोधै हो यमराजस्वै जनको वैतनि ` ` भन्न ` पनि।तृष्णा हो भनियोौ बुञ्षेर तिमिने केले नविरस्यां पनि॥सन्तोषूलाई वुक्च कामधेनु सरिको सन्तोष ` मन्ले रहु। `रिस गरन्‌ बढ्या' त छेन मनमा जान्‌ असल्‌ हो सह्‌।।३५।यस्तं हो सुन क्मेका वश हंद वस्तेन एक्‌ ठम्‌ रही ।वस्ते कोहि हवस्‌ अवश्य करलेः जान्‌ छ 'जाहां गई ॥कर्मको फलं भोग गं दुनिर्यां यै चित्तमा लेउ भाइ ।आमेले यहि बात्‌ बुक्चीकन विदा दीनूहवस्‌ हामिलाई।1३ ६जन दुख ओौर सुख को एक समान ही मानते हैँ! धनको छाया तुल्य,यौवन को धूल-के समान तथा स्व्री-बुख को स्वप्न की भांति मानतेदह।ओर इस यथार्थता को मानते हुए, एेसा जान तूञ्च कर भी, मनुष्य संसारमेभूला रहताहै ओर इसी कारण अनेक आपदाओं सहित संसार में

भ्रमण करता रहतादहै। ३३

जिस शरीरके लिए इतना करोधकियो

उसे पहचानते हो ? ' हड्डी, रक्त, मांस ओौर नसे यही सव मिलकर यहशरीर बनतादैजो एक दिनि नष्टहो कर भस्महो जाता है 1` अनन्त
काल तक यहु किसी प्रकार जीवित नदी रह्‌ सकता)

रेमे शरीर के

लिए किचित्‌ माव्रभी छल क्ियातोपापके भागी होगि1 ३४
समस्त ॒मानव-जाति के लिए यमराज सदृशदहै।

क्रोध

तृष्णा वैतरणी है इसे

भी न भ्रुलना, ओर सदा सन्तोषरूपी कामधेनु का सहारा लेकर ' रहना ।क्रोध करना अच्छा नहीं, वरत्‌ वन जाना ही उचित है; ` इसे सहनकरो 1३५ ेसाहीदहै, सोसुनो! कमरत प्राणी को एक स्थान पररहने को नहीं मिलता । क्सीन किसी कार्यवश उसे एक स्थान सेदूसरे स्थान को जाना ही पडता है जहां जाकर वह्‌ अपने कयि कार्योके `
फल का भोग करतादहै!

यही बात चित्तम धारण करके ह भाई तथा

नेपाली-हिन्दी

६३
बीदा दिइन्‌ मन्‌ बुक्चाइ्‌ ।आं ` थाम्न कठिन भयो - र॒बहुतं रोईन्‌ शरीरे रुन्लादइ्‌आशीर्वाद वचन्‌ समेत्‌ मिलि गयो ताहां विदा. रामलाइ्‌'।लक्ष्मणले पनि साथ जान्छुम भनी विन्त गग्या जानलाई।) ३७)।लक्ष्मण्‌लाइ हिडलौ मन्या र रघुनाथ सीताः भयामा गया।सीतालाइ्‌ तिमिता घरे बस भनी पले तं भन्दा भया ॥पट्का छतर चमर्‌ रहित्‌ .प्रभुकने देख्ता त॒ शङ्कित्‌ भडइन्‌ ।क्या कारण्‌ हुनगौ भनीकन सिता हात्‌जोरि साम्ने भइन्‌।1 ३८}घरेमा. यहाँ)शङ्कित जानकिलाइ देखि प्रभुले तीमीचौधैमहां॥सासूको टहलगरीकन रू वषे तपीताको वचनै लिई शिर-उपर्‌ जान्छ म 'वनूमा ' प्रिये ।चौधे वषं बिताइ्‌ जल्दि म यहां फिर निश्चै श्चिये।।३९॥यस्ता ` बात्‌ प्रभुका सुनीकन तहां सीताजि मूर्छ परिन्‌।पले ज्योतिषिको कुरा सब कही छोडदीनंँ सेवा भनिन्‌ ॥सीताको यति वात्‌ सून्या र खुशिभं साथे सिताजी लिया।ब्राह्मण्‌ खूशि सदा रहत्‌ ` भनि तहां दौलत्‌ बहूतं दिया ॥४०॥।
यो बिन्ती गरि पाउमा जब पव्या.
माता, आपलोग मृश्च विदा देने की कृपा करें! ३६

ेसी विनती

करके जव राम चरणों में नरुके तो उन्होने अपने मन को समज्ञा कर बिदादी
जौर रो-रोकर" अपने शरीरकोहीधिगो लिया।

रामको आशीर्वाद

के वचनो के साथ विदामिली जओौर लक्ष्मणनेभी साथ जाने की विनती
की 1 ३७ ` लक्ष्मण को चलने की अनुमतिदेकर राम सीता के पासगये। पर्हुचते ही सीताजी कोधरमें रहने की अज्ञा दीं} पंवा,
छतरी ' तथा चवर आदि से सुसज्जित प्रभु को देखकर वे सशंकित हई ।
वे करवद्ध होकर, ` उनकी इस वेशभूषा का कारण जानने के लिएं सामने
आई । ३८ सशंकित जानकी कों देखकर प्रभ ने कहा कि' चौदह वषं तकतुम घर पर रह करं अपनी सासो की सेवा टहल करती रहना । हप्रिये! मै पिताजी कौ जना शिरोधा्यै करके, वन को जाता हूं । ' चौदह

वषंव्यतीत करम

निश्चय ही शीघ्र लौर्टूगा। ३९

प्रभ की ये वाते

सुनकर सीता जी मूषित हो गयीं । पहले ज्योतिषी की सब वाति कहींतत्पश्चात्‌ विनती कौ कि जापकी सेवा नहीं छोंमी।

सीताजी की

यह वात सुनकर राम ने प्रसत्त हो उन्हं साथले चियां। फिर ब्राह्मणोंको सदा खुश रखने के लिए धनं-सम्पत्ति का वितरण किया । ४०.' माता

भानुभक्त-रामायण

दष्ट

कोसल्याजि जहाँ थिडइन्‌ तहि, गई . कष्मण्‌जिले. बविन्तिलाइ \साता. मेरि पिला भडइन्‌ .भनि तहां सुम्प्या .सुमित्राजिलाईइ ॥येती .काम्‌ गरि .रामका हुकुमले ` लक्ष्मण्‌ तयारी भया ।राज भयामा गया 1४१सीता लक्ष्मणः साथमा-चि रघुनाथबीदा हून पिताजिथ्यें -जवब सिता लक्ष्मण्‌ लि -रामूज्यु.गया।ब शोक गर्द भंया.॥सीता रामूकन दुःखयो हुन गयो... कैकेयि - दुष्टे. ~ भईसीता आज .कसोरि- दुःख. सहनिन्‌ घोर्‌. जद्धलेमा गई ।।४२।भरभूकासंगेः।यो अन्याय भयो यहाँ.त नवसौँ, जाराम्‌लाईइ छोडि यहाँ कसोगरि बसौ -वक्चन मन्‌ -ता नगे॥यस्तो

देखि असह्य

भोर दनियां

यस्ता बात्‌ गरि-लोकले त बहुत शोक्‌ `गनं लाग्या भनी-।सब्‌ विस्तार्‌ गरि वामदेव, ऋषिले . सबला बुञ्ञाया पनि।।४३।
हेलोक्हो । अतिगदछौतिमितशोक्‌ ,. यो शोक .ता छाडिद्यौसाक्षात्‌ विष्णु इ हुन्‌ भनेर मनले - श्रीरामलाद- ..जानिल्यौ.॥पुथ्वीकोो सव भार्‌ हरेरः रघुनाथ्‌ - फन्‌ इ -जान्छन्‌ .कहां \।
साचा. हृन्‌ इ कुरा-अवश्य तिमिवे. खेद्‌ कीन मान्यौ यृहा।।४४।।को पीले लगते देख लक्ष्मण नै.कौशल्या के पास्च- जाकर

-विनतीकी ओर

सुमिता माताको उन्हे सोप दिया ।, -इतना.कायं केर -राम-की अनुमतिपाकर लक्ष्मण तैयारहो गये। सीता.ओौर लध्मण को.साथ-लेकर रघुनाभूपिता के पास गये। ४१ राम को.सीता ओर लक्ष्मण सहित विदा लेने -केलिए पिताकेःपास जाते देख असहाय हो समस्त प्रजा. शोकाकुल -हुई.दुष्ट केकेयी के-कारण सीता तथा` रामको कृष्ट. सहन करना पडा. हैः।सीतां आज -किस प्रकारधघोर. जंगलमें जाकर दुख सहन करेगी ।.४२यह्‌ .अन्याय हसा है । यहँन रह, .प्रभुके- -संगही चलें ।. -राम कोछोड कर यहां किस प्रकार रहेंगे । विना गये-मन नही मानता । , ठेसीवाते करर प्रजाजन अत्यन्त मलोक करने .लगे। तब वामदेव ऋषिनेसविस्तार, वर्णेन कर सवको -समन्ञाया;। ४३. -हे प्रजाजन ! तुम लोगअपने इस अत्यधिक शोक का त्याग.करो).. श्रीराम-कोौ मनमें-साक्षात्‌विष्ण्‌ का अवतार समञ्लो ।-- पृथ्वी के सत्र भायों.का निवारण करने के. वादःरघुनाथ लौट आेगे । . येः जायेगे कहाँ ? ये सव॒ बातें सत्य हैव्यथं ही यहं पर क्यो. शोक .प्रकट-करते हो. ४४ -इन बातों -सेऋषि ने सभी. जनों के मन को -अत्यन्त. सन्तोष प्रदान किया।

नेपाली हिन्दी

[
६५
यंसू -बात्‌ले -ऋषिले `मनुष्यहरुकी 'खुप्‌ `मन्‌ . बुक्चाईः ` दिया ।पौच्या' राम पनि कंकेयी' र दशरथः ` जाह बस्याका <थियोः।हे सांतर्‌ ! वन जानलाइ अवता आयौ. जना `तीन्‌. ˆचली ।बीदी जान मिलोस्‌ मा.जान्छ्ु वनमा रस॒ रागरतीभरःनली।!४५।
आज्ञा जानमिलोस पिताजिकि पनी. जा सदा खश.मचछ्।द्खृपाउनन्‌किभनी पिताजिकन शोक्‌ ` मन्‌मा नला -गोस्‌कष्ल.॥कंकेयी यति बात्‌ .सुनीः.खुशि भर्ई बस्तर्‌ . पुराना" दिइन्‌।लाया श्री ,रघुनाथले, ति कपडाः. सीताजिले ता दिद्न्‌।।४६॥यस्ता वस्त्र'म.लाउं आज कसरी ` भल्त्या ` मनैमा' धरी ।हेरिन्‌ -कटक्षे गेरीलज्जाले ` रघुनाथका मुखविश्रीरामूले मुदटुराः गरीः ति कपडा हात्मा जसे ताः लियात्यो ~ देखीकनः : राजपत्तिहरु . सवृ : सोया तहां जो थिया।1 ४७1दृष्टे! आज सिताजिलाइ किन.यो ` वस्तर्‌ `. पूर्नां दियौ ।केकेयी सित वात्‌ वशिष्ठ गुरुले
ण्‌: खेचिं ले लियो ॥येती -गव्याथ्या जसे ।

बीदा भै रघनाथ

सम्पूणे' रोया .तसे ।।४८।॥
यस्‌ काम्ले जति छन्‌ .यहां इ सबको-चढया रथविषे
राम भी, जहाँ केकेयी जौर दशरथ थे वहीं पहुंच गये ओर बोले, -हैमाता !चन जानेके लिए हम तीनों जने आगयेदहै। लेणमत्र भी मनमेक्रोधतथा द्वेष नं रखकर आप हमे वन जानेके लिएविदादेने की कृपा करं | ४५पिताजी भी कपया आज्ञा दे-जिससे मै वन चला जाञॐं। मे सदाहप्रसन्न'हं । आप मनम किचित्‌ मात्र भी चिन्तान कर्‌ कि मुज्ञ कष्ट,होगा । ये शब्द सुनकर केकेयी प्रसन्न हुड जौर उन्है पुराने वस्त्रादि.लाकर दिये । श्रीरघूनाथने तोवह्‌ `वस्वले लिये ओर सीताजी नेभीले लिये। ४६ से वस्त्र आज मै किस प्रकार धारण `क|मूनमे.यह्‌ विचार कर सीताजी ने लज्जापूव॑क `श्रीरघुनाथ कीओर कटाक्षपणं दुष्ट से देखा । श्रीराम ने उन वस्तो को अपने हाथमे लेः लिया, यह्‌देख सव रांज-पतिनर्यां (माताए) रोने लगीं । ४७ अरी' दृष्टे! तूनेआज' सीता कोयं पुराने वस्त्र क्योँदियि "तूने इस 'कायं से यजोलोग ह उन सवके प्राणों को खीच लिया.है। गुरु वशिष्ठनेककेयीसेजसे ही यह बात कटी श्रीरघुनाथ विदा होकर रथ मे.च॑ढ्‌ गये उस समयसब लोग 'रोने लगे । ४८
साथ मे 'लक्ष्मण भी गये।
रथे चढकर सीताराम वन कों चल पडे।घर छोड कर' उस रातति को रघपति एक
६८

भानुभक्त-रामायथण

कर्ता हूं पनि. भन्नुः ,छेन. अभिमान्‌ . जन्‌ूले न
कहीं |कर्मेको फल- भोग मिल्छ तिमिल यो बनू जाहां तहीं ।। ५७॥धीरा `भै :रहन्‌- `विपत्ति सहन्‌ ` कस्तं, ..परून्‌ : तापनि ।जनने -माया 'छ .संसार्‌ः भनी ॥कौले मोहविषे ` .नपर्त्‌ःयस्तै बात्‌ सुनि रात्‌ बित्यो गुहुजिको , ` रमूका नजीक्मा :रही'।गङ्का तनं हुकूम्‌ भयो प्रभुजिको तारहाँ उज्यालो . भई ।।५८॥गंगेः। आजम जान्छ घोर वनमा. केवल्‌ `नमस्कार्‌ गरी।टलो ,` गरी॥फिर्दामा म परजा अवश्य गरुला सामग्रियस्तो. विन्ति गरी सिता पतिजिको साथे चलिन्‌ः पार्‌ तरी।आज्ञाले घरमा फिम्यो. गह पनीः क्ती, मनेमा घरी + ५९॥तहँ ।गंगा पार्‌ तरि मिग मारि पकुवा तारेर खाया
तेस्रो .वास्‌ रधघुनाथको तहि भयो एक्‌ वृक्षका `.तल्‌महाँचौथो ` वास्‌ रघुनाथको हुन गयोः आश्रम्‌भरद्राजकोः ।राम्‌ज्यूको ऋषिले गम्या स्तुति तहां` सुरजानिकाम्‌क्राजको।।६०॥
तन-मन से उनके, वचनो को सुनने लगे। ५६ सुख-दूख का दाता ,यहांकोई नही? वास्तव मे सुखन-दुखके रूपमे यह्‌ .सवब कर्मोका फल.प्राप्त होता है। कहना मूखेता है, न कृहने से सव धमे का नाश होता है ।मे कर्ता नहीं हूं यह्‌ कहना ही उचित है । किसी को-भी.अभिमान नहींकरना चाहिएतुम यही जानलोकि इस संसारमेंकर्मोकाही फल्‌

भोग करने को मिलताहै। ५७

कंसी भी विपत्ति आ.जाय -धैय-पुवैक

सहन करना चाहिएसंसारकोमाया रूपी.जान कर कभी भी मोहकेव मे न पड़ना चाहिए । रामके निकट वंठ एेसी बातें -सुनते-हुएगृह -की रात `बीती। , उजाला होने पर गंगा पार.करने के :लिए--प्रभःवभे आज्ञा हुई ।.५८ “लौटते.. समय पर्याप्त सामग्री लेकर मै अवश्यपूजा करूगा । , हे गंगे! आज. तो.मै केवल नमस्कार कर घनघोर -वन्‌
को जाती हुं ।
एेसी विनती कर सीता अपने पति के साथः गंगाःजी कोपार कर. चली गई । आज्ञा पाकर गुह.भीः मन में भक्ति-भाव धारणंकर घर लोट गये । ५९ .गंगौ के.पार आकर गहने मृग-काशिकार कियाओर उसी का भोजन किया । श्रीरघुनाथ का तीसरा. पड़ाव वहींएक वृक्ष के नीचे पडा ओर चौथा पड़ाव भरट्राज -ऋषि के आश्रम मेंहुभ'1 कार्यो के विस्तार को-समन्न कर ऋषि ने रामजी,-की स्तुतिकी,} ९० .र्पाचवे दिनि मागे-प्रदशंन ;

लिषु ऋषिकुमारो को सयु भर

नेपाली हिन्दी `

६५
यस्‌' `बात्‌लेः ऋषिले 'मनुष्यहरको -खुप्‌ सन्‌ - वृ्ञाई ` दिया'॥'पौँच्या राम्‌ पनि कँकयी र दशरथ
हेःमातर्‌, ! वनः जानलाइ अब.तावीदां जान मिलोस्‌ मा जानु वनमा-
जाहां बस्याका थियोआयौ जना .तीन :चली |~रस रागरतीभर नली।४५॥
आज्ञो `जानमिलोस्‌ पिताजिकि पनी ` जान्छ्‌ सदा खश्‌ सष!
दुखूपाउनन्‌किभनी पिताजिकन शोक्‌ ` मनूमा ` नला गोसृकष्छ-]।ककेयीः यत्ति वात्‌ ` सुनी `खुशि भई: बस्तर्‌ पुराना दिन्‌ ।,
लायाःश्री .रधुनाथलेः ति' कपडा": सीताजिले ता दिइन्‌।(४६॥।;यस्ता ` वस्तं म लाड आज कसरी भन्न्याः' मनेमा धरी ।लज्जाले रघुनाथका ` ` मूखविषे हेरित्‌ कटाक्षंगरी 1श्रीरामूले मुटुरा गरी ति कपडा. हात्मा जसे ताः लियां।त्रो , देखीकनः7-राजपत्निहुर्‌ सब्‌ ` रोया तहां जो धथिया।।४७।दृष्टे! आजः सिताजिलीद्‌ः किन यो बस्तर्‌ ^:पुराना ` दियौ।यस्‌ कम्ते' जति छन्‌ यहां इं सबकोण्‌ वेचि `एेलै चियौः।।केकेयी सित बात्‌ वशिष्ठ गुरुले येती.. ..गव्याथ्या जसे ।बीदा भे रघनाथ

चढया रथविषे

संम्पुणं `रोया 'तसै ॥५५८॥
राम भी, जँ केकेयी ओर दशरथ थे वहीं पहुंच गये ओर बोले, हे माता 1वन जाने के लिए हमं तीनो जने आ गये रहैं। लेणमात्त भी मनं.में क्रोधंतथा द्वेष न रखकर आप हमे वन जाने के लिए विदां देते की कृषा करे 1 ५पिताजी भी. कृपया आज्ञा द- जिससे मै वन चला जा । मै सदा ही
आप मन में किचित्‌ मात्र. भी'चिन्तान करें कि. मुज्ञ कष्टहोगा । ये शब्द सुनकर -कंकेयी प्रसन्न हुई ओर उन्ह पुराने .वस्त्रादिलाकर दिये] श्रीरघूनाथ न. तो वह्‌. वस्तले लिये ओर सीताजी नेप्रसन्न हं ।

भीले लिये।४६

रसे वस्र आजै किस प्रकार धारण

क.
मन
मे.यह्‌. विचार कर सीता जीने लज्जापूरवंक श्रीरघुनाथ की ओर. कटाक्षपणं ष्टि से'देखाश्रीराम ने उन वस्तो को अपने.हाथमे.ले लिया, यह्‌देख -सव .राज-प॑लिन्थां (माता). रोने, लगीं । ४७अरी' दुष्टे!" तूनेआज सीता. कोये-पुराने वस्व क्योदियि? तूने इस -कायं से यहां जोलोग हँ उन सवके `प्राणोंको खींच लियादै। गुर `वशिष्ठ. ने.केकेयी संजसे ही यह्‌ बात कही श्रीरघुनाथ बिदा होकर रथ मं. चद. गये । `उस समयसव लोग रोने -लगे 1 ४८
साथ मे लक्ष्मण भी गये।
रथ मे चटकंर सीताराम- वन को चलं पड)घुर छोड कर उश्व राति को'रघपति एकं

भानुभक्त-रामाथण

६८
कर्ताहं पनि. भन्नुः छेन,. अभिमान्‌ .' जनूले न. गर्न. कहीं ।कर्मेको;. फल
भोग भिल्छ- तिमि - यो 'वृडनु जाहां 'तहीं ।।५७॥
कस्तं ¦परून्‌ -तापनि |`नपर्नु` जनने माया छ संसार्‌. भनी॥कलेः .मोहविषे `यस्तै वात्‌ सुनि रात्‌ वित्यो -गरहजिक्र - रामूक्रा, नजीक्मा...रही.1.गद्धा तनं हुकूम्‌ -भयो प्रभुजिको -; ताह .उज्यालो भई ।५८॥गंगे! आजम जान्छ्‌ घोर वनमा केवल्‌ ‹नमस्कार्‌ , गरी.1.

धीरां भै. रहन्‌. विपत्ति

सहन्‌

फि्दामा म पूजा. अवश्य,
गरूला. साम्नि.
;सठ्लो ; गरीयस्तो विन्ति गरी सिता.पत्तिजिको. साथे चिन्‌ -पार्‌ तरी ।.आज्ञाले घरमा फिन्यो..गुह पनी ; भक्ती -मनतेमा धरी | ५९॥
गंगा पार्‌ तरि मिगं मारि पकुवा:तेस्रो वास्‌ -रघुनाथको तहि भयोचौथो वास्‌ः-रघुनाथको हुन गयोराम्‌ज्यूको ऋषिले- गृन्या स्तुति तरह
तारेर.खाया -तर्हाँ।एक्‌ ` वृक्षका. .तलूमहां ॥.ञआश्चम्‌ ,. :- ' भरट्राजको ।

सुरजानिकाम्‌काजको।।६०॥ `

तनं-मन से उनके ,वचनो को सुनने लगे। ५६ सुख-दृख का दाता यहाकोई नहीं्है? वास्तव में सुखनदुखकेषखूपमे यह सव कर्मो का फल[प्त होता है। कहना मूखंता है, न कहने से सव धमे का नाणदोताहै.1मै कर्ता नहींहं यह्‌ .कहना हीं उचितदहै। किसी को.भी अभिमान नहींकरता चाहिएतुम यही. जानलोकिडइस संसारमेकर्मोकादही फलग करने क्रो मिलताहै। ५७. कंसी' भी विपत्ति आ. जोय .धैयं-पुवैकसहन करना चाहिएसंसारकोमाया रूपी जान कर कभी भी मोहके वशम न पड़ना चाहिए । -रामके निकट वठ एसी बातें सुनते हृएःगुह `कीं रात. वीती । उजाला होने परः गंगापारकरनेके लिए प्रभ.

को आना. हुई ।.५८

“लौटते समय पर्याप्तं सामग्री 'लेकर मँ .अवश्य.
पूजा .कलूगा । हे गंगे! 'भाज तोम केवल नमस्कार करे घनघोर वनको जाती हं 1", एेसी विनती कर सीता अपने पत्ति के साथर्गंगा.जी.को.,पार करं चली गई 1 ` ज्ञा पाकर शह भी'मनमें भक्तिभाव धारणःकर घर लौट गये। ५९ गंगाकेष्पार आकर गहने मृग का.शिकार्‌ कियाओर उसी का भोजन किंया।श्रीरघुनाथ. का' तीसरा पडाव. वहींएक वृक्ष के नीचे पड़ा ओौर चौथा पड़ाव भरद्ाज ऋषि के आंश्रम मे.
हा 1 ,कार्यो के विस्तारको समन्नकर ऋषि" ने. रामजी. की स्तुतिको] ६०,
-रपाचवें दिनि माग-प्रदशंन. के लिए ऋषिकरुमोरों को साथमे
1

नेपाली-हिन्दी

६९
पाँचौदिन्‌ ऋषिका कुमार्‌ सेंगलिया ,बाटो. ` बताउन्‌. भनी ।राम्‌ज्यूलाईः .यमुनाजितारितिकुमार्‌ सस्मा-त 'फकर्या पनिंसीताराम्‌ पनि, चित्रकृट्‌ पुगि ग्या वाल्मीकि ब्रसूभ्या जहा।वाल्मीकीकन' दण्डवत्‌ गरि बहृत्‌ : आनन्दः मान्या !तह11६१॥वात्मीकीकन--- भन्दछन्‌ -: रघुपती --क्ये, - दिन्‌.“ .रहन्छ्‌ - यहा 1.वुन्‌; जग्गा-,बटिया- छ सब्‌- तरहले.. .होला
सुविस्ता }` कहां 1,
सून्या ,-वाहिमिकिले मनुष्यः सरि भं. रामूले - गच्याका, करूरा}.सोही. माफिक-विन्ति-वात्‌ पनि गन्या `वाटमीकि छन्‌ ्नुपुरा\॥९२।।जान्देनन्‌ महिमा वडा ऋषि पनी

-जस्का त. एक्‌. .नामको )

यस्ता हौ रघुनाथ्‌ !. हजुरकन यहाँ. -क्या काम्‌. असल्‌- खामको ॥ज्जन्‌को 'हूदयै -छ घर्‌. हजुरको . -अच्छा बहुत्‌ः फेर्‌--कहां ।
व्रिस्तार्‌ ,एक्‌ -सुनिबक्सन्‌ पनि हस्‌. वबिन्ती म, ग्ट यहा ॥६,३॥व्याघ्रा. हूं अधिको -म सप्तऋ्षिको. .निम्‌ , कृपाले. गरी
वाल्मीको भनिनाम्‌ चल्यो जब जप्या , रामनाम -उल्टा. गरी ॥उत्टे-नामकि ताछ यस्ति. महिमा विस्तार -धेर्‌ क्या कटं ।

गंगाकां

-र इ चित्रकूट -गिरिका

बीच्‌का.जगामा. रह्‌।।६४॥
लिया,।.. रामजी. को- यमुना परार करवा कर वे कऋषिक्रुमार संध्या तकलौट भी. आये.। . सीता-राम्‌ भी चित्रकूट, जहाँ बाल्मीकि र्हूते.थेपहुंच गए ओर बाल्मीकि "मुनि को दण्डवत कर अत्यन्त आनन्दित हए । ६१, कू, दिन वही ,रहने की इच्छा प्रकट. करते हुए ःरघुपति- बाल्मीकि से कहतेहै7~-कौन-सा स्थान 'सवेप्रक्रार से सुविधापूणं .एवम्‌ उत्तम होगा 1 : मनुष्यकी .भांतिः राम हारा कही गर्द वात को वात्सीकिं मूतिने सुना |. ओौर उसीप्रकार विनय-पूणं वार्ता-की । -क्योकि वाल्मीकिपूणंज्ञानीयथे। ६२ हेरघूनां आप. तोः एेसे. है कि जिनके कायं की महिमा. क्रो. ऋषिनहीं समञ्च -सकता ।; `आपके ,लिए उत्तम स्थान, की क्या आवश्यकता है ,?सज्जनो-का हूदय'ही आपका आगार है, इससे `बहकर उत्तम स्थान ।आधरकोओौर कहां -मिलेगा 1. मेँ एक बात विस्तार-पूवंकः; कहता रँ, आप; श्रवणकरनेकी कृपाकर
६३.
भैँ.किसी समय.एक बहेलिया था,

सप्त्षियों

की असीम. कृपा से जव, रामःताम कोः उलटी ओर्‌. से.जपना -आरम्भ कियातव्रःःबात्मीकि के.नामं से प्रख्यातः-हुजा । , उलट -नाम.की -पेसी महिमाहैःकि शौर अधिक, क्या कटः ।

आप,गंगा- तथा -चित्रकट प्त्र॑त के मध्य के

स्थल में निवास 'करे । ६४

वात्मीकि-ऋषि के चवचनों.को;सुनःकर प्रभु

७२

भानुभक्त-रामायण

विन्ती यो मरि दुःखमा परि विलाप्‌ मर्ध्या भरत्‌जी- ` तर्हा 1.मन्तीवे समेत वशिष्ठ गुरुजी पौच्या नजीक्मा तहां ॥देख्या शोक भरत्‌जिको र गुरुले . पीता वित्याछत्‌ भनी 1शोक्‌ गरन बिया त छैन किन शोक्‌ गष्ठोँ महाराज ! भनी।।७३॥नाना तत्त्वे कही तहँ भरतकोसन्‌ आज्ञा गुरुको लिई ` भरतले
सब्‌ शोक्‌ गुरूले 'हग्या 1काम्‌काज्‌ पिताको गन्या॥

माता मेरि त राक्षसीः सरि भन्‌

`इन्‌का नजीक्मा यहाँ ।.
नस्त्‌ योग्य अवश्य छैन अवतायस्तो चित्त धियो तहां भरतको
जन्छ्‌ प्रभू. छन्‌ जहां॥इनूकोषछयो मन्‌ भनी.
राजाको किरिया जसो गरि सक्या ` दानूक्रो असङ्ख्यै' गरी ।तेस्‌ बीच्मा मनले विचार्‌ भरतले सख्या वहत्‌ शोक्‌ गरी11७४॥'
मालूम्‌ ` ता गुरुमा थियो तरप॑नी भन्छन्‌ उचित्‌ हो भनी।।७१५।।,
वावाको छ हकम्‌ यहाँ भरतने . राज्‌ गर्त, ररामूले गई.
चौधे वषं ' तलक्‌. वसून्‌ वनविषे मानो मुनीश्वर भई॥सीता राम्‌ यहि वातले वंन गया , याहं . हजूर्‌ले . पति:गादी चदूनुहंवस्‌ हकूम्‌ दिनुहवस्‌
यो राज्य मेरो भनी।!७६॥

यस्तो बिन्ति गरी वशिष्ठ गुरु चुप जस्त

रह्याध्या' तहां ।'`

उत्तर्‌ जल्दि, दिया ताँ. भरतले. क्या. गुं `यो "राज्‌ यहां । ।.।सभी मंत्रिगणों सहित वहां पहुंव गए। भरतजी. कोः शोकाकुल.देख गुरुनेपिताकीमृत्युकी सूचनादी। वे बोले; शोक करना ठीक नहींआप व्यथं ही शोक क्यों. करते है ७३ ` अनेक प्रकारके तत्वोंका ज्ञान

दे करः गुरु ने भरत के शोक को शान्त किया

लेकर भरत ने पिता का. क्रियाकर्मादि.किया।

गुरु की आज्ञा

जसेही राजा -का क्रिया-

कमं समाप्त हुआ वैसे हीः असंख्य दान-पुण्य आदि किए }' 'उसी बीच भरत `
ने शोकाकुल हो कंर मन में विचार .किया1 ७४ मेरी माताःतो राक्षसीःतुल्य ह ।` . इसके समीप रहना अवश्य ` ही उचित नहीं है, अतः अन जहाँप्रभुं वहीं जताहं।

.गुर को.विदितिथाकि

भरतके मनःमें-देसा हीः

विचार था जो उचित ही था। ७५ पिता (दशरथ) की आज्ञानुसार”
भरतयहां राज्य करना है ओौर राम को चौदह्‌ वषं तक वनों मे मूनियोंके रूपमे रहना है। सीता-रामं इसी कारण वन को. गए ! ` अतः आवः
रांजगदही पर वैठ कर, प्यहु मेरा राज्ये है" ,कह्‌ क्‌ कर ,राज्य करे । ७६.
६९

नेपाली-हिन्दी

पाचोँदिन्‌ ऋषिका कुमार्‌ . संगलिया बाटो ' वताउन्‌ भनी ।रामृज्यूलाइ्‌ ५ यमूनाजितारितिकुमार्‌ सस्मि त ` फकर्या ` पति ॥सीताराम्‌ पनि चित्रकूट्‌ पुगि गया वाल्मीकि वसृथ्या जहाँ ।वाल्मीकीकन दण्डवत्‌ गरि बहुत्‌ आनन्द मान्या. .तहा।।६ १वात्मीकोकन - भन्दछन्‌. , रधघुपती , व्ये .दिन्‌: रहन ` यहाँ ।.कुन्‌ जग्गा बवदिया छ सब्‌ तरहले. होला सुविस्ता करटा ॥सून्या वाल्मिकिले मनुष्य सरिभंः राम॒ले, गन्याका कुरा,सोही माफिक विन्ति बात्‌ पनि गव्या वाल्मीकि छन्‌ नूपुरा ६२।।
जान्दैनन्‌ महिमा .वडा ऋषि पनी जस्का त एक्‌ नामको,
क्याकाम्‌ असल्‌ ठामकोसज्जन्‌को हृदयैः छ घर्‌ -हजुरको ,. अच्छा वहत्‌ फर्‌ कहां ।

यस्ता हौ रघुंनाथ्‌ ! हजुरकन यहां

विस्तार्‌ एक्‌ सुनिवक्सन्‌. पनि हभोस्‌ विन्ती म-गष्ं यहां।।६३।।व्याधा हं अधिको. म सप्त्षिको , तिर्मल्‌ _ कपाले .गरी।वाल्मीको धनिनाम्‌ चव्यो.जब जप्या

रामनाम

उत्ट. नामकिता छ यस्ति महिमा

विस्तार धेर्‌ क्या कहूं।नीच्‌का जगामा रहू।1६४।

गंगाका

र इ. चित्रकटः

गिरिका

उल्टा

गरी॥
लिया-। रामजी को यमुना. -पार करवा.केर वे.ऋषिकुमारः संध्याः-तकलौट भी आये] सीता-राम भी चिच्रकृूट, अजहां बाल्मीकि, रहते थे
पहुंच गए ओर वाल्मीकि सुनि को दण्डवत कर अत्यन्त आनन्दित हुए । ६१.वूछ दित वहीं रहने की इच्छा प्रकट करते हुए रधुपत्ति वाल्मीकि से कहते"है-कौन-साः स्थान `सवंप्रकार से सुविधापूणं एवम्‌ उत्तम. होगा ।
की भोति राम द्वारा कही गई वात को वाल्मीकि मूनिने सुना

मनुष्य

ओर उसी

प्रकार विनयःपणं वार्ता की । क्योकि वात्मीकितोपूणंज्ञानीयथे। ६२ ह

स्पूनाथ अप तो एसे हैँ कि जिनके

कायं की महिमा को ऋषिः

नहीं ससन्च सकता 1 `आपके लिए उत्तम स्थान की क्या आवर्यकता है ?सज्जनो का हदय ही आपका आगार है, इससे बढ़कर उत्तम स्थान आपकोओर कहाँ .मिलेगा 1 .:मै एक वात विस्तारपूर्वक केहता. हँ, आप श्रवणकरतेकी कृपा करे । ६३ यँ किसी समय एक वहेलिया था 1 सप्तपियोंकी असीमकृपा से.जव रामनाम को उलटी ओर से जपना ¦आरम्भ कियातवः वाल्मीकरि के नाम से प्रख्यात हुजा। उलटे नाम कीः एेसी महिमाहैकि ओर अधिक क्या कहूं । आप गंगा तथा चित्रकूट पर्व॑त के मध्यकेस्थल में निवास करे ६४ .बात्मीकरि ऋषि के वचनोंको सुनः करग्रभु
७२

भानुभक्त-रामायण

बिन्ती-यो गरि दुःखमा परि विलाप्‌ गर्ध्या भरत्‌जी , तहा ।मन््रीवगं .समेत्‌ . वशिष्ठ गुरुजी रपौच्या 'नजीक्मा तहा ॥देख्या शोक भरत्‌जिकोः र गरले ` पीता वित्याछन्‌ .भनी ।शोक गर्न,बहिया त छैन किन शोकताना तत्त्व कही तहां भरतको
गर्छ महाराज्‌ ! भनी।1७३।॥सव्‌ शोक्‌ गरूले हत्या 1
सव्‌ आज्ञा गुरुको लिई भरतले कामूकाज्‌ पिताकों ग्या ||राजाको किरिया जसो गरि सक्या दानक असङ्ख्यैः गरी)तेस्‌ बीच्मा मनले. विचार्‌ भरतले . राख्या बहुत्‌ शोक्‌ गरी।॥७४॥माता मेरि त राक्षसी" सरि भइन्‌ -इन्‌का नजीक्मा ‹यंहां ।वस्त योग्य अवश्य छेन अवता ` जान्छ प्रभ्‌ छनं `जहा |
यस्तो चित्तं थियो तहां भरतको इन्‌कोषयो मन्‌ भनी।मालम्‌ ता गुरुमा थियो तरपनी
भन्छन्‌ उचित्‌ हो-भनी।।७५१।
बाबाको छ हुकुम्‌ यहाँ भरतले . रोज्‌ गर्नु, राले. गरई।चौधै वषं तलक्‌ वसून्‌ वनविषे मानो. मुनीश्वर. भई ॥सीता राम्‌ यहि बातले वन गया. यहाँ . _हज्‌रले. ` पनि ।गादी चदुनुहवस्‌ 'हुकूम्‌ `दिनुह्वस्‌ यो राज्यं मेरो भनी।।७६। ,
यस्तो बिन्ति गरी वशिष्ठ गुरु चुप्‌ जस्स ` रह्याथ्या.

तहा ।.'

उत्तर जल्दि दिया तहां भरतले -क्या गं योः रान्‌ यहा ॥,सभी मंत्निगणों .सहित वहां पहुंच ग्ए।भरतजी कोः. शोकाकुल्‌देख गुरु ने पिताकीमृत्युकी सूचना दी। वे बोले, शोक.करना.ठीक नहींअपः व्यथं ही.शोक क्यों करते हैँ । ७३ --अनैक प्रकार के तत्वों का ज्ञानंदे कर गरु ने भरत के शोक -को..शान्त किया।- गुरु की. आज्ञाःलेकर भरतने पिताक क्रियाक्र्मादिकिया। जेसेही रजा. का त्रियाकमं समाप्त हुआ वसे ही असंख्य दान-पूण्य आदि किए । उसी बीच भरतःने शोकाकुल हो कर मन में विचार किया। ७४, -मेरी माता तो राक्षसीःतुल्य. है । , इसके समीप रहना अवश्य ही उचित नहीं है, अतः अब जहाँप्रभु ह वहीं जताहँं। ,गुरु को.विदित.थाक्रि
विचार.थाःजो उचित दही. था।*७५.

भरतकेमनमेंणेसा हीः

पिता (दशरथ) की आनज्ञनुसारंः

भरत को यहाँ राज्य करना है ओर राम को -चौदह्‌ वषं तक, वनो मे भूनियो-
के रूप.मे रहना है ।-` सीता-राम इसी कारण वन को गए 1 अतः ओपराजगही पर्‌ वेठ कर, "यह्‌ मेरा राज्य है '.कह्‌ कहु कर ` राज्य कर| ७६:
७३

नेपाली -हिन्दी

कीर्तीमा

अपकीत्ि

पारि कसरी

राज्‌ गर्नु याहा बसी।

दाज्यूको

टहल गरी

संग र्या

लक्ष्मण्‌ रह्याछत्‌ जसी।!७७॥
गया जाहाँ ` सीतापति म पनि जान्छू अब तहां ।फगत्‌ एक्‌ कैकेयीं यहि बसिरहून्‌ छोड यह ॥फलाहारी हन्छ्‌ शिरभरि जटा धारि वनमा।म भोली जान्याष्ट्‌ हिडिकन विचार्‌ यै छ मनमा ॥७८॥।प्रभूको गादी हौ प्रभुकन फिरायेर धरमा।म॒ गादी सुम्पन्छ्‌ किन म गर्ला राज्य करमा।)भरत्‌का यस्ता बात्‌ सुनिकन सवे ` खुश्‌ अति भया ।`सबेर हिडिगया.11७९।॥।भरत्‌. . भोलीवेर ` उठ्किनसवे माता भ्राता गुरु सहित. सब्‌ फौज पनिं ली ।फकत्‌, सीतारामूको चरणतलमा चित्त पनि दी॥.भरत्‌ गद्खा पच्या गूहजिकन, शंका हुन गयो ।टुलो लश्कर्‌ . देख्या नवबुक्चिकन तानं डर भयो ॥८०॥लडौला नाड खेची भरत कपटी हुन्‌ यदि. भन्या ।भनी मन्‌ मन्‌ -ल्कर्हरुकन तयार्‌ हौ पनि भन्या ॥- एसी विनती कर जसे ही गुरु वशिष्ठ चुप हुए, भरत

ने तुरन्त

उत्तर दिया कि क्या राज्य करूगा यहाँ! कीति मे अपक्रीतिले करकिस प्रकार यहां बैठ. कर राज्य क्रूं! भाई की सेवा कर. साथ
मे रह्‌ कर लक्ष्मण यश्‌ के पात्र हए 1 ७७ सीतापति जहाँगए हैँ मैंभी अव वहीं, जाता हँ केवल कैकेयी अकेली यहाँ पर रहे! फलाहारीहोकरं शिरमे जटा धारण कर्म कल पैदल ही.वन को चला जाऊंगा,यही मने मनमेठानादहै। ७८ यह मदी प्रभु कीदहै, अतः प्रभुको घरलौटा करम गही उनको सौपदुंगा, भरत की ये बाते सुन कर सब
लोग अति प्रसन्च'हृए्‌ । -भरतनेकहाकरि भँ क्यों विवशताःपूरव॑क राज्य-करंगा. ओर `दूसरे दिन. उठकर सवेरे ही चल पड़े । ७९ सब माताओं,तथा गुरु सहित सब सेनाको भी साथ लेकर केवल सीताराम के चरण-
तल मेंएकाग्रचित्त लगाकर भरत गंगा पर पहुंचे । . निषादराज को शंकाउत्पन्न हई ओर भरत की. विराट सेना को देखकर वास्तविकता को जाने विनाउन्ह पार उतारते भी डरने लगे! ८० यदिकोर्ई्‌ कपट होगातोनावको
खीचकर लङ्ग, यही मन मे विचार कर उन्होने अपनी सेना को सचेत किया ।
स्थिति की गम्भीरता को समञ्ञ कर भरतने कहा किरम सव समन्ता हं ।1

भानुभक्त-रामायण

७४
- टुलो भिदी सत्‌लब्‌ गरिकन गयो बुच्दष्टु भनी ।तह्य भेटी राखी नजर तिर हव्या कष्टं भनी ॥८१।जसे देख्या आंसू गहभरि धरी शोक्‌ पनि गरी।कह मिल्छन्‌ सीतापत्ति मकन भन्दा घरिघरि ॥जसँ शिर्‌ पाऊमा गरिति गुहले ढोग्‌ पनि दिया ।भरत्‌ले अङ्कंमाल्‌ गरं भनि उठारईकन लिया ॥८२॥भरत्‌जीले सोध्या गृहसित सितका पति यहाँ ।सुत्याको स्थल्‌ कून्‌ हौ मकन कटु जान्छू अव तहां ॥गथा विस्तार्‌ पाई रघुपति सुत्याका शयनमा ।भरतूले खेद मान्या कुणश-शयन देखेर . मनमा ॥८३॥अहो ! मेरो खात्तिर्‌ वन वन सिताजी पति संगे ।कुशासन्‌मा सुत्‌छिन्‌ न त यसरि सुत्‌थिन्‌ अधि कतं ।
अहौ धिक्कार्‌ मेरा जनम जननी ककि भडन्‌ |इनेले गर्दा पतिसंग सिताजी वन गन्‌ ॥८८॥करटा छन्‌ सीतानाथ्‌ कति पर गया भेट्‌तष्ट कहाँ ।
छ केही मालूम्‌ ता मकन कहु जान्षू अव तहां ॥वे गुह से भेट करने गये ओर कुछ समक्चने हेतु उसकी ओर देखा 1 ८१गह्‌ ने भरत के शोकाकुल अध्रुपूणे नेत्रो को देखा। सीतापति कांमिलेंगे, कह्‌ कर भरत वार-वार निपादराजसे पृषछनेलगे। ज॑सेदहीगृहनेपावि मे मस्तक रख कर नमस्कार किया, भरतने उसे आलिगन करने
के लिए उठा लिया। ८२ भरत ने गदं से सीतापति के शयनस्थलका पता पूछा। विस्तारपूर्वक जान कर भरत रघुपति के शयनस्थल कौओर गएओौररामकी कुशो की शय्या देख कर भरत जी को अत्यन्त खेद

हुआ । ८३

ओह। मदी निमित्त हंकि सीता जी पति के साथ वन-वन में
कुशासन पर सोती! इस प्रकार पहले कभी नहीं सोई! -ओह्‌।धिक्कार है मेरी जन्मदाली जननी केकेयी को जिसके कारण आज सीताजीपति के साथ वन चली आई) ८४ कहाँ हँ सीतानाथ ? कितनी दरजने पर उनसे भेट होगी? कहाँ? कु मालूम हौ तो बताओअब वही जाता हूं । तब गहने भी उन्हं स्थान .वता दिया जहाँ रामथे। गुह के द्यि हुए समाचार

प्रसन्न हुए 1.८५

से ही राम-मिलनकी आशासे भरत

सब कुछ विस्तारपुवेक वता कर गृहने भरत को

नेपालौ-हिन्दी `

|
७५.
बताया याहाँ छन्‌ भनि ति गुहे रामकन पनि । "`गुहैकां सम्‌चारले खुशि पनि भया भेटृतष्टु भनी ॥८५॥ `, सन्‌ विस्तार्‌ बताइ्‌ ताहि गहलेताहाँ देखि भरत्‌ चली पुगिगयाएक्‌ दिन्‌ ताहि मुकाम्‌ गव्या भरतलेविलूकुल्‌ सैन्य जती धिया भरतका
गङ्धाजितारीदिया ।.जाह भरदाज्‌ धिया ॥सन्मान्‌ ऋषीले गम्याः।मेज्‌मानिलेक्‌ पय्या।1>६।
भोली बेर सबेर लष्कर लिर्ईद बीदा ऋषी््यैकै्हे पुग्दटुः चिव्रकूट गिरिमा ` भन्दै भरत्‌जी
खृश्‌ भं लश्कर चित्रकृट गिरिकाखोज्या ताहि भरेत्‌जिले अधि गई
भया।गया॥
पौँच्या नजीक्माः `जसै।डेरा प्रभूको तसै"\=७॥
डेरादेखी भरत्‌जी ताहि नजिक गया पाउका छाप देख्या।.श्रीराम्‌का पाडका छाप्‌ चिन्हकन खृशिले माथले ताहि टेक्या ॥भन्छन्‌ धन्न्ये रहय सहज नमिलन्या पाठका छप देष्यां ।ब्रह्माजीले. नपाउनु छ तपनि सहजे माथले आज टेक्याँ 41८।।यस्तो बोत्दे प्रभूको चरणधूलिविषेभक्तिलिे लदट्पटीदं।करहु 'पुण्छ्‌ कहाँ छन्‌ भनिकन सनले दसूदिशा दृष्टि दीदे॥जादा ताहीं भरत्‌ले प्रभजिकन ` जसं नेवले ` देख्न पाया |ख्वामित्‌लाइ्‌ आज पायां भनतिकन ख शिले पाडमा पनं धाया।८९।। .गंगापार करा दिया। वहाँसे चलकर भरत भरद्वाज जी के आश्रममे पहंच गये। -एकं दिनि वहीं ठ्हरे। ऋषिने भरत का सम्मानकिया। इस सत्कारको देख कर भरत की सम्पूणं सेना चकित रह्‌
गई । ८६ दूसरे दिन प्रातः सेनाको लेकर भरतने ऋषिस विदाली।चित्रकूट पवत. पर शीघ्रातिशीघ्र पहुंचने कौ इच्छा से भरत चल पड।सेना जंसेही चित्रकूट पर्वतके पास पहुंची वैसे ही भरत.अति प्रसन्न होआगे बद्‌ कर प्रभुकेडेरेकी खोज करने लगे! ८७ डरा ज्ञात होनेपर भरत जी जब- निकट .पहंचे तो उन्हँ पावो के चिह्न दृष्टिगोचर हुए ।श्रीराम के चरण-चिहन पहचान कर.भरत ने अत्यन्त हरषितत होकर वहीं
अपना मस्तक रख दिया । मँ धन्य हूं जो आज अप्राप्य पद-चिह्नोंकोप्राप्त कर पाया जिन्ह ब्रह्मा भी नहींपा सकते। ८८ ` इसी प्रकारभक्ति-भावनामेंडबे हुए भरत जी, प्रभ की चरण-धूलिसेशरीर क्रो
प्चित्न करते .हृए,
कव पहुचंगा, रम कहुँ है आदि बातें मन में सोचते
७६

भानुभक्त-रामायण

देख्या पाऊ पव्याका गहुभरि वहूंदा भश्रुधारा धन्याको ।स्‌ राज्ये तरृण्‌ बरावर्‌ गरिकन वहते आफुमा मन्‌ गन्यको ॥यस्तो देखी कपाले भरतकन तहां काखमा राखिलीया।
जस्तो मन्‌ हो भरत्‌को वुक्लि रघुपतिले चुप्‌ कृपादृष्टि दीया।।९०॥श्रीसीतापत्तिमाइकाचरणमा राख्या र शिर्‌ फेर्‌ पिता।कहां छन्‌ किन आज देखितिनंँ यहाँ क्या गदेछन्‌ छन्‌. कता ॥भन्दे खोजि गच्या पिताकन तहं

श्रीरामजीले

स्‌ विस्तार वरिष्ठे भनिलिदा

शगोक्‌ गनं लाग्या तसं॥९१॥

गंगा स्नान गरी तिलाञ्जलि दिया

फर्‌
फलू रफूलूले रघुनाथले तहि दियातेस्‌दिन्‌मा उपवास्‌ गन्या जव वित्योगंगा स्तान्‌ गरि फर्‌ फिरेर मटिमा
पाञ्न्‌ पिताले भनी॥रात्‌ फेरि गंगा गया।आएर वस्ता भया ॥९२॥

तहां सीताराम्‌का चरण-तलमा

.
जसं।
पिण्डदानं . पनि,।
शिर पनि धरी।
अयोध्यै लैजान्छ्‌ भनिकन टुलो मनृसुव गरी ॥भरत्‌ विन्ती गष्ठेन्‌ किन रघुपते ! आज वनमा।हजूरले आयाको मकन अति ताप्‌ हुन्छ मनमा ।९३॥
हए दशो दिशाओं की ओर दष्ट डालत्ते चले । जाते-जाते प्रभ्‌ के दणेन पातेही कहते है-आज स्वामी को पाया ओौर अत्यन्त प्रसन्न हो उनके चरणो मेंआत्म-समपेण कर दिया । ८९ रपव पडते, नेत्रो से अश्रुधार वहाते, तथा. समस्त राज्य-लोभ को तिनका सदृश समञ्न कर अपने हृदय को राम-चरणो में
अर्पित करते हुए भरत को राम ने कृपापूरवंक अपनी गोद में वैठा लिया।भरत की एेसी मनोभावना देख कर रघुपति ने उन्हँ महान्‌ कृपा की द्ष्टिसे देखा । ९०भरत नते प्रथम श्रीसीतापति के चरणों मे मस्तकञ्ुकाया फिर सीता-माता को प्रणाम किया। श्रीराम ने पिता कोव्हा न देख उनके विषय मे पूछा किवे कहां हैव क्या कर रह हैँआदि।गुरु वशिष्ठ दारा विस्तृत सरूपसे सव समाचार ज्ञात होने पर वे'अत्यन्तशोकाकुल हुए । ९१गंगा-स्नान करके तिलांजलि दे श्रीरघुनाथ नेफल-फूलो आदि से पिण्ड-दानादि किया। उस दिन उपवास किया]रानि व्यतीत होने पर पुनः गंगा में स्नानादि करके लौटे ओरअपनी मड्यामे जाकर वैठे। ९२ वहां सीता-रामके चरणों पर सिररख कर भरत ने उनके अयोध्या लौट चलने की उत्कट अभिलाषा प्रकट
की । भरत ने विनती की, हे रघुपते, आज आपके इस प्रकार वन चले

नेपाली-हिन्दी

७७
ख्वामित्‌ ! हजुरको मत दासपोहूं।यो रज्य गर्नाकनं योग्य को हूंयो

गादि

ता
याहि हजूरको हो।
: मैले त सेवाछोरा

हुनन्‌

गरियज्ञ॒
व्स्नु.पो हो ॥९४।
बहुत्‌ ` गरीनन्‌।
सम्पूणं लोक्को पनि ताप्‌ हरीनन्‌ ॥तब्‌.पो ति छोरासित राज्य छाडी।जान्‌ असल्‌ हो त छदे छ आडी ।९५॥बेला त॒ यो होइन जान वनूमा।मेरा त॒ ये निश्चय हृन्छ मनूमा॥जाओ - घरे फकि सधाइजावस्‌ 1¦, भेरी इ
-,

मातासित

, रिस्‌ नआवस्‌ ।९६॥
यस्ता प्रकारले गरि विन्ति गर्दे1 ,आखाभरी ओंयु बहत धद ॥रोया भरतूले जबपाउमा गै।बल्या प्रभूले पनि खृशि मन्‌ भै ॥९७॥हे भाइ!
गछ
किन
आज
जिही।
. फिनू असल्‌ छेन नि काम्‌ नसिद्धी॥जन्छ्‌ म॒ वनूमा तिमि फकि जाऊ ।तेस्‌ राज्यको काम्‌ तिमिले चलाऊ।)९८।)आनेसेमेरेमनमेघोरसंतापहोरहारहै। ९३

हे स्वामी, में तो आपका

मूञ्ञे तो सेवा करके रहना ही उचितदहै। ९४

जिसके पुत्र नहीं हए,
सेवक हूं। यह्‌ राज्य करने योग्य नहींहूं।
यह्‌ गहीतो आपकी है,
जिसने यज्ञादि भी नहीं किया, ओर न जिसने सम्पूणं लोकों का निवारणंही किया,
रसे पत्र को राज्य त्याग कर वन -जाना ही उत्तम होगा । ९५
नहीं है!
चलें, घर लौट चले जिससे सवका सुधार हो ओर अपनी-माता
मेने तो मनमें यही निष्वय कियाहै क्रि आपके वन जाने का यह्‌ समय

के प्रति मेरा क्रोधदूरहोजाय 1९६

इस प्रकार विनती करते हुए

नेतो मे अश्रु भर चरणोंमे भिर कर जव भरत रोएतो प्रभुने प्रसन्नमन से कहा.।! ९७ हे भाई! आज ` तुम इतनी जिह क्यों करते हो।
विना कायं-सिद्धि के लौटना उचित नहीदहै। भँ वन जता हूः तुम

भानुभक्त-रामाये्णं

७८
रामूले वनै गै सुनि भेपयाहीं भरत्‌ले वसिराज्य
धन्‌गन ॥
भन्त्या पिताको जव सुन्च पायांआज्ञाउसने वनजान ज्यां ।॥९९॥ई वात्‌ भरत्‌ले जव सुन्न पाया।'फेरी चरण्‌मा परि विन्ति लाया,हे नाथ्‌ ! पिता हुन्‌ मतिहीन्‌ भयाका।
स्तीका त सादं वशमा पन्याका ॥१००॥उनले भन्याथ्या पनि राज्य छाडी।जान्‌ असल होइन आजडी ॥ख्वामित्‌ ! वहत्‌ विन्ति छ फकि जाडं |` फकन्नँ भन््या त जवा नपाञॐं।१०१॥यस्तो भरतूले जवजिदहि लीयाउत्तर प्रभूले पनि फेरि दीया॥फकेन्नँ भैया तिमि फकि जाञ।'पिताजिलाईपनिदोप . नलाऊ 1१०२॥खुप्‌ सत्यवादी त पिताजि थीया।सचिहनालेवरदान ` दीयासो पूणं ग्नकिन जान्छुं वन्‌मा।संचो कृरा हौ वद्निलेउ मनूमा।१०३॥लौट जाओ ओर राज-काज का सव कायं संचालित करो। ९८ जवमैने पिता की यह्‌ जना सुनी कि राम मूनि-वेष धारण करे ओर भरतयहां रह
कर

राज्य कर

तदनुसार मै वन जने

के लिए आयां

हं । ९९ जव भरतने यह वात सुनीतोवे पूनः रामकेचरणोंमे गिरकेर विनती करने लगे। हे नाथ) पिताकी मति हीनदहौ गई थी, वेस्त्री के वशीभूतथे । १०० उन्होने यदि कहाभीतोभी राज्य छोड़करवन को जाना आज अच्छानहीं। हे स्वामी! मेरी हादिकि विनती हैकिं आप लौट चलें; न लौटने की बात मृञ्लसेन कहं! १०१ भरतेजब इस प्रकार हठ क्यातो भी प्रभु ने पुनः यही उत्तर दिया किम नहीलोर्टूगा । तुम लौट जागो ओर पितापरभी दोषांरोपणन करो ।.१०२पिता जी अच्यन्त सत्यवादी थे । - सत्यके कारण ही उन्होने वरदान द्ियि।
७९

नेपाली-हिन्दी

उत्तर प्रभरुको सुनि दुःख मान्या।फेरी चरण्‌मा परि बिन्ति लाया ॥फिन्‌ हवस्‌ ख्वामित ! बिन्ति गु)यस्‌ दण्डकारण्य विषे .म॒ जान्छु 1१०४॥यस्ता वचन्‌ सूनि - भरत्जिलाई।फेरी हकूम्‌ भा तिमि फकं भाई॥
यो . राज्य साट्या पनि हृच्छ चूटो।
हे भाइ! गौ किन आज भटो ॥१०५॥हकम्‌ यस्तो सूनी भरत पनि रामुका चरणमा।परी विन्ती गछन्‌ मत रघुपते! षट्‌ शरणमा॥-चरण्‌ बाहिक्‌ एक्‌ छिन्‌ रहन पनि ताप्‌ हुन्छ मनमा ।नफवर्या ख्वामित्‌का पछिपछि म ता जान्छु वनमा ॥१०९॥` नता फकींजान्यान त मकन लान्या वन पनि।.
,, , भन्या मछ ख्यामित्‌ ! अब अरु कुरा केहिनि भनी ॥
" भनी आसन्‌ रबँधी जब मरणमा निश्चय धन्या ।खुशी भै श्रीराम्‌ले पनि अति दयालू मन गन्या ॥१०७॥।दिया सूचन्‌ रामूले गुरुकन वबुञ्चाऊ तिमि भनी ।

गुरूले एकान्ते

भरतूजीकन पनि ॥

लगिकन

वही पूणं करनेमैवन जा रहाहं।

बात सत्यहै, यह मन में जान

लो1 १०३ प्रभुके इस उत्तरको सुन कर भरत बहुत ही दुःखित हुएओौर पुनः चरणों मे गिरकर विनती करते लगे। दहेस्वामी! मै आपसेविनती करता हूंकि आप लौटनेकौ कृपा करें!

मेमेँदही निवास करताहूं। १०४

दण्ड-स्वरूप सवन

एसे वचनो को सुनकर उन्होने भरत

को पनः ओज्ञादी-किटे भाई] तुम लौट जाओ। यहः राज्य बदलनेसेभी पिताजी का वचन्जूठाहो, जायगा । हे भाई! आज व्यथं ही फिरहठ क्यों करते हो । १०५. एेसी आज्ञाःसुन कर भरत फिर राम के चरणोंमे गिर कर्‌ विनती करने लगे, हे रघुपते! मँ आपकी शरणमे हँ ओरअपके चरणों के विना एक क्षण रहने से भी मेरे मनमेंताप होगायदिभाप नहीं लौटते तौ स्वामी के पीपी म भी वन को जार्ठगा । १०६
नही लोटेगे ओर नही मुञ्चे वनने जायेगेतो मेँ अव कुन कहगा, युंही मर जांगा। देसा कह कर जव मरने के लिए आसन वाध लियातो श्रीराम ने.भी मन ही मन प्रसच्च हो अत्यन्तःदया दिखाई । १०७ तव

भानुभक्त-रायायण

८0
वक्षया वात्‌ खोलीकन सुन इ जो हुन्‌ रघुपति ।जगन्नाथ साक्षात्‌ हन्‌ विभुवनपतीका अधिपति ।॥१०८॥।
अधी ब्रह्माजीले सकल भुमिको भार्‌ हर भनी ।स्तुती गर्दाखुश्‌ भसनम हर्ला भारहर्‌ पनि॥भन्याका हूनाले उदहि वचन पालन्‌ गरु भनी ।प्रभु जान्छत्‌ वनूमा पछि त सुन फिष्ठंन्‌ घर्‌ पनि ।॥१०९॥परभूकं इच्छा हो नतर कक्षरी केकयि पनि।वनै जाउन्‌ भन्थिन्‌ प्रभुकन रती तुल्य गनी ॥कुरो यस्तो जानी नगर तिमि यो आग्रह यहां ।भुमीको भार्‌ टारीकन पछि त जान्छन्‌ प्रभु करटा ॥११०॥रावण्‌ मारि उतारि भारि भुमिको फिषठन्‌ जगन्नाथ भनी ।गद्येयस्ता हृन्‌ रघुनाथ्‌ भनेर गुरुले खोलेरपनि॥सव्‌ विस्तार गरीदिया र गुरुको वाणी सुनी खुश भया।फवर्यानन्‌ रचुनाथ्‌ भनी मन बुद्यो राम्का नजीक्मा गया। १११॥अयोध्यामहां ।हेनाथ्‌ तत्त्व सन्यां म फिष्टुअवता जान्छपुजा गनं॑दिन्‌ हवस्‌ हजुरका एक्‌ जोर्‌ खराऊ यहाँ॥0गुरुजीनेभरतको
रामने गुरु से भरत को समञ्ञानेकी विनती की।
एकान्त में ले जाकर वात को स्पष्ट करके समन्ञाया।

सुना यह॒दैकि

श्रीरामे सू-भार हरण करने का वचन

उसी वचन को

रघुपति साक्षात्‌ जगच्राथ, तथा त्रिभुवनपत्ति के भी अधिपति 1 १०८व्रह्मा जी के सम्पूण पृथ्वीके भार हरण करते की स्तुति पर प्रसन्नः होकरदिया था।
पालन करने हेतु प्रभु भभी वन जारहे दँ!

लौटेगे । १०९

यह सवप्रभुकीहीङ्च्छादहै।

इसके वादवे धर भी

नहींतोप्रभु को किचित्‌

मात्र भी न समन्ञ कर कंकेयी किस प्रकार वन जाने को कहती । इन्‌ वातोका जान-समज्ञ कर तुम्‌ यह अग्रह न करो। भू-भार हरण करतेके वाद ,प्रभु जायेंगे कहं (अर्थात्‌ घरही तो लौटेगे) । ११०

रावणको मार कर

भू-भार हरण करके जगन्नाथ लौटेगे । रघुनाथ की लीला चाहे गोपनीय हो,
गुने स्पष्ट रूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन कर दी।

गरुकी वाणीको

सुनकर भरत प्रसच्च हुए ओौर रघुनाथ लौट ययेगे यह मन मेँ जान कर .राम
के निकट गए । १११ ह नाथ! मैने सव तत्वोंको सुनल्िया। अवरमअयोध्या जाता हू, पूजा हेतु आप अपनी दोनों खड़ा देने की कृपा करें ।
एेसी विनती करके चारो जोर परिक्रमा करके भरतने प्रणाम किया।

नेपाली-हिन्दी

यस्तो बिन्ति गरी प्रणाम्‌ वरिपरीभाप्ना साफि खराउ दी प्रभुजिलेफोरी बिस्ति गन्या तहँ भरतलेचौधे वषं समाप्ति पारि नफिन्यायो बिन्ती सुति लौ भनी भरतका

कैकेयी

रघृनाथका

चरणमा

८१
घुम्दे भरतूले गन्या।सन्‌ताप्‌भरत्काह्न्या। ११२॥लौ फिल्‌ फिनं -ता।सर्ग्या सचे म॒ ता॥सामने इुकूम्‌ भो. तहां ।
सूदे परी खृप्‌ तहां ।॥११३॥
हे नाथ्‌ दुवंद्धि आई अति फजिति दियां राज्यको घात्‌ गराई ।मायाले मोह पारदा मन पति भृलिगे मेरि बुद्धी हराई |क्यार नाथ्‌ ! आज रनक विपति गरिगयो आज यौ चेत पायां ।कट्पुत्ली स्चनचाडं छिन्‌ तिभुवन केन सब्‌ धन्य छन्‌ तिभिमाया । ११४।मेरो

माया छ

छोरा

जन धनहरमा

यो सबै खंचिदेड\

ुर्बद्धी हो पटीं ता शरण परि भनी घुष्‌ कृपा राखिलेञऊ॥केकेयी येहि पाट्ले स्तुति गरि हरिको पाउमा शीर धारिन्‌ ।हेनाथ्‌ आईशरण्‌मा परिभनि करुणा राखयो बिन्ति पारिन्‌ ॥ ११५॥हांसी सीतापतीले पनि अभय द्या जो भन्या्यां भम्यौ सो।
"दोष्‌ तिम्रो छेन यस्मा बुञ्च तिमि मनलेमेरिडइच्छातदहोयो॥{
अपनी पवित्र खडा देकर प्रभुने भरत के सारे मानस्िकतापकाहूरणकर लिया। ११२ भरतने पुनः विनती करते हुए कहा-लौटने के
लिएतोरै लौटता हूंपरन्तु चौदह वषं समाप्त कर यदि आपन लौटेतो मँ निष्वय ही मर जाऊंगायह विनती सुनकर लौटने कामएवासन, देते हुए रमने भरतको आल्ञादी।कैकेयी भी रोती

हई रघुनाथके चरणोंमे गिर पड़ी । ११३

हना!

मैने दुर्बद्धिके

कारण राजा को आघात पहुंचा कर घोर विपत्ति ढाईमाया के मोहमे पड़करमेरा मन भ्रमितहौ गयाओौरमेरी बुद्धिका नाशो गया ।क्या करं रघुनाथ [ विपत्ति आने पर आज रोतीहूं।! भाज यह समन्षआयीदहै!हे चिभुवननाथ | आप सबको कट्पुतली के समान तचातेहै, आपकी माया धच्यह। ११४ मेरा मोह जन-धनमेहै, यहु आप जवेचाहं खीच लं गौर जव आपकी इच्छाहो तब दुर्बुद्धिं व्याप्त हो जाय;बादमे शरणागत जान कर मेरे ऊपर छृपा करे 1 यहु स्तुति करकेकंकेयी हरि के समाने क्षुक गयी ओर उनके चरणो मे अपना सिर रखकेर कहने लगी-हेनाथ! भै आपक्री शरणमे आयी ह, सन्न परकरुणा-दृष्टि रक्ं 1 ११५केकेयीनेजौ कुछभी कियाथा, हस कर
८२

भानुभक्त-रामायण

मनूमा सन्तोष पाऊ सकन दिनदिनं सम्ललंदे दिन्‌ विताऊ।छट्‌नन्‌ सन्‌ कमं तिस्र रतिभर मनमा शोक नराेर जाऊ ११६॥ककेयी करुणा बक्षी खुशि भई वीदा प्रभूय भदन्‌।श्रीराम्‌को चरणारविन्द मनले भञ्दं अयोध्या गन्‌ ॥सन्‌ लफकरुहरु ली भरत्‌ पनि विदा भै फेर्‌ अयोध्या गया।सव लश्कर्हरलाद राखि घरमा अआफूफरक्‌भं रदह्या।। ११७॥न्दीग्राम्मा सव्याका भुमिश्यन गरी रोज्‌ फलाहार्‌ गव्याका ।एक्‌ गदट्ठा सब्‌ जटाको गरिकन ति खराउ गादिमाथी धव्याका ॥गर्थ्या सव्‌ राज्यको काम्‌ तपनि सव कुरा गादिमा विन्ति गदं।यस्त रीत्ले बिताया दिन भरतजिले राममा चित्त धद ।।११२८॥केही दिन्‌ चित्रकृट्मा बसिकन रघुनाथ्‌ वाह्मिकीथ्यै विदा भं।
जान्छू बनूमा म फिट भनिकन खुशिले अतिका आश्रम गे॥अत्तीका पाउमा शिर्‌ धरिकनमतहूं राम्‌ भनी नाम्‌ वताया।श्रीराम्‌का वाणि सुन्दा मन अत्ति खृशि भं अच्िले हषं पाया ॥११९॥
सीतापतिने भी उसके कृत्यो को क्षमा करके उसे अभयदान दिया मौरकहा कि इसमे तुम्हारा कोई दोप नहीं।यह मेरीही इच्छा दहै।यह मनम

सोचकरमेरी

रसे सन्तोष धारणकरो

ओौरमेरा स्मरण

करती हुई दिन व्यतीत करो । सव अपराधोंसे तुम्हारी मुक्ति होगी,तुम मन मे विचित्‌ मा्तभी शोकनकरो भौर जाओ । ११६ कंकेयी
भी राम कौ करुणा को समक्ष कर प्रस हुई ओर प्रभु से विदा लेकरअपने मनमें राम के चरणारविन्दों का भजन करती हई अयोध्या चलीगयी 1 भरत भी सम्पूणं सेना-सहित विदा लेकर अयोध्या चले गए ।सारी सेना कौ धर मे रखकर स्वयं दूसरे स्थान पर निवास करनेलगे । ११७ भरतजी नन्दीग्राममें भूमि पर शयन करते। सदैव फलाहार ५ करते। जटाको एक जूट करके वधते। खडा को अपनीगौदमें रख कर सेवा करते तथा गरही पर स्थापित कर सविनय ध्यानपुवैकराज्यके सभी कायं करते।इसी प्रकार नियमित रीति से भरतजीने रामके ध्यानमे लीनदहौ दिन व्यतीतं किए] ११८ कुषठदिनचित्क मे रहकर रघूनाथ नै वाल्मीकि से वन जानेके लिए विदा ली।
उपरति अत्यन्त हषं के साथ अचरि मुनिके आश्रम मे जाकर उनके चरणौमे सिर नवा कर अपना परिचय दिया।

वङौ प्रसन्नता हुई 1 ११९

श्रीराम की वाणी सुन, मुनि को

सीतापति कौ पुजा कर ऋषि ने उनके चरणों

नेपाली-हिन्दी

८३
पूजा सीतापतीको गरिकन ऋषिले पाडमा बिन्ति लाया ।बृद्धा छन्‌ पत्ति मेरी सकल विषयमा एक्‌ रती छेन माया ॥भित्ते छन्‌ आज दर्शन्‌ दिन मदलिविषे भित्र सीताजि जान्‌ ।सीताजीलाई पाई अबत ति बुहिले जन्मको सार पाञन्‌ ॥१२०॥अवीको बिन्ति सूनी हुकुम पति दिया लौ सिता भित्र जाऊ ।
अत्रीकी पत्ति भेटीकन अब तिमिले जल्दि फकर आऊ ॥आपना नाथूको हृकूम्‌ यो सुनिकन खुशि भे भित्र सीताजि जाई ।भेटिन्‌ बुद्धा बहुत्‌ भैकन बसिरहन्या अविकी पलनिलाई ॥१२१॥सीताले पाउमा शिर धरिकन बहते प्रेम्‌ बुढीमा बढाइन्‌ ।जोर्‌ जोर्‌ कुण्डल्‌ र सारी दिदकन बुढिले अद्धराग्‌ फर्‌ चढाइन्‌ ॥
यस्ले शोभा निरन्तर्‌ दृढ पनि रहला यो पनी बिन्ति लाइन्‌ ।सीताजीलाइ आशिष दिई ति अनसुयाले बहृत्‌ हषं पाइन्‌ ॥१२२॥सीता र लक्ष्मण सहित्‌ गरि रामलाई।भोजन्‌ सा दिन्ल भनि खृप्सित चीज्‌ बनाई ॥
भोजन्‌ गराई रघुनाथकिताह

सपत्नि

भई
जानि माया।

रामक

कीति गाया ॥१२३॥

अयोध्याकाण्ड समाप्त

मे विनती कौीकिमेरी पत्नी वृद्धादहै ओर उसके मनमे किचित्‌ सात्रभी भक्ति नहींदहै।
अतः दशंन देनेके लिए सीताजी अन्दर पधारनेकी
कपा करे, जिससे सीताजी के दशेन प्राप्त कर बुहिया को जन्म के फल
प्राप्तहौ जायें । १२०अचि की विनती सुन-कर श्रीरामने सीताको अन्दर जानेकीआनज्ञादी।अत्िकौ पत्नीसे भेट करके अन तुमशीघ्री लौटञआओ।अपनेनाथकी आज्ञा पाकर प्रसन्नहो सीताअन्दर गदं ओर अत्यन्त वृद्धा अच्ि-पत्नीसे भेट की) १२१ सीतानेपैरो परसिर रखकर वृद्धाके प्रति अत्यन्त प्रेम प्रदशित क्रिया। अच्धिपत्नीने सीताजी को नोड़-कुण्डल ओर साडी देकर उवटन काले करिया
गौर कहा कि इससे तुम्हारे शरीर की शोभा स्थिर रहैगी। इसप्रकारसीताजी को आसौस देकर अनसूया को अत्यन्त हषं प्राप्त हुआ १२२सीता एवं लक्ष्मण-सहित रामको भोजन करानेके लिए विविध प्रकारके भोजन तयार क्यि।भोजन कराके रघूनाथकी माधाको समन्नकर च्छि तथां उनकी
पत्नीदोनोंते राम-कौति के गीत गाये । १२३अयोध्याकाण्ड समाप्त

अत्रीका आश्रमैमा

अरण्यकाण्डबसि रधुपतिले प्रेमले दिन्‌ विताई।
दोरा दिनमा सबेरं उरठिकन वनमा जान मनसुव्‌ चिताई 1अद्रीजीका नजीकमा गदकन अव ता जान्छु वीदा म पाऊ।रस्ता यो जाति होला भनिकन कहुन्या एक्‌ अगवा म पाॐ। १॥
सीताराम्‌को हुकूम्‌ यो घुनिकन ऋषिले भन्दछठन्‌ क्या-वताञॐंसबको रस्ता त देख॒न्या यहि हजुर भन्या कुन्‌ अगवा खटाञं।।चिन्छ लीला हजुरको तरपति अगुवा याहि अस्सल्‌ खटाईये मर्जी पूण गर्नकिन पनि अगवा आज दिन्छ्‌ पठाई्‌। २॥अघ्नीले बिन्ति येती गरिकन अगुवा शिष्य धेरै खटाया।केही रस्ता त आफ पनि पछि पछि गै रामलारई्‌ पठाया॥एक्‌ कोश्‌ तक्‌ पौचेदामा बडि नदि बहुंदी नाउले तरनपर््या।मित्थिन व्योतारिफकरया महित्तिर ऋषिकाशिष्य सबृफिर्न पर्या ।।३॥सीताराम्‌ बनमा पुग्या बन थियो साहु खजित्‌को तहाँ।बाघ्‌ भालू अरु दृष्ट राक्षसहरू इल्छन्‌ निरन्तर जहां ॥अचरि के भाश्चम में रघुपति ने प्रेमपूवंक दिन व्यतीत किया.।.दुसरे दिन सबेरे उठकर वनगसन का निष्वय कर अतिजी के निकटजाकर विदा मांगी ओर कहा कि उत्तम पथप्रदशेककी भी व्यवस्था:करदें। १ सीतारामका यह्‌ आदेश सून कर ऋषि कहते हँ कि जवश्रीमन्‌ स्वयंही सवको पथ-प्रदशंन करनेवालेतो मै आपके लिए
किस पथ-प्रदशंक को भेजूं । अपकी लीलाओंको मैं भली प्रकार जानताह, फिर भी मै आपकीइच्छा-पूरति के लिए इस समय एक पथ-प्रदशेक कोभेज दूंगा । २

अचरि यह विनती करके कुछदूर तकस्वयं

हीराम के

पीलेपीचे गये ओर करई शिष्यो को पथ-प्रदशंनाथं नियुक्त कर दिया।
एक कोस चलने के पश्चात्‌ एक बड़ी नदीकोनावद्भारया पार करवा करऋषि के सव शिष्य आध्रमकी भोर लौटपडे)३सीताराम जिसवन मे पहुंचे वहु अत्यन्त घना था, जहाँ वाघ, भालू तथा दुष्ट:राक्षसगण निरन्तर धूमा करतेथे।वरह पहुंच तत्पर होकर प्रभुजी
८५

नेपाली -हिन्दी

ताह पौचि हृकूम्‌ भयो प्रभुजिकोसीताका म अगाडि हिड्ष्टं तिसिलेयस्ता बात्‌ गरि राम लक्ष्मण तहांएक्‌ सुन्दर बनमा तलाउ मिलिगोठण्डा जल्‌ तहि पान्‌ गरेर रघुनाध्‌आयो ताहि विराध राक्षस टलोकोटौ स्त्री पनि साथमाषछकिनयोकस्तो सुर्‌ मनमा छ फर्‌ अब उपर्‌मले सुन्दर गास्‌ बनाउन असल्‌सब्‌नाम्‌ कामस मेत्‌ बताउ तिभिलेराक्षसूका इ वचन्‌ सुनी प्रभुजिले
तयारी भरई।हिडन्‌ पषछठाडी रही ॥ ४ ॥'हिडथ्या तयारी-ः भई।ठ्ूलो छ कोश्‌ वन्‌ गई ॥छायां बस्याथा जसे,डर्‌ दीन लाग्यो तसे । ५]आयौबडा व्रनूमर्हा ।:जान्‌ छ इच्छा . कहां ॥भाई!

मान्थां र॒सोरध्यां यहाँ |

जुन्‌ काम्‌ छ जान्छोौ जहा । ६॥नाम्‌ काम्‌ बत्ताया सवे ।जाऊउसं॥बन्ति सन्‌ छ भन्या सिता र हततियार्‌ छोडेरराक्षस्‌ जसे ।यस्तो बोलि सिताजिलाइ लिन सुर्‌ बधिरदौडथ्यो रघुनाथले पनि ति हात्‌. दुवे गिराया तसं । ७॥रामलाईभनी ।जस्स हात गिथ्या तसं त रिसले खदौडन्थ्यो मुख बाई फर्‌ प्रभुजिले काल्या ति गोड पनि॥
नेआन्नादी कि भाई लक्ष्मण! तुम सीताके पीले-पीछेहो लो, मै आगेआगे चलताहूं।४इस प्रकार बातचीत कर राम-लक्ष्मण तत्परतासे चल पड़े, लगभग एक कीस चलने के पश्चात्‌ एके सुन्दर वनमेंपहुंचे, जह एक तालाब मिला । शीतल जल पान कर जैसे ही रघुनाथंएक वृक्ष के नीचे उसकी छायामें बेठेक्ति एक बड़ा विशालकाय भयंकरराक्षस वहाँ आकर उन्हँ भयभीत करने लगा।५तुम कौन होजीःजोस्त्रीके साथ इस बीहडवनमेंञआयेहो।. तुम्हारे मनमें क्या इच्छाहै ओर आगे कर्हां जाना चाहते हौ ? सब नाम, काम सहित, किस कायंवश कहाँ जाओगे इत्यादि बाते सविस्तार बताओ । तुम्हं अपने उदरकाभाहारः बनने की इच्छाहृर्ईदहै इसी कारणसे पृष्ठ हाहं) ६

राक्षस

के इन वचनोको सुन कररामने नाम तथा काम सबं बता दिया।
राक्षस ने कहा, यदि जीवित रहना चाहूतेहौ तो सीता भौर अस्वोंकोछोड कर चले जाओ । इतना कहकर मन में निश्चय कर के राक्षस सीताको पकड़ने के लिए दौड़ा, वसे ही रधुनाथ ने उसकी दोनों भृजाओं को काट

दिया 1७

भृजाएं कट कर गिरते ही राक्षस करोधित होकर जैसेही रामको
भक्षण करनेके लिएदौड़ा वसेही प्रभुने उसके पावोंको

भी काट

८६

भानुभक्त-रामायण

हात्‌ गोडा नहंदा त सपं सरिको

पसून्यो भुमीमा जसं ।हात्‌ गोडा सब कटिथा तब पनी घस्रेर आथो तसे ।। = ॥घस्री घलि उ सर्देथ्यो प्रभृजिले काटया तहां शिर्‌ पनि ।विद्याधर्‌ गण हो ष्टृटोसू अब सराप्‌ जाभोस्‌ परम्‌धाम्‌ भनी ॥राक्षस्‌ देह मय्या सराप्‌ पनि रन्यो विद्याधरं फर्‌ भयौ,शरीरामूको स्तुति खुप्‌ गरेर खृशि भं फर्‌ स्वगंलोक्मा गयो ॥ ९॥
जस्सं स्वगे विराध गयो प्रभुजिलेपालन्‌ गरुम योगिको अव भनीध्यान्‌ गदं शरभद्धजी बनमहांताहीं श्रीरघुनाथजी खशि हदं
रस्तावनेको लिया।मनूमा दया खृप्‌ लिया॥.
ताहीं श्रीशरभङद्खले प्रभुजिमाआपत्‌ कमं जती थियो तहि ततीअस्सल्‌ ताहि चिता बनाई ह्रिकोताह देह दहन्‌ गरी चलिगयामुक्ति श्रीशरभद्खको जब भयोआया मेट््‌न भनी बहुत्‌ खुशि भई
तन्‌ मन्‌ वचन्‌ सब्‌ धरी।सम्पूणं अ्पेण्‌ गरीदशन्‌नजरलेगरी)संसार स्रागर्‌ तरी ॥११॥तस्समूनीश्वरहरू ।बन्‌सा धिया जो अरू॥

जाहां

वस्याका

यिया।
पोचेर दशन्‌ दिया ॥१०॥
हाथ-पांवसे रहित होकर वह सपं के समान पृथ्वी पर लोटनेलगा, फिर भी वह खिसक-खिसक कर आगे वठा। मइस प्रकारखिसकते हुए आता देख प्रभ ने उसका सिर भी काट दिया। वह्‌ पहुल

दिया)

अवश्रापसे सुक्त हो उसका राक्षस शरीर भीमृत्युकोप्राप्त हुआ ओर उसने पूनः विद्याधरके रूप को धारण किया, त्तथाअत्यन्त प्रसच्चतापूवंक श्रीराम की स्तुति कर स्वगंलोक को चला गया! ९विद्याधरके स्वगं चले जनेके बाद प्रभुजी ने वन का मागं लिया।दया से भर कर योगियों के कष्ट-निवारण के लिए श्रीरघुनाथनजीविद्याधर था)

श्रीशरभंगका

स्मरण कर के उनके आश्रमे

जानेके लिए उस वन

कीञोर चल दिए! १०

श्रीशरभंभनजीने वहाँ प्रभुमे ही अपना तन,

मन, धन से ध्यान लगाकर

कमे-मुक्त हौकर एक उत्तम चिताका निर्माण

करके हरि के दशेन किये।तदुपरन्त शरीर को अग्निम समपितकर संसार-सागर तर कर चले गये। ११श्रीशरभंगनजी की मूक्तिहोते ही अन्य मुनीश्वेरगणनजो वनम थे प्रसन्न चित्तसे भगवान्‌ से भेटकरने के लिए आये । उन्ींको अपना स्वामी जान कर खूब स्तुत्ति की।

नेपाली-हिन्वी

८७ |
हात्‌जोरी स्तुति खुप ग्या ति ऋषिले ` ख्वामित्‌ इनं हुन्‌ भनी ।च्या प्रभूले पनि । १२॥कोमल चित्त गरी तहां नजरलेबिन्ती सब ऋषिले गव्या हजुरमा हाम्रो विपत्ती पतिदेख्या पूणं दया हन्या थइ बहूत्‌ आपत्‌ रह्याछन्‌ भनी ॥जाभौं सन्‌ ऋषिका मढीमटिविषे ' वाहं ग॑ंई्‌ यो दया।होला चित्तविषे भनी ति ऋषिले भन्दा प्रभूजी गया ।। १३ ॥देख्या तेस्‌ वनमा अनेक्‌ पृथिविमा खप्पर र सोध्या तहां ।कस्का खप्पर हुन्‌ अनेक्‌ नजरले देख्छ्‌ . मव्याका यहं ॥श्री सीतापततिका वचन्‌ सुनि तहां बिन्ती ऋषीले गव्या ।
ई शिर हुन्‌ ऋषिका यहाँ छल परीराक्षस्‌का छलले बहुत्‌ ऋषि मव्याताहां सब्‌ ऋषिलादइ्‌ राखि सबकासब्‌ राक्षस्‌हरुको म नष्ट गरंला

खूशी मन्‌ हुनगो र ताहि ऋषिता

घेर ऋषीश्वर्‌ मय्या । १४॥भव्या कुरा यो सुनी ।सामनेभ्या
प्रतिज्ञाप्रभूले
पनि॥गव्या ।
ञनन्दमा सन्‌ पन्या ॥ १५॥केही वषं बिताइदई्‌ ताहि हरिले सब्‌ योगिको ताप्‌ हन्या ।माया फेरि सुतीक्ष्णका उपर भैं प्रस्थान्‌ प्रभूले गव्या ॥जाह भक्त सुतीक्ष्ण छन्‌ तहि गई दशेन्‌ प्रभूले दिया।पूजा पूणं गरी सुतीक्ष्ण ऋषिले राम्‌लादइ मन्‌मा लिया।। १६॥
प्रभूते भी शान्त एवेम्‌ कोमल हृदय से उन्हे देखा । १२ सव ऋषियों नेपरभु के समक्ष विनती की कि हमारी विपत्तियों को देख कर, है रघुनाथ |आप अवश्य दया करेगे । आपत्ति से पीडतोंके मटोंमें स्वयंजा करदया करनेकी कृपा करगे)6 तदनुसार प्रभु जी सभी ऋषियोंके आश्रमोंउस वनमें पहुंच कर अनेक मृतकोंकी खोपडयों कोमे गये । १३
बिखरा हृ देखकर प्रभू को यह्‌ जानने की उत्कण्ठा हुई किये किसकीखोपड्यां है। श्रीसीतापतिके वचनोंको सुनकर ऋषि ने विनतीकीकियेशीशषछल दारा मारे गये ऋषीष्वरोके है । १४

राक्षसोंद्राय

छल से मारे गये ऋषियोंकी मुघ्युका कारण जान कर, सभी उपस्थितऋषियों को एकतर करके उनके समक्ष प्रभु ने प्रतिज्ञाकी कि मै सब राक्षसोकीनष्ट्‌ कररदूगा; यह्‌ सुन कर ऋषिगण अत्यन्त आनन्दित हुए । १५कुछ वर्षो तक वहीं रहे कर हरि ने सब ऋषियों के कष्टं का हरण कियां ।इसके पश्चात्‌ सुतीक्ष्ण के उपरछृपा करने हतु प्रभुने वहसे प्रस्थान
.

भानुभक्त-रामायण

सयुज्ये मुक्ति मिल्ला तिभिकन सुन यो देह जले त छृट्ला।भर्या आज्ञा प्रभूको सुनिकन अव ता कमंको पाश टुट्ला॥मत्या यो मन्‌ ऋषीको हून गई बहूतं चित्तमा हषं पाया ।सीताराम्‌ले अगस्ती सित गद कु दिन्‌ बस्न मनूले चिताया || १७॥
प्रभुका साधेमा पछि पछि सुतीक्ष्ण पनि गया।अगस्तीका भाई सित पुगि त एक्‌ रात्‌ प्रभु रह्या॥ति अग्नीजिह्वा खुप्‌ खशि पनि भया ईश्वर भनी ।चिनी ताहाँ तिन्ले विधिसित गनच्या पूजन पनि ॥१८॥तहां देखी सीतापति उरि सबेरं चलिगया।अगस्ती काह छन्‌ भनि खबर ली दाखिल भया ॥
अगस्तीले खृश्‌ भे स्तुति गरि बहुत्‌ सन्‌ पनि धव्या ।विराट्‌ रूपूले वर्णन्‌ गरिकन त पूजा पनि गच्या ।१९॥सुन्दरठोक्राताहीं
विन्तीकिया।
धन्‌ र तरवार्‌ संग बाण्‌ धन्याका।तत जोडिअधि इन्द्रजिले धन्याका ||थयासबदियारधुनाथलाई।

गव्या

सकल

भार्‌ हर आज

भक्त सुतीक्ष्णको प्रभु ने देन दिया।
जाई।।२०॥

पूजा पुणं करके ऋषि

सुतीक्ष्णने मनम रामका ध्यान किया) १६रमने विचार प्रगटकिया कि इस शरीर से सायुज्य मुक्ति मिलनी चाहिए । देहसे टृटकारा
पाने की बात प्रभु से सुन कर वह्‌ अत्यन्त हृषित हुए । उन्हं यह सोचकरबड़ा सन्तोष हुजा कि अवै क्मंके बन्धनसे भी मुक्त हो जाऊंगा ।सीताराम ने अगस्त्य मनि के पास जाकर

,विचारक्िया। १७

वर्ह कुष्ठ दिन रहने का

सुतीक्ष्णभी प्रभुके साथहोलिये।
भाईके पसतजा कर प्रभु एक रात वहाँ रहै।

अगस्त्यके

उन्हं ईश्वर जान कर

अग्निजिह्वा मुनि भी अत्यन्त प्रमुदित हृए । उन्होने श्रीराम का पूजनविधिवत किया! १८वहसे उठ कर सीत्तापत्ति सवेरे ही चले गए।अगस्त्य जी के आश्रम का पता लेकर वहां पहुंच गए । अगस्त्यनेभी ,मन ही मनध्यान धर के स्तुति की ओौर विराटसरूपसेपूजाभीकी। १९व्हा पर अगस्त्यने इन्द्रका रक्खा हुभा सुन्दर धनुष भौर बाणोसे भरे
हए तरक्स की जोड़ी श्रीरघुनाथ कोञपेणकी ओर विनती की क्तिजाज ही जाकर पृथ्वी का सम्पूणं भार हरण कीजिये । २०
८९

नेपाली-हिन्दी

पञ्चवटी भन्याको ।कोशम - असलआट्‌आश्रम्‌ असल्‌ छ रमणीय बहतु बन्याको ॥दिन्‌ त्िमिले विताऊ।ताहीं बसेर -कुछसब्‌ साधुमाधि करुणा तहि गे चिताऊ ।२१॥यस्तो

अगस्ति

ऋषिको

उपदेश

पाई ।
श्रीराम्‌ तथार्‌ पनि भया तहि जानलाई ॥मालूम्‌ थियो त पनि जुन्‌ ऋषिले वताया।पाड उतं चलाया ।२२॥जानकनसो सागजान्थ्या प्रभ्‌ अलिकती पर केहि जाई।जटायुलाई ॥वृद्धअधिकजंगलूविदेख्याराक्षसभनीकनमानेलाई।जनाई।।२३॥माग्या धन्‌ प्रभुजिले र लिलामान्य कुरा सुनि जटायु बहुत डराई।राजाजिको प्रिय सखाहुं भनी कराई |गर्नु हित्‌ यहि वसी म सिताजिलाई।कल्याण्‌ मिलोस्‌ हजुरदेखि वहत्‌ मलाई ।।२४॥।श्रीरामले पनि तहां -अति खशि मनूले।आनन्द निर्भय दिया पछि फेरि तिनूले॥“~^.
हासे आठ को की दूरी पर एक अति उत्तम एवं रमणीय

आश्रम

है जिसे पंचवरी कहते है; तुम वहीं रहकर कू दिन व्यतीत करो ओौर `समस्त साधुवगं पर करुणा करके उनके कणष्ट-निवारण का उपायसोचो । २१ अगस्त ऋषि के एेसे उपदेश पाकर श्रीरामजी भी जाने के
लिए तत्क्षण तैयार हो मये।
ग्र्यपि वह्‌ सव कूठ स्वयं ही जानते थे,
फिरभी ऋषियों के वताये हए मामं से चल पड़ं। २२ वृ्ठदूर चलकर जंगल कं मध्यमे एक अत्यन्त वृद्ध गिद्ध (जटायु) कोदेखा। उसेराक्षस समज्ञ कर सारनेके लिए प्रभुने धनुपर्मांगा। २२ मारे जाने
की वात सूनकर जटायु बहुत भयभीत हुआ ओर चिल्लाकर कहने लगा किं
मै राजा दशस्थ का श्रिय सखा हुंओर यही रहकर मैँसीताजी का कुष्ठ
कल्याण करगा; अतः आप मेरे उपर कृपादृष्टि रखें ओर मेरा कल्याणकरे1 २४ श्रीराम ने भी अत्यन्त प्रसन्न मनसे उसे अभ्रयदान दिया ।
तदूपरान्त उसने पुनः विनतीकौ कि है स्वामी!

मै आपकी शरण

९०

भावनुनक्त-रामायण

ख्वामित्‌ ! शरण्‌ षु भनि खुप्सित बिन्तिलाया।श्रीराम्‌तर्हपछि त पञ्चवटी त आया ।॥२५।।डेरा पय्यो प्रभुजिको रति -“वीच बनूमा।एकान्तदेखिकनहषंभयो र मनूमा॥
आनन्दपूरवेकरह्यारधूनाथताहीं।आर्को त॒ आश्रम नजीकथियेनकाही ।॥२६॥एकान्तदेखिकनलक्ष्मणलेचरण्‌मा 1विन्ती गरया रधुपती! मत ष्‌ शरणूमा॥जान्‌ कुन्‌ -करहिन्छ भनि कृन्‌ त॒ करहिन्छ विज्ञान्‌ ।जान्दीनं केहि म विषे त ट्लो छ अज्ञान्‌ ।२७॥आज्ञा हवस्‌ सकलजान्तया पुरुष्‌ अर्‌ छं
तत्त्वत म॒ सन्न पाडं।कोर करा म जाॐ॥
यो विन्ति लक्ष्मणजिको सुनि हषे पाया।लक्ष्मण्जिलाई सबतत्त्वत तहां वताया ।२८॥यै ज्ञान्‌ कटिन्छ युन येहि कटहिन्ठ विज्ञान्‌ ।यो रीत्‌ गरीकन वस्या हूंदि दछुट्छ अज्ञान्‌ ॥खोलेरयेहि रितलेप्रभुलेबताया)लक्ष्मण्जिले पनि तहां सव तत्तव॒ पाया ।२९॥यै बीचमा नजिकसूपणखा त आई ।देख्यातहं प्रभुजिलेपनिदुष्टलाई ॥
मेहं!

इसके बादश्री राम पंचवटी चले गये! २५

उसी वन के मध्य

से श्रीरामजी का डेरा पड़ा! निकटमे ओर कोई आश्वस तरहींथा।एकान्त स्थान देख वे मनमें हरषित हुए ओर आनन्दपूवेक वहीं रहनेलगे । २६ एकान्तवनको देखकर लक्ष्मणने श्रीरचृपत्िसे कहा किं
मे आपकी शरणमे हूं । ज्ञान-विज्ञान का मृञ्मे कोई ज्ञान नहीं । यही मुञ्चमे अज्ञानता है । २७ अतः सव तत्वों को मुञ्चे सुनाने की कृपा करे, क्योकियहां ओर अन्य कौन पुरुषै, जिसके पास मँ जाऊं1 लक्ष्मण कौ यहविनती सुनकर राम अत्यन्त हषित हुए ओर उन्हे तक्त्वज्ञाने का उपदेशदिया 1 २८ ज्ञान-विज्ञान के विषयमे समञ्षाकर तथा किस रीतिसेञज्ञान का नाश होता है, यह्‌ सभी स्पष्ट सू्पसे प्रभ ने बताया ओर लक्ष्मण
ने भी उन स॒व तत्त्वों को सौख लिया 1 २९ इसी वीच बूर्पणखा भी वहाँ आ

नेपाली-हिन्दी

कन्दपेका

वश
परी

सोधी

तहां

प्रभुजिलाद

९१
प्रभुकोबूत
नजीक्‌खुश्‌
ग।भ ।॥३०॥
नाम्‌ सब्‌ कल्या प्रभुजिले जव नाम सूनी।एेले मे भज्दष्टु पति भनि येति मूनी॥विन्ती गरीमकननपत्निबनाइलेऊ ।कन्दपंकोकठिनतापछृटाइदेऊ ॥३१॥यस्ता वचन्‌ सुनि सितकनरहसि हैरी,उत्तर दिया प्रभुजिले संगै छमेरी ॥सीता बुक्षीकन नभज्‌ तं पत्ती मलाई)भाई छ खालि बरु भज्‌ पति भाइलारई ।३२।।संचो भन्या भति त लक्ष्मणका नजीक्‌ गे ।आयां म॒ पत्ति हुन येति भनेर खुश्‌ भै॥सून्या वचन्‌ सकललक्ष्मणले र ताहां।दास्‌ हंमता मसित कृन्‌ सुख भिल्छ यहाँ ।।३३।जा वाहि

मालिक

उ हुन्‌ उह वस्नु अच्छा।
बुद्धी रहेनछठ बहुत्‌ रहस्‌तं कच्चा॥यस्तावचन्‌ सुनि र दूपणखारिसाई।सीताजिलाई्‌ अब खां भनिफंकि आई ।[३४॥गयी । प्रभुनेभी उस दुष्टाको देखा । घमण्ड के वशीभूत हौ अत्यन्त हषंसे धरी वह प्रभु के निकट गयी ओौर उनसे प्रष्न किया। ३० प्रभुने अपनापरिचय दिया । उसने जव प्रभुकानामसुना तोमनमे कु सोचकरविनती की कि मुञ्चे भी अपनी पत्नीके रूपमे स्वीकार करकामदेवके कठिनंतापसे मक्त करते.की कृपाकरं) ३१ रएेसे वचन सुनकर सीताकी ओरहंसकर देखते हुए प्रभ ने उत्तर दियाकिघरमें मेरी पत्नी सीतावैटीदहै,अतः सज्ञे तुम पतिन कहो । भाई लक्ष्मण अकेला है अत्तः उसे ही पतिकहकर भजो । ३२ इस कथन को सत्य मानकर शूपंणखा ` लक्ष्मण केनिकेट गयी ओर पत्ती वनने को इच्छा प्रकट करके अत्यन्त हुषित हुई ।लक्ष्मण ने उसको वाते सुनकर कहाकि मतो राम का दास हू, मुक्षसे
-तुम्हं यहाँ क्या सुख प्राप्त हौ सकता है । ३३ जहाँ अपना मालिक है, वहींरहना उत्तम है) तुम बुद्धिहीन हदो यौर ज्ञानमें परिपूर्णं नहींहो।एसे वचन सुनकर शूर्पणखा कोधित हृई ओर सीताजीको भक्षण करने केलिए दौड़ी 1 ३४ पृथ्वी के भारहुरण-हेतु प्रभुने वीज बोया ओौर लक्ष्मण
९२

भानुभक्त-रामायण

भार्‌ हनं वीज्‌ प्रभूजिले तहि रोप्न अट्या।लक्ष्मण्लिलाद भनि नाक र कान काटया1काटिदीया।
पनि

` आज्ञा

लि

लक्ष्षणजिले

लष्करराक्षस्‌
समेतभनी
अधिक जल्दि कदम्‌प्रभुजिले तहि चाल
थीया ॥३५॥भाइ जहां तउराइक्नभागीविस्तार गरी व्रिशिर दूषण खर्‌ भन्याका।राक्षस्‌ पनी सुनि ति अग्नि सरी वच्याका॥आया जहाँ प्रभु धिया तहि तीन भाई,
लक्ष्षण्जिलाद्‌ तहि काम्‌हे. भाद्‌ ! आज तिमिलेगूफाविषे

लागि

वसीरहु

बडाई ।।३६॥पाया)
प्रभुले अदाया |इ सिताजिलाई।जल्दि
जाई ।३७॥
एक्‌ वात्‌ नवोलिकन जल्दि उटठेर जाऊ)संग्रामको वखतभो अब वेर्‌ नलाऊ॥मठ्‌ म दुष्टकन तेज्‌ अधिके जनाई।चौधे

हजारकन

सह्‌

दटुकुरा

बनाई ।३८]]

यस्तो हुकृम्‌ हन गयो र सिताजिलाई॥लक्ष्मण्जिले संग लिईकनजल्दि जाई।गफाविषेवसिरह्यारघूनाथ्‌तयारीचाड भया धनु र बाणृहर ठिक्क पारी ।३९॥जीके द्वारा चुपंणखा की नाक ओर कान दोनों कटवाये। इससे धयभीतहोकर गूपंणखा अपने भाईके पास भाग खडी हुई । ३५ खर, दूपण तथात्रिशिरा राक्षसौ को जुपंणखा ने विस्तारपूर्वक सारी घटना सुनायी, जिसे
सुनते ही .अग्निके समान अप्रनी सेनाको लेकर गीघ्रतासे तीनों भाईवहां पहुंचे, जहां प्रभु विराजमान थे 1 ३६ प्रभुजीने राक्षसो को पहचानकर लक्ष्मण को कायं सोपते हुए कहा, “हे भाई ! आज तुम सीता को लेकर
गुफाके वीच जाकर रहो । ३७ कुभी न कहकर शीघ्रता से उठकरचले जाओ। संप्रामका समयञा गयाहै, अवदेरनकरौ। दुष्टौकोमै तीन्रतासे मार डालूंगा मौर चौदह्‌ हजार सेनाओं को सहज ह में ट्‌कड-
टुकड़े कर दंगा । ३८ देसी आज्ञा पाकर लक्ष्मण जी सीताजी को लैकरतुरन्त चले गये ओर गुफाके अन्दर वैडे रहै।

श्रीरघुनाथ भी धनुष

नेपाली-हिन्दी

९३
खर , त्रिशिर दूषण _ तीन भाई।आयासमेत्‌ संग विर्ईदकन रिस्‌ बडाई ॥लश्करबाणकरि वृष्टि पाय्या।उपरठाकुरजिकाठाकुरजिले पनि ति बाण्‌ सब काटि टाव्या ॥४०॥तिनृका न्ति सवं हतियार्हृर्‌ काटि टारी।मारी ॥जल्दिराक्षसहरूकनसम्पूण.ताहाँ।.च्रिशणिर दूषणलाद्‌खरकाल्याघरिचारमाहां ।४१।सम्पूणं राक्षस सक्याजस्सं।दूषणलाइव्रिशिरखरमाव्याप्रभुसीत तस्सं॥र लक्ष्मण पनीसीताभागी।उरादकन - शूपेणखां तआयारावण्‌ जहाँ छ उह जाँ भति जन लागी ।\४२॥रावण्‌

जहाँ छ

सब्‌ भाइदेख्यो तहां

रउहि पौचि

बन्धुहरुकोबहिनिलाईइई

विलाप

गद॑।
हदं ॥गयाकी।
मनलाइत॒ नाक्‌
त्यो फेरि बुच्चि पनि कान नभे र्याकी ॥४३॥माया भयोवहिनिमाथिः र अदु ऊघ्यो।विस्तार सोध्न नजिकं पनि ज्ल्दि षृट्यो~~~
~~~
~~~“
~ ~~~ ~---~-~+^~
~~ ~^
ओर बाणोंको टीक्‌ करके तत्परतासे तयारदहौ गये। ३९ खर, विशिराओर दूषण तीनों भाई अत्यन्त कुपित हौ सेना-सहित आ गये। उन्होने

रामकेउपर

बाणोकी वृष्टिकी।

श्रीराम नेभी उनसव वाणोंको

काटकर्‌ नष्ट ' कर दिया ४० उनके सारे हथियारोको काट करं सवराक्षसो कोभी तुरन्त सारडाला।चार घण्टे के अन्दर खर, त्रिशिराओौर दूषण-सहित सारी राक्तस-सेना को समाप्त कर दिया। ४१ जैसेहीखर, त्रिशिराओौर दूषणका वध हुआ, वैसेही सीता ओर लध्मण भीप्रभु केषाम आगये।ओर सूपणखा भयभीत होकर रावणके पासभाग गयी | ४२ रावण के पास. पहुच कर वह्‌ विलाप करने लगी।उसके दुःख से सभी भाई-वन्धु प्रभावित हौ गये । ` उन्हे बहून की नाक
कटी हुंई'देखी तथा उसको कानोंसे भी विहीन देखा । ४३ वहन कीइस अवस्था को देख वे सव करणा.से परिपूणं हो गये ओर उसके निकटजाक्रर उसी समयसारा हाल विस्तारपूवेक जानने की जिज्ञासा प्रकटकी । उन्होने पुषा, है वहन, तेरी नाक ओौर कान काटनेवाला यह्‌ कौन
९४

भानुभक्त-रामायण

हे वेनि} कुन्‌ पुरूष हो भन नाक काटृन्या।खूवे रदे सहजेपनि मनंअआंट्न्या ॥४८५॥जस्ले त॒ नाक्‌ सित इ कानूकन जाज काट्यो।हे वेनि | जान सुन त्यो अग मरनं ओंट्चो॥यस्ता वचन्‌ सुनि र नाम समेत्‌ वताई।सीतार लक्ष्मण सहितरघुनाथलाई ।४५।॥ती छन्‌ पराक्रमि त प्रञ्चवटी वस्याका।ठोक्रा भिरीकनधनू पनि खृप्‌ कस्याकाग्ट विचार मनले त यही म मान्छरु।[1[
सव्‌

भस्म पौ

गरिदिनन्‌

कि
भनेर रउन्छं ।(४६॥
आर्द्रया म॒ त खुप्सित मन्‌ डराई।फिन्‌ ति सवं ऋषिलाइई त खृश्‌ गराई ॥आश्चयं मानिकनदौडि म॒ याहि आयांविस्तार पनी हजुरमा सव॒ विन्ति लाँ ।\४७\सीताजिलाइद
अति

सुन्दरि

मानि

ताह ।
ल्याट्पक्क टिपि सृन्दरिलाद्‌यहां ।।भत्ता-निमित्त अतिचित्तधरीगयाकी।पार्थां विपत्‌ नकटि वुच्चि समेत भयाकौ ।४८।।ल्या समर्थं छ भ्या तिमि आज जाऊ)साम्ने त हनं छ करिन्‌ तिमि मन्‌ नलाऊ।^-^
^-^
~~~ ^~ ~~ ^~^~-~~-~ ~ ^~ ^~
नत
^
पुरुष दहै, जिसने सहज दही अपनी मृल्यु को आमंत्रित किया दै । ८जिसने भी यह्‌ कूकमं कियाद,है वहन, तुम यह्‌ जान लो किं अव वह्‌मृत्यु वो प्राप्त होनेवालादहै।सुनकर युपंणखाने सीता, लक्ष्मणजोओर राम केनाम वता दिये! ४५ पंचवटी मे तीन पराक्रमीतरकस एवम्‌ धनुप-वाण धारण कयि दै, सुञ्चे एसा लगता है किये सवका

लाश करदेगे । ४६

मँ अत्यन्त भयमीत होकर आरहीहं!
को प्रसन्न करकेवे धूमते रहते!

ऋषियों

उनके कार्यो से चकित होकर र्म

दौड कर यहां आयी हं भौर आपके सम्मुख विस्तारपूर्वक विनती की है । ४७
सीताजी अपूवं सुन्दरी रहै, उसे उठाकर आप यहांले आये, यही मनमविचार करके आपसे कहने आयी हूं । नाक-कान से रहित हौ कर अत्यन्तयदि आपसे सामथ्यै तो आज ही जाकर सीताकष्ट पारहीहूं। ठ

नेपाली-हिन्दी

एक्‌

युक्तिले

छल

साम्ने

कदापि

नगया तहि

९१

गरीकन

हर्ुपर्ला।देह
मर्ला ।४९।।
तेस्ले बहुत भयमा परि बात्‌ गव्याको।लष्कर समेत्‌ त्रिशिर दूषण खर्‌ मञ्याको ।न्यो र ॒बेह्लिकन खातिर खूव दीयो।एकान्तमा
गइ
लह
पनि
खूब
लीयो ।॥५०॥
सामान्य मानिस भया कसरी ति माग्या।लश्कर्‌ खर त्रिशिर दूषण षटि पाव्या॥।सामान्य होइन इ ता परमेश्वरे हुन्‌ ।नाहीं त॒ भादहरुको अधि तिक्तथ्यो कुन्‌ ॥५१॥ईशए्वर्‌ भया हुंदि कसँ ` पनि मादेछन्‌ ती ।सामान्य हुन्‌ पनि भन्या हरुला सिताजी ॥ईश्वर्‌ भया हूंदि विरोध्‌ गरि खश्‌ हृन्याछन्‌ ।रीस हन्याछ भजुंला त॒ ममाथि ता क्जन्‌ ॥५२॥येती विचार्‌ गरि तव्यो र॒ समुद्र पारि।मारिच्‌ जहां छ ऋषिको सरि रूप धारीपुग्यो तरह र॒ रथ राखि नजीक्‌- गयाको।विस्तार गव्यो खरहरू सव॒ नाश्‌ भयाको ॥५३॥को ले आओ!पहले यह सोच लोकि सीता का सामने से हरणकरना कठिनिहै। एक युक्ति से उसे हरण करना होगा, सामने कदापि
न जाना, वर्ना मारे जाओगे । ४९ सेना-सहित खर, त्रिशिरा ओर दूषणके मारे जने की खवर सुनकर रावण अत्यन्त भयभीत हुआ, फिर भी उसनेअपनी बहुन को सन्त्वनादी ओर

एकान्तमें जाकर

अपने मन को बड़े

प्रयत्न से उत्साहित किया। ५० रामद्वारा अपने भादयोंके संहारकासमाचार सुनकर रावण बड़ी चिन्तामे पड़ जातारहै। वहु सोचता है कियह राम कौनहों सकताहै? जोभीहो यह्‌ कोई साधारण मनुष्यतोनहीं है, अवश्य ही यह्‌ परमेश्वर है; यदि यह्‌ साधारण मनुष्य होता तो मेरेभाइयों के सम्मुख कंसे टिक पाता? ५१ यदि राम ईश्वरहोगेतो किसीप्रकारसे मारले ओर यदि साधारण मनुष्यहोगेतोर्म सीताका हरणकरलूंगा। ईष्वरदहोगेतो मेरे विरोध पर वह्‌ प्रसच् होंगे ओर भजनकरने से मन्न पर क्रोधित होगे । ५२ यह्‌ विचार करके ऋषि के समानरूप धारण कर वह्‌ समृद्रपार मारीच के पास पहुंचा। रथ को वहीं

भानुभक्त-रामावण

९६

यस्तो

पय्यो

मकनन

आज
सुन्दर ट्लो मृग स्वरूप्‌रापचन्द्रलाद्‌सीताजसे

सहाय

देऊ ।
तिमि आज लेऊ॥
छलि दूर्‌ तिमिले गरायाम॒ हरला तव फकि आया ॥५४।।[१
मारीच यत्ति हृकूम्‌ जव ताहि सून्यो।तेस्तो हकम्‌ सुनि तहां मनरमित्र गृन्यो॥विन्ती गन्यो सकल तेज्‌ प्रभुको जनाई।ख्वामित्‌ भनेर मनले जय खृप्‌ चिताई ।५५।।कस्ले गव्यो र उपदेश्‌ तिमि आज आई।सीता

म हठं

मग

हो तं भ्यो

मलाई ।
त्ये शतु हो तिमि व्यसंकन मारकूलै समेन्‌ क्षय गराउन खोज्छको सक्छ जित्न र टुलो तिमि सूरयो सूर्‌ लिया कुल समेत्‌ तिमि आज
तारहां।याहां ।५६॥ग्ठौँ।मौ]

एक वाणले मकन

चार्‌ सय

कोश

सान्या

वालक्‌ धिया तपनि

भस्म

युवाहु

पाञ्या ।५७॥।
(~
~^^^
खड़ा करके उसके निकट पर्वा ओौर खर आदिके मारे जात के विपयमे सविस्तारं कहु सुनाया 1 ५२३ मेरे उपर्‌ आज टेसी समस्या आपड़ीहै, तुम मेरी सहायता करो 1 तुम आज एक अत्यन्त सुन्दर मृग कारूपधारण करो ओौरषछ्लसे रामचन्धकोद्रुर तकतेजाओ ओौरजंसे दहीर्मसीताकाह्रण करलं, वैसेदही तुम चले अआना।५४८ मारीचने यह्‌ आज्ञासुनकर अपने मनम विचार किया ओौर्‌ प्रभ के सम्पूणं पराक्रम का वर्णनकर विनतीकी, ओौर स्वामी कहकर मनम जय-जयकार किया! ५५उसने कहा कि किसके उपदेश को युनकर आज तुम आकर सीता-हुरणके लिए मुञ्चे मृग वननेको कहु रहैहौ। यदि वह शलुहै तो तुम उसेही मार डालो, नहीं तो वह तुम्हारा सम्पूणं कुल दही समाप्त कर देगा ५६उन्ह कौन जीत सकेगा, जो तुमरेसी धारणावनारहैहौ।

रसा विचार

करना उचित तथा कल्याणकारी नही, उनसे युद्ध करने पर तुम कुल-सहितनष्ट हो जाओगे 1! उनके वाण केएक प्रहारसेम चारसौ कोद्रजागिरा। जिस समय वहु एक वालक थे, उस कोमल अवस्था मेषीउन्होने सुबाहु को भस्म कर दिया | ५७ भाज भँ मृग-रूप धारणकरके वन में गग्रा। उनके एक ही बाण ने सुञ्चे पछठाड. दिया।
९७

नेपाली -हिन्दी

आज्‌काल्‌ गयां वनविषे मृग-ल्प धारी ।एक्‌ वाणले यहि पनी त दिया पछारी॥छाद्दै रगत्‌ अति उरायर भागि आयांजावैन भन्छु अव खृप्‌ सित चेत पायां ।॥भ५८।॥।तस्मात्‌ तिमी पनि विरोध्‌ मति यो नलेऊ।सीता
हं
भनि

आग्रह

छाडिदेऊ॥
भनि
यो

तिमि

जानिलेऊ।
सब्‌ नष्ट हुन्छ तिभिले मति यस्ति लीया।दूपण मारिदीया ।॥५९॥त्रिशिरदेख्यौ खरहीतै कन्ठ
आर्को कहन्छु म॒ गुटिल्‌ तिमि चित्त देऊई ता अनन्त अधिनाथ्‌ परमेश्वरे हुन्‌ ।ब्रह्माजिले पनि भजिन्छ सदा पुरुष्‌ जुन्‌ ॥६०॥नारद्जिका वचन सूनि म आज भन्छ।ख्वामित्‌ ! मता हित चिताइ सदा रहन््।।लौ मार रावण भनी वरदान माग्या।ब्रह्माजिले र॒उहि सुर्‌ प्रभु गने लाग्या ॥६१॥घरे नसिरहूु मति यो नलेऊजाऊईश्वर्‌ वुञ्चेर उदि माफिक चित्त देऊ1-~^~~~~
“~~ ~ ^~~~-~-~“~~~~
~~~
~~
ˆ~
^-^~-~~ ~~~ ~
रक्त-वमन करते हुए अत्यन्त भयभीत हकर मँ भागकर आयाहूं।चैतन्य हो गया हुं अव वहाँ नहीं जाउंगा।
पराक्रम को समक्न गया हूं। ५८
कोत्यागदो।

अवरम

मँ सम्हल गया हं ओौर्‌ उनके

अतः तुम इस विरोध करने की भावना

सीता-हूरण का विचार षछोडदो। एसे विचारोंसे, तुम्हार
सवंनाश होगा । उन्होने खर, चरिशिराओौर दूषणका वध करदियासोतुमने देव ही लियाहै। ५९ मै तुम्हारे हित की वात कहताहंः इसेसमन्चो । एक गौर विनेष रहस्य की वात कहता हूं, उसे ध्यान लगाकरसुनो । ये तो अनन्त अधिनाथ परमेश्वर ही है; इनको स्वयं ब्रह्माजीदहीनित्य भजते है । ६० आज मै नारदजी हारा वतायी हुई वाते कहता हं ।स्वामी ! मै तोसदेव दहितकाही चिन्तन करताहूं। ब्रह्मा से रावणवध का वरदान मांगा ओर तदनुसार प्रभ ने उसके लिए तत्परतादिखायी । ६१ अपनी बुद्धिसेेसी बातोंको निकालदो मौर घरमेजाकररहो। उन्हं ईश्वर समञ्जकर उनका ध्यान करो) प्रभूजो करते
है, करे, यह उनकी लीला है । उसमे किसी प्रकार का हस्तक्षेप उचित नहीं ।

भानुभक्त-रामायण

५.
जो गदन्‌ प्रभु गरन्‌ छ लिला उनको ।चल्दैन जोर्‌ प्रभूविषे अरूका कनको ॥६२।मारीचन्ने जव त वात्‌ यति सव्‌ वतायो।सन्‌ वात्‌ सुनी वृकि त खुप्सित चित्त लायो ॥भन्छ
हैरी ।

यस्तो हकूम्‌ गरि तहां जव वीच

पा्यो।
अनि

मारीचलाडइ

रावण

सीता म॒ हिष्ट मृग भैकन जाउ फेरि ।॥६२॥द्वर्‌ त हुन्‌ यदि भन्या ति अवश्य मान्‌ ।सामान्य हृन्‌ यदि भन्या ति अवश्य हान्‌ ॥टश्वर्‌ भया प्रति असल्‌ छ अवश्य तष्ट ।सामान्य हुन्‌ त म॒ सितासंग भोग गं ।६ब्जाऊ अव्य स॒ सितानि हरेर लिन्छ।बोल्यौ यहाँ कष भन्या तम कारिदिन्छु |
मारीचले पनि तसे जिय आश माग्यो ।॥६५॥आखिर्‌ म्यां म॒ ह्रिदेखि भन्या त तषु,यस्‌ दुष्टदेखि मरिया तं नरक्‌ म॒ पषयस्तो विचार्‌ गरि तहा मृगरूप धारी)सुकम्‌ शिरोपर धरीकनभो तयारी ।॥६६॥
प्रभुके उपर किसी प्रकारका प्रभाव नहीं पड़ सकेगा । ९२ मारीचसेयह्‌ सव वाते ध्यान से सुनकर रावण कहता है किं तुम पूनः मृग बन कर.चले जाओ-म सीताका हरण करूंगा । ६३ यदिवे ईष्वर होगेतोअवष्य मृन्ने मार डालेगे, अन्यथा स्वयं ही पराजितहोगे। यदि वे ईश्वरहोगे तो उनके हदाथसे मारे जाने पर मै तर जागा, अन्यथा सीताकेसंगभोग करूंगा । ६४ तुम अवश्य जाओ-्मै सीताको हर कर ले आगा ।अव तुम अगे कु मत कटो, अन्यथा भै तुम्हारा वध कर डालुंगा।रावणकी एेसीञन्ञाको सुनकर मारीचने भी अपने जीवनकी आशाछोड दी) ६५ उसने सोचा-यदि्मै प्रभु केहार्थोँसे मरणा तो करजागा, इस दुष्ट द्वारा मारे जनेसेतो मै नरक कोही प्राप्त होगा, इसलिए ईश्वर के हाथों सारा-जाना दही उचितहोगा।यह्‌ सोच कर सारीचने मृग-रूप धारण क्यासौर रावणकौी आज्ञा को स्वीकार करते हुए

तैयार हौ गया)

६६
वड़ही विचित्र ढंग से उछलते-कूदते हुए सीताजी

नेपाली-हिन्दौ

दौडयो

सीताजिका

लिला

पनि

नजिक

चरित्र

गैकन

सीताजिलाईद्‌गरु मोहलीला गरीकनवरीपरि
९९
विचित्र गर्द ।
ताहि फिदं॥ .भनेर दाग्यो।चरनं. लाग्यो ।६७।॥
छ्ल्‌ हो भनी प्रभृजिले पनि चाल पाया।एकान्तमा गइ सिताकन काम्‌ अहाया॥सीते |! अदृश्य ,भद्‌ लौ वस अग्तिमाहां।छाया सिता पत्ति बनायरछोड याहं ।॥६८।एक्‌ भिक्षुको रप लि रावण आज आई।
हर््याछ दुष्टचांडो अवश्य
तिमिलाईइई स्वरूप्‌ छिपाई॥तिमिले पनि रूप्‌ छ्िपाऊ।
एक्‌ व्षेसम्म चछ्पि दिन्‌ तिमिले बिताऊ ॥६९॥यस्तो हृकूम्‌ सुनि अदुश्य सरूप धारी।छाया सिता पनि दुरुस्त गरिन्‌ तयारी ॥सीता चछ्िपीकन रहिन्‌ जब अग्निमाहांँ।छाया सिता-संग वस्या रघुनाथ ताहाँ।।७०॥छाया सिताजि अति चित्र॒ विचित्र मानी।खेलातेसमृगलाइभनेर ठानी॥विन्ती गरिन्‌ रघुपते! मृग आज देऊ ।वेलाञछ्‌ अधिकजाति छ पक्रिलेऊ ।७१॥

को आकर्षित करने के लिए वह उनके निकट जाकर

चरने लगा! ६७

प्रभुजी ने इस छली मृग को पहचान कर सीतासे कहा किह सीते, तुमअग्नि में अदृश्य होकर रहौ ओौर यहां अपनी जगह पर छाया-रूपी सीताको रखदो। द एके भिक्षुके रूपमे रावण यहं आज अयेगा मौरवह दुष्ट इस छ्य वेष मे तुम्हें हरण करेगा । अतः तुम भी तुरन्त अपनास्प चछिपालो ओर इसी प्रकार तुम एक वषं व्यतीत करो । ६९ . एेसीआज्ञा सुनकर सीताजी अदृश्य हो गयी ओौर छाया-ल्पी सीता को रखकर
स्वयं अग्निम छिप गयीं । रघुनाथ छाया रूपी सीतां के संग वहं रहे 1 ७०छाया-ूपी सीता ने अत्यन्त आश्चर्य-चकित हौकर उस मृगसे सेलने केविचार से रघुनाथ से विनती की-हे रघुपति ! इस सुन्दर मृग को पकड़करञआजही लाद, मँ उसमे चेलूंगी । ७१ सीताजी की विनती सुनकर
१००

भानुभक्त-राययिण

दृच्छा धियो प्रभुजिको पनि विन्ति सूनी।जान्‌ असल्‌ छ भनि यो मनभित्र गूनी॥हातूमा धन्‌ लि मयका पछि आपु धाया ।लक्ष्मण्जिलाद्‌ वस तीमि भनी अदहाया ।७२।लक्ष्मण्‌ र्या तहि सिता-सित चौकिदारी।मारीचलाई्‌प्रमूले पनिघुष्‌ लधघारी।)माय्या तहा जब त दिक्‌ वहतं गरायो।हे भाद लक्ष्ण ! म्यां भनि छल्‌ करायो ॥५७३॥छलका वचन्‌ सुनि सिताजि वहत्‌ उराइन्‌ ।लक्ष्मण्जिलाईइ तिमि जाउ भनी अह्ाइन्‌ ॥लक्ष्मगूजिले हकूम यो सुनि विन्ति पाव्या।हे माई! जो मृग थियो प्रभूले त मान्या 11७८1)तेस्तो कहां मृग थियोमृगरूप-धारी।मारीच राक्षस धियो र त आज सारी ॥

ठाकूरजिले

तहि

भिसाददिदा

करायो।
हे भाइ लक्ष्मण ! मन्यां भनि छल्‌ गरायो ।७५।।ज्योतिस्वरूप्‌ तहि भयो र मिल्यो हरीमा।आश्चयंभो सकललाद्‌तसे घरीमा॥यस्‌ दुष्ट्ले पनि त यो गति आज पायो ।भन्न्या वृञ्चेर सव जन्‌कन हषं आयो ।॥७६॥प्रभुजी की आन्तरिक इच्छा हई कि मृज्ले जानादही उत्तम है। वे धनप
~~~
हाथ मे लेकर मृगके पी दौड़ पड़ं।आना

दी) ७२

लक्ष्मणजीको

लक्ष्मण सीता के संरक्षक वनकर

भी मारीचको बड़ी दूुरतक दौडनेकेवादमारा।

वहीं रहने की

वहीं रहै।

प्रभते

मारीच (प्रभुको) दुविधा

भरे डालने के लिए छलपूणं स्वरमें चिल्लाया--'मर गया' । ७२३ इस छलनामयपुकार को सुनकर सीता अत्यन्त भयभीत हुई । लक्ष्मण को तुरन्त आनादीकिवे राम की सहायताके विष्‌ दौड़। लक्ष्मण ने उनकी यह आजा
सुनकर विनतीकीकिहे माता, जो मृग था, उसे प्रभुने मारडाला है । ७४वह॒ मृग नहीं धा, वह॒ तो मृग-र्पी सारीचथा,जोप्रभ्‌ दवारा मारे जातेही “हे भाई लक्ष्मण मराकहकर चिह्लाया 1 ७५ वहु ज्योति-स्वरूपधार्णकर हरि मे विलीन हौ गया।उस समय सबको आश्चयं

नेपाली-हिन्दी

५०१
लक्ष्मण्जिको वचन्‌ सूनि सिता रिसाइन्‌पनी खसाइन्‌ ॥'आंसू. बहुत्‌ नजरदेखिबोलिन्‌ अवाच्य पनि लक्ष्षणलाईइई ताह । .` भज्‌ली मलाइ भनि मन्‌ छ कि आज याहां ।७५७॥रामृदेखि वादहिक अवर त भजनं मेलेतिम्रै अगाडि यहि छोड्दछु देह एेले।॥ `तिग्रो त चित्त अति दुष्ट रहे जान्यां।काम्‌ देखि आज तिमिलाई त शु मान्यं ।।७८॥यस्तो वचन्‌ सुनि ति लक्ष्मणजी रिसायाबोलिन्‌ अवाच्य भनि भित्र मनं चिताया ॥धिक्‌ चण्डि | येति भनि खुप्‌ सित चट्पटायावन्‌-देविलाई्‌रखवारितहांखटाया ॥७९॥।[

सीताजिलाद्‌

तहि

छोडि

उटी

गयाका

दरे हदा नजरदेखिफरकभयाका॥देख्यो र रावण सितातिर जट्दि आयोसन्न्यासिको स्वरुप लीकन रूप्‌ छिपायो ।८०॥सन्यासि हुन्‌ भनि

पूजा

प्रणाम्‌

पनि

बहृत्‌ गरि भक्ति लाइन्‌

गरीकन

[1
हषे पाइन्‌ ॥
हृ कि दुष्टको भी यह्‌ मोक्चगति प्राप्त हुई है ओर साथही यह जानकर॒ सवको हषं भी हा । ७९ लक्ष्मणजी के वचन सुनकर सीताजीकोधित हुई । उनके नेतो से अश्रु प्रवाहित होने लगे! उन्होने लक्ष्मणको अपशब्द भी कहे ओर कहा कि कदाचित्‌ तुम यह सम्लते हो कि रामकोकुछ हो जायगातो उनकी अनुपस्थिति में तुम्हारी सेवा करनेलगृगी । ७७. रात के अतिरिक्त्मै किसी की सेवा नहीं करूगी। यहांतुम्हारे सामनेअपने प्राणोंको व्याग दुंगी। तुम्हारे इस पापी मनको मै जाज दही पहचान सकी हूं। आज से मँ तुम्हँं अपने शत के समानमानती हूं । ७८

सीताके इसप्रकार के वचनोंको

सुनकर लक्ष्मण को

क्रोध आया । उनके अपशन्दों को सुनकर निवेदन किया-' धिक्कार चण्डी!कहकर घूब वडबडये । वन-देवी को (उनकी )रक्षा-हेतु नियुक्त किया 1 ७९सीताजी को अकेली छोडकर लक्ष्मणके अखोंसे गोट होते ही रावणसीताके पास आया । उसने अपने वास्तविक रूप को चछ्िपाकर एकसंन्यासी का रूप धारण करके सीताको छलने कौ युक्ति की। ८०
--१०२

भानुभक्त-रामायण

बिन्ती

गरन्‌ बस गुरो!
प्रभु फकि आई।
गनेन वहत्‌ प्रिय हजूरकन. चित्त लाई ।।८१।।यस्ता वचन्‌ सुति सितातिर दुष्टि दीँदो।को हो पती वृक्ष भनीकन गुह्य लींदो ॥सोध्यो सितासित पती पनिनजोषछको हो।नाम्‌ काम्‌ समेत्‌ तिमि वताउन आजनजोदहो॥=र्‌।सीताजिले पनि भनिन्‌ सवजो छ नाम्‌ काम्‌ ।सन्यासि जानिकन क्ति नपारि छलृष्ाम्‌ ॥सोधिन्‌ तहं म पनि नामहरु सन्न पाञॐ।कुत्‌ हो बताउ तिमिले पनि नाम ठॐं।॥5३॥।यस्ता वचन्‌ सुनि सिताकन हनं ओंटी।नाम्‌ काम्‌ तहां सवकह्यो रतिभर्‌ नांदी ॥बोट्यो अवाच्य पति मानि मलाई लेऊ।
राम्‌चन्द्रलादइतिभमिले अब छाडिदेऊ 15४1]यस्तो वचन्‌ सुनि अलिक्‌ यने उराइन्‌ |वातूले त दुष्टकन तृण्‌ सरिको गयाइन्‌ ॥हे दुष्ट रावण ¦ अवश्य त॒ आज मर्लास्‌ ।एेले जसं प्रभुजिका अगि याहि पर्वस्‌ ॥८५॥
सन्यासी समन्नकर सीताजी उसके प्रति भक्ति-भावना से परिपूणं हकरविनती करने लगीं। उन्टोने कहा कि आप विराजं) प्रभु अभीलौटकर आतिहोगे ओर तव वहु आपका उच्चित स्वागत-सत्कार करेगेआर भक्ति-वार्ता करेगे । ८१ यह्‌ सुनकर संन्यासीरूपी रावण नेसीताजी कीओर प्रष्नपूणे दृष्टस देवा ओर कहा कि तुम्हारे पतिकौन है, नाम ओर काम-सहित वताो ! ८२. सीताजीने भी उसे वास्तवमे संन्यासी ही समक्षकर सविस्तार सव कू कट्‌ सुनाया । तत्पश्चात्‌संन्यासी का परिचय तथा निवास-स्थान जानने की जिज्ञासा प्रकट की । =यह सुनकर रावणने सीताजीकोह्रण करने का निष्वयं करके अपनापुणे परिचय देते हए कहा किं अव तुम मृघ्ने ही अपना पत्ति मान नलो ओौररामचनद्रको हृदयसे त्याग दो! ८४ उसकेएेसे वचनो कौ सुनकरसीताजी लेण-मान्न भी भयभीत नहीं हुई ओर उस दुष्ट को एक त्तिनके केसमान समञ्लकर कहा, हे दुष्ट रावण ! आजतु प्रभु के लौटने पर अवश्य

ही उनके हाथोंसे मारा जायेगा | ८५

सी वाणी सुनकर रावण अत्यन्त

नेपाली-हिन्दी

१०३
यस्ता वचन्‌ सुनि रिसायर जल्दि ऊश्यो।धाय्यो सरूप्‌ र अब दुं भनेर षटटयो॥नीस्‌ बाहु दश्‌ मुख शरीर्‌ पनि शुद्ध कालो ।देखाइ सब्‌कन तरास्‌ मन-भित्र॒हात्यो ॥८६।सीताजीलाइ्‌ मनूले चिद्भिकन मनसा मातृवत्‌ बुद्धि गर्दो।हात्ले मैले छंदामा अनुचित छ भनी स्पशं केही नगर्दो ॥आपफ्ना नङ्‌ सब्‌ जमीनूमा धघरसिकनजमिनजल्दि हात्‌ले उठायो ।सीताजीलाद रथूमा धरिकन दगुव्यो रामदेखी षटृटायो ।८७॥हा राम्‌ ! लक्ष्मण! येति मावर युखले बोलेर सादंस्दी।तन्‌ मन्‌ रामविषे धरेर बहुत विह्वल्‌ निरन्तर्‌ रदी ॥देख्या ताहि जटायुले र उडि गै रथ्‌ चूं पारीदिया।घोडा चूणे गराइ फेर्‌ धनु समेत्‌ दटुक्टुक्‌ गरार्ददिया 1८२८॥रावण्‌ जन्‌ वीर थीयो क्षटपट करमा क्रोधले खड्ग लीयो ।काटो दूवै पेट रिससित र तहां भरूमिमा पारिदीयो॥बाधा पाई जटायु प्रृथिवितल भगिन्यां फेरि रथूको तयारी ।जल्दी पान्यो र सीता वलिदकन पृगिगो दुष्ट त्यो सिन्धु पारि ।८९।।क्रोधित हुभा ओौर तत्क्षण उठकर खड़ा हो गया सौर अपना वास्तविक रूपधारण किया। तव सीताजीको हरण करनेके लिए वीस भुजाओं तथादस शीशोवाले अपनेषरूपको प्रदशित कर अपने मन में आवेग उत्पन्नकिया। ८६ सीताजी कोहदय से पहचान कर माता-तुल्य समञ्लकरअपने हाथों से स्पशे करना अनुचित समज्ञा, अतः उसने अपने नाखूनों कोभुमिमे धंसाकर सीताजी को जमीन-सहित उठाकर रथम रख लियाओर.राम सेविलग करने गया। ८७ हा राम! हा लक्ष्मण ! केवलइतना ही सीताजी के मुख से निकल पाया ओर वह्‌ अच्यन्त व्याकुल होकर
विलाप करने लगीं।
केवल राम को ही अपने ध्यानमें बसाये हुए मन
ही मन अपना तन-मन रामको अपण करती हर्द वह वार-बार विलापकरती रहीं । मागं मे उनकी एेसी दशा देख जटायु उनकी सहायता को
दौड़ा ओर उसने रावणकेरथ को चूर-चूरकर दियाघोड्कोभीमार डाला ओौर रावण के धनुष के दुकड़-टुकडे कर व्यि । ठ्ठ रावणतौवीरथाही।
उसने तुरन्त तलवार खीचकर कोधित जटायु के दोनों परों
को काटकर उसे धराशायी कर दिया।पर गिरपड़ा।

पखोंसे विहीन जटायु भूमि

शीघ्र ही राव्णनते रथ तैयार किया ओर सीताजी को
१०४

भानुभक्त-रामायण

आकाश्‌मा जव ऋष्यमूक गिरिका ऊपर्‌ पुगीधिन्‌ जसं।आप्ना सन्‌ गहना फुकालि वचलियो पोको वनादन्‌तसे ॥राम्‌ लक्ष्मण्‌कन यो दिउन्‌ भनि तहां पोकं खसालिन्‌ पनि।सुग्रीवूले त॒ गुफाविषे धरिलिया कस्ले खसाल्यो भनी ॥९०॥सीताजीलाद्‌ चद्कालगिकन मनमा मातृवत्‌ वुद्धि गर्दो।भितरीजुन्‌ हो बगेचा तहि असल अणोक्‌ वृक्का नीच धर्दो ॥सेवा खृप्‌ गनं लाग्यो तर पनि मनमा मादने दुःख पाइन्‌ |हासम्‌! हाराम्‌! जगन्नाध्‌! यहि वचन गरी राममा चित्त लाइन्‌ ।।९१॥मारीच

मारेर फिर््या प्रभृ पनि वनमा

देखिया ताहि भाई।
राम्‌ले ताहीं विचारया सन मन ड्‌ कूरा भाद्‌ पर्ने नपाई॥साया सीता बन्याकी अलिकति पनि याद्‌ छन ई भादलाई)साच सीता इने हुन्‌ भतिकन सल भन्दषछठन्‌ चालू नपाई ९२यो वात्‌ बोत्दिनं गह्य राच्छु म पनी मानृन्‌ सिता हुन्‌ भनी।सीता निश्चय हृन्‌ भन्यात रसे लडइनन्‌ रिपूथ्यं पनी॥यस्तो निश्चय सन्‌ भयो प्रभुजिको लक्ष्मण्‌ पुग्या लट्‌ तहां।सोध्याश्री रघुनाथले किन सिता छोडेर आयौ यहाँ ९३)^~
~~ ~~~ ~
~~~ ^ ~-~-~--~-~ ~~~
~~~
---~--~
~
~
~ ~~ ~
~ ~~
~~~ = ~ ~~ ~ ~~
~~~ ^ ~^“
~^
साथ लेकर वह्‌ दुष्ट समूद्रको पार कर गया। ८९ आकाश सागंसेजसे ही सीताजी ऋष्यमूक पव॑त पर पहुंची, उन्होने अपने समस्त ञआभ्रूषणउतार करएक गठ्रीमे वाघ लिये ओर नीचे गिरा दिये, जिससे वे किसी
के द्वारा राम-लक्ष्मण के पास पहुंचा दिये जाये । सूग्रीव ने उन्हँं उठाकरतुरन्त अपनी गरुफा में रख लिया) ९० रावणने सीताजी कोलंकालेजाकर अपने हृदय से उन्हं माता-तुल्य जानकर अपने अंतःपुर की वादिकामे अशोक वृक्ष के नीचे वैठादिया ओर खूब सेवाकी। तथापि सीतामाता के मन में महान्‌ दुख रहा ओौर वह्‌ मनदहीमनदहा राम! हा राम।हा जगच्ाथ! जपकर रामकीस्मृति.को अपने मन में वसाती रहीं।मारीच का वधकर लौटते समय राम ने वन-वीच भाई लक्ष्मण कोादेखाओर भाई के पहुंचने के पूवं ही मन दही मन विचार किया कि सीता मायाख्पी वनी हई हँ, यह्‌ भाई को किचित-मा्र भी स्मरण नहींहै। सत्यही सीता यही होगी, एेसा सोचकर मनम कहूतेहै। ९२ यह्‌ वात मैगुप्त रक्ंगा, किसीसे नक्हुंगा। इसेही सीतामान लें! निश्चयही सीता होने पर गतु के साथ लडनेका विचार प्रभ के.मन में हआ ।
तुरन्त ही स्वुनाथनेप्रए्नकियाकिंसीताको छोडकर क्यों अये दहो ? ९३

नेपाली-हिन्दी

१०५.
लक्ष्मणूले पनि यो हुकृम्‌ सुनि तहां विन्ति ग्या क्या करू ।मेलं ˆ वरु ॥जो दुर्वाच्य गरिन्‌ सवै भनुं भन्या सक्तीनंमारीच्‌का छलका वचन्‌ सुनि वहत्‌ दुर्वच्यि बोलिन्‌ जसै।सम्बाया भरसक्‌ अपेक्‌ तरहले लागेन विन्ती कसं ।९४॥।फर्‌ उत्तर्‌ प्रभले दिया अनुचितं हो यो गन्या तापि ।छोडन्‌ क्ति भियेन दुर्वंचनले स्तरीहन्‌ ति सीता भनी.॥येती वात्‌ गरि राम आश्रमविषे जल्दी कदम्‌ ली गया]देख्यानन्‌ र॒ सिताजिलाइ वहतं शोक्‌ गनं लाग्दा भया ॥।९५॥की राक्षस्‌हरुले हव्या कि वनमा को दुष्ट्ले पेट्‌ भय्या।एक्‌ थोक्‌ क्या त भयो अवश्य म गयां वन्‌ दुष्टका खेल्‌ परया ॥वनूदेवीहरुलाद्‌मालुमभया विस्तार बताऊ यहाँ।सीता मेरि पियारि देख॒तिनं म ता जान्छ्‌ सिता छन्‌जहां ।\९६।।यस्ता रीत्सित सोधि सोधि रघुनाथ्‌ ज्ञानंस्वरूपीपति।जस्तो मानिस गं सोहि रित्ले हा मेरि सीता! भनी॥पर्थ्या तेस्‌ वनमा बडा विरहले सोध्यानपाई उसे।यै बीच्मा वनमात रथ र धनुको देख्या अनेक्‌ टुक्‌ तसे ॥९७॥यह्‌ आज्ञा सुनकर लक्ष्मणने भी विनती कीक

क्या करू, मारीचकी

छलपूणं चीख को सुनकर सीताजी ते अनेक दुवेचनों का प्रहार किया ओौर
भने अनेक प्रकारसे समक्ञानेकी चेष्टा की, परन्तु सव व्यथं हुमा 1 द
प्रभु ने फिर उत्तरदिया किं यहतो अनुचितिदहीहृआरहै। स्त्री केदुवचनों को सुनकर भी उसे स्री समञ्चकर अकेला नहीं छोडना चाहिए ।इतना कहकर राम ने - शीघ्रता से आश्रममेंदेखा। सीताकोन देख करअत्यन्त शोकाकुल हुए ! ९५ किन्हीं राक्षसो ने हरण किया टोगाया वनमे किसी दुष्ट ने अपने पेट का आहार वनाया होगा-कछ तो अवश्यही
हुआ दहै। मेरे चले जाने पर किस दुष्ट ने यहु खेल किया? वनदेवियो |यदि तुम्हे विदितदहो तो मृञ्चे विस्तारपूवंक वतादो। मेरी प्यारी सीताकहीं दृष्टिगोचर नही होतीमतो सीता जहां होगी, वही जा रहा.
हं । ९६. ज्ञान-स्वरूपी होने पर भीसीता कोन देखकर रघुनाथ अत्यन्तव्याकुल हो उसी प्रकार हा मेरी सीते ! कहकर पुकारते हृए उस वन मेँभटकने लगे, जिस प्रकार मनुष्य क्ियाकरता है) उसी वीचवन मेंरथ एवम्‌ धनुष के टुकड़ देखे । ९७ लक्ष्मण से कहते है, भाई ! तुम यहांदेख रहै हो-क्या हृ है, कोई ओर ही आकर विजय प्राप्त करले गया
१०४

भानुमक्त-रामायण

आकाशूमा जवऋष्यमूक गिरिकाआप्ता सब्‌ गहना फुकालि वलियो
ऊपर्‌पोको
पुगीथिन्‌वनाद्न्‌
जसं।तसे ॥
राम्‌ लक्ष्मण्‌कन यो दिउन्‌ भनि तहां पोकं खसालिन्‌ पनि।सुग्रीवूले त॒ गुफाविषे धरिलिया कस्ले खसाल्यो भनी ।९०॥सीताजीलाद लङ्कालगिकन सनमा मातृवत्‌ वुद्धि गर्दो।भिवीजुन्‌ हो वगेचा तहि असल अणोक्‌ वृक्षका नीच धर्दो ॥सेवा ख॒प्‌ गनं लाग्यो तर पनि मनमा मादले दुःख पाडइन्‌ ।हाराम्‌! हाराम्‌! जगच्ाथ्‌! यहि वचन गरी राममा चित्त लादन्‌ ।९१॥मारीच मारेर फिर्थ्या प्रभ पनि वनमा देखिया ताहि भाई)रामले ताहीं विचारया सन मन इ कुरा भाद्‌ पर्ने तपाई ॥।
माया सीता वन्याकी अलिकति पनि याद्‌ छन ई भादलाई।सचि सीता इनं हन्‌ भनिकन मलले भन्दछठन्‌ चालू नपाई ।॥९२॥यो वात्‌ वोह्दिनं गृह्य राख्छुम पनी मानून्‌ सिता हुन्‌ भनी।सीता निश्चय हुन्‌ भन्यात रिसले लडइनन्‌ रिपूथ्यं पनी॥यस्तो निश्चय मन्‌ भयो प्रभुजिको लक्ष्मण पुग्या लट्‌ तहां ।सोध्याश्री रघ॒नाथले किन सिता~---~~
~~ ~~-~~~-~
~--~~-
-~-~---~-----~-- ~~
--~- ~~
छोडेर आयौ य्ह ।९३।~^
= ~
~
~~ ~ ~
~~
^~” <~
साथ लेकर वह्‌ दुष्ट समुद्रको पार कर गया। ८९ आकाश मागंसेजसे ही सीताजी ऋष्यमूक पवत पर पहुंची, उन्होने अपने समस्त आश्रुपणउतार कर एक गव्रीमें वाघ लिये ओर नीचे गिरा दिये, जिससेवे किसी
के द्वारा राम-लक्ष्मण के पास पहुंचा दिये जाये।

सूम्रीव ने उन्हं उठाकर

तुरन्त अपनी गरफा मं रखलिया। ९० रावणने सीताजी कोलंकानेजाकर अपने हृदय से उन्हे माता-तुल्य जानकर अपने अंतःपुर की वाटिकामे अशोक वृक्षके नीचे वैठादिया ओौर खव सेवाकी। तथापि सीतामाता के मन में महान्‌ दुख रहा ओर वह मनदहीमनदहाराम! हा राम।हा जगन्नाथ! जपकर राम की स्मृत्ति.को अपने मन में वसाती रहीं।मारीच का वधकर लौटते समय रामने वन-वीच भाई लक्ष्मण कोदेखाओर भाई के पहुंचने के पूर्वं ही मन ही मन विचार किया कि सीता मायाख्पी वनी हरईहें, यह्‌ भाई को किचित-मात्रभी स्मरण नहींहै। सत्यही सीता यही होगी, एेस्ला सोचकर मनम कहते है। ९२ यह वात मँगुप्त रक्खंगा, किंसीसे नक्हूंगा। इसेटही सीतामान लें। निश्चयही सीताहोने पर शतके साथ लडनेका

विचारप्रभ्‌ केमन में हअ]

तुरन्त ही रघुनाथने प्रश्न किया कि सीताको छोडकरक्यों येह
९३

नेपाली-हिन्दी

१०५
लक्ष्मणले पनि यो हुकम्‌ सुनि तहां विन्ति गव्या क्या करू ।मेले ` बरु ॥जो दुर्वाच्य गरिन्‌ सवे भनुं भन्या सक्तीनंमारीचूका छलका वचन्‌ सुनि वहत्‌ दुवच्य बोलिन्‌ जसं ।सम्सायां भरसक्‌ अपेक्‌ तरहले लागेन वबिन्ती कसं ॥९४॥फेर उत्तर्‌ प्रभुले दिया अनुचितं हो यो गन्या तापनि।छोडन्‌ कर्ति धथियेन दुर्व॑चनले स्तीहुन्‌ ति सीता भनी॥येती बात्‌ गरि राम आश्रमविषें जल्दी कदम्‌ ली गया।देख्यानन्‌ र सिताजिलादइ्‌ बहुत शोक्‌ गनं लाग्दा भया।।९५।।की राक्षसूहरुले हव्या कि वनमा की दुष्टले पेट्‌ भय्या।एक्‌ थोक्‌ क्या त भयो अवश्यम ग्यां कून्‌ दृष्टका खेल्‌ परया ॥वन्देवीहर्लाइमालुमभया विस्तार्‌ वताऊ यहांँ।सीता मेरि पियारि देख॒तिनं म ता जान्ष्‌ सिता छन्‌जहाँ ।।९६।।यस्ता रीत्सित सोधि सोधि रघुनाथ्‌ ज्ञानेस्वरूपीपनि]जस्तो मानिस गरं सोहि रितले हा मेरि सीता! भनी॥
पफिर्थ्या तेस्‌ वनमा बडा विरहलेयै बीच्मा वनमात रथ र धनुको
सोध्यानपाई उसे।देख्या अनेक्‌ टुक्‌ तसे ।॥९७॥
यहु आज्ञा सुनकर लक्ष्मणने भी विनती कीकिमैँक्या करू, मारीचकीछलपुणं चीख को सुनकर सीताजी ने अनेक दुव॑चनों का प्रहार किया ओरमैने अनेक प्रकारसे समञ्लानेकी चेष्टा की, परन्तु सव व्यथं हुआ । ९४प्रम्‌ ने फिर उत्तरदिया कि यहतो अनुचितदहीहुाहै। स्त्री केदुवेचनों को सुनकर भी उसे स्ती समञ्लकर अकेला नहीं छोडना चाहिए ।इतना कहकर राम ने शीघ्रतासे आश्रममेंदेखा। सीताकोन देख कर
अत्यन्त शोकाकुल हुए । ९५ कन्हं राक्षसोंने हरण किया होगाया वनमे किसी दुष्ट ने अपने पेट का आहार बनाया होगा- कुतो अवश्यदहीहमा है । मेरे चले जाने पर किंस दुष्टते यहु खेल किया? वनदेवियो |यदि तुमह विदितहोतोसूज्ञे विस्तारपूवेकवतादो। मेरी प्यारी सीताकहीं दृष्टिगोचर नहीं होती।
मतो सीता जहां होगी, वहीं जा रहा.
हं । ९६. ज्ञान-स्वरूपी होने पर भी सीता कोन देखकर रधुनाथ अत्यन्त
व्याकुल हो उसी प्रकारहा मेरी सीते ! कहकर पुकारते हुए उस वनमभटकने लगे, जिस प्रकार मनुष्य कियाकरतादहै। उसी वीचवन में

रथ एवम्‌ धनुप के टुकड़ देखे । ९७

लक्ष्मण से कहते दै, भाई ! तुम र्हा

देख रहै हो-क्या हुआ, कोई ओर दही आकर विजय प्राप्त करले गया

भानुभक्त-रामायण

१०६
भन्छन्‌ लक्ष्मणलाइ्‌ भाद्‌ | तिमिलेअर्क्य आइ जिती लियेषठ विचमायेती बात्‌ गरि राम्‌ अलिक्‌ पर गयाचिन्नैलाद्‌ कठिन्‌ जटायुकन ताअज्ञान्‌ कत्ति यियेन तापनि तहँदीन्याको नचिन्ह्यै गरेर भगवान्‌हे भाई ! धनु देउ दुष्ट मिलिगोखान्था येहि रहै हेरि बुक्लियोसून्या बात्‌ र जयायुले पनि हवाल्‌
देख्यौ यर्हांको कुचाल्‌ ।मैले त देर््यां कूचात्‌ ॥देख्छन्‌ त पल्टी रही ।
दूवे पखेटा शई ॥९८॥

लीला

नरको गरी।

भन्छन्‌ अगाडी

माछ म वाणै

सरी ॥
धरी
पत्टेछखृव्‌पेट्‌भरी ॥९९॥वृत्तान्त विन्तो
गव्या ।
सूनी पणे दया भयो नजिक गैं छाम्यार सवूताप्‌ हत्या ॥सीताको समचार्‌ खबर्‌ कहि तहां सामने जटायु मस्या]स्तान्‌ दाहा गरि मांसपिण्डह्‌ रूदी क्रीया प्रभूले गव्या।।१००॥सायुज्यै मुक्ति पाई स्तुति पनि वहत भक्ति रवेर लाई।पौच्या घामूमा जटायु प्रभु पनि नरको ठिक्कं लीला जनाई॥।वनूवन्‌मा फिने लाग्या विरह्‌ गरि गरी सोद्धछन्‌ जाहि ताहि ।दोस्रादेखन्यामभिल्यानन्‌सकलवदुडयाएक्‌ पनी काहि नाहीं । १०१॥
^~~-^~~~-~ ~~
है!
मतो कुछ अनथं के लक्षणदही देखताहूं।
~~
~~~ ~~~ ^+ ~~~ ^~-~-^~-^~

इतना कहकर रामने

कुछ दूर जाने पर्‌ पख कटे हुए जटायु को अचेत अवस्था में पड़ा देखा,जिसे पहचानना भी कल्नि था! ९८ प्रभु अज्ञानी नहीं थे, तथापि मनुष्यकीही लीला करके अपरिचित की भांति आगे वकर भगवान कहते हु,हे भाई ! दुष्ट मिलगया। धनुषदेदो्मैवाणसे इसका वध करताहं! इसीनेसीताको खायादहै ओर पेटभर खाकर लेटा हुआदहै। ९९इन वातो को सुनकर जटायु ने भी विनती-स्वरूपसारा वृत्तान्त कहं सुनाया ।वृत्तान्त सुनकर दासे पूणं हौ रामने उसके निकट जाकर उसका स्पशंकिया ओौर उसके दूख-ताप का हरण किया । सीताके विपयमें सारासमाचार ज्ञात करने के पश्चात्‌ जटायुका प्राणान्तहो गया । स्नानोप्रान्त दाहसंस्कार. कर मांस-पिण्डादि देकर प्रभु ने उसका क्रिया-कमंकिया । १०० अत्यन्त भक्तिपूवेक स्तुति करने के वाद, मुक्ति पाकरजटायु स्वगं-धाम को पहुंचे। प्रभु भी मनुष्यके समान लीला करते हृए,
विरह व्यक्त करते तथासीताके विषयमे पुषछठ-ताछ करते हुए, वन-वन

, भटकने लगे, परन्तु दूसरा ओर

को देखा हो । १०१

कोई एेसा नहीं मिला, जिसने सीताजी

राम कौभेंट एक कवंध नामक राक्षस से हई

नेपालो-हिन्दी

१८७
छातीमा मुख्‌ भयाको शिर पनि नहूंदा नाम्‌ कबन्धैः रह्याको 1.चार्चारकोश्‌ सम्म पुर्या दुद्‌ अत्ति बलिया दीघं वाहुः भयाको ।
रक्षस्‌, थीयो तहां एक्‌ वसि बसिकन स्‌ हातले खचि खान्या ।'तेसैका बाहुं बीचूमा रघुपति पुग्रदा रोकियो मागं जान्या ॥१०२॥राक्षसूले घोरियाको बुक्चिकेन रघृनाथ्‌ भन्दछन्‌ ` भाद्लाई ।हे.लक्ष्मण्‌ ! आज देख्यौ अब बिच परियो निल्छ की हामिलारई॥ठाकूरजीकरा . वचन्‌ ई सुनिकन विनती ताहि लक्ष्मणूजि गछन्‌ ।हेनाथ्‌! क्या उर्‌ छ यस्को दइ भद दृद हात्‌ काटि याहि श्चन ।३॥येती बात्‌ गरि हात्‌ दुवै सहजमा काटी खसाल्या जसे ।राक्षस्‌ते पनि हात्‌ गिन्या जब तहां आश्चयं मान्यो तसे ॥सोध्यो आज म वीरका पनि सहज्‌ हात खसाल्यौ . यहां 1को हौ क्या मनमा

लियेर वनमा

इल्छौछ जान्‌ कहां!) १०४॥
उत्तर्‌ श्री, रघुनाथले पनि द्यासून्यो राम सनी तहां र मनले
हसिर विस्तार गरी।चीन्ह्यो इनै हुन्‌-ह्रि॥
ठाकुरजीकन चीन्हि खुश्‌ अधिक भै विस्तार आपन्‌ गव्यो ।हेनाथ्‌! आज चिन्ह्याँ हृज्‌रकन यहा पायां र सब्‌ ताप्‌ ख्यो ।। १०५॥जिसका मुख उसकी छातीमे था गौरसिरथा
ही नहीं!

उसकी भुजां

च्रार-चार कोस की लस्वार्ईमे थीं ओर बहूत'ही बलिष्ठ थीं | वहु अपनीउन्हीं बलिष्ठ भुजां से अपना जहार खींच कर खाताथा) उसकी दोनोंभुजाओं के बीच में रघुपति आ गये, जिसके कारण उनका अगेजानेकामागं रक गया १०२ राक्षसमसे धिरा हुआ समञ्चषकर राम भाई से कहतेहै, हेलक्ष्मण! आज देखो, कदाचित्‌ यह्‌ राक्षस हमे निगल नले। ठाकरुरकेइन.वचनों को सुनकर लक्ष्मणजी विनती करते है, हेंनाथ, इसका क्या भयहै,
दोनो मिलकर दोनों भूजाओं को काट डाले, वस यह्‌ यही गिर जायेगा 1 १०३
एसा कहकर जैसे ही दोनों भुजाओं को सहज ही काटकर गिरसा दिया ।यहु देखकर राक्षस को भी अपनी भुजाओं के कटकर गिरने से .आण्चयं -हुञा ।
अतः उसने पूछा, आज सृन्ञ-जेसे बौर की भृजाओं को सहज ही मे गिरने.वाले तुम कौन दहो, किस उदेश्यसरेवनमें धूम रहेहो ओौर कहाँ जानाहै ? १०४ रधुनाथनेभी हसकर धीरेसे उत्तर दिया, राम कुकरपुकारे जाते, ओर मनम हरि समक्चकर पहचान जति है) ठाकुरजीको पहूचानकर, अत्यन्त हपित हौ .उसने विनती कौ-हे नाथ ! आज आपकोयहाँ पहुचानकर मेरे सब पापों का. नाशः हु । १०५ गन्धर्वं होने पर
१०८

भानुभक्त-रामायण

ब्रहादेखि अवश्य पाद्‌ वरदान्‌राम्रो षू भनि गवेभोरऋषिताहास्यं कोहि र अष्टवक्र ऋषिलेपेले श्राप गरी दिया पछठित फेर्‌राक्षस्‌ भैकन पिरद्यां म॒ रिसलेबरह्माको वरदान्‌. थियो र म जि्यांणीरे नै पनि यो जियो अव कसोआयो इन्द्रजिका र खानकन मूखचार्चार्‌ कोश तलक्‌ समाउन भनीसो हात्‌ आज गिराइवक्सनुभयोजस्तो सूक्ति ति अष्टवक्र ऋषिवेतस्तो ठक्कर भयो इ हात्‌ भिरिगयाक्यावात्‌ धन्य रषु आजम प्रभू |रातोदिन्‌ रटना थियो चरणको

गन्धव

तापनि।

साहं

नराम्रा

भनी
राधस्‌ भयास्‌ लौ भनी ।मृक्ती बताया पनि ॥ १०६शिर्‌ इन्द्रजीले हव्या ।इन्द्रादि सव्‌ छक्‌ पव्या ॥गर्वा भनी घुप्‌ दया|छाती विपे दी गया।। १०७]
लामा तं हाते दिया।याहीं तलक्‌ ई धिया।।पलेवतायायहुँ।मूक्तीपायां यहाँ ।।१०८॥आस्रा गर््यारथ्यां जति।भगो शरण्‌को गति॥यो देह मेरो धरी!
खाडल्‌ खृप्‌ गहिरो खनेर उसमापोली भस्म गरादइवक्सनु हवस्‌ जान्छू म संसार तरी।।१०९॥^^
~ ~~~ ~~
~
भी ब्रह्माजी से वरदान पाकर, अपनी सुन्दरता पर्‌ गवं करने पर, ऋषियोंको कुरूप कहकर उनको हंसी उड़ाने पर, अष्टावक्र ऋषपिने मुद्ध राक्षसहोनेकाशापदिया,साथ ही इस शापसेमुक्तिपानेका भी मागं बताया] १०६म राक्षस वनकर धूमनेलगाथा। क्रोधित होकर इन्र नैमेरे सिरकाहरण कर लिया। ब्रह्मयाके वरदानसे मै जीवित रहा ओर इन्द्रादि सभीआश्चयं-चकित हुए । सिर कट जाने पर भी यह जीवित रहा, अव व्याकरेगा, यह्‌ सोचकर इन्द्रजी को अत्यन्त दया उत्पन्न हुई ओर भोजन करनेके लिए उन्होने मेरे वक्षस्थलमे मुंह वना दिया! १०७
भुजाएं शिकार को पक्डनेके लिएदीं।
णशापका प्रभाव भी यहीतकके लिएथा।

चार कोस लम्बी

वेदाथ भी अव गिरा दिये गये।

जिस प्रकार अष्टावक्र क्रपि

ने पटले ही वता दिया था, ठीक वेसा ही हुआ । हाथों के गिरने पर उन्होनेमुक्ति पानेकोवतायाथा 1 १०८ क्यावातदहै! मँ धन्यहकि जो कुष्ठआणा करताथा
ओौर रात-दिन इन्हीं चरणोंकी रट लगायेथा ओर प्रभ
की शरण में मृजे गतिप्राप्त हो गयी।

मेरे शरीर को भस्म करके एक

गहरा गड्ढा खोदकर भूमिको अपितकरने की कृपा करे, जिससे मेँसंसारसे मुक्ति पाजाॐऊ। १०९ सीता कोप्राप्त करनेकाभी उचित

नेपाली-हिन्दी

विनतीसीता पाउनको उपायसन्या या विनती सुन्या रहरिलेसुन्दर शुद्ध स्वरूप्‌ ` धन्यो प्रभुजिले
१०९
ग्न्य सांचो गरी।पोलीदिया खाक्‌ गरी॥खश्‌ भं दिया वर्‌ पनि।
भक्तीले बहते गव्यो स्तुति र त्यो पौँच्योपरम्‌ धाम्‌ पनि॥।११०॥हे नाथ्‌! सीताजि मिर्निन्‌ अब तिमि शबरी छन्‌ जहां ताहि जाऊ ।साहं भक्ती छ तिस्रा चरणकमलको ताप तिन्‌का ्टुटाऊ॥येती बिन्ति जगन्नाथ सित गरि जब धाम्‌ त्यो गयौ राम फेरि)आश्चमूमा पौँचि दशेन्‌ शबरिकन दिया खुपूरृपा राचिहैरी ।१११॥आसन्‌देखि -उठेर जल्दि शबरी रामूका चरणूमा परन्‌ ।सक्भरको बहते पुजा गरि तहां हात्‌ जोरि बिन्ती गरिन्‌ ॥हेनाथ्‌! हीत्‌ कूलकी स्त्री जातिम गरीब्‌ जान्दीनं तिस्रो स्तुति।आधार मात्र फगत्‌ छ ये चरणमा यस्तेछमेरो गति ॥११२॥विस्तार्‌ सब्‌ गुरुदेखि सूनि गुरुको आज्ञा मनैमा लिई।केले दे्छु हजूरलाइ भनि खुप तन्‌ मन्‌ हजुर्मा दिई॥पुजा नित्य हजुरको गरि यहाँ ख्वामित्‌! बस्याकोथिर्यां |हे नाथ्‌ आज दया भयो हजुरको प्रत्यक्ष देखीचियां ॥११३॥ण्यै
-उपाय म आपको वताऊंगा । कवंध की एसी विनती सुनकर हरि ने उसकेशरीरको भस्मकर दिया। तदुपरान्त एक सुन्दर शरीर प्रकट हुआ
ओर प्रभृजी ने भी हषित होकेर उसे आशीर्वाद दिया।

भक्तिपूवेकं स्तुति

कर वहु परमधाम को पहुंच गया । ११० केबंध प्रभृजी से कहताहै,हे नाथ! जहां शवरी रहती है, आप वहीं चले जाये, अब आपको सीताजीमिल जायेंगी । उसकी आपके चरणों मे अगाध भक्तिहै; आप जाकरउसके तापो का अन्त करं । जगन्नाथ से इतनी विनती कर जव वह्‌ परम-
धाम पहुंच गया, तब राम ने भी आश्चम में पहुंच कर शव्ररी को कृपापूवेक

दशंन दिये! १११

शबरी राम को देखकर तुरन्त आसन से उठ बैदी,
ओर रामके चरणोंपरर गिर पड़ी अपनी शक्तिके अनुसार पूजाकरहाथ जोड़कर विनती की-हे नाथ! मै एक नीच कुल कीदीन स्त्रीह,आपकी स्तुति किस प्रकार करूं, यह्‌ ज्ञान नहीं है, हमें केवल आपके चरणोंकाही सहाराहै, चाहे मेरी जैसी गतिहो। ११२ गुरुकी बतायी हुईविधि को सुनकर ओर उनकी आज्ञा मनमे धारणकर कभी आपको देखतीह, तन-मन लगाकर नित्य आपकी पूजा करके मैया रह्‌रहीहं। हेनाथ} आज आपकी इतनी कृपा हुई कि मै साक्षात्‌ आपके दशेन पा रही
~~
११०

भानुभक्त-रामोयण

व्याले आज वहत्‌ प्रसन्न हुनुभो कून्‌ ` कम॑ मैले. ग्यां ।योगीको ` मनले. नभेटि सकिन्या मैले त . दन्‌ ग्यां ॥यस्तो बिन्ति सुनी दया वबहूतभो दहेतु प्रभूले कट्याउच्‌ नीच्‌ स्त्री रपुरुष्‌ विचार्दिनंमता चुण्‌ हृन््ु भक्तोभया।। ११८॥नौ साधन्‌ कि तभक्तिछन्‌ति नवमा पैलो त॒ सत्सम हो।पैलो साधन्‌ पो भयो पनिभन्या वाकी रह्याका तिजो॥
आट्‌ साधनहरू हुन्‌ ति ता कमसिते ` मिट्छन्‌ असल्‌ सद्धते |सत्‌को संग भया सवे वनिगया वक्याहन्छ कन्‌ सद्धले। ११५॥
सतको स भै रह्याकी दिनदिन न उपर्‌ भक्ति ट्लो भयाकी ।सज्जन्‌को सद्ध पार्दूकन सग गुणमा पार पौची गयाकी |देख्यां सैले र द्णेन्‌ दिन भनिः खुशिले आज अफे म आई।दीयाँ दशन्‌ र पायौ तिमिथधम भया पाञथ्यौ क्या मलाई।११६॥मूक्ती भो आज तिस्रो अव फजिति छुटया खुशि भै आज जाऊमेरी सीता कर्टाँछन्‌ कषु खवर भया त्यो पनी सव्‌ वताञ।)हकम्‌ जस्स सुनिथिन्‌ तव तहि विनती गदछिन्‌ क्या वताडं।सवेव्यापी हुजूर्‌ले बुल्ञि त नसकिन्या एक्‌ रती छेन ठाउ ॥ ११७॥हं । ११३
पता नही, केसे आज आप इतने प्रसन्नौ गये।

आज मैने

कौन-सा एसा सुकर्म किया । भाज मैने आपका दशन पा लिया, जिसेवड़-वड़े योगी नही पा सक्ते दहै। शवरी की देसी विनती "सुनकर, प्रभूकाहूद्य दयासे भर उठा। उन्होने कहा-पै ऊंच-नीच तथा स्त्री-पुरुप का
विचार नहीं रखता, मै तो प्राणिमा की भक्तिसे प्रसत होताह्ं। १९१४
भक्तिके नौ साधन है, जिनमें प्रथम तो सत्संग) प्रथम साधन हौ जानेपरजोभी देप आठ है, अच्छी संगतसे भी कठिनतासेप्राप्तहोतेरैँ। सत्‌कै संग होने पर सव वनताहै, जो कुसंग से नहीं वनता) ११५ सत्संग मेंरहकर प्रतिदिन मेरी भक्ति में.तल्लीन, सज्जनो के सम्पकसे सभी गुणोंसे परिपूणे देखकर, प्रसन्न होकर मँ आज स्वयं द्ण॑न देनेके लिए आयाहं । तुम्द दशेन मिल गया, अन्यथा तुम अधम होती तोक्या मृन्ञेपासकती थीं । ११६ आज तुम्हारी मुक्ति हुई। आज तुष्हारे संकट दुरहो गये! मेरी सीता कर्हा दहै, यदि तुम्हैं कोई सूचनाहोतो वह भीमुञ्चे वताओ 1 राम की यह्‌ आज्ञा सुनते ही, शवरी विनती करने लगी,मे क्या वताॐ, अप तो स्वयं सव॑न्यापी है, आपसे छिपा हुजा कोईस्थान नहीं । ११७ यहम सत्यही कह रही हूं परन्तु आज मनुष्य-ह्प

नेपाली -हिन्दी

१११
सँचो बिन्ती. गव्यां योतर पनि नरको आजयो रूपधारी ।आज्ञाभोता म विन्ती पनि हजुरविषे मदं काल्‌ विचारी ।॥सीता ल्काविषे छन्‌ अब त हजुरले भेट सुग्रीवलाई।बवस्थाजावस्‌ ति गनैन्‌ जतिजति अरु काम्‌ वित्कूलै पार लाई।।११८॥पम्पा भन्त्या तलाऊ पनि नजिक हन्या ऋष्यमूक्‌ पवेतेका ।टाकूरेमा ति बस्छन्‌ अति फजिति सही दिन्‌ बितारई सधेका ॥वालीको उर्‌ हुनाले तहि बहुत बस्या बालि जाँ देन ताहांँ।बालीलाई नजान्‌ भन्िकन छ सराप्‌ स्‌ गर्व्यां बिन्ति याहा।।११९॥सुग्रीव्‌ सीत मित्यारि गनं सब काम्‌ हृन्याछठ सीतापनि।मिल्‌निन्‌ आज म देह खाग्‌ गरि यहीं पोलृच्‌ नजीक्‌ भै भनी ॥।.- विन्ती पारि चिताविषे पसिशरीर्‌ त्योजोछसब्‌ खाग्‌ गरिन्‌ठाकुर्‌को अति भक्तिले ति शबरी संसार सागर्‌ तरिन्‌। १२०क्या दुर्लंम्‌ रघुनाथ्‌ खुशी हुन गया जात्‌की अधम्‌ भै पनि।श्रीरामूका अगि देह छाडिकन पार्‌ पौँचिन्‌ सहजम तिनी॥बराह्यप्र्‌ भेकन भक्ति गर्दंछ भन्या उस्कातक्लन्‌ क्या कूरा।जो कोही पनि भक्ति भो भनि.भन्या
योगीतिहृन्छन्‌ पुरा।।१२१॥
धारण कर यह्‌ आज्ञाकीरहै, तो रै.अवसर को विचार करके आपसे विनती
करती हं-सीताजी लंका मे हैँ। जव आप सुग्रीवसेभेट करेगे तोजो काम होगे, सव अवश्यमेव पूणे होगे । ११८ वह सुग्रीव पपा नामकतालाव के निकट ऋष्यमूक पवंत के शिखर पर अत्यन्त संकटयम तथा दूखी
जीवन व्यतीत कर रहादहै। बालिके भयस वह्‌ वही रहताहै। बालिको शापदहै, इसलिए वह वहाँ नहीं पहुंच सकता । ११९ सूग्रीव सेमित्रता होने पर पर जब सब कायं पूणं होंगे, तव सीता भी मिल जायेगी ।आजम आपके निकट इस देह को भस्मकरतीहूं। एसी विनती करकेणवरी ने चितामें प्रवेश किया ओर अपने शरीरको अग्निक

अपित

कर दिया । इसप्रकार की भक्तिसे शबरी ने संसार-सागरं पार कर

लिया । १२०

नीच जाति'की होकरभ्री शबरी का, साहस देखकर,
रघुनाथ अत्यन्त प्रसन्न हुए । जवपेसे लोग श्रीराम के.ही समक्ष देह त्यागकर परम-धाम को प्राप्त कर सकते है, तो फिर ब्रह्मण होकर भक्ति करने
परतो उसका कहना ही क्या ! जो कोई भी हो, उनका भक्त हने परमनृष्य पूणं योग्य होताहै। १२१ . है मनुष्यो ! रधुनाथ के चरणोंकी
भक्ति मोक्ष दिलानेवाली है, यह्‌ जानकर कामधेनुं के समान राम का मन

भनुभक्त-रामायण

११२
हे लोक्‌ हो! रघुनाथका चरणकोयो जानीकन कामधेनु सरिका
क्या गछ अरु मंत्र-तत्रहरलेतनूमनलादइ्‌ अवश्य जान मनने
भक्ती छ मृक्ती दिन्या।राम्‌ नाम्‌ मर्नमा लिन्या॥
सव्‌ राममा।छोडेरसार्‌ मिल्छयंकाममा।\ १२)

अरण्यकाण्ड प्रपाप्त

मे ध्यान करनेसे अन्य मंत्र तथायंत्रों का प्रयोग करके क्या करेगा?मन से निश्चित ही जानो कि तन-मन से एकान्त र्मे ध्यान धर्कर चिन्तनं
करनेसेदहीसारप्राप्तहौोतादै। १२२
किष्किन्धा कारद्वजस्सैमूक्त भद्‌ गदन्‌ ति शवरीजान्छ्‌ आज म ऋष्यमूक गिरिमाजान्थ्याकोश्‌ भरिको तलाउ मिलिगो
स्‌ वात्‌ सुनी राम्‌ पनि)सूम्रीव भेटृष््‌ भनी ॥पम्पा भन्याको पनि।

चीन्ह्या

गवरिते

ये हो भन्याको भनी ॥१॥
माछा कच्छप चल्‌दषछठन्‌ कमलकोकेसर्ले जव छोपियो पनि भन्यानीला लाल सफेद्‌ कमल्‌ पनि उनेक्‌वोत्छन्‌ हंसि चकोर सारसदहृरू
सव्‌ गि केसर्‌ तहा ।देखिन्छ जल्‌ पो करटा ॥रङ्का भयाकातहां ।लाटाकुस्यारा जहा ॥२॥
+~

श्रीरघुनाथले

~ ^-^ ~~” ~ ~~~
^~
~^
~ =
~.
“>
+~
जंसेही शवरी चुप हुई, रामनते सारी वातं सुनने के पश्चात्‌
ऋष्यमूक पवेत पर सुग्रीव सेभेट करनेके लिएतकत्काल दही जाने की
इच्छा प्रक्टकी । लगभग एक कोस दूर जाने के वाद परस्पा नामक एकंताल उन्हं मिला, जिसे शवरी के केथनानुसार श्रीरघुनाथ ने पहुचाना ! १उसताल

मे मछली ओौर कष्ेए रहतेथे ओर कमलके

केसर भिरकर

जल को पूर्णरूपसे दके. हुए थे, जिसने जल कहीं धी दिखायी नहीं देताथा। उसतालके कमल लालः, नीले तथा सफेद अनेक रंगोंमे खिलेहए थे, जहाँ दंस, चकोर तथा सारसं समह वोलत्ते रहते थे।र

नेपाली-हिन्दी

११३
नस्तो निमेल : हृन्छ सन्तहरुको मन्‌ सोहिमाफीक जल्‌ ।नि्मल्‌ , देखि बहूत्‌. प्रसन्न हुनुभो लाग्यो र साहं असल्‌ ॥थोडाजल्‌, पनि पान्‌ गरी ' सकल वन्‌ हेय ,'जगच्नाथ्‌ तहं ।देष्या ,: सुभ्रिवले उरायरं नजर्‌ ` लाया प्रभू छन्‌ जंहाँ ।॥३।बालीको छल हो भन्या बुञ्चि ` तहां -हातूले इशारा दिया।ओरं कोहिः रहै सज्जन भन्या हैरेर हंसीलिया॥बराह्मण्‌को लडका बनेर हनुमान्‌ जाऊ तिको हुन्‌ कहाँ ।जान्छन्‌ क्या मनमा छ सब्‌ वरिपरी हैरेर इल्छन्‌ तहँ ।।४]।सूग्रीवले हनुमानलाईइ जब यो हकम्‌ दिया जौ भती ।ब्राह्मणको, लडका बनेर हनुमान्‌ रामूका हजुरमा पनि॥पौँचीः पाट्सित विन्त पारि सबकाम्‌ सोध्याप्रभूको जसै।विस्तार्‌ नाम र कामको प्रभुजिलि खश्‌ भं बत्ताया तसे ।।५।सुग्रीवको ..हनुमानले पनि तरह `विस्तार बिन्ती' गभ्या.।` बकं , श्रीरघुनाथलाइ्‌ भनि , फर्‌ आपन्‌ स्वरूप्‌ चट्‌ धन्या ॥राम्‌ लक्ष्मणकन वोकि जल्दि हनुमान्‌ सुग्रीवकापासमा ।पौचाङ रघुनाथलाईइ भनि खृप्‌ कू्याति .आकाणमा ।॥६॥जल्दी पर्वतका उपर्‌ पृभिगया छायाविषे राम्‌ र्या ।सुग्रीवलाइ्‌ खबर्‌ दिनाकन तहां जल्दी हनूमान्‌ गया॥जैसे सन्तों के हृदय जल के समान निमंल होते हैः उसी प्रकार उसतालमे निमेल जल को देख अत्यन्त प्रसन्न हुए ओौर . आकर्षित हए । कुछ
जलपान करके श्रीजगन्नाथने सारेवनको देखा। प्रभु जहां थे, वहुसुग्रीव, ने भयभीत होकरदेखा । ३ बालि काषछल.तो नहींरहै, यह्‌
जानने के `लिए-हाथसे इशारा करना ओर सज्जन होतो देखकर हंसदेना, , यह्‌ कहकर सुग्रीव ने. ब्राह्मण-पूत्रके रूप मे हनुमान को उनके विषयमे , यह्‌ पता लगाने के लिए किं उनके मनमेक्यादहै, ओौर दस प्रकारचारों ओर देखकर क्यों घूम रहै हैँ ? यह जानकारी
करने को कहा | ४.
सुग्रीवने जव हनुमान कोयह्‌ आज्ञादीतो हनूमान भीब्राह्मणके पुत्रके रूपमेंश्रीराम के समक्त पहुत्रे ओर नियमित रूपः से प्रभुजी से समस्तकार्यो के व्रिषय,.मेज्ञान देनेकीो विनती की। प्रभुजी नेभी प्रसन्नहोकर नाम तथा कायं के विषय मेंपुणं-रूपसे वताया।५ हनूमान नेभी सुग्रीव के विषय मे विस्तारपूवंक विनतीको। श्रीरघुनाथजी को ढोनेके चिए अपने वास्तविक रूप को, धारण किया।

रामलक्ष्मण दोनों को

११४

विस्तार्‌ पायर

भानुभक्त-रामोयण

आद्र

सूभ्रिवजिले

हागा कोमल भांचि आसन

दिया

आसन्‌ सुग्रिवलाईइ लक्ष्मणजिलेलक्ष्मण्‌जीकन बस्न आसन दियासन्‌ वृत्तान्त बतादइ लक्ष्मणजिलेसीता जुन्‌ गहना खसालि गद्थिन्‌हा राम्‌! लक्ष्मण! येति माच मखलेजान्थिन्‌ सव गहना पुकालिकनताभिर्या पाट्‌ सित पो खसालि ति गन्‌
दशन्‌ प्रभूको गव्या +आनन्दसागर्‌ प्या ॥७॥प्रीया,` हनूमानलेताहीं टलामानले ॥।

कस्का हुन्‌ यहि चीन्हि वव्सनुहवस्‌

विस्तार्‌ सुनाया. जसे।हाजिर्‌ गराया तसं ॥८॥बोलेरआकाशमा ।हाम्रा यसं वासमा॥चिन्न याही धर्यं ।यदहो हजूरमा दिया ))९॥

येती चिन्ति गरी दिया ति गहूना

देश्या

मप्रभूले ` पनि।
चीन्ह्या सब्‌ गहुनारशोक्‌ बहुत भो हा! मेरि सीता भनी॥रोया . छातिविषे धन्या र गहना नानाविलापले. जसँ ।लक्ष्मण्‌ सूग्रिवले तहां प्रभुजिको ` दिल्‌ खुश्‌ गराया तसें।। १०॥हे राम्‌ ! रावणलाद्‌ मारि सहजं सीताजिलाईयहाँ ।हानिर्‌ हामि गराउला हनजुरमा त्यौ दृष्ट जाला कर्हा।ढोकर सुग्रीव के पास पहुंचने के लिए आकाश की ओर अत्यन्त तीत्र गतिसेकूदे । शीघ्रता से पवंत के शिखर पर पहुंच कररामकोषछायामें रखकरहनुमान तुरन्त सुग्रीव को सूचना देने के लिए गये) विस्तारपुवेक समाचारपाते ही सुग्रीव तुरन्तहीराम के दशंनोंके लिए आये ओर वृक्ष कींशाखा को तोड़कर आसन देते हुए आनन्द

के सागरे इव गये 1 ६-७

सूग्रीव को लक्ष्मणजी ने आसन दिया ओौर लक्ष्मणजीको बैठने के लिषएंहनुमानजी ते आसन दिया 1 लक्ष्मणजीने जसेही विस्तारपूर्वक साराहाल वताया, वैसे ही सीताजी द्वारा गिरये गये आभरूपणोंको सूग्रीवनेप्रस्त॒त किया 1 ठ आकाश-मागं सेजाते समय केवल हे राम! ह लक्ष्मणमुह से चीत्कार करती हुई, सीताजी ने अपने आगभ्रूषणों को उतार-उतारकर हमारे इसी निवास-स्थान पर गिरादियाथा,ये वही चिन्ह, यह
कृपया पहचानने का कष्ट करे) ९ इतना कहकर उन्होने गहने दे दिये 1प्रभृजी ने भी उन गहनो को भली प्रकार पह्चवान लिया भौर अव्यन्तशोकाकुल होकर वोले ! हाय सीते, ओर गहनो को वक्ष से लगाकर अनेकः
प्रकार से विलाप करते हए रोने लगे । यह्‌ देखकर लक्ष्मण ओौर सुग्रीव
ने प्रभुजी को ढादृस वँधाकर उनके हृदय को शान्त किया ! १०

हे राम)

^

` नेपाली-हिन्दी

११५
येती बिन्ति तहां ति सूभ्रिवजिले राम्‌का हजुरमा गव्या ।बोत्या. श्री हनुमानले पनि तहां अग्नी त साक्षीधन्या।।११॥अग्नी सक्षि धरेर सुग्रिवजिले ` राम॒थ्यं मित्यारी गरी।बाहाँ जोरि सखा. भई नजिकमा सुग्रीव्‌ बस्या तेस्‌ घरी ॥सुग्रीवूले तदहि बिन्ति बात्‌ पनि गन्या हे नाथ्‌{ फजीती सही ।`बालीका उरले बहुत्‌ दिन बित्या येसे जगामा रही ।१२॥याहं बालि त अङंदेन छ संराप्‌ मातद्कजीको रे पो.।;नचांङंदथ्यो ॥पार्यं बस्त. नहीं भन्या समक्न ता कस्लेबालीको ` बल वबिन्ति गरु अहिले जस्देखि सन्‌ इउदंछन्‌ ।क्रस्तै वीर हउन्‌ लडचा पनि भन्या लडन्या सवे मद॑छन्‌ । १३।।ट्लो वीर्‌ मयपूत्र दानव 'थियो मायावि नां थियो।बालीसीत लडाई गने भनि स्यो आयो र हांक्‌ खुप्‌ दियो।।बालीले. पनि दौड. गैकन तहां हान्यो मूटीले जसै।वाधा . पाइ उरादइ्‌ भागिडउ गयो लाग्यो पछठाडी तसै।। १४॥बालीका पछि लागि मै. पनि गयां रक्षस्‌ गुफामा गयो।टोकामा त॒ मलाइ राखि रिसले फेर भित्र जादो भयो॥हम रावण को सहज ही मारकर सीताजी को आपके समक्ष प्रस्तुत करेगे,वह्‌ दुष्ट कहाँ -जायेगा । इतनी विनती करके सूग्रीव रामके चरणों परंगिर पड़े . ओौर श्रीहनुमान ने भी उसी समय अग्तिको साक्षीःरा'। ११अभ्निको साक्षी रख के सूग्रीवने राम के साथ मित्रता की श्पथनली।अपने हाथों को जोड़कर मित्र के निकट जाकर सुग्रीव बैठ गया । सुग्रीव
ने पुनः प्रभु से विनती.की, हे नाथ! बालि के भय से अनेक कष्टों को सहन
कर इसी स्थान पर रहःरहा हं । १२ मातंगजी के शाप के कारण बालि यहंनहीं आ सकता । यदि मृक्ञे यहाँ रहने को न मिलता तो कौन बचा सकताथा; क्योकि. बालि की शक्तिको देखकर सभी धयभीत होतेदहै। ओरकंसाभी वीरक्योंन हो, यदि बालिसे लड़ाई ठानली तो यह्‌ निर्चितहैकि लड़ने .वाला मर जायेगा 1 १३ मय-पृत्र मायावी नामकः एक वीररासक्न बालिसे युद्ध करने हेतु आया ओर बालि को ललकारा। बालिनेभी दौडकर उसे घूंसा मारा । अपने सम्मुख वाधा आयी देख, बह भयभीतहोकर भाग निकला ओर वालि उसके पीषेदौडा। १४ मैँभी वालिकेपीले-पीचे गया ओर वह राक्षस गरफा के अन्दर चला गया। द्वार पर रमुञ्नरखकर क्रोधित होकर बालि अन्दर चला गया। एक मास व्यतीत हौने

भावुभक्त-रामायण

११६
पैह्ला दिन्‌ विति गँगयोत पनित्यो, फकन बाली . जसं ।सां दिक्‌ म धिर्याँ कसो गरभनी आयो रगत्‌ पो तसं ।॥१५।।लौ वाली त मरेछ हेरि रगतं आयो गफादेखि तो ।मलाई पनि फक्त माछ रिसले गफा धनीमता॥यस्तो वुद्धि भयो र पत्थर दलो त्यायां र गूफा युर्न्या।फर्की आडउन मनु गन्या पनि सहन्‌ निस्की नसकन्‌ हन्या १६॥यस्ता पाट्‌ सित खृप्‌ थुन्यां रम फिन्यां वाली मव्या लौ भनीविस्तार्‌ सब्‌ ति सुनाउंदा मक्नता राजा वनायापतिराजा भैकन राज्य भोग्‌ पनि गस्यां ` व्ये दिन्‌ पछि बालि ता ।रक्षस्‌ मारि फिरेर दाखिल भयो रीसाई मैमाथि ता १७]उस्‌ दिन्‌देखि उराइ याहि म रह्यां मेरी
वल्‌जपती सित भोग गकं गरं क्यायाहा आउन सक्‌ भये यहि पनीपापको क्याडर मान्छत्यो र बललेसावं दुःखि भयेरसूग्रिवजिले

सु्रीवूको अब

दुःख हर्दे भनी~
^~ ~~

त ` पत्नीः

पतनि।
पुग्देन जोर्‌ तंपनि॥आएर . मास्या धियो ।जस्ले बुहारी लियो ॥१८॥विन्ती गव्याको सुनी ।अन्तस्करणूलेगुनी ॥
--~~~-~~--~--~*~~~
मै किकतंव्य-विमूढ-सा होकरपर भी वालि लौटकर नही आयाअत्यन्त चित्तित्तथा कि देखा, द्वारसे रक्त की नदी बाहुरकी ` ओर बहुर्हीदहै। १५ .यैने सोचा, कदाचित वालिका बध कर दिया गया है, इसीलिए गफासे रक्त बह निकल -रहा है । कहीं वह क्रोधित होकर मुञ्चे भीनमार दे, इसलिए गरफा को वन्द करके मैने चले जाने की सोची। यहं सोचकरएक वड़ा-सा पत्थर लगाकर गुफा को बन्दकर दिया, जिससे-वह्‌ लौटकरआने पर भी निकल न सके 1 १६ इसप्रकार गुफाको वन्द करके बालि
को मरा समञ्षकर मै लौट पड़ा गौर यह सब वृत्तान्त सुननेके बाद मुञ्चे याँका राजाबना

दिया गया}

राज-भोग कृरनेके एक ही दिनः पणचात

उस दिनसे भयभीत होकर

यहाँ पर रह रहा हूं, वालि मेरी पत्नी को

बालि रुक्षस को मारकर आ पहुंचा, ओर मुज्ञ पर अत्यन्त कोधित हुमा ।१७भी बलपूवेक छीननले गया!क्या करू, मुञ्मे कोई जोर नहीं । यदिचह्‌ यहम आ संकता तो यहीं आकर मृञ्चे मार डालता । जिसने बलपूवेकअपनी बहू तक को छीन लिया, उसेपापकाक्याडरहै? १८ सुप्रीव
की एसी दृख-भरी विनती सुनकर अपने अन्तःकरणमें सप्रीव के दख कोहरण करने का विचार करके प्रभुजी ने कहा, सुनो सखे { उस बालिका

नेपाली-हिन्दी

११७
खातिर्‌ श्रीप्रभूले गय्या सुन. सखे त्यो बालि मारी यहाँ)तिम्रो राज्य गराउंला अब उपर्‌ जोर्‌ च्छ तेस्को कर्हां।। १९।तेपनि।यस्तो सत्य वचन्‌ सून्या प्रभुजिको शंका - पव्योशक्छन्‌ क्या तब वालि मानंकन , ता. ्लो छ बाली भनी ॥बालीलाई बहत ' वीर्‌ बुक्षि तहां राम्‌का अगाडी सरी।बालीको अधिको पराक्रम कल्या वित्कूल विस्तार्‌गरी।।२०॥एक्‌ दिन्‌ दुन्दुभि नाम , रासस्‌ टृलो आयो रर्ाक्‌ घुष्‌ दियो ।बालीले सहजे निमोल्किन शिर्‌ दृट्टचादइ हात्मा लियो ॥सोही प्यांकिदिदा यहाँ गिरिगयो चार्‌ कोश्‌ जगामा जसे ।छीटा पने गयो , बहूुत्‌ ` रगतका ऋषी रिसाया तसै ॥२१।बालीलाईइ सराप्‌ दिया अब यहां : आद्स्‌ -भन्या ते पनिशिर जुदा. भद्‌ पृथ्विमा गिरिगयास्‌ जस्तै -गिन्यो यो; भनी।यो मालुम्‌ त मलाई सब्‌ अधि धियो सो जानि याहीं- र्यांउस्लाई पनि यो छ याद्‌ तब मतेस्‌. वीर्‌ देवि रवांचतो भर्यां॥।२२॥सोही शिर अज्लतक्‌ छ पवेत सरी यो पर्यांक्त . सवनू . भया ।बाली मानं समथं ताहि चिन्हंला मेरा- त सेखी गया ॥वध करके मँ तुमह राजा बनाऊगा, क्योकि अब्‌ यहां पर उसकी कोई शक्ति

काम नहीं भयेगी । १९

प्रभुजी के पेस्े सत्य वचनो को सुनकर भी सुग्रीव
के मन में शंका उत्पन्न हुई कि वालि तो भयंकर है, क्या प्रभृजी उसका बध
कर सकगे ? बालि को अत्यन्त वीर संमञ्चकर रामके सम्मुख खड़े होकर

वालि के पराक्रमो का सविस्तार वर्णन. किया

२०

एक दिन, दुदी

नामक भयंकर राक्षस ने आकर. जोरों से'ललकारा।. वालिने सहज ही
उसे हाथमे लेकर शरीरसे सिर अलग करते हृए मरोड़ दिया ` ओर फक
दियां।
उसको फेंकने पर चार कोस भूमि उसके शरीरः नेघेर ली
जिससे भूमि कम हो जाने पर ऋषि आदि क्रोधित हृ । २१

ऋषियों ने

क्रोधित होकर बालि को शाप दिया कि यदि तुम यहां आयोभे, तो तुम्हारेशरीरस तुम्हारा सिर अलगहो जायेगा, ओर उसी राक्षस की भति
-गिर जाओगे । यह स॒व बतं मृज्ञे पहले से ही ज्ञात थी, इसीलिए यहांआकर रहने लगा हूं, ओौर उपे भी यह स्मरण है कि वह्‌ यहाँ जीवित नहींरहेगा, इसीलिए तोरम उस वीरसे वचा हाहं । २३ वही सिर अभीतक पव॑त के समान यहां पड़ा हृञ-है, मौर यदि इसे फक सक्ते हो तोवालि का वध करने की. सामथ्यं को पटचानृंगा। मैतोहार्‌ खा चूका ।
११८

भानुभक्त-रामांयण

यी बात्‌ सृभ्रिवका सुनी स्ललक चुं यिनूलाइ्‌ भन््याः भयो.।पयां क्या शिर्‌ तहि पाउका अंगुलिलेदेख्या सूग्िवले तथापि मनमा
चालीस कोश्‌ तक्‌ गयो।।२३॥शंका त फेरी: रहय}.
सव्छन्‌ क्या तब वालि मानकनतासात्‌ ताल्‌ वृक्ष इछन्‌ इ एक शरले
ट्लो छ भन््या भयो॥खेडछन्‌ त माछन्‌ भनी ।
सुग्रीवूका मनमा भयो रइ कुरा सब्‌ थोक्‌.सुनाया पनि।।२४॥हे नाथ्‌ ! बिन्तिम गर्द अरू पनी यस्तो,वाली भनी).येही शिर्‌कन फां कि मात्र मनले मानने विश्वास्‌ पनि 1वालीले यहि ताल वृक्षकनः ता बरूटे. बराबर गनी।हत्लाएर खसालिदिन्छ जति छन्‌ सम्पूणं पत्ता ' पति । २५ई ताल्‌ वृक्ष पनी यहाँ हजुरले एक्‌ बाण देले धरी।सबूमा दद्र गराइबक्सनु हवस्‌' बुह्न्या छ मन्‌ खृप्‌'गरी 1येती विन्ति तहां ति सुग्निवजिलेः रामृथ्यं जसं ता. गव्या ।रामूजीने पनि लौ: भनेर खृशिले हात्‌माधनुष्‌वाण्‌धस्या ।२९॥वाण्‌ पयांक्या प्रभले र वेग्‌ सित गयो सात्‌ ताल भेदन्‌ गरी ।पवत्‌ भूमि समेत्‌ विदारि पर गो सामनेत सब्‌ साफ्‌ गरी ||यह्‌ सुन प्रभु ने उसे अपने पराक्रम का परिचय देने कौ सोची. ओर अपनेपाव की उंगली से उस्रके पिर को धकेल दिया, जो चालिंस कौस दुर जा~~ ~~~ -~~~~ ~ -~~-~-~~~~.
पहुंचा । २३ सुग्रीवने यहसव कुष देखा तथापि उसके मन मे पूनः 1 उत्पन्नहृरद; क्योकि वालि महावली है, उसे मारना फिर भी सम्भव.नहा। सततालवृक्ष जो यहाँ है इन्दं एक सरसे गिरादेताहै। रपेसेवीरको मारते,
कीवातने सुग्रीव के मन को चिन्तित किया ओौर उन्हने सव कुछ रामसे कह्‌ सुनाया! २४

हि नाथ! बालिके इसी प्रकारके ओर

से पराक्रमरँजो मँ आपको सुनाता!

भी वहत

यहसिर फंकदेने मात्रसे मेरे

मन मे विश्वास नहीं हुभा, क्योकि वालि इन ताल वृक्षों को छोटे पेड्‌
के समान समञ्ञकर हिलाते हँ ओर सम्पूणं पत्ते गिरा देते है। २५ अतःइन तालवक्षोको आपभी एक वाण हवाराछेदने कीङृपा करे तवम
अपने को सन्तुष्ट कर लुंगा। सूग्रीवनेजैसे ही रामसे यह्‌ विनती कीरासमने भी तुरन्त प्रसन्न होकर हाथमे धनुष-वाणनले लिया 1 २६ प्रभुहारा. छोडे गये वाण अव्यन्त तीव्र गति से सातो तालवृक्षों को छेदते हुएपवृत-भूमि सहित काटकर सामनेकौी सव भ्रूमि साफ करने के पश्चात्‌पुनः तरकणमं लौट आये। यह्‌ देखकर सुग्रीव कौ वडा आश्चयं हुआ ।

नेपाली-हिन्दी

टोक्रमा फिरि जाइ बाण्‌ जब पय्यो

साक्षात्‌ श्रीपति हन्‌ भनी चिन्ह तहांहे नाथ्‌! बल्ल चिन्ह्यां अहो सकलका.
११९
सुग्रीवजी छक्‌ . पन्या |राम्‌ को स्तुती खुप्गन्या ॥आत्माजगन्नाथ्‌ भनी ।लाग्देनः माया ~ पति ॥
मायादेखि फरक्‌ भयो. अव त मन्‌व्या गर्ठं अव पत्र दार धनले सम्पूणं ` ई ` दर्‌ हउन्‌ 1मेरा सब्‌ दश इन्द्रियं हजुरका सेवा टहल्मा रहुन्‌ ।॥।२८।।सुनी ।'यै पाट्ले जब ता गन्या स्तुति तहां सुग्रीवको सोगुनी ॥यो ज्ञान्‌ आज नद्यं भनी प्रभुजिले अन्तस्करण्‌लेमायाले अनि मोह पारि रघनाथ हस्या र बोल्यां जस)सुग्रीव्‌ मोह भयाः वचन्‌ सुति तरह ऊ ज्ञान बिर्स्या तसे ।२९॥हे युग्रीव. सवे ! .मलाईइ दुनियां भदन मित्यारी गरी।कून्‌ चीज्‌ सुग्रिवलाइ्‌ दीकन गया आपत्ति तिन्‌का ह्री ॥ `यो लोक्को अपवाद्‌ ममेटृष्टु अब ता वाली छ एेले जहाँ।ताह गेकनः हक देउ तिमिले त्यो बालि माछ यहुँ।।३०॥एेले. राज्य `गरा भनि तहां रामको हकम्‌ भो जसे ।वचनूले तसं ॥सुग्रिव्‌खूशि 'भयेर वालिकन खुप हक्यकिष्किन्धा पुरिका नजीक वनमा आयेर हाक्‌ खृप्‌ गरी।.सु्रीव्‌जी जब ता चल्या वुक्ि खबर्‌ वाली ट्या तेस्‌घरी।।३१॥साक्षात्‌ श्रीपति राम को पहचान कर उनकी नियमपूर्वकं स्तुति की। २७हे नाथ ! सकल संसार की आत्मा श्रीजगन्नाथ | अव मैने आपकोपह्चाना 1 माया के कारण विचलितमेरा मनभी अव नहीं स्थिरदहै।माया-मोह्‌ लेकर अब मै क्याकरंगा। पृत्र एवं स्त्री-धनसे मृश्च दूरदहीरवेखे । मेरी दसों इद्धिर्यां भआपकी ही सेवा-टहल मे समपित ररह । २८
जव 'इस प्रकार की विनती रामने सुनी तो'इस विचारसे कि अभी आजयह ज्ञान नदेना ही उत्तम होगा, माया-मोहपूवेक हंसकर बोले भौरसुग्रीव उनके मोहपूणं वचनो को सुनकर अपना सारा ज्ञान भूल गया । २९
है सखे सुग्रीव ' संसार कदाचित्‌ यह्‌ कहे कि मत्तता करके आपत्तियोंकाहरण करसुग्रीवको कौन सी चीजसौप गएरैँ। इस लोक-अपवादकोम मिटताहूं। अवतो जहां बालिदहै वहां जाकर तुम ललकारोमं उसका वध-कर्गा1 ३० जंसे हीरामन यह्‌ कहा कि तुम्हं राज्यदिलवाञगा वसे ही सुग्रीव ने प्रसन्न होकर वालि के पास जाकर उसे जोरोंसे ललकारा।किष्किन्धापुरी के निकट वन मे आए सुग्रीव की ललकारको सुनकर ओर सुग्रीव को पह्चानकर वालिभी वहाँ आ गया! ३१

भनुभक्त-रामायण

१९०
वाली सुग्रिवको लडादं पनिभोसक्थ्या सुग्रिवले कहां सहजमा
सुग्रीव एक्‌ क्षण्‌ लडया।
वालीक विरले धरया॥बाण्‌ छोडीकन वालिलाइ्‌ अवतामानिन्‌ प्रभूले भनी ।एक्‌ क्षण्‌ ता यहि आशले टिकिगया घुस्सा दिदामा पनि ॥३२ ॥वाली सुभ्रिवको दुरुस्त अनुहार्‌' एक्र्‌ देखि राम्‌ले जसँ ।,भाग्या तसं ॥वाण्‌ थाम्या टिकिसक्नु मुरिकिल भई सुग्रीवपौच्या श्रीरचघृनाथका हजुरमा काम्दे र. छाहं रगत्‌।बल्‌ तोडीकन्‌ वालिले हरिलियो एक्‌ देह पौँच्यो फगत्‌ ॥३२३॥सुग्रीवले तहि बिन्ति खृप्सित गव्या हे नाथ्‌ ! मलाई यहाँ ।मानेको यदि मन्‌ छ पोपनि भन्या जोर्‌ चल्छ मेरो कर्हां॥आफले यहि मारिवक्सनु हवस्‌ ख्वासित्‌ ! हजूरले पनि ।शतूलाइ लगाई माने त उचित्‌ हो व्या सा हौ भनी।।३४॥प्रभूलेः धन्या।सुग्रीवूका इ वचन्‌ सनी , गहभरी असूसुग्रीवृजीकन अङ्धुमाल गरि खुप्‌ खातिर्‌ प्रभूले .गव्या॥।हे सुग्रीव सखे ! दुरुस्त -अनुहार्‌ एक्‌ देखि शंका भयो ]मनन्‌ मित्र भनेर पो उर हदा बवाँचेर वाली `गयो ॥३५।^+ ^~ ~
~~ ~~~
~ ~~~
~~~
*-^^~^~ ~~~
~~~
वालि तथा सृग्रीव.का युद्ध कछ क्षणों तक हुआ 1 वालिके सामने सूग्रीवव्याकर सकताथा।वीर वालिने वड़ी सरलतासे उसे पकड़ लिया।इस आशा पर कि-अभी प्रभु वालि को वाण-प्रहारकरः मार डालेगे, सुग्रीवकु क्षणो तक घृंसा मारने पर भी सहन कर टिका रहा।३२ वालिसौरसग्रीव दोनोंका ही एकहीरूप देख प्रभुने अपने वाण को रोक्रचिया। परन्तु सुग्रीव के लिए अव अधिक टिकना अत्यन्त कठिनिहोगया, अतः वह॒ वहां से भाग. निकला शौर कपिति हृएुःवमन करता हुजा
श्रीरघुनाथ जी के पास पहुंचा 1 वालिनेसुग्रीव की शक्ति का हुरणकरलिया आर केवल उसका शक्तिहीन शरीर ही- वर्ह तक पहुंचा । ३३सूग्रीव ने अत्यन्त व्यश्र होकर प्रभ से विनती की, है नाथ | यदि मूले मारडालना. चाहते है तो आप स्वय मार डालें। मेरा अपने पर कोई वण
नहीं । स्वामी!क्या अपने मित्र-को इस तरह शत के हाथ सेःमरवाडालना उचित होगा । अच्छा हो यदि उस शतु केहाथ;सेन मारा जाकरमै आपके हाथों मारा जां ।-३४ ` सुग्रीव के इन वचनों को सुनकर प्रभू
द्रवीभूत होकर वड़े दुःख से अमू वहानि लगे अत्यधिक स्नेह से भरकरउन्होने सुग्रीव को अपने आलिगन मे भर्‌ लिया ओौर बड़े आदर से कहा,हे सखे सु्रीव ! तुम दोनो का एक-सा रूप देखकर मँ शंका से भर गया,

नेपाली-हिन्दी

चिह्लो देह विषे .धरेर. अहिलेवालीलाईद्‌- म मारिदिन्छे

सहजं

यस्ता वात्‌ गरिखुप्‌ शपथपनि गव्याआज्ञा लक्ष्मणलाद वक्सनुभयो
१२१
जाऊ र रहांक्‌ देउ फेर्‌।लाग्वेन एेले त बेर्‌ ॥सूप्रीवकोमन्‌ भरी)एूल्‌ ल्याउ मालाधरी ॥३६॥
सो माला -पहिराद्‌ भाइ तिमिले जल्दी . पठा.हकः दीउन्‌ अब वालिलाईइ अहिले ` मष्ट म॒ छोड
तहाँ।
कहां ॥
लगाईदिया ।लक्ष्मणले पनि- यो हृकूम्‌ सूति तहां मालाःत्यो माला -पहिरेर सूग्रिव गया -वाली जहाँ वीर्‌ धिया।।३७॥। `वालीलाईइ सुनाइ्‌ हांक्‌ बहुत दी सुग्रीव्‌ बस्याथ्या जसं ।व्रालीले पनि शब्द सुग्रिवजिको सून्या र ऊठ्या तसै ॥आश्चर्ये मनमा भयो अधि भन्या ऊठ्यो पष्ठी रिस्‌ अनि।
` मुक्का ख्वाइ्‌ लगारियो.. तपनि फेर्‌ . फर्व्यो भगूवा पनि ॥३८॥लीले पनि फर्‌ काइ कसि तयारताराले त॒ नजाउ यस्‌ बखतमा
भै जान लाग्याभन्दंसमात्तिन्‌
.जसै।तसे ॥
कोही' वीर्‌ बलवान्‌ सहायं मिलिंपो. सूग्रीव. आयाय्ह ।साहायै नभया त येहि घडिमा सुग्रीवं .फिर्थ्याकहं ।।३९॥ओर शत्‌ की जगह कहीं मिव्कादहीबधनहो जाय इसीडरसे मैने प्रहार
करना रोक दिया ओर बालि बच गया । ३५.

अपने शरीर पर कोई

चिह्ल धारण करके .जाओ ओरफिर से बालि कोः ललकारो।को सहज हीमे मार उलूंगा।

मँ बालि

'आंज इस कायं में कोद विलम्ब नहीं

होगा 1 'एसा कहकर सुम्रीव को. आश्वांसन दिया ओर उसके सामने इसकायं की शपथली। फिर लक्ष्मणसेबोले कि एक फूलोंकी माला बनालो । ३६ यह माला पहनाकर सुग्रीव को वरहा भेजो!`अब बालिकोजाकर वह्‌ ललकारे 1. मैं इस बार उसे नहीं छोडंगा, अभी मार डालंगा 1राम की यह्‌ आज्ञा सुनकर लक्ष्मण ने सुग्रीव 'को साला पहना दी ओौर
सुग्रीव.वह माला धारण कयि हुए बाचि के 'पास गया! ३७ वालि कोललकार कर जसे सुग्रीवबेठा हीथाकि बालिभी सुग्रीव के शब्दोंकोसुनकर उठ वेठा। पहलेःतो बालि आश्चयं में इन .गया, लेकिन फिरतुरन्त ही करोधित होकर बोला कि मुक्का खाकर ओौर इस प्रकार खदेडेजाने पर भी वह्‌ फिर कंसे लौटकर आया दहै 1३८ वालि भी कमर केसकरलड़ने केलिए तयार होने लगा।परताया ने उसे इस समयन नाभो
एेसा कहकर रोक लिया । निश्चयी किसी वीर का सहयोग पाकरहीसुग्रीव यहां जआयादहै। यदि कोईसहारान होतातो सुग्रीव इसी समय
१२९

भानुभक्त-रामायण

ताराक्रा :इ वचन्‌ -सुनेर,.बलवान्‌हे प्यारी । नडराउ कोषछमसरीसुग्रीवलाइ सहज्‌ ` सहाय ` सहितं
वीर्‌ `वालि बोल्छन्‌ तहां. ।वीर्‌ .आज दोस्रो यहांमारेर. :फिर्न्या मःछ।शङ्का नमान्या कषु ।1४५॥

आई सन्‌ इ कुरा. मलाइ्‌ “अधि नै

भन्थ्यो न जाऊ तहां।(५२।जाऊ. र, -ल्याऊ यर्हाँः।जित्‌, छन. तिम्रो 'तहां ॥
वीर हुं हाक -दिदाः कसो--गरि वसूवालीका इ वचन्‌ सुनीकन तहां ताराजिले :फेर्‌ पनि)भन्छिन्‌ नाथ्‌! क्छ सूनि बव्सनुहवस्‌ क्या ,भन्दल्ले ' योः 'भनी,विन्ती गष्टुम दहित्‌ कुसा, हजुरमा साधात्‌ ; अयोध्यापति\श्रीरामचन्द्रः संहाय `छन्‌ `अव तहां चल्दन जोर एक रती।1४शसुग्रीव्‌सीतः `मिव्यारि लाइ रघुनाथयूले - पिषठामा ` लिया ।वाली मारि म राज्य आज. दिडंला भन्त्या. वचन्‌' यो दियां'।भन्न्या बात्‌ अरुमा हदा बनमहांँ सूनर. _-अद्धद्‌ ` यहाँ।सुग्रीव्सीत विरोध्‌ नराख. .तिमिलेयो राज्‌ सूग्रीवूलांइ देडः. अव ताश्रीराम्‌का .दुद्‌ पाउमा. पर तिमीसाचा हुन्‌ इ कुरा बुन्षी लिनु हवस्‌कँसे लौटता 1.३९

गन॑न्‌

--प्रभूले ~ दया.।
भोग्‌ गनं इच्छा भया।।४३।।
तारा के.एेसे वचनो को सुनकर `वलवानं वीर वालि
बोला, हे प्यारी,-उरो मत ।; मेरे समानःवीर `आन. यहाँ- ओर कौन षैः?सूग्रीव को उसके सहयोगी-सहित आज .मार कर हीः यैआँगाय ` ैँ-वीर्‌
हं । `शतु के ललकारने परम क्रिस प्रकारः वैल. रहं-? --अतः तुमः शंकामत्‌ कसे,। ४५ ;~बालि के.इन वचनो कोः सुनकर; तारा,पुनः कहती हैहे नाथ-{ यह (दसी) क्या कहती है,.कुछःतो सुननेकी कृपा करेः।; तँ(आपके. ओौर ) अपने हित की वात; कहती हूं अयोध्यापति `साक्षात्‌ “श्रीरामचच््रजी -सुग्रीव-. के सहायक दहै, -अतः. अवतो कुठ भी वश नहींलेगा {-४१ सूग्रीव-के संग-मिवरता करके !रघुनाथःजी ते बालिःका.वधकर राज्य दिलाने क्रा बचन दिया हैः ओौरः. यहः; बातः वनः मे ओौरों के-मंहसे सुनकर अंगद ने. पहले ही -आकर मुञ्चे, सूचित. किया हैःओौर इसीलिएपहले. भी -मैने- आपको वहाँ जने-से-रोका था 1 र्‌ अप, प्सुग्रीव.के-साथणतृता-नः करे |

जाइए ओर उन्हे, यहाँ ले आइए-आपः'

उनसे ..जीत नहीं

सकते । --अवः यह्‌. राज्य सुग्रीव को सौप दीजिए:--जाकर -श्रीराम^जीके चरणोमे पड़, वे प्रभृ निष्वय -ही- दया करेगेः।;, यद्वि जीवन ःकी
दरच्छादटौ तो इन वातो को सत्य समङ्षने की-कृपा कर ।<४२`

यहः विनंती

नेपालौ-हिन्दी '

१२३
यती. बिन्ति : गरेर पाडः दुदमा ` पक्रेरतारालाद
बुञ्ञाउनाकेन.

तहां

“.रोइन्‌' ,जंसं।
फर्‌ बालि बोल्था तसे ॥
हे प्यारी † नडराउ क्ति. रघनाथ्‌ . साक्षात्‌

रमाका

पति।

तासंयण्‌ भनि चन्द म पनि-सो

नाथ्‌ हुन्‌ जगत्कागति।1 ४४

ताह. छन्‌ र्धुनाय्‌

पन्य `

चाड.
` वहा ।
सुग्रीवं; छ फगत्‌ भन्या .सहजमा : मार्ष्टि

छाडष्ट्‌

कहां ॥

भन्या

चरणसा

सुग्रीव्‌ कुन्‌ बलियो छ. पाजि भगुवा ` त्यो लडन मनसूव्‌ लिन्या।तेस्‌-पांजीकन डाकि.- आज. कसरी. यो राज्य मैले दिन्या।।४५।।तस्मात्‌ शोकं नगरी बसीरहु तिमी- जन्हछ्‌,म. तार्हा' भनी ।लडनेलाइ केछाड्‌ कसीकन. तयार्‌ . भे बालि दौडया पनि ॥बाली सग्रिव दूइ भाइ रिसले फर्‌ लडन लाग्या जसे.रूखंको आड गरी' तहां प्रभुजिले एक्बाण छोडया. तसे ।४६।वाण्‌ बज््यो जब बालिका हूदयमा सर्वद्धखं बाधागरी)पृथ्वी कम्प.गराई्‌ षट्‌ -तहि गिन्या वीर्‌ -वालि, मूर्छा परी॥मूर्छा दूइ घडी पन्या पछि अलिक्‌ चैतन्यआयो `जसे।देख्या . श्रीरघूनाथलाई .खशि भे साम्ने .बस्याका तसं।।४*७।।.भन्छन्‌ श्रीरघुनाथलाइ रघुनाथ्‌ ! , तिस्रो; विराम्‌ क्या गर्व्याँ।कर; 'दोनों पांव पकड़कर रोती हुई तारा को समक्षाने के लिए वालि पूर्नः
बोला;--'हे'प्यारी ! तुम किचित्मात भी भयभीतन हौ । -साक्षात्‌ रमाके पति जगत्‌-पत्ि नारायण रघनाथ को मै भली प्रकार पहचानता हूं । ४४यदि रघनाथ वहाँ होगे तो मै तुरन्त उनके चरणों में पड़ जागा र यदिकेवल सुग्रीव ही अकेला होगा तो उसे नहीं छोडगा, सहज ही मार लूंगा ।सुग्रीव कौन एेसा `बलवान है, `भगोडा कहीं का!

मु्चसे युद्धकरने की

इच्छा करता 'है{ उस -दुष्टको. बुलाकृर मै किस प्रकार्‌ यह्‌ राज्यसोप? ४५ इसलिए शोकन करो! तुम यहीं बेदी रहो, मै `वहां जाताहुं। यह्‌ `कहकर लड़ने के -लिए लंगोट.कसकर तैयार हौ बालि दौडपड़ा । ¦वालि-ुग्रीव दोनों भाई क्रोधित हो पूनः यद्ध करनेलमगे। वैसेहीपेड की आडसेप्रभुने'एक

बाणछोडा1 ४६

वालिके हदय मे, सर्वाग को छेदता हुआ टंकराया,ओर वालि मूच्छित होकर तुरन्त वहीं गिरं प्रडा।

जसे हीराम

का बाण

पृथ्वी मेँ`कम्पन हुआ-दो घड़ी मूषित रहने
के पश्चात्‌ वालि को' जसे ही. थोडी चेतना आई, वसे ही श्रीरघुनाथ कोप्रसन्नचित्त सामने ब॑ठा पाया 1 ४७ ` वाल्लिने श्रीरघुनाथ जी से कहा-
१२४

भानुभक्त-रामायणं

वीर्‌ वाण छोड्छन्‌ कहीं. ।एक्‌ आज .देयां यहीं।(४८॥सास्ते भैकन बाण छोडि तिमिल मार्ध्यौ त खृप्‌ यश॒ थियोसुग्रीव्हो कति साख म हूंकति कुसाख्‌ हादेव ! क्या मन्‌ दियो ॥मनले `गरी.।सीता रावणले हव्यो भनि बहुत्‌ सन्तापसुग्रीव्‌लादइ सहाय ली मकन ता लूकेर चोर्‌ न्ष गरी ॥४९॥माय्यौ यो अति चृक्‌ भयो गरकसो बरच्थ्यां त॒ याहीं बसी ।रावण्‌लाई कुले समेत्‌ ' सहजमा क्षिक्थ्यां म॒ पाता कसीलद्का पूरी समेत्‌ पनी म बलले स्चिक्थ्यां ' सहज्‌मा यहीं ।पाजी रावणलाईद्‌ मानं तिमिल क्या जानुपर्थ्यो उदहीं ।॥५०॥चोरी मारि लिदान यश्‌ हून गयो मामू. न खान्‌ भयो।धर्मात्मा तिमि पापिज्ञ हून गयौ: ज्यान व्यथं मेरो -गयो ॥वालीका इ वचन्‌ सुनैर रघुनाथ, भन्छन्‌ तं वोल्छस्‌ कति ।वाली हूंभनि गवे गर्‌ त पनिहैर्‌ सवै तँ होस्‌ दुर्मति.।५१॥
यो क्या क्षिय धमे हौ लुकिलुकीक्षत्ती भैकन धमं छोडि लडन्या
हे रधुनाथ ! मैने आपका क्या विगाडाथा।

घछमंको त्याग कर आज

आपने मृन्ञे छिपकर मारा ओौरमैँ अवमय।क्या वीर के लिए, छिपिछिपुकर बाण प्रहार करना कोई क्षत्निय-धमंहै। क्षत्रिय होतेहृएभी
धमं को त्यागकर लडनेवाले को आज ही मैने देखा । ४८. सामने- आकरबाण छोडकर यदि तुम मृह्ले मारते तोयशकी वातथी। सुग्रीव कितनेसज्जन ओर मं कितनाबुराहुं।.. ह्या दंव ! यह कंसा हूदयःहै। सीताको रावणद्रारा हरण करने पर अत्यन्त सन्तापग्रस्त होकर सूुप्रीवसेतोयह सहायता ली ओौर मृ्षे छिपकर चोरों की भांति मारा । ४९ भयंकरभूल हो गई। क्या करू! यदि बच जातातो यहीं रहकर रावणकोउसके सम्पूणं कुल-सहित, सहज ही में बंधवाकर यहाँ प्रस्तुत करता। भँअपनी शक्ति से सरलतापूवेक लंकापुरीः सहित उसे यहाँ उठा लाता!दुष्ट रावण को मारने के लिए तुम्हं वहां जाने की भी आवश्यकता नहींपड़ती । ५० मरते समय बालि कहतादहैकि चोरीसेयों मारने से कोई
लाभ नहीं हुजा।. नतोतुम्हंही यश प्राप्त हुन मेरा मांस ही किसीकाम आया। तुमने छिपिकर्‌ मृङ्ञे मारा इसलिए मुज्ञ मारकर भी तुमधर्मात्मा नहीं, पापी के समानहौो। वालि के -इन वचनों को सुनकररघुनाथ कहते है- “चाहे भवे ही तुम बलिष्ठ होने का गवं करते हो फिर

भी तुम दुमंतिसे युक्त हो। ५१

तुमने किचितूमात्र भी पापका भय नहीं

१२५
नैपाली-हिन्दी ,
खुश्‌ भै बुहारी हरिस्‌ ।तेस्‌ पापले पो मरिस्‌ ।मेले लिया ।धर्मं स्थापन ग्नैलाद त॒ यहां ओतारधर्मे जानि अधमं ठाति अहिले तंलाइ मारीदिर्यां ।॥५२॥श्रीरामुका इ वचन्‌ सुनी: प्रभु भनी. जानी चरणूमा पञ्या।बानर हं रघुनाथ ¦ क्षमा गर्‌ भनी, हात्‌ जोरि बिन्ती गन्या |)सागर्‌ तरी।सहजमा संसारनामोच्चारणले ` फगत्‌ख्वामित्‌ ! जान्छ हजूरमा,अव भन्या मेले त दशन्‌ गरी ॥५३।।.पायां मनं म भाग्यको कति बखान्‌ मेरो म एेले . गरंको पाञछ- हज्‌ूरलादइ भगवान्‌ ! मर्या वखत्‌मा अरू॥मेरो ता गति यं धियो भिचिगयो जान्छ्‌ परमूधाम्‌ मता।अङ्खदमाथि दया रहोस्‌ हजुरको हाजिर्‌ छसेवक्‌ उता।।५४॥मेरा छात्तिमहाँं छ बाण्‌ हजुरको यो खचि छोरईदिया।शीतल्‌ देह हुने ` धियो सहजमा प्राण आज जान्या थिया ॥
पापको डर्‌ रतिभर्‌ नराखि तद्लेसोही पाप्‌ अहिले प्रकट्‌ हुन गयो
बालीका इ वचन्‌ सुनी प्रभुजिलेठकुर्का अगि देह छाडि खुशि भं
वाण्‌ ज्लीकि ष्टंदा भया।बाली परमुधाम्‌ गया। ।५५॥\~~
~~~
~~~
~~
किया ओौर प्रसन्नतापूवेक अपनी वहु काहरण क्रियातेरा वही पापअब प्रगट हुआओौर इस प्रकारमृत्यु को प्राप्त होर्हादहै। धमेस्थापना के लिएदही मैने यहां अवतार लियादहै ओर धमे-जधमं दोनोंकाविचार क्रकेही मैने तुम्हारा इस. समयषव्ध क्याहै। ५२ श्रीरामके
इन वचनों को सुनकर, उन्हें प्रभु जानकर बालि तुरन्त ही उनके चरणों मेंभिर पड़ा ओर बोला, है रघुनाथ! मेँ वानर हं यहं कहते हए हाथजोड़कर क्षमा-याचना करते लगा।प्राणी केवल आपके नामोच्चारण सेसहज ही में संसार-सागर तर जाता) फिरर्भैने तो अन्त समयमे आपके
दशन कर लिए है, अतः हे स्वामी अवँ वैकुण्ठलोक को जाता हुं । ५३हे भगवन्‌ ! मै कहाँ तकं आपकी सराहना करूं । मुञ्चे आपके हाथोंमरने का अवसर प्राप्त हृआ। मृत्यु के समय आपको कौन पा सकताहै।

मेरीतो गतियही थीकिर्मै आपकोन पाता

लेकिनमैने तो

अपकोपा लिया । अवै परमधाम को जाता हूं! अंगद के ऊपरआपकी कृपा दृष्टि वनी रै, वह्‌ आपके सेवक के रूपमे तत्पर है । ५४
मेरे वक्ष पर्‌ आपके वाण है, आपके करकमलों से इन्दं बाहर खींचकर स्पशं
कर देनैसे मेरी देह शीतल हो जायगी ओौर प्राण सहज में निकल जा्येगे ।

भानूभेक्त-रामोयणे

१२९
वालीका संगमा धिया ` जति तहां वानर्‌ ति भागी गया.।.ताराजी . सित गै. वहां सव हवालू ` विस्तार गर्दा . भयाः।।राम्‌जीले लुकि बाण छोडि सहजं वाली: त मारीदियाः।सुग्रीव्‌. मं्चि समेत्‌ बहुत्‌ खुरि भई रामकं हज्‌र्‌मा थियो ५६॥श्रहूरको भुनी +यो राज्‌. अङ्खदलादइ -.वक्सनुहूवस्‌ टोका.ब्छौं -जल्दि हुकूम्‌ । वस्‌ हजुरको क्या हुन्छ धेर -गुनी॥येती.' विन्ति गय्या र वानरहुरू

जल्दी : तयारी

व्या ,ग्ट अव, पुत्र राज्य धनलेवालीको परलोक्‌ भयो .उहि जगावालीको दुद्‌ पाड पकरि बहुत
दे; ति "तारा, जहांसोधेर पौँचिन्‌ तदहं 11५८1

भयां

हकम्‌. माफिक, काम गनं भनि सव्‌ ` ` वानर्‌ खडा भै र्या ५७॥वालीको परलोक्‌ भयो , भनि खवर्‌ ` सूनिन्‌ }..र तारा.रंदे।हा नाथ्‌ { आज कता गयौ भनि बहुत्‌ विह्वल्‌ , निरन्तर्‌ _. .हुंदे ॥
भर्छिनिः श्रीरघनाथलादइ्‌ रघनाथमारीदेड मलाई अन्छ म पनीखोज्छन स्वगंविपे मलाद्‌ पतिन~~~“
~~~"
^~
^~
~+
^~
रूदी विलाप खृप्‌ गरीफेर वाण .-एेले .धरी ॥मेरापतीका ` संग!कहाँ म वस्छ्‌ नमे ।५९॥
~~ “
बालि के इन वचनो को सुनकर प्रभ प्रसन्न होकर वाण निकालकर वालिकाणरीरष्टूदेते दहै, जिसमे वालि प्रभु केः: समक्ष प्रसन्नतापूर्वक देह व्यागकर परम-धाम चला ग्रा । ५५ वालिके मरने के वाद वहां (वालिके
पक्ष के) जितने, वानरथे सवभाग गएुओौर तारो के पास जाकरसाराहाल कह सुनाया किराम ने (किसप्रकार) छिपकर वाण-प्रहार करकेवालि को मार डाली |` सूम्रीव अपने मंत्री-सहित अत्यन्तहपितः' हो'वहींश्रीराम के पास वेट.५६. .हम लोग श्हरकेद्टारको बन्द कृर्देगे।ओप यह राज्य अंगद को सौपनेकीःकृपाकरे1 ग्रीघ्रही -आदिश्देनेकी .करुपा करे, अत्र अधिक विचार करनेसे क्या होगाः। इस प्रकार विनतीकरके सव वानर तत्पर दहो गए; अदेशानुसार सव वानर काय करनेकोखड़े हयो गए । ५७ वाचि के देहावसान होनै की सुचना सुनकेर तारारोती हुई अव्यन्त विह्वल हो विलाप.कृरती है--“हे नाथ ! आज आप कहांचले. गये 2: मै अव पुत्त-धनादि -लेकरः. क्या कृल्मी "1: यहु "कहती ईतारा उसी स्थान पर पहुंची जर्हा वाचि का देहावसान'

हया था) ५८

वाचिके दोनों चरणों को पकड़ कर रोती ओर अत्यन्त विलापं करती हुईतारा कहती दै--““ह रघृनाथ,+मृश्चे भी बाण-प्रहार' कर मार डाले) मँ ¦

सी अपने पतिक साथ जागी

मेरे पति मृन्ले स्वगं में दुढेगे, अतः

' नेपालो-हिन्दी `

१२७
पत्नी सीत वियोग्‌ हूंदा यंति विलाप्‌ हदा: `र्याछन्‌ «` ' भनी ।भन्त्‌ःः : पति"।मालम्‌ सव्‌ त तहीं छ फेर्‌ म भनुक्या ` पदनपेत्तीदान्‌ गरि पुण्य हुन्छ जति .सो मिल्न्याछ पुण्ये .'पनि)तस्मात्‌ ¦आजः, अवश्य 'हान शेरलेयेती वात्‌ अधि रामसीत गरि फेरभल्छिन्‌ लौ 'गर राज्य आजं खृशिने

जावस्‌

पतीथ्ये भनीः॥

सुग्रीव्‌. -जिलाई

पनि
मिंतूले `' दियाक्रो `भनी ॥ताराका-.इ` वचन्‌ सुनीकन वबर्हुत्‌ "आयो ` प्रभरूमा' `दया. |तारालाइ ` `वुंञ्ञाउनाकनतह एक तत्त्व भन्दा भया।।६१॥
हे ताराः विद्रार्‌ नराखि तिमिले. शोकं कती , गदंछ्यौ ।यो मेरो -पतिः हो. भनेर -नवबुक्षी- व्यथे शरीर्‌ हर्दछ्यो ॥जीवैःहो परति-भन्दछ्यौ-पनि.भन्या , मर्दन ~जीव्‌ -ता-. कहीं ।देह हो पति भन्दछयौ त किन शोक्‌ गयौ छ ऊ ता.यही।।६२॥श्रीरामूका- इ `वचन्‌ सुन्रीकन- तहा --ताराजि ¦चप्‌; भे-रहिन्‌ ।जुन्‌ सन्देह ..प्योः वहं ल्मतमहाँ < सो.. मात्र ,सोद्धी `-भडइन्‌ ॥
हेनाथ्‌ ' भिजि भयोः सून्याँ सब कुरा ;;बुश्देनि. `मन्‌“ तपनि ।सन्देहै !मतेमा< रह्यो .--मकन
.-ताःःकोगछ यो भोग्‌ भुनीः।।६३॥।~~~
{८

कंसे यहाँ रह सकती हँ ? ५९

पत्तनी-वियोग में कितनी `पीडा होती है

यहं सव आपको ज्ञात 'है'।' अतः इस. विषये मे: ओरआपकोक्था `कहं _: पत्नीदान करने परं. जी कृं पूरणं श्राप्त होता हैवही `सेव "पुण्य पको

प्राप्त

होगी":

इसीलिए

आप, अवे अवश्यं

ही" बाण-प्रहारं केरे, जिससे 'मै पति के पास्त.शीघ्र' पहुंच जां 1“ ६5राम सेः. इतनी 'वातः कहने के' बाद तारा पुनः: सुग्रीव से बोली--“आजप्रसन्नं होकर'भपंने मित्रके दिए हुए 'रच्ये-कौयो्गे.कर'

लो 1 ।ताराःके

इन वचनो को सुनकर प्रभु को अत्यन्तं दया आयी अततः 'तारा को सेमञ्लानेके लिए. एकः तत्तव "कंठ" सुनाया 1 ६१"तारा! :तुमे विना विचारेहीशोक करती हो #॥ :' इसे अपनो पति कंहुकरं व्यथं. ही अपने: शरीरं कोःकण्टेदेती हो.। यदि.अओंत्मा.कोही षति कहती हो तो आत्मा कभी.नहींमरतींरं यदिशरीरदही को पति कहती होतो 'व्यथं-शोक क्यो करती हो, वेहतो यहीं पडा है" दर्‌ श्रीरामंजी के इन वचनोंको सुनकर तारी तृषं
हो गई । जिस्‌ वतका संदेह हुज-केवल वही `वात `पू्ी--"हे नाथे!--अपिनेसव कुष्ठं सुनाथा"फिर भीःमन नहीं मानता" है 1: यदिः मेरेमनंमे संदेहंवनां रहा तोः यहु भोग कौन करेगा ६३ यंदि मैं यह्‌ कहं, वि्शरीरही

श्रानुभक्त-रामायण

१३०

लेखै हवन

अव
कमं
पनी
गरीन्या।

रस्ता क्यं

भवसमुद्र

सहज्‌

तरीन्या ॥
, मेरो स्वरूप्‌ र इ वचन्‌ जति सम्स्ि लिन्छन्‌ |सव कमंपाश्‌ ति सहजेसित काटिदिन्छन्‌ः।।७३।।
यस्ता वचन्‌ प्रभुजिको .सुनि खूशि मंनूले ।छोडिन्‌ जति छ अभिमान्‌.पनि ताह तिन्‌ले ॥
सूग्रीवको पनि गयो अभिमान ताहाँ।¦ . राम्‌को कृपा हुन गयापछि दिक्छ. काँ ।[७४॥' हकूम्‌ भयो `प्रभूजिको तहि मिव्रलाई ।हे मित्र सुग्रिव ! जलाउ इ वंलिलाई]]क्रीया

गरीकन

शरीर

गर
शुद्ध एेले।
` . सन्‌ काम छोडिकन यै गर आज पैले ॥७५॥हकम्‌ भयो र तव बालि लगी जलाया । `क्रीया गरीसकि ति. सुग्रिव . ताहि आया ॥
अर्पेण्‌ गरी सकल राज्‌ प्रभुका चरणूमा ।सेवक. बनीकन म॒ बस्छे भन्या
सुग्रीव्‌लाइ हुकूम्‌ भयो प्रभृजिकोजाऊ आज र गादिमा बसमता~~~
~~
शरणमा ।।७६।।
-जोहौ तिमि सोमहं।याहं वनैमारहुं॥+~
समन्लोगीतो जो कष्ट तुम्हू अव तके हुआ दहैवहनष्ट हो जायेगा ७२(पिले कर्मो की) रेखा भी कदाचित्‌ अव मिट जाय ओर कर्मादि भी नहींकिया जायेगा । सहज ही भव-सागर तरने का मागें ही कर्हाहै? मेरे
स्वरूप तथा वचनों को जितना ही समक्न लोगी उतने ही सहज भोावसे
क्मंपाणश कट जायेगा । ७२३ प्रभुजीके एेसे वचनों को -सृनकर-तारानेप्रसन्न मनसेजोभी अभिमान था सव वहीं त्यागदिया। सुप्रीवकाभीअभिमान समाप्त हो गया-1 राम. की कृपा होने--पर अभिमान कहूंरिकतादहै? ७४ वही पर मित्रके लिए, प्रभुकी आज्ञा हुरई्--हे मिच्रसुग्रीव | वालिका दाह ओर क्रिया-कमे आदि कर शरीर को अभी शुद्धकृरो1 सब काम छोडकर आज सवेप्रथम-यही कायं करो। ७५ एसीआज्ञा होते ही सूग्रीवने बालि कोले जाकर: दाह दिया ओर क्रिया आदिकरने के बाद सूग्रीव ने लौटकर सकल राज्य,-प्रभुके चरणों मे,अपित करकेसेवकं वनकर
रहने की इच्छा प्रकट की | ७६ _ सुग्रीव-को प्रभ की
आज्ञा हुईकिजो तुमहौ वदीर्मैहं।

तम आज जाकर; गही. पर वटो

नैपाली-हिन्दी

१३१.
मेरो प्रतिज्ञा छ यो।.भाई गया भैगयो ॥७७॥सीताजिको खोज्‌ गन्या ।पव्या ॥येती. मजि .दियां र -सुग्रिव बहुत्‌ आनन्द-सागर्‌लक््मणृजी पति -रामका हृकृमले सुग्रीवका साथ्‌ गया।सुभ्रिव्‌ गादिविषे बस्या पछि फिरी दाविल्‌ प्रभूथ्यें भया।।७८।।.रामूले ताहि थियो प्रवषेणगिरी तेस्‌का शिखरमा ची ।देख्या `सुन्दर एक्‌ गुफा .स्फटिकको ताहीं गराया ' मदी ॥तलाऊ . पनि।फल्‌ फल्‌ ताहि खचित्‌ थियो नचिकमं थीयोदेख्या मन्‌ खशि भो तहां प्रभुजिको बस्न्ये जगा हो भनी ।।७९॥वर्षा काल तलक्‌ र्या प्रभ तहं पर्थ्यो बखतूमा क्रीजन्तू पृष्ट धिया सवे ति वनका खायेरं घास पेट भरीबस्थ्याःश्रीरघुनाथका वरिपरी ख॒प्‌ ध्यान्‌ प्रभ॒मा धरी |ध्यान्‌.जन्तूहरुको विंचार्‌ गरि तहां खूशी रहन्थ्या हरि ॥८०॥लक्ष्मणले तहि बिन्ति एक्‌ दिनगय्या हेनाय्‌ ! पुजाको विधान्‌ ।पाड सन्न हुक्म्‌ हवस्‌ खशि भरद कुन्‌ हो`करूणा-निधान्‌ ॥ब्रह्मा, व्यास्‌ अरु -नारदादिहृरु सब्‌ भन्छन्‌ पृजले सरी।आर्को तनं -उपाय छनजनको खश्‌ छन्‌पुजेमा हरि ॥८१॥गासमा घरमा' बसोहनंभनीजानन्‌ लक्ष्मण ता संगं घर पनीवर्षा काल्‌ बितिसक्छ यो जब तसं
^~ ~

मै यहीं वनम

~~~ ~
रंगा । गविमे, घरमेंन रहने कौ मेरी प्रतिज्ञा है, अत
लक्ष्मणकेसंग मे तुम्हं घर जाना -उचित. होगा 1 ७७ जब वर्षकिालव्यतीत हो, जायगा तब- सीता कौ खोज की जायेगी। रएेसी आज्ञासृनक्रर सुग्रीव आनन्दसागरमे ड्व गयालक्ष्मणजी भी श्रीराम कीआज्ञा पाकर सुग्रीवके साथ (नगरमे) गए ओर सुग्रीव का राज्याभिषेक
करने के बाद पुनः प्रभु के पास उपस्थित हुए ७८ रामनेप्रवषंण शिरिके शिखर पर चढ़कर एक स्फटिक की बनी हुई सुन्दर फा देखी जो चारोंओर से फल-फूलो से धिरीहूर्दथी। उसके निकट ही एक तालावभीथा। ठहरने योग्य एेसा'देखकर प्रभुजी केमन में प्रसन्नता हई! ७९प्रभु वहाँ वर्षाकाल तकं रहै।. समय-समय पर वर्षा होती थी। पेटभर घास खाकर उस वन के सभी जन्तु हृष्ट-पूष्टयथे ओर श्रौरघूनाथ केध्यान में उन्दींके चारोंओोरवे घूमा करतेथे। जन्तुओं की इस ध्यानमग्न दशा पर प्रभु जी सूग्ध रहते-थे ।! ८० एक दिन लक्ष्मणने विनती.
की--हे नाथ! हे करुणानिधान, पजा के विधान क्या है, मँ सुनना चाहता
ह, प्रसन्न होकर बतलाने की कृपा करं ।

ब्रह्मा, व्यास ओर

नारद आदि

~+
१३२.

भानुभक्त-रामायण

यस्तो सूति गव्यां र॒मन्‌ चरणमा सोरध्यां पुजाको - विधान्‌ |साँचो तत्व बताउन्या हजुर चं को छन्‌ दयाका निधान्‌ ॥यस्ता लक्ष्मणका वचन्‌ सूनि तहां पूजा विधी हो जति.।सब संक्षेप्‌ रितले कल्या प्रभुजिले लक्ष्मण्‌ भया खुश्‌ अति ॥वघकाल्‌ यहि रीतले तहि बित्यो वार्ता क्थाको . गरी

सम्ध्या्षट सिताजिलाइ र॒विलाप्‌

फेर. गनं

लाग्या हरि॥
हन्‌मानले 1"किष्किन्धा पुरिमा यसै-बिचमहां मन्तीसुश्रीव्‌ सीत सिताजि खोज्‌ गर भनी विन्ती ग्या . ज्ञाने ॥हे राजन्‌ रघुनाथले त उपकार्‌ ्लो हजूरको, -.गरी।.यो राज्‌ बक्सनुभो हज्‌र्कन ठलो वीर्‌ बालिलाई हरी.सो विस्या क्लदं मान्दष्ट्‌ हजुरले सीताजिको खोज्‌ खबर्‌ |ग्न्य हो अव ता बखत्‌- पनि भयो सब्‌ काम छोडी अवर्‌ ८४यादै छेन हनजूरलादई्‌ त सिता खोज्‌ ` गनुपर्लां भनी ।.वालीको यति जुन्‌ भयो उदहि गती होला हजुर्‌को पनि॥यो विन्ती. हनूमानको सुनि तहँ संचो भन्या यौ भनीसुप्रिवले तहि षट्‌ हुकूम्‌ पनि दिया लश्कर, पठाऊ. भनी ।८५॥सवका यही कथन है कि पूजा के समान तरते का अन्य कोई उपाय नहींहै । (भगवान्‌) पूजा (भक्ति) से ही प्रसन्न होते है। ८१ लक्ष्मण कामन पूजाका विधान जाननेके लिए राम के चरणों मेंकेन्ित हो गया। वे-बौले,
हे दयानिधान ! सत्य-तत्वों को जानने ओर वतानेवाला आपके समान.ओरं कौन? लक्ष्मण के से वचनों कौ सुनकर जितनी भी पूजाकी
विधिर्यः प्रभुजी.ने प्रसन्न होकर लक्ष्मण को संक्षेप में वतायीं।दसी प्रकार कथा-वार्ता करते हुए वर्पा-काल व्यतीत किया

एक दिन

अकस्मात्‌ सीताजीकास्मरणहो आया ओौर श्रीराम पूनः विलाप करनेलगे। इसी वीच मंत्री हनुमान ने किप्किन्धापुरीमें सुप्रीवसे सीता जीकी खोज करने के लिए विनतीकी। ८३ हूं .राजन्‌ ! रघुनाथ ने बीरवालि को मारकर यह्‌ राज्य आपको देकर महान्‌ कृपा कीदहै। परन्तुमुञ्चे लगताहै कि वहु सव आपमभूल गएहै; अवतो

सीताजीकी खोज कृराइए 1 ८४ लगता

सीताजीकी खोज करनादहि1

सव

काम छोडकर

है, आपको याददही नहींरहैकि

वालिकीजो गति हुई है आपकी भी वही

गति होगी । हनुमान कौ यह्‌ विनती सुनकर "यह्‌ सत्यही कहु रहा है,एेसा जानकर सूग्रीवने तुरन्त सीता जीको.खोजनेके लिए वानरोंकीसेना भेजने कौ अनादी । ८५ दस हजार वानर जाकर, ईशान दिशामें

नैपाली-हिन्दी

दस्‌ हज्जार्‌ विर जाइ सात द्विपमा'खोजी आज खबर्‌ दिउन्‌ र सब वीर्‌जो आवन हकम्‌ बदर्‌ गरि यहाँतेस्को प्राण्‌-म लिन्याछ्लु तिश्चय बुस्चन्‌यस्तो सुश्रीवको हुक्म हुन गयो
१३३
बानर्‌ ` जती छन्‌ सब ।जम्मा हउन्‌ ज्ट्‌ .अबे |
ई पन्ध्र दिन्‌ भिवरमा।
मानन्‌ सब चित्तमा।०९।।सोही बमोजिम्‌ गरी ।दश्‌ हज्जार्‌ विरको खटन्‌ पनि गन्या लागेन बेर एक्‌-घरी॥दश्‌ हुञ्जार्‌ विर दश्‌ दिशातिरचछिटी खश्‌ भे हनमान्‌ रह्या ।तीवीर दशत्िर गं खबर दिइ अनेकं ` सेना बट्ल्दया भया 1८७॥लाग्या गनं विलाप्‌ अनेक्‌ तरहुले लीला, गरी राम्‌ उसं।भन्छत्‌ छन्‌ ति सिता करं अञ्च पनी लागेनपत्ता ` कसे ॥याहा छन्‌ ति सिता भनीकन खबर्‌ पाड त. जाडं तहांँ।त्यां अमृत ञ्चं सिताकन यहाँ पाञंखबरपो कहा ॥८८॥हे भाई! सुनजो छ आज इ सिता. हर्या म॒ तेस्को सबे।क्लं भस्म गराउन्याचु करुणा राख्वेन उस्मा कवे ॥येती बात्‌ तहि भाई सीत गरि फर्‌ सीताजिको शोक्‌ गरी ।लाग्या गनं विलाप्‌ अनेक्‌ तरहले तेलोक्यका नाथ्‌ हरि।।८९॥हेसीते! कसरी म देखि परभ बस्छ्यौ तिमी छौ कहाँ ।

प्राणे थाम्न किन्‌ भयो म. िनुता

आपत्‌ भया हुन्‌ तहां ॥
जो भी वानर है उन्हं खोजकर येह सूचनादेदे कि सव वीर तुरन्त एकचितहयो जाएं!
जोभी इस आज्ञा का पालेन कर पन्द्रह दिन के अन्दर नहीं
आतादहै उसके प्राणम ले लूंगा, इसे निश्चय जान लें ओर स्मरण रक्खें ।८६सुग्रीव की एेसी आज्ञा के अनुसार दस हजार वीरो को एकतर कर नियुक्त
केरनेमे कुष भीदेर नहींहृई।

दस हजार वीरोको. दसों दिशाओंमें

भेजकर हनुमान प्रसन्नतापू्वेक रहे । उन वीरोंने दसों दिशाओं में जाकरसूचना देते हुए विपुल सेनाएं एकचित कीं । ८७ श्रीराम अनेक प्रकार कीलीलाएं कर,

विलाप

करने लगे।
“सीता कहाँहै?

क्या अब तक

भी कहीं पता नहीं लगा? सीता के अमुक स्थान पर होने की सूचनामक्षे दो ताकि मेँ वहाँंजा सकं अमृत-तुल्य सीता को यहां ले आभोकहाँ है, इसकी सुचना कहा मिलेगी | ठन हे भाई ! सुनो, आज सीताकाहुरण करनेवालाजोभीहो, मै उसके कूल को भस्म करद्गा। उसपर कभी दया नहीं करूंगा 1" इतनी वात भाईसे कहकर पुनः सीताके शोक में'वलोक्य के नाथ हरि अनेकप्रकारसे विलाप करने लगे। ८९“हे सीते ! मृक्चसे अलग किस प्रकार रहतीदहोौ। कहां हो! तुम्हारे
१२३४

भावुभक्त-रमियेणं

तिम्रो भेट नपाडंदा मकनः ता ई चन्द्र सूयं वन्या |तिस्रोतागरं क्यावखानतिमित न्‌ , छयौदुष्टकापास्‌ भन्या।।९०सुग्रीव्‌ आज कृतघ्न सँ हुन गया ` आयो शरदकाल्‌ पति
सुरते छेन सिताजिलाद्‌ अन्नतक्‌ , खोज्‌ गरन्‌ `पर्लां भनी॥मां सग्रिव दृष्टलाद्‌ पनि फ़र्‌ वाली -. सरीको गरी।लक्ष्मणूले प्रभुका वचन्‌ सुनि गव्या. ` बिन्ती अगाड़ी सरी।९१॥

हे नाथ्‌ ! आज मलाद्‌ बक्सनु हवस्‌

हकम्‌

म॒ मार्ट गरई।
लक्ष्मण्‌का. इ वचन्‌ सुनेर रघुनाथभन्छन्‌ भाइ | नमार आज बहुतमारीहाल्नतयोग्य छन तर खुप्‌हकम्‌ यो प्रभृको युनीकन,. तहांसीतानाथ्‌ नरको लिला गरि विलाप्‌किष्किन्धापुरि पौचि लक्ष्मणजिलेपत्थर्‌ वृक्ष उठाई ` वानरहरूसब्‌ वानर्कन नष्ट गदेषु भनीअद्खद्‌ आद्‌ -हटाइ्‌ बानरहरू
अत्यन्त खृशी भरई्‌॥हप्काउड जाऊतहां.चेताइ्‌ आऊ यहं ।।९२॥लक्ष्मण्‌जि जल्दी गया ।खप्‌ गनं -लाग्दा `भया,॥
टद्धुार्‌ धनको गन्या।कोही -अगाडी -सव्याः॥लक्ष्मण्‌जिले वाण्‌ धव्या ।जल्दी चरण्‌मा पव्या. ॥
विना प्राण वचानाभी कठिनिहो गयादहै। तुम्हारे वियोग में तुम्हारे गुरस्वरूप चन्द्र ओर सूयं मूञ्चसे कहते है कि तुम दुष्ट के ओर निकट "हौ । ९२आज सुग्रीव अक्ृतक्ते सा हुञा है। शरदकाल भी आगया । किन्तु उसे कोईचिन्ता नहीं है कि अभीसीताकी खोज करनीहै।

वालिकी

तरह दृष्ट

सूम्रीवकोभीमै मार डालृंगा 1“ -प्रनरुके इन वचनोंको सुनकर लक्ष्णआगे बढ़कर विनती करने लगे- ९१ “हे नाथ । मृञ्चे आज्ाकर,मअभी जाकरसुग्रीव को मार डालूंगा 1 लक्ष्मण की एेसी विनती सुनकरश्रीरघूनाथ अत्यन्त प्रसन्न हए ओर वोले हे भ्राता ! आज उसेनमारो।किन्तु जाकर उसे डटो-फटकारो |. अनावश्यक लड़ना ओौर मारनाउचित नही है; अतः उलो, केवल चेतावनी देकर आओ। ९२ प्रभुकेइस आदेश को सुनकर लक्ष्मण शीघ्रतासे चले गये। सीतानाथ मानवलीला केर अत्यन्त दुःख,से विलाप करने लगे'। - किष्किन्धापुर पहुंचकरलक्ष्मण ने अपने धनुषको टंकारा। टकार सुनकर पत्थर तथा वृक्षोंकोउठाकर कुष्ठ वानर अगे वदृ-जाएु। ९३ सव वानरों कानाश करताहँ, कहकर लक्ष्मण ने वाण चडाया । अंगद ने शीघ्रतासे आकर वानरोंको हटाया आओौर लक्ष्मण के चरणो में गिर पड़।

.लक्ष्मणने प्रसन्न होकर

१३५

नेपाली-हिन्दी

अद्द्‌ सीत ~ बहुत्‌ः प्रसन्न भद्‌ षट्‌ ताह अहवाया पनिजाऊ देड खबर्‌ अगाडि तिमिल - लक्ष्मण्‌जि आया भनि।।९४॥तहँ 1अद्धृद्‌ गैँकन त्यो .खबर्‌ जब दिया सुग्रीवलाईजल्दीः सुभ्रिवले, हुकूम्‌ पनि दिया, लौ जाउ ल्याऊऽ यहाँ ।।अद्खद्लाई ` संगै लिथेर हनुमान्‌ चडि . चरण॒मा परी)लक्ष्मण्‌लाइ -वृञ्ञाइ ल्याड तिमिल सब्‌ रीस शान्ती गरी॥९१५॥यस्तो. सुप्रिवको -व्रचन्‌ सुनि तहां सोही बमोजिम्‌ गरी।पाऊमा परि, बाहुमा ` धरिलिया ल्याया बहूत्‌ खृश्‌ गरी ॥हक्म सुभ्रिवक्रो सुनीकन ` तहां ताराजि चाँडे गइन्‌।'लक्ष्मण्‌ लाई बुक्ञाइ्‌ खृश्‌ गरं. भनी ` खुप्‌ बिन्ति गर्दी भइन्‌।।९६॥।लक्ष्मण सुग्रिवको भयो जबत भद्‌ सु्रीव्‌ चरणमा पन्या ।लक्ष्मणे. .पनि ताहि सुभ्रिवजिको सातो कराले ह्या ॥वाली च्च हुन, मन्‌. की भनि जसे लक्ष्मण्‌जिले बात्‌ गव्या ।लक्ष्मण्‌लाईइ ` बुञ्चांउनाकन तहां जल्दी हनूमान्‌ सन्या ।।९७॥लक्ष्मणृजी पनि; ` कामले वुक्च गया बात्‌चित्‌ खृशीका गरी ।फिर्नाक्रो ` मतलब्‌ गव्या प्रभु थिया जाहां जगन्नाथ्‌, हरि ॥लक्ष्मण्का संग लागि सैन्य पनिली सुग्रीव खुश्‌. भै गया |.जाहाँ श्रीरघुनाथ . थियाः तहि सबै दाखिल क्षणैमा भया।\९८॥]अंगद को अन्नादीं किंजाओो ` ओौर सुग्रीवको भेरेआने की सूचनादे

दो । ९४

अंगदने जाकर जब सुभ्रीव को यह सूुचनादी तो सुग्रीव ने
भरी तुरन्त जाकर उन्हे लिवालाने कीञाज्ञा दी।

सुग्रीव नेअंगदसें

कहा कि हनुमान को संगं लेकर जाओ ओर लक्ष्मण के चरणों मे पड़करसमज्ञा-वुञ्ञाकर तथा उनृके क्रोधको शान्त करके उन्हंले आभो। १५सुग्रीव केः अदेशानुसार अंगद जाकर लक्ष्मण के चरणों में 'गिरा ओर उन्ह
अपनी बाहौमेसमेटकर प्रसन्न करके ले आया।

तारा भी वह आ

गई!

सुग्रीव का आदेश सुनकर

लक्ष्मणजी कौ समन्चाकर प्रसन्न करनेके

उदेश्य से वहं विनती करने लगी । ९६.. जव ` लक्ष्मण ओर सुभ्रीवकीभट हुई तव सुग्रीव तुरन्त उनके चरणो मे गिर पड़े। लक्ष्मण.नतेभी
जपनी बातों सेसुग्रीवके होश ठिकानेकरदयि। जैंसेही लक्ष्मण नेकहा कि कदाचित्‌ तुम्हं भी वालि की तरह मरनेकी इच्छा है तो उनमनानेकेलिए हनुमान'जागे वटे । ९७. लक्ष्मणजी भी इन सव कार्योसेसन्तुष्ट हौ गए ओौर प्रसन्नतापूवंक वातचीतकर प्रभृकेपास लौटने की उन्होने
दच्छाकी।
साथ ही सुग्रीवे भी अपनी सेना सहित. अत्यन्त प्रसच्नतापूवंकः

भानुभक्त-रामायण

१३६
देव्या श्री रघुनाथलाई र॒ परं रथू देखि ` उत्रेर फेर्‌।लध्मण्‌ सूग्रिव पाउमा परि गया लागेन एक्‌ छीन वेर्‌ ॥गरी।राम्ले सुग्रिवलाद मित्र! भनि खुप्‌ ' आलिद्धनादीसोधयपृष्ट्‌ गर्नृभयो वहत्‌ खुशि हुदै आफ अगाडी सरी ॥९९॥लाग्या सूग्रिव विन्ति गनं रधुनाध्‌ । मेले .-त सेना पनि।व्यायाँ वीरहरू छन्‌ अनेक्‌ तरहका छन्‌ इन्द्र तुल्ये पनि॥ई सन्‌ ख्वामितका निमित्त खृशि भै प्राणै दिन्याछन्‌ जसो ।हकम्‌ हन्छ हवस्‌ यहां हजुरको गछन्‌ ति एेले तसो।॥। १००॥गरी।खृशी भै रधूनाथको हुकुम भो ` हर्ष्नुधाराहे सुग्रीव सखे!इ वानरहरू -जाऊन्‌ दिशा दश्‌ भरी॥जाह छन्‌ ति सिता तहीं पुगि खवर त्याउन्‌ भनी रामको ।हुक्म्‌ पाद्‌ पठाइ बवानरहुरू उर्दी दिया कामको।१०१॥जाऊ वीर्‌हरु सब्‌ दिशा दशविषे सीताजि मित्छिन्‌ जहाँपत्ता लाइ सिताजिको खवर ली सब्‌ वीर आऊ य्हां॥मेन्हा दीन विताइ एक्‌ रति खवर्‌ केही नपाई त जो।दील्‌ गर्न्या तसलादइ ता म॒ सहजे मान्य मर्न्याछत्यो ।॥०२॥जहाँ श्रीरघुनाथ थे, वहाँ तत्क्षण पहुंच गए । ९८

श्रीरघुनाथ ` को देखते

ही,दूरहीसे रथ परस उतरकर लक्ष्मण ओौरसुग्रीवको रामके चरणो
मे पहुंचने मे किचितूमाव्र भरी विलम्ब नहीं हज । राम ने सुग्रीव को
मित्रकहकर आलिगन किया ओौर अत्यन्त प्रसन्न होकर स्वयं आगे बदुकरवेपूष्ठ-ताछ करने लगे 1 ९९
सुग्रीव विनती करने लगे, है रघुनाथ!
म॑
तो अपनी सेना भी साथ लेकर आया हूंजिसमे इन्द्र के समान अनेक व्रीरह: ये सभी अपने स्वामी के -निमित्त अपने प्राण न्यौछावर करनेकोतत्परदहैँ। जेसी आपकी अन्ना होगी वेसा ही किया जायमाः। १००प्रसन्नतासे हर्षाश्रुकी धारा प्रवाहित करते हए श्रीरघुनाथ ने. आनज्ञादी,हे सुग्रीव सते ¡ ये वानर चारों दिशाओं कौ,ओर चले जाये ओर जहांसीता हों वरहा पहुंचकर उनका समाचारले अवें। राम काः यह्‌ आदेशपाकर (सुग्रीवने)
सव वानरोंको कार्थ-विवरण समञ्चाकर उन्हं चारों
दिशाओं कीओर भेज दिया । १०१ जाते समय सुग्रीवे सव वानरोकोञआजादीकिहे वीरो !. सव दिशाओं कौ ओर जाओ-- जर्हा भी सीताजीरो, पता लगाकर उनकी खबर लेकर पूनः लौट आओ। महीना
भर के अन्दर पता लगाने.मे जो हिलाई करेगा उसे मै तुरन्त मार डलूंग
वह्‌ वच नही पायेगा । १०२ , इस प्रकार शीघ्रता. से अदेश.देकर.अन्थ

नेपाली-हिन्दी

१३७
यस्तो जल्द हुकृम्‌ गरी .अरू दिशा बानर पठाया अवर्‌।दक्षिण्‌ तीरत खुप्‌ बड़ा बिरहरू छानी पठाया जबर्‌ ॥अद्धदलाईइ र जाम्बवान्‌ र॒ हनुमान्‌ वीर्‌ नल्‌ युषेण्‌ फेर्‌ शरम्‌ ।मद दरीविद आठ पठाई्‌ प्रभका पास्मारदह्याएक्फगत्‌।। १०३॥हकम्‌ पाइ इ आठ. वीर्‌हरु पनी साट्‌ जान लाग्या जस ।हात्मा.ओठि लियेर एक्‌ हुकुम भो राम्‌चन्द्रजी को तसे ॥जाऊ काम्‌ पनि साधि आउ हनुमान्‌ ली जाउ ओौँठी पनि।मेरो नाम्‌. यहि ओौव्िमा छर दयां सीताजि चिन्लिन्‌ भनी।।४॥।यो काम्‌ सिद्ध गराउन्या तं तिमिषछौ तिम्रोचछयो बल्‌ भनी।चीन्याको षु तवेत भन्छु मुभ हृन्याछ रस्ता पनि॥येती श्रीरघुनाथको पनि हुकूम्‌ पाया र ओँटी लिया।खूशी भै हनुमानले प्रभुजिमा सम्पूणं तन्‌मन्‌ दिया।। १०५।अंगद्‌ वीर्‌ हनुमानृहरू हुकुमने दक्षिण्‌ दिशामा गया।सवव पृथिवी दंडी दुंडि सरवै घुम्दं ति जादा भया॥एक्‌ दिन्‌ विन्ध्य भिरीविषें वनमहाँ देख्या र राक्षस्‌ जसं ।रावण्‌ हो.कि भनी मुठी कसि कसी मान्या कसले तसे।। १०६॥दिश्ाओंकीओर वानरो को भेज दिया, किन्तु दक्षिण दिश्ाकीओरमहाबली ओौर चुने हुए अत्यन्त पराक्रमी. वानरो को भेजा।अंगदजास्बवन्त, हनुमान, नल, सुषेण, शरभ,मैन्द ओर द्विविद नामक आंवानरो कौ भेजकर केवल सुग्रीव. अकेलाही प्रभुके पास रहा.। १०३सुग्रीव की आज्ञालेकरजसेही येआ वीर जाने लगे, श्रीरामचन्द्रजीहाथमे एक अंगूठी लेकर कह्ने लगे-- जाभो, काममे सफल होकर आभोहनुमान ! यह अंगूठी लो।इसमे मेरानाम अंकित, इसे सीताजीसहज ही पहचान लेंगी इसीलिए दे रहा हूं । १०४ यह :मै भली प्रकारजानताहुं किं इस कायं मे सफलता प्राप्त करनेवाले तुमदही हो, क्योकितुममें वह्‌ शक्ति निहित दहै। इसीलिए मै कहताकि मागमे भी सबप्रकारसेशुभ हीहोगा। श्रीरघुनाथ की यह्‌ आज्ञा पाकर हुनुमाननेप्रसन्न होकर प्रभु से वह ्गंगुटी लेलीओौर सम्पुणे तन-मनसे स्वयं को
प्रभुकी सेवा मे अपित कर दिया । १०५ अंगद ओर वीर हनुमान प्रभकी आज्ञानुसार दक्षिण दिशा की जोर चले गए । पृथ्वी पर चारोंगौरदूढते हुए जा रहं थे, तभी एक दिन विन्ध्यपवंत के 'बीचोबीच वनमएकं राक्षस कोदेखा ओर उसे रावण समक्षकरसब ने उस पर मुष्टिका(घूस) से प्रहार किया! १०६ परन्तु वह्‌ रावण नहींथा यह्‌ जानकर

भानुभक्त-रामायण

१३८
गईरावण्‌ होइन यो त जाडं भनी फर्‌ अर्का वनेमादुद्ध्या प्यास वढचो र जल्‌ पनिदुंडी हिडथ्या ति .आकुल्‌ भई]गृफा देखि त पप्वांख्‌ चिसा गरिगरी हस्‌ निस्किंदादेखि तेस्‌ ।गफा भित्र पस्या सवै विरहरू देख्या बहुत्‌ बस्ति बेस्‌।।७॥रण्डा जल्‌ सितका तलाउ पनि धेर्‌ स्‌ वृक्ष फलूफूल्‌ भरी ।धेर्‌छन्‌ घर्‌ घरमा छ चीज्‌ पनि अनेक हीरा जवाहर धरी॥गुलूजार्‌ देखनु भव्या मनुष्यहरु ता एक्‌ देख्नु नाहीं कहीं ।एक्‌ योगीनि स्वयंप्रभाकेन ` जहां ध्यान्‌ गदि देख्यातदहीं।।८॥सोधिन्‌ योगिनिले प्रणाम्‌ तव गथ्या . वुन्‌ काम आयौ यहाँ ।क्या सनूयुब्‌ छ बताउ फर्‌ अब उपर्‌ जान्‌ छ इच्छा . जर्हा।हन्‌मानले ।यस्ता योगिनिका वचन्‌ सुनि तहां वोत्याआयौ आज यहाँ सवै यति जना केवल्‌ जलै खानले ॥९॥कामयैहो यहि काम गर्नु भनी विस्तार्‌ सुनाया जसं,साहं खुश्‌ हनुमानकाः वचनले - हेदी भडइन्‌ ती तसै ॥आऊयहाँ।बोलिन्‌ फलूफल खाउ जल्‌ पनि पिई फकरमेरो नाम बताइ आज, तमताः जान्छ प्रभू छन्‌जहां ।।१०॥अन्य वनमें जाकर खोज करने लगे। खोज करते-करते जववेप्यासेहुए तो अत्यन्त आकूल होकर जल की खोज करने लगे 1 इतनेमे भचानकएक गफासे हंसों को अपने पर भिगो-भिगोकर
वाहुर निकलते देखा ।
अतः उसी गुफामें समस्त वीरो सहित प्रवेश किया तो वहां एक अत्यन्त

उत्तम वस्ती देखी .।- १०७

उन्होने देखा कि . वहाँ पर शीतल -जल वाले

तालावके चारों ओर वृक्ष ह, जो फल-फूलों से लदेहुएदहैँ।1

अनेकों घर

भी ह जिनमें तमाम वस्तुं ओर हीरे-जवाहरात. भरे पड़ हैँ । परन्तु व्हान तो कोई चहल-पहल थी न कोई मनुष्य था; केवल एक योगिनी, जिसकानाम स्वयंप्रभा था, ध्यानमग्न वटी थी। १०८. योगिनी ने जव उनवानरो से यहु प्रष्नःकिया कि आप लोग किस कामसे आए, क्या इच्छाहे ओर

अव आगे कहं जानाहै तवःसव

वान्ररोंने योगिनी को प्रणाम

किया ओर योभिनीके एेसे वचनों को सुनकर" हनुमानते कहा किइससमय हम सव लोग केवल जल पीने के लिए आए । १०९ जव हनूमानने अपने -आने का कारण तथा कायं के विषयमे सविस्तार कह सुनायातो "योजिनी अत्यन्त हर्षित हुई यौर उन्हं फलादि खाने को देकर बौली किखा-पीकर जाओ ओर मेरा नाम बताकर लौट आओरैभी जहाँ प्रभ

दै वहां जाऊंगी । ११०

योगिनी के आदेशानुसार वे जलपान करके गए

नैपाली-हिन्दी `

१३९
यस्ता योभिनिका वचन्‌ सुनि गगा जल्पान गरी फेर `पनि।आया. योगिनिले गरिन्‌ सब कुरा राम्‌का इ दूत्‌ हुन्‌ भनी ॥हेमाकी सखि हं सखी गदहगदन्‌ उन्का वचन्‌ले यहाँ ।धेर वषे बसी प्रभ भजि लिदा एले कृतार्थे - भयां ।१११॥।भन्थिन्‌ राम्‌ अवतार्‌ हुन्याछ हरिको ` हुर््याछ रावण्‌ सिता ।खोज्न्या वानर आउनन्‌ तहि तवक्‌ याही रह. तीमि ता॥वानर्को रघुनाथको गरि पुजा ये ब्रह्मलोक्‌ पाउली।जान्छं आजम ता तिमी बसिरहू व्येकाल्‌ पछी आउली।। १२॥यस्तो अति दिई गडइन्‌- सडिनिञ्यू जुन्‌ ब्रह्मलोर्‌ ही वहां ।नाच्तंमा शिव खृशृहंदा अधि दियां यो स्थान बस्ती यहाँ ।॥` गन्धव कन्या सबै ।पूत्री हुन्‌ उत बिश्वकमेकि मविस्तार आज कल्यां म जान्छ खशिभं जाहाँ प्रभू छन्‌ अने।। ११३॥आंखा चिम्ल पू्याइदिन्छु सहजं रस्ता विषे क्षणूमहांरास्तामर्हां ॥जाऊ तीमिहरू पनी भनि सहज्‌ पौचादइ्‌श्रीरास्चन्द्रजिथ्ये ति योगिनि गदन्‌ वानर्‌ पृग्या रस्तिमा।,पौचिन्‌ योगिनि रामको. कुटि जहाँ थीयो उस बस्तिमा।।१४॥ओर लौटकर आगएु। उन्हूंरामके दूत जानकर योगिनीने भी उनसेअच्छी तरह बात-चीत की ओौर बताया किमैँहेमा की सहली स्वयंप्रभा
हे । सहेली तो चली गई परमै उसी के वचनके प्रभावसे यहींबेटीहं । यही रहकर कितने ही वर्षोसे में प्रभु कों भजते-भजते आज कृताथहुई हं । १११ उसका कथनथाकिश्रीराम का अवतार होगा, तब उनकीपत्नी सीता का-रावण द्वारा हरण होगा, उस समय उन्हं दढता हा वानर
यहाँ आएगा; तव तक तुम यहीं रहो । उस समय वानर तथा रघुनाथकी पुजा करके ब्रह्मलोक आओगी मै जातीं । तुम वेठी रहौ कू समयके बाद आओगी। ११२ -.रेपे उपदेश देकर मेरी सहली उसी समय ब्रहमलोक को चली गई । वहाँ उसके नव्यसे प्रसन्न होकर. शिवजी ने उसे
यह्‌ वस्ती दीथी.।
वहु विश्वकर्मा कीपृत्री है जौर मै गन्धवे-कन्या हूं ।
इस प्रकार विस्तृत वणेन कर स्वयंप्रभा ते प्रसन्नचित्त होकर जहां प्रभह वहीं जाने की इच्छा प्रकट की ११३ ~ (फिर उसने कहा कि) ओंखंबन्द करो; मै सहज ही मे तुम्हे रास्ते तक पहुचा दुंगी, यह्‌ -कहुकम्‌ उसनेउन लोगों को रास्ते पर पहुंचा दिया ।- वह्‌ योगिनी श्रीरामचन्द्रके पासगई । वानर भी रास्ते पर पहुंच गएरासकी कुटी जिस वस्तीमेंथी योगिनी वहां पहुंच गई । ११४ उसने राम कीःस्तुति की ओर र्म

भानुभक्त-रामोयणे

१४०
र बद्रीमहं।:राम्को स्तुति गरन्‌ र वर्‌ दिनुभयो, जाऊमेरो ध्यान्‌ गरि यो बिताउर शरीर्‌, पाडली परमूधाम्‌ तहां ॥जो तिञ्रा मनसा छ त्यो सब पुगोस्‌ यस्तोत वर्‌ ली गद्न्‌.1,रामका वचनले ` संसार तर्दी भद्‌ ११५॥बद्रीमा गदभनेर वानरहृरू. फिर्थ्या सब , वनूमर्हा |सीता खोजनवित्तिगयो धेरकाल एकदिन्‌ तर्हा ॥नपादसीतालादइ्‌अंगद्ले अति शोक्‌ ग्या अब सहन्‌ माछन्‌, सबेको .गयोप्यारो प्राण गरौ कसो अव मन्यौ वचन्‌ यहीं तक्‌ भयो।। १६॥सुग्रीवले त॒ मलाई . मानु छ सहज्‌ पाया निह. यो पनि।मान्‌ निश्चय शतु जानि अहिले यो शतको वीज्‌ भनी ॥केवल्‌ राम-कृपा हुंदा अधि बर्च्यां एले त राम्‌ले पनि।'दिन्छन्‌ निश्चय मार्नलाईइ मतलब्‌ खोजेन सीता भनी ॥१७।]अंगद्का इ वचन्‌ सुनीकन तहां क्वे बिन्ति यो पादंछन्‌ |हे साहेब ! यहीं बसौ यहि बस्या कन्‌ पाठले मादंछन्‌ ॥अंगद्काअरुवानरादिहुरुका सून्या र -कूरा तहांनोल्या श्रीहनुमानले किन बहुत्‌ छोटो गच्यौ बात्‌ यहां ॥॥१८॥।ने (प्रसन्न होकर)उसे वर दिया । उसे आज्ञा भिली कि बदरीनारायण धाममे जाकर मेराध्यान करो, तभी तुम्हं परमधाम प्राप्त होगा। “जोतुम्हारे मन मेंहै वह सब तुम्हं प्राप्तहो" एेसा वर प्राप्तकर वदरीनारायण धाममें जाकरश्रीरामके ध्यानमें मगनदहो स्वयंप्रभा संसारसे

तर गई । ११५

सीताकी खोज करते हुए वन में घूमते-घूमते वानरो को
बहुत समय बीता, पर सीता नहीं मिली तो एक दिन वर्ह अगद ने अत्यन्तखेद प्रकट किया। अबतो हमसभी मारे जायेगे, सबके प्रिय प्राणोंकी रक्नाकिस प्रकारकीजाये। अवतो लगताहै कि वचने का समय यहीं तक

हे । ११६

सुग्रीव तो बहाना पाकर मृन्े मार ही डलेगा, मुज्ञ शतु का
बीज समन्ञकर सहज ही में समाप्त कर देगा, यह निश्चय जानो |: पहले
तोराम कीकृपासे वचाथा। अव तोराम भी सीताकी खोजनकरनेका कारण वतताकर निश्चय ही मृञ्चे मार डालने का प्रोत्साहन
देगे । ११७ _ अंगद के इन वचनो को सुनकर वहाँ कुछ लोग यह्‌ विनयकरते है, “हे श्रीमन्‌ ! यहीं.रह्‌ जायं । यहाँ रहने पर किस प्रकारमारेगे । _अंगद एवं अन्य वानरो की एेसी बाते सुनकरं हनुमान कहते हैँकरि तुम लोग एेसी तुच्छ कल्पना व्योंकर रहहो? ११८ सुग्रीव केभ्र

नेपाली-हिन्दी

4१४१
सुग्रीव्‌का प्रिय छौ अवश्यं भगवान्‌साचोभन्छुम वेस्‌ कुरा हजुरमाभूभार्‌ हनं . भनेर राम-अवतार्‌कस्को सक्‌ छ सिताजि हनं नर्हितामानिस्‌ को अवतार्‌ भयो प्रभुजिकोगर्छ सेवन भक्तिले प्रभृजिकोजान्याछठौ पछि धाममा पनि ` संगेक्या गछ मनमा कूतकं ह्रिकोयस्ता बात्‌ हनुमानका सुनि बुश्या
राम्‌चन्द्रजीकापति ।यस्तोकारण्‌ भनी॥आदी पुरुषूको भयो ।इच्छा प्रभूकंछ्यो ॥११९॥सेवक्‌ त॒ बानर भई।केवल्‌ हुकूमूमा रही ॥यो जान मनले . यहं ।
तेस्को नाम महेन हो नजिकमापृथ्वीमा न मिलिन्‌ सितान जलमा
देखिन्छ सागर जहाँ ।।२१॥
रिसछेन कस्स महां।१२०॥अंगद र खृशी भई।न्ध्याचल्‌ गिरिका कुनाकुनिसमेत्‌ सम्पूणं खोज्दं गई ॥पौच्या क्षीरसमूद्रका तिरमर्हां पवेत्‌ थियो एक्‌ तहां ।जान्याछ

वाटो

कते ।
खो्जौ जाऊं भन्या सव्यं पृथिवि सब्‌ पायौन - सीता कसे ॥फर्की जाडं भन्या पनी - अब सहन्‌ माछेन्‌ त चाही यहीं ।मनू आज निको भनेर तिरमा वंदर्‌ बस्या सब्‌ तही।। २२
तोतुमप्रियहोही, श्रीरामके भी अवश्य त्रियहो।वडी उत्तम वातदहै।मे अवतारलियादहै।

सत्य कहता हूं यह्‌

श्रीरामने भुभार-हरण करनेके लिए पुरुष केसरूपकिसकी श्क्तिहै जोसीता काह्रण करे? यह्‌

स्वयं प्रभु की ही इच्छा है। ११९

प्रभुजीने मनुप्यके रूपमे अवतार

लिया है ओर वानर उनके सेवक वने हं । उनकी भाज्ञाका पालन करतेहए हम लोग प्रभु जी की सेवा भक्तिपूर्वकं करेगे । जिससे अन्त मे परमधाम को प्राप्त होगे, यह्‌ भी मनमेंजानलो। मन में कुतकं उत्पन्न करके
क्याक्रोगे?

हरिका किसीके उपर क्रोध नहींहै। १२०

हनुमान

जीकी बातोंको सुन ओर समञ्चकर अंगद प्रसन्न हुए ओौर विन्ध्याचलपवत के कोने-कोने मे सीताजीकी खोज करनेलगे।! पेक्षीर-सागरकेकिनारे पहुचे । वहां एक पर्वत था जिसका नाम महेन्रथा। वहाँसमुद्र अत्यन्त निकट दिखाई देताथा। १२१ पृथ्वी पर सीता जी कीं
भी नहीं मिलींतो सोचने लगेक्रि जलमेंहीजनेका माशंरढढा जाये,
वयोकि सम्पूणं पृथ्वी पर न भिलनेसे लौट भी जायेगे तो मारे ही जा्येगे ।
अतः सरनादही उत्तम रहैयह समञ्ञकर सवे वानर किनारे पर वैठगए । १२२ उस वन का निवासी एक वृद्ध शिद्धजैसे दही वाहुर निकला
१४२

भनुभक्त-रामायर्णं

थीया ति निस्क्या जचं।देख्या ति वानर तसं ॥
सम्पाती अति यद्ध गृद्ध वनमाहेव्या दुष्ट फिराद्‌ तेस्‌ तिरमहांबोल्या वाक्य पनी म भ्ठ अव पेट्‌अंगद वीरहरुले सन्या र इ वचन्‌लाग्या भ्व सवं ति वानरहरूमनँ आज अवश्य माषं यसलेकव्यावात्‌ भाग्य जटायुको प्रभुजिकोठाकुरलाई रिज्ञाइई पार्‌ पनि गयाव्यथं हामि त॒ गृद्धका मूखविषेयेती वानरका वचन्‌ सनि तसंहे वीर्‌ हो नडराउ आज तिमिलेमेरे भाइ जटायु हो कटु खवर्‌अद्कृद्‌ वीरहरुलाइ नभय दिईसब्‌ वृत्तान्त वताइ अद्धदजिलेसम्पाती तहि भन्दछन्‌ मकन लौदिन्ल्‌ आज जटायुलाइ जलदान्‌
लजाउसागर्‌ मर्ह ।चांडो म एेले तहां । १२६॥
सीताकोम वताडउ्ला सव खबर्‌ई बात्‌ सूनि उचालिञ्चट्‌ लगिदिया
स्नान्‌ अजञ्जलीदान्‌ गरी।सम्पातिले स्तान्‌ गरी॥
पायांअहारा भनी।साह उराया पनि।। १२३आये हाग्रोत काल्‌।
यो गृद्धको हैर चात्‌ ॥प्यारो हन्या काम्‌ गरी।.
संसार सागर तरी।।१२४॥

सव्‌ पनं आर्यो

यहाँ ।.

सम्पाति

तहा ॥

वोव्या

प्यारो पुनायौ कुरा।तेस्का त सप्पे कुरा।॥२५॥येती भन्याथ्या जसँ।

विस्तार्‌

सुनाया तसं ॥
गौर उसने तटकी ओर दष्टिडालीतो उसे वानर दष्टि मे गाएउन्हे देखते ही वह्‌ वोला, मृन्गे आहार मिला है; अव पेट भर लंगा | अंगदआदि वीर उसके इन वचनो को सुनकर अत्यन्त भयभीत हुए । १२३ वै
सव वोले किजवतो काल निकटहीञ पहुंचादहै। आज तो अवश्यहीमरेगे। इस शिद्ध की चाल देखो ! यह्‌ आज अवश्यहीहमलोगोकोखाउलिगा। जटायु भी कसा भाग्यशालीथा जो प्रभ काग्रिय कमं करकेउन्हं सतुष्ट करके ससार-सागरको पार कर गया । १२४ वानर परस्परकह्ने लगे कि हम व्यथंही गिद्ध के मुंह के समक्ष आषएरहै। वानरोंकेन वचनो को सुनकर सम्पाति नेक्हा-हेवीरो!तुम वीरहो, भयन करो।

आज तुम लोगोंने वड़ी अच्छी बात

सुनाईहै; जटायु मेरा

ही भाई)उसके बारेमे सविस्तार सव समाचार. वताओ। १२५तव अंगदने उक्षे सव. वृत्तांतं सविस्तार कह सुनाया। उसी समयसम्पाति बोला, मुञ्चे शीघ्र सागरमे ले चलो, आज मै अपने-भाई्‌ जटायुको जलदान दूगा । १२६ स्नान एवं अंजलि-दान कर्मं सीताजी केवारेमें सव समाचार वता्ंगा। इस वातको सुनकर वानर तुरन्त

नेपाली-हिन्दी

१४३
, राखीदिया .।दीया अज्जलिदान्‌ जस फिरि उही त्यायेरसम्पाती खशि भै सवे कहिदिया आपत्तिदेख्तं धिया ।। १२५७॥पनि ।हे वीर्‌ हो !मत गृद्धहूंरमसिता देख्छ्‌ नजरलेयाही छन्‌ यहि भष्‌ छ येति संग छन्‌ यस्तो छ चाला भनी।)भन्छ्‌ सब्‌ तिमिलाईइ चार सय कोश जो कुद्न सक्छौ य्हसोल्का पनि पुण्दषछठौ उति कुया पौचिन्छ लद्धुामहां।। १२८॥।लङ्कामाति सिताजि छन्‌ तहि गया मिल्छिन्‌ सिताजी वहां ।गाहो चार्‌ सय कोश कदन छ तहीं जाऊ न जाऊ तहांरावण्ूले लगि भित्र गुप्ति वनम राख्याकि छन्‌ बेश्‌ गरी 1पौँची भेट्‌ गर जान सक्छ तिमिमा को यो सनुद्रै तरी।१२९॥अश्शोक्को वनभितर वृक्ष छ असल एक्‌ शिशपाको तदहीं ।सीताछन्‌ तहि भेट्‌ हुन्याछतदिलौ जायो गऊ काल्‌ यहींक्यारू रावणलाइ मानः म सहन्‌ मार्स्या धियां होरको।साक्षात्‌ सूयजिका कठोर्‌ किरणले' प्वांखें उढचासब्‌ र पो।। १३०॥जाऊ चार्‌ सय कोश कुद्न सकन्या वन्‌ वीर्‌ छ सागर्‌ महां ।आऊयदहं ॥सीताको समचार्‌ खवर बुक्चि सहन्‌ फकरमी
किकी
+~
=+
^+
+ ए
~ ~-^~~~~--~~
सम्पात्तिको उठाकरले गये ओर जैसे-ही वह्‌ अंजलि-दान कर चुका, वैसेही उसको पूतः वही लाकर रख दिया । सम्पाति ने प्रसन्न होकरसबकूुषछछकह्‌सुनाया । १२७ ' हे वीरोः! मँतो गिद्ध हूंअतः मै अपनी आंखों से यहींसे.सीताजी को देख रहा हूंकि वहु किस स्थान पर ह, करिसरूपम हं किनकेसंगमे ओर कंसी यृक्तिमे(फसी)ह। मैतुम्हंसव बतलाताहूं। यहाँसेजोचार.सौ कोस छलांग भर सकेगा, व्रह लंका पहुंच जायेगा । १२८ सीताजीलका में हीह. वही जाने पर :मिल जार्येगी। चार सौ कोसकृदना कठिनिहै। .तबभी किसी प्रकार वहं अवश्य जाओ।सीताजीको रावणनेले जाकर लंका केःअन्दर एक गुप्त वनमें रखा.है। समुद्रपार कर तुममेसेजो वरहाँंजा, सकताहो जाये, ओर भेंट करे। १२९अशोक वन के अन्दर एकं अत्यन्त उत्तम शिशपाका वृक्षहै। सीताजीवही 'है,.वहीं भेट होगी अतः चले जाओ । क्या बताये समय निकल गया ।मे रावण को सहजन ही मार सकता था, परन्तु साक्षात्‌ सूयं की तीव्र किरणोंसे (मेरे पंख) जल गये हैँओौर्‌ इस कारण लाचार होना पड़ा । १३५चार सौ कोस कद सक्नेवाला वीर कौन रहै,? , वह्‌ चला जाये ओर सीताक समाचार आदि-पता लगाकर लोट आये। यह्‌ समाचार बताकर, पन;
१४४

भानुभक्त-रामायण

यो समचार बताई फेर्‌ खुशि भईजन्‌ रीतृले अधिप्वांख्‌डढयार विपती
सम्पाती र जटायु भाद्‌ दुदहूंबल्‌ जान्नाकन दरद भाद उडिगे
आपन्‌ हवाल्‌ स्‌ कट्या |पाई अनेक्ताप्‌ सह्या।।३१॥हाम्रो कती, वल्‌ भनी।.
श्रीसूय विमू्ेमनि ॥पुर्दामा ति जटायुले त॒ अत्ति ताप्‌ मान्या र छोर्प्यां जसं ।च्या भाद्‌ जटायु क्यारं म गिर्व्यां मेरा उढचा प्वांख्‌ तसे।३२॥उच्चादेखि गि्यां म विन्ध्यगिरिमा तीन्‌ दिन्‌त मूर्छा भयां।
व्यूयाँथ्यां जव चन्द्रमा मुनि मित्यासोध्या ती ऋषिले र सब्‌ जव भन्यांमेरो चित्त बुञ्लाउनाकन भन्यायस्तो हृन्छ विपत्ति गभं रहुंदायस्तो हुन्छ वृढो हंदात भनुं क्याजाहाँ देह वन्यो रदुःखछ भनीजाहांँ देह छ ताहि दुःख छ चिन््यातस्मात्‌ दुःख नमान देह तरोग्‌

श्रीरामको अवतार्‌ हन्या बखततक्‌ं

तिन्‌का नजीक्मा ग्यां ॥ ,
आप्ता विपत्‌का गति।सन्‌ दुःख हुन्छन्‌ जति।।३३॥यो हृन्छ यौवन्‌महां।थाहै छ -सब्‌ मनूमहां॥पदनभन्नू- पनि।सांँचो कुरा हो भनी ॥३४॥दुःखादि. सारा सही।यस्सं जगामा रही ॥
प्रसन्न होते हृए अपना भी सव हाल वताया कि किस प्रकार उसके पंखजल गये ओर उसने विपत्ति में पड़कर अनेकों कष्ट सहे । १३१ सम्पातिओर जटायु हमदो भाई हैँ।1 हममे कितना वल है यह्‌ जानने के लिएहम दोनो भाई सूयेमण्डल के समीप पहुंचे थे।

वहां पहुंचने पर जटायु

को जसे ही अत्यन्त ताप का अनुभव हुभा उसने उडना छोड दिया । जटायुतो वच गया परन्तु मँ (उड़ता ही गया ।) क्या करूं मेरे पंख जल गयेओर म गिर गया 1 १२२ मै इतने ऊचे से विन्ध्यभिरिःमें भिराकरि तीन दिन तक मूर्ति पडा रहा। जसे ही मून चेतना आयीमूञ्ञे चन्द्रमा मुनि मिले ओर मै उनके निकट गया । उन ऋषि के पृषछठनेपर मने अपनी सारी विपत्ति कह सुनाई । मेरे चित्तको सान्त्वना देनेके लिए उन्होने सभी दृखों के विषय में वताया । १३३(उन्होने कहा)
गवं करने से एेसी ही विपत्ति प्राप्त होती है ओर यौवन के बाद `वृद्ध होनेपरतो कंसा दुख होताहै क्या कहं; सब मनमें ज्ञात हीरहै। जहाँ देहका सृजन हुआ वहाँदुःखकी प्राप्तिहोती ही है; जहा देह दहै वहीं दुःखदे, इसे ही सत्य जानो । १३४ इसीलिए दुःख न मानो, देह रहै तो रोगहैमौरदुःख भीदहै। श्रीराम के अवतार होने के समय तक तुम इसी
स्थान पर ` रहौ ओौर कुष काल न्यतीतकरो।

राम का अवतार दोगा

नेपाली-हिन्दी

१४५
केटी काल विताउ राम अवतार्‌हरल रावणले र॒ तेस्‌ वखतसमावीर्‌ बानर्हरु आनन्‌ ति संग भेद्‌सीताको समचार्‌ जसँत कहुलाभन्थ्या सोहि कुरा सब पुगि गयोप्वांख्‌ देखाइ विदा भई उडिगयाअङ्कद्‌ वीर्हरु खुश्‌ भया अब सिलिन्‌लाग्या गम्न समूद्रलाइ र गमन्‌फेरी ताप्‌ मनमा पन्यो र अतिशोक्‌
होला र सीता पनि।सीताजि खोज्नं भनी ।३५।।होला उ वेला महाँ।
अंगद्लादई्‌वबुन्नाउनाकन अधीसाहेव्‌ । शोक्‌ रतिभर्‌ कदापि नहवस्‌
अङ्घद्लादइ बुक्लाइ सट हनुमान्‌पँची वेस्‌ स्तुति गदंछन्‌ किन यहाँरामूका काम निमित्त मात्र हनुमान्‌,क्या वर्णेन्‌ वलको गरू जव तिमी
पाक्याको फलओर सीताका

ठनि सूयेकनता

भीरावण

प्वख उस्रनन्‌ फर्‌ तहां ॥हैर्‌ प्वांख उस्व्या भनी।जाऊ तिमी लौ भनी।। १३६।।सीता भनी सन्‌ जसे ।.गर्ने नसव्न्‌कसे ॥अद्कद्जि गर्द भया।श्रीजाम्बवान्‌जी गया।। ३७॥।
जाउन्‌ हनूमान्‌ भनी ।जीका नजीक्मा पनि +चूप्चाप्‌ भई दूर्‌ रह्यौ।योजन्म लींदा भयौ || ३८जन्म्यौ उसं फल्‌ भनी ।हात्‌ले म॒रिम्छ्‌ भनी ॥

द्वाराहरण होगा

खोजते हए वीर वानर आदि अयेगे । १३५

उसीसमयसीताजीको

उन लोगों से तुम्हारी भेट

होगी ओौर उसी समय जव तुम सीताजी के समाचार सुनाओगे, तुम्हारेपख फिर से उम आयेगे । उनकी कही गयी वही सब बातें अब पूणं हो रही
हँ । अपने उगे हुए पंो को दिखाकर संपातिने विदाई ली ओर सवसेजाने की इच्छा प्रकट करके उड़ गया । १३६९ अंगद आदि वीरकोजैसे ही यह्‌ मालूम हुआ कि अव सीता मिल गयीं, उन्हं हादिक प्रसन्नताहई । वे समुद्रो को गिनने लये ओरपारजा सकनेका कोई मां सोचनेलगे; किन्तु उन्हं कोई मागं नहीं सूक्ञा ओर वे मन मे चिन्तित होने लगे।
अंगद गहरे शोक में इव गये!

अंगद को सान्त्वना देने के लिए

श्रीजाम्बवन्त आगे बहे । १३७ श्रीमान्‌ ! आप किचितमात्रभी शोकन करे, हनुमान चला जायेया। अंगद को समज्ञाकर हनुमान के निकटपहुंचे ओर उनकी उत्तम प्रशंसा करने लगे । तुमने ये जन्म राम के लिएही लिया दहैअौरतुमदही यहां चूपचापद्रूर वेठेहो। १३८तुम्हारे वलकेवारेमें मैक्या वणेन कर्ं। जव तुम जन्मेथे, सूर्यको पका हजफल समञ्ञकर उसे हाथ से पकड़ने के लिए तुमने आकाणकी गोर छर्लग

भानुभक्त-रामायण

१४६
आकाशूमा जब ता कुचौ दुद हजार्‌यस्ता बालकमै धियौ किन यहाँसून्या सन्‌ हनुमानले स्तुति तर्हाँसादं खृश्‌ हनुमान्‌ भया र खुश्शिलेपेत्‌ तुल्य बडो स्वरूप्‌ धरि वचन्‌लद्धुूा भस्म गराइ रावण समेत्‌सीता लीकन आञ्छ्‌ कि रिसलेज्यंदे दाखिल गुं राम्‌चरणमाकीताछन्‌ तिसिता यहाँ भनि खवर्‌
किष

श्रीरघुनाथका

चरणमा

श्रीराम्‌का चरणारविन्दं सनमानोल्या श्रीहुनुमानले यति कुराभन्छन्‌ श्रीहनुमानलाई तिमिलफर्क आउ सिताजिको खरलीख्वामित्‌का संग लागि गैकन पष्ठीभन्दा खृशि भई विदा भइलियासारीथी।
कोशूतक्‌ पुगी फर्‌ क्षप्यौ |कोश्‌चार्‌सथेमा उप्यौ।।३९॥जो जाम्बवान्‌ले गन्या |खुप्‌ गजना पो गव्या॥वोल्या म सागर तरी।सन्‌ सेन्य चूर्णं गरी ।|४०॥सन्डयाइई रावण्‌ पनि।खनी हज्रको भनी॥मावे सिताको लिई।तन्‌ मन्‌ वचन्‌ सब्‌दिई।।४१॥धर्यं र उटता जसं।श्री जास्बवानूले तसै ॥भेर्‌ सात्र एले मरी,
एक्लै नलड्न्या गरी।४२॥
सक्भर्‌ लला भनी।सद्‌ कूद्न मन्‌ सुब्‌ पनि ॥
उस समयतुम दो हजार कोस पहुंचकर पुनः लौटे थे! जव
तुम बाल्यावस्थामेही पएेसेथेतो यहाँ केवल चार सौ कोस

लिए क्यों

उर करवैठेहौ। १३९ जास्बवन्त की इन सव बातोंको हनुमान ने सुनाओर अत्यन्त प्रसन्न हुए । प्रसन्नता के मारे वे जोर-शोर से गजंन करने लगे ।इसके बाद वे पवेत तुल्य विराट रूप धारण करके वोले किम सागर पारकर लंका को भस्म करने के वाद रावण सहित उनकी सेनाओं को समाप्तकर दंगा | १४० सीताजीकोले आगा ओौररावण को लटकाकर जीवितहव्यारेके रूपमे श्रीराम के चरणों में उपस्थित करूंगा ! नहीं तो सीताजीके बारेमे सूचना मिलतेदही श्रीरघुनाथके चरणोंमें लौट आगा ओरअपना तन-मन-बचन सब (उनके लिए) अपण कर्गा । १४१ श्रीरामके चरणारविन्द मनम धारण कर हनूमाननेजैसे ही यह्‌ इच्छा प्रगटकी
वसे ही जास्बचन्त ने श्रीहनुमान से कहाकिकरके सीताजी की सूचना चेकर लौट आओ;मत मोललो) १४२
हनुमान, अभी केवल भटअकेले लड़ने का ्ंञ्लट
स्वामीके संग जाकर वबादमें हम लोग यथासाध्य
लड़ंगे । एसी बात सुनकर अस्यन्त प्रसन्न हो हनूमान ने विदाई ली मौरतुरन्त कृदने को मनम ठानी। लाल मुख पीला शरीर धारण क्यिहृए

नेपाली-हिन्दी

लालमृख्‌ पीतशरीर्‌ गरी भिरि उपर्‌सन्‌ प्राणीहरुले तहां ति हनुमान्‌-
जल्दी हनूमान्‌ गया ।जीलाईइ है्दा भया ॥ १४३
।। किष्किन्धाकाण्ड समाप्त ॥
|न~~
१४७
~~~ ^ ~-~-^~--~-^ ~~
हनुमान शीघ्रही पर्व॑त के उपर चले गये ओौर सव प्राणी हनुमान कोदेखने लगे । १४३किष्किन्धाकाण्ड समाप्त
सुन्दर काण्डतष क्षार समुद्र आजश्रीरामूका चरणारविन्द
सहजेमनले
भन्या इरादा धरी।अत्यन्त चिन्तन्‌ गरी॥

भन्छन्‌ वीरहरुलाद ताहि हनुमान्‌

हे वीर हो! पार्‌ तरी।
सीताजीकन भेट्तष््‌ म॒ अहिले जन्छ्‌ बडोवेग्‌ धरी ॥१।।पापी जन्‌ पनि रामका स्मरणले संसार पार्‌ तषठंता।रामकं काम निमित्त ओठि संग ली जन्छ्‌ दूतं हूंमता।),क्या उर्‌ क्षार समुद्र तनं सहजे पौँचन्छु लंका भनी ।चारे पाठ जसिन्‌ विषे धरसि कुद्या दहैर्दे तमसा पनि।२॥दक्लिण्‌ तरम्‌ युख गरीकन कृद्नबस्ता।उपर्‌ नजर्‌ दि अधिका दूइ पाड धस्ता॥सोज्ञो गरादइकन घाटि कृुद्याजसं ता।वाथ सरी हून गया हनुमान्‌ तसं ता।३॥~~~
~ ~ ~ +~ ~ ~~~
उसी दिन क्षीरसागर पार कर लेने की कामना से उन्होने मन दही मनश्रीराम के चरणारविन्दोंका ध्यान कर अपने वीरो से कहा-हे वीरो! नैंसागरके पार पहुंच कर बड़ी तेजी से जाकर सीताजी से भेट कगा । १पापी जन भी केवल रामकास्मरण करके ही संसार-सागरपार कर लेतेह! रामकेदही कायंसे यह्‌ अंगूढी लेकर जागा) मैतोउनका हीदूत ह, उर किस बातका है? क्षीरसागर पार कर शीघ्र ही लंका
पहुचूगा । एसा कह कर चारो पव-हाय धरती पर जसा कर कौतुक केसाथक्दे1२
हनूमानने दक्षिण की ओर मुंह करके कदनेके लिए ऊपर
दुष्ट उठायी ओर आगेके दोनों हाथों को जमाकरजैरै ही गर्दन उठायी

भानुभक्त-रामाव्म

पत
आकाश्‌ मागे गरी कुया र हनुमान्‌सीताजीकन भेटि फकिकन फर्‌पुर्या अक्क वल्‌ छ छन इनकोइन्द्रादीहरुचेखटाइसुरसाजल्दी गे सुरसा अधिलूतिर वसिन्‌वया भन्छन्‌ हनुमान्‌ भनेर खृशि भैभोकी धेर्‌ दिनकीम खोजिहिड्थ्यांपायां बल्ल यहाँ मिल्यौ तिमित एक्‌आञुलौ पस मूखमा जव भनिन्‌भन्छन्‌ आज सिता नभेटिकन तासीतामभेटिम फकूला र रधुनाथविस्तार विन्ति गरेर आद पसुंलायस्ताबात्‌ सुनि भन्दछिन्‌ ति सुरसानिस्की जाउ नदीं भन्याम वललमाछ येति भनिन्‌ रलौ तव यहांचार्‌ कोए्कोतशरीर्‌ गरीकन ठस्या^~
"^^~~-~~-~^~~~~ ~~~
~ ~~ ^ ~
~~~
^
~ ^~
उद्ध्या ति अकाग्रमा।राम्‌चद्द्रकापासमा॥चूली सव वल्‌ भनी।री पठावा परि 1+४]
हन्‌मानका ।करा गरिन्‌ खानका॥व्या खां अहारा भनी)सादं भयां दृष्‌ पनि ।५॥वौल्याहन॒मान्‌ तसतं ।पस्तीनं मृख्माक्सं॥ज्यकाहजुरता गद्रं।तिस्रो अहारा भद्रं ६मरामुखमा पती ।पक्रेर्‌ दाहाधसी ॥मुख्‌ वाढ चांडो भनी।आफ्‌ हुन्‌मान्‌ पनि ।॥८॥~^
^~
~
ओर छलांग मारी, वतेही व्रायुफे पतमान उड़्च्चे। ३

जव हूनुमान

आकाशकी ओर कूदकर वायु-मण्डलमं उड़तो इन्रादिने यह्‌ जानना चाहाकि हनुमान में सीतास्ेभेट करके लौट कर श्रीरासचन्द्रजी के पास पुनपहुंचने का वुद्धि-वल है अधवा नहीं; ओर्‌ वही जानने के उदेश्य से उन्दनेसुरसा को तुरन्त वहां भेजा! ४८ सुरस्रा शीप्रतासे जाक्रर हनूमान केसमक्ष वंठ गयी ओर यह्‌ जाननेके लिए कि हनुमान क्या कटुता,इस
प्रकारवोलीकि मे तुम्हु खान थयीहं।
क्डुदिनोंकी्रूखौदहं।

क्या

आहार करू, इसी खोज मं भटक रही थी} जज तुम्हं पाकर मै अत्यधिकप्रसन्न हं ५ सुरसाने कृह्ा, "तुम आथो ओौर मेरे मंहंमें प्रवे करोउसके इन वचनो को चुनकर हनुमानने कहा कि आजं सीताजी की खोज
मे हूं, उनसे भेट क्रिये विनामे क्द्रापि तुम्हारे मुंह में प्रवेष सदी क्गा।
सीताजी से मिलकर मै लौट्गा गौर श्रीरामजी मे सतिस्तार चिनत्ती करैपुनः लौटकर तुम्हारा आहार वनकरप्रवेण क्रया) ९ हनूमान की वतिसुनकर सुरसा क्ती है कि मेरे मुह्‌ में प्रवेग करके निकल जाओ, नहींतोमेवलपूवेक पकड़कर दाढ में फौसकःर मार उालूगी } इतना कह्ने पर हनुमानने उसे मह्‌ खोलने को कहा ओीर तुरन्त अपना शरीर चार को का बनाकर

नैपाल -हिन्दौ

१४९
विस्‌ कोशको सुख गरिन्‌।मुख्‌ फेरि जल्दी धरन्‌ ॥को रूप गराई बस्या।अंगुष्ठ स्च भै पस्या।८॥निस्क्या जल्दि र भन्दछन्‌ ति हनुमान हं देवि ! मृख्मा परस्ी।निस्क्यां जान्छुम ता अवश्य अबता बन्देन्‌ काम्‌ ता बसी ॥हन्‌मानका ।अक्कल्‌ बल्‌सितका वचन्‌ जब सुनिन्‌ यस्ताआपन्‌ सत्य कुरा तसे सब कहिन्‌ छाडिन्‌ कुरा खानका ॥९॥
चार्‌ कोए्का हनुमान देखि सुरसाचालीस्‌कोशृहनुमान्‌भयारञसिकोशजल्दी फर्‌ हनुमानले छ विस कोशफोर्‌ दई सय कोश सुख जव गरन्‌
सक्छौ काम्‌ तिमि साधि आउ अनुमात्‌चीन्ह्यां भन्छ म इन्द्रका हजुरमाबल्‌ बुकन भनि इन्द्रका हूकूुमलेखृश्‌ भे स्वगंविषे गन्‌ ति सुरसाजस्ले सागर नाम्‌ घन्या सक्नसोतिनूका वंशमहं विभूषण सरीतिन्‌का काम निमित्त आज हनुमान्‌मैनाक्‌ पवेत! निस्कि जाउ तिमिगे
योबल्‌छ तिग्रो भनी।तिम्रो पराक्रम्‌ पतिआयाकि ता हं भनी।कूद्ा हनूमान्‌ पनि ॥१०॥राजा सगर्‌ जो गया।श्रीराम राजाःभया॥जान्छन्‌ इ लद्धामरहा ।विश्वाम्‌ गरा तहँ ।१९१।।
वेठे! ७ चार कोसका हनूमान देखकर सुरसा ने अपने मुंहको बीसकोस का वनाया ओर तब हनुमान चालिसर कोसकाहुमा। सुरसानेतत्क्षण ही अपना मुँह अस्सी कोस का बनायाहनुमान ते शीघ्रतासे अपने को
एक सौ बीस कोस का वना डाला ओर जवसुरसानेदो सौ कोस का मुह्‌बनाया, वेसे ही अंगूठा-सदुश सूक्ष्म रूप धारणकर हनुमान ने उसके मुंह मेंप्रवेशकिया। ठ सुरसाके मुँहमे प्रवेश कर हनुमान कहतेहैँकिहि देवी मैमह में प्रवेश कर निकल आया हूं । अबरमैजाताहूं। अब जाता हं, यहाँरहकर अवश्य ही कायं में विलम्ब होगा। सुरसा ने जन हनुमान कौ एेसीशक्ति तथा बुद्धिमत्ता देखी तो आहार

करने की बात छोडकर सब सत्य

कहु सुनाया) ९ हनुमान ! तुम अपने कायं में पूणं सफलता प्राप्त करआभोगे। तुममें अपार शक्तिद, यहंर्यैने जान लिया! अवरैडइन्द्रकोभी तुम्हारे पराक्रम के विपयमें कह सुनाञंगी । इद्द्रके आदेशानुसारंतुम्हारी परीक्ना लेने ही आयी थी! इसके वाद सुरसा प्रसन्न होकर स्वगंको चली गयी ओर हनुमान भी कूद पड़े । १० सागर.ने कहा कि जिसने मुञ्चसागरकै नामस विभूषितकियारहै, उन राजा सगरके वंशमें श्रीराम राजा
हए है भौर उन्हीके कायंसे भाज हनुमान लंकाजा रहै है, अतः ह मैनाक
१५०

भनूभक्त-रामांयण

थाक्या हुन्‌ हनुमान्‌ विसाई्‌ फलफूल्‌

खाऊन्‌ र जाउन्‌ भनी।भन्दा सागरका वचन्‌ सुनि तहां निस्क्या ति मैनाक्‌ पनि॥अर्को एक मनुष्यको स्वरूप ली हात्‌ जोरि विन्ती गव्या ।आई फलुपुल्‌ खाइ जाड हनुमान्‌ सन्दं अगाडी सन्या ॥१२॥आज्ञा सागरको हुंदा चरणमा आयां म एेले भनी।पैताक्ले यति विन्तिबात्‌ जब ग्या वोल्या हनूमान्‌ पनि।रामको काम्‌ नगरी बसेर कसरी खान्छ्‌ म जान यसें।हात्ले छृन्छु म लौ भनेर खुशि भै छोयेर कूद्या तसं ।१३॥केही दुर्‌ हनुमान्‌ पुग्या पछि तहां एक्‌ सिंहिका राक्षसी ।छाया पक्रि उ जन्तु खचि बलले खान्थी जलैसावसी ॥छाया पक्रिउ तान्न लागि हनुमान्‌ ज्यूको गती वन्द भो।कस्ले बन्द गव्यो गती भति दिशा दशमा तसै दष्टिगो ।१४॥देख्या तल्‌तिर दृष्टि दीकन तहां जस्स नजर्मापरी।एके चोट्‌ दइ लात्‌ दिया र सहजं घुसुक्कं ताहीं मरी ॥ताहाँ देखि कूदी गया र हनुमान्‌ पच्याजसं तीरमा।लद्कापुरि तहां च्िकूट गिरिका देख्या उपर्‌ शीरमा ॥१५॥पवेत ! प्रकट हो जामो ओर जाकर विश्राम कराओ। ११ हनुमान थकेहोंगे, विश्राम करध लें । उन्हं फल-फूलादि दो, खाकर जाये । इस प्रकारसागर के बचनों को सुनकर मैनाक भीप्रकटहो गये। वे एक अन्यमनुष्यके रूपमे प्रकट होकर आगे वटं ओौर इस प्रकार विनती की-"हे
हनुमान, आओ, फल-फूल खाकर जाना । १२ सागरकी आन्ञापाकरर्मेआपकी सेवा मे उपस्थित हुआ हुं“ । यह्‌ कहकर मैनाक ने जव विनती कीतो हुनुमानने भी कहा कि राम का कायं सिद्ध कयि चिना मै केसे जलपानकरू? भैरेसे ही जातादहूं। केवल हासे स्पशं करके ही चलताहूं।
इतना कहकर प्रसन्न होकर स्पशं किया ओर कूदवेपडे। १३ कृष्दरूरचलकर हनुमान को सिंहिका नामक राक्षसी मिली, जो जलमें ही रहकर अपनीशक्ति द्वारा जीव-जन्तुओं को खींचलेतीथी ओौर उसी से अपना आहारचलाती थी ! उसने छाया देखकर ज्योंही हनुमान को खीचना चाहा त्योहीहनुमान की गति लुप्त हो गयी । किसने गति लुप्त कर दी ? -कहते हुएहनुमान ने दसो दिशाओं की ओर दृष्टिपात किया | १४ हनूमानने जंसेही नीचे की ओर देखा तो राक्षसी दृष्टिगत हृईः; गौर उन्हने दोनों लातोंसेएक साथ प्रहार कियाराक्षसी सहजहीमेंमृल्युको प्राप्तहौो गयी)

नेपाली-हिन्दी

१५१
वरिपरि तहि तीरमा छन्‌ भरी वृक्ष फलूफूल्‌ ।जउन वनमरहाँं धेर गर्द॑छन्‌ पकषिले गल्‌ ॥भ्रमरहरलताकफूलमाहल्वि ह्ली ।घुनुनु घुनूनु गदे हिडदछन्‌ बट्लि बल्ली ।॥१६॥नजर वरिपरीको जो छ शोभा नजर भो।
चचिकुट गिरिवरिपरिसहजसंग
उपरका पूरिमा फर्‌ नजर्‌ गो॥
परखाल्‌ छन्‌ बीच-नीच्मा छ खावा।दावा ॥१७।।.गनं को सक्छअख्ले

अति तखत

पञ्याको खुप्‌ अगम

देखि लंका!
यहि घडि पसि जाँ की राति जां येति शंका॥गरिकनठहरायायाहि ब्स्छ्‌ र राती।सहज सित म जालां जान ता राति जाती ।१८॥तहि बसि यति गम्ले बँकि दिन्‌ सव्‌ विताया।दिन विति जब रात्‌ भो जान पा चलाया ॥
स्वरूप पनि तसानू्‌ ली पस्याथ्या जस ता।दगुरि नजिक आइन्‌ लंकिनी पो तसं ता।१९॥
वह से कूकर हनुमान किनारे पहुंच गये अर वहां से तरिकूटभिरि के उपरीशिखर से लंकापुरी देखी । १५ उन्होने देखा, किनारे चारों ओर फलों सेलदे वृक्षहै। उस वन के पक्षीगण अपनी मधुर ध्वनिसे वातावरणकौगुंजित कर रह हँ ओर भंवरे लताओंमे लगे फूलों के साथ ज्ूम-्ूमकरगुनगुनाति हुए उड रहै हैँ । १६ हनुमान ने वहाँ की एसी छटा देखी, फिर
चिकूटगिरिके उपरसे दूर तक दष्टिपात किया-चारोंओर दीवार खडीहै जर बीचोवीच में पहरा लगाहं। देसी जगह मे, भला कौन सहज ही
मे आक्रमण कर सकता है ? १७ अति जगम जौर कठोर व्यवस्थापू्णं लंकाको देखकर हनुमान सोचने लगे-इसी समय प्रवेश करे अथवा राच्चिमें?
सोचते-सोचते, निश्चय किया कि अभी यहीं ठह्रता हूं; रचि में ही सरलता
होगी, वही समय इस काये के लिए उत्तम है । १८ एेसा सोचकर श्ञेष दिनंवहीं ठहर कर बिताया 1
दिन व्यतीतदहोगया।

लिए पावि उठाया । सूक्ष्मरूपं धारणकर

रातआयीतोनजानेके

उन्होने जसे ही प्रवेश किया,
वसे ही लंकिनी दौड़कर निकट आयी । १९ .कौन है यह्‌ ! आज मुञ्चे कु
भी न समन्ञकर अन्दर प्रवेश करनेवाला ! चोर दही है-एेसा सोचकर कौध

भानुभक्त-रामायण

१५२

को हो आज

मलाइं केहि नगनी

चोरे हो भनि लात्‌ उठादइ रिसलेजल्दी वाम मुठी उठाई सहजंछाद्दे ताहि रणत्‌ गिराद्‌ ब्लट्पट्‌लंकापूरि तहन्‌ ति राक्षसि भईजानिन्‌ श्रीहनुमान्‌ भनेर जब चोद्‌लंकीनी हुं मलाई त जितिगयौरावण्को त मरण्‌ हुन्या वखत भोब्रह्माजी अधि भन्दथ्या प्रभृलिकोह्ला रावणले सिता र रघुनाथगनेन्‌ सुग्रिवले पनी दश दिशागर्नालाइपठाउनन्‌विरहतिन्मा एक्‌ विर आउलार तिमिलहान्ला वाम मुटो उठाई र॒रगत्‌रावण्‌को त्हिसम्म जायु छ भनीब्रह्माको त वचन्‌ प्रमाण्‌ गरि भर्या
यो भित्र जाम्या भनी।एक्‌ चोट्‌ त हानिन्‌ पनि ॥टोक्ता जमिनूमा परिन्‌ |ऊटेर विन्ती गरिन्‌ ॥२०॥
वस्थिन्‌ सदा दहारमा।पाइन्‌ चलिन्‌ सारमा॥यस्ते सक्यो राज्‌ गरी।आयो मरण्को घरि ।॥२१॥हन्याछरामावतार ।सुग्रीवथ्ये मित्र चार्‌ ॥सीताजिको खोज्‌ खवर्‌ ।छाने र घुष्‌ खुप्‌ जबर्‌ २२लात्‌ सारिच्ौली जसे।

छाद्दे

गिरौली

तस ॥
भन्ध्यारसो वात सुनी ।त्यो मं रावण्‌ पति ॥२३॥
से उसने (हनुमान पर) लात से प्रहार किया तत्क्षण (प्रद्यत्तर मेंहनुमान के) मूद्ी कसकर घुंसेसे प्रहार करते ही वहु पृथ्वी पर गिरगयी ओौर रक्त-वमन

करते हुए तुरन्त उठकर

विनती करने लगी। २०

वह॒ लंकापुरी (की रक्षिका) है, जो सदव राक्षसी वनकर हार पर रहतीथी। चोट खनेके बाद उसने हनुमान को पहचान लिया तथा उनकीशक्ति का परिचय पाया। मन दही मन कहने लगी-मैँ लंकिनी हुं। मृश्चतो इसने पराजित कर दिया है ओर अव राज्यभी हृडप करलेगा। एेसालगताहैकि रावणका तो अव अन्तिम समयगयाहै। २१ ब्रह्माजीकहते थे कि प्रभुजी का राम अवतार होगा; रावणसीता का हरण करेगा;रघुनाथजी सुग्रीव के साथ मित्रता करेगे तथा सूग्रीव. भी अपने वलिष्ठ वीरोंको सीताकौी खोज में भेजेगे! २२ उनमेंसे एक कीर आयेगा गौर जैसे
ही तुम लातसे प्रहार करोगी, वैसे ही वहु वार्ई्‌ मूदीसे प्रहार करेगा ओरतुम रक्त-वमनकर गिर पड़ोगी। कहाजाताहैकि रावण की आयु उसी
समयतकके लिएहै। अतः हनुमान की वाते सुनकर उन्हं प्रणाम कियाओर कहा कि यह्‌तब्रह्मा कावचनदहै कि रावण सरेगा । २३ जाओ

सीताजीसे भेट करो)

वहाँ अन्दर उद्यान में अशोकवन के एक उत्तम

नेपाली-हिन्दी

१५३
वधेचाम्हां ।जाऊ भेट सिताजिलाईइ ति अगम्‌ भित्तीअशोक्का वनमा छ वृक्ष बठ्या एक्‌ शिशपाको तहँ ॥ताहीं छन्‌ प्रभुकी प्रिया वरिपरी छन्‌ राक्षसीगण्‌ पनि।भेटी ग रघुनाथथ्ये भन तिली यस्ता विपत्‌ छन्‌ भनी।।२४।धन्ये भयां म॒ अहिले प्रभुको स्मरण्‌ भो!संसारको भय छ जो उ त आज दर्‌ भो॥जस्तो मिल्यो मकन संग र भक्ति रेल्हे।यस्ते रहोस्‌ यहि म पाडं न विसु कंते ।२५॥जस्पै श्री हनुमान्‌ पुग्या सहजमा

लंका

समूद्रे : तरी।
तस्स जानकिको पुव्यो नजर वाम्‌ हाते समेत्‌ घुप्‌ गरी॥रावण्‌को पनि वाम हात्‌, नजर वाम्‌ फएून्यो,रघूनाथको ।दक्षिण्‌ अंग पफुम्यो तसं बखतमा खृश्‌ मन्‌ भयो नाथको।।२६॥सान्‌ रूप लिई

पसी सव शहर्‌

हदं विचार्‌ खुप्‌ गरी।

रावणूको दरबार विशेष्‌ गरि दुँडया

चोटा र कोठा

सम्ख्या लंकिनिका वचन्‌ रति गया

अशोक वनूमा तसे ॥२७॥
गरी ॥
पायानन्‌ रक्ता मजा भनि तहां मनूमा विचार्‌ भो जसं।
शिशपाके वृक्ष के नीचे प्रभुकी प्रिया विराजमानदहै।

उनके चारो ओर

राज्यका पहरादहै। सीतासे भेट करके शीघ्ही रघूनाथजी से उनकीविपत्तियों का हाल कहो । २४ मैँघायलहो गयीहूं। अभी प्रभुकास्मरणदहोआया।

संसारकेसारे

भयमेरेहृदयसेदूरहोगये।

मेरी

यही कापना है कि अभी जैसी भक्ति भावना प्रभुकेलिएमेरे हृदयमेंहैःवैसीदही सदा वनी रहै । २५

इधर हनुमान सहज ही समुद्र पार करके

लंका पहुंचे ओौर उधर उसी समय जानकी के बाम अंग (वायां नेत्र तथावार्या हाथ) अत्यधिक फड़कने लगे । तभी रावणका भी बार्यां हाथ तथानेत फड़क उठा ओौर उसी समय रधुनाथ के भी दक्षिण अंग फड़क उठे । एेसाशुभ लक्षण देख. राम के मन मेंप्रसन्नता छा गयी । २६ हनुमान ने सूक्ष्म
शरीर धारणकर नगरमे प्रवेश क्या । चारो ओर भलीर्भांति देखते हए
ओर सोचते-विचारते हुए कमरे-कमरे की छान-बीन की ओौर रावण करेदरबार-विशेष को खोजने लगे । जव कुछ पता नहीं चला तो सोचने लमअव कह जाॐ? तत्क्षण. ही लंकिनी की बातत याद आयी सौर वे अशोकवन मे चले गये । २७ उन्होने देखा--इन्द्र की नगरी के समस्त वृक्ष वहां
१५४

भानुभक्त-रामायण

जोजौ वृक्षका त इन्द्रका नगरिमा सोसोत स्‌ छन्‌ तहीं।कहींरत्नैका सिहि साप्‌ अस्तलू जल पनीं यस्ता तलाऊफलफूलूले अति भार्‌ भयेर रुखका सबका ति हमा. पनि।लच््याका ध्रमरा र पर्छि वहतं रूख्मा वस्या का पनि।।२८॥विचूबीचूमा सनका हवेलि पनि छन्‌ उच्चा मणीको छ थाम्‌ ।जस्मा छन्‌ कति गर्नु व्णंन जहां हेव्यो तहां पविकि काम्‌ ॥यस्तो भुन्दर वन्‌ नजर्‌ गरि सबं इल्दं हनूमान्‌ गया ।देख्या सुन्दर शिशपा र खृशि भँ ताहीं ति दाखिल्‌ घया।।२९॥अधिक गंभिर छाया सूयेक्ो ताप्‌ नपसून्या।उपर अति पहेला वेस्‌ चरा मात्र वसून्या ॥वरिपरि पनि नाना राक्षसीको छ घेरा)रुखमनतितहि सीता देविन्‌फंद-नेरा ॥३०॥भोकी मैलि निनाउरी न त कपाल को्याकि संब्‌ केश उसे]लट्टा मात्र गम्याकि खालि भुमिमा सूदं वस्याकौ यस ॥राम्‌ राम्‌ राम्‌ यति मात्र नोलि रदी देख्या र॒ साना भर्ई।पातका अन्तरमा लुक्या ति हनुमान्‌भन्छन्‌ श्रीहनुमान्‌ तहां सनमनचै

जो सीताकन देखि आज

खुशिले

रूख्का उपर्‌मा गई 1३१ेलेकृतार्थ, भर्या,

सीता-समीपूमा

र्यां ॥
हैँ । निमल एवं स्वच्छ जल के तालाव, रत्नों से जड़ी सीदि्यां, फल-फूलों
से लदो क्रुकी हुई टहनिर्यां गौर उन पर भैँवरे तथा पक्षी बैठे हुए है। २८
वीच-वीच में स्वण-हूवैलिर्यो भीदहै। मणि-जटित उचे-ञचे मदिररहै, जोवणेन-शक्ति से परे है। जिधर देखो, उधर दही पक्के कामहै) देसे सन्दरवन मे घूमते हुए ओौर चारों गौर निरीक्षण करते हुए हनुमान गये । सुन्दरशिशपा को (अशोक-वृक्ष) देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए ओर वहीं प्रेणकिया 1 २९
अत्यन्त घना छायादार वन, जहाँ सूयं को गर्मी भी प्रवेश नहीं
केर सकती, जहा अत्यन्त उत्तम पीले रंगके पक्नीही केवल रहते थे, वहाँ एक
वृक्ष के नीचे राक्षसियोंसे धिरी हई सीताजी दिखायी दीं} ३० शूखीप्यासी, हताश, अस्त-व्यस्त केश-राशि खुली हई, लट विखराये सीता भ्ुभि परयठी रोती गौर केवल राम-रामकी रटलमारही है । हनुमान ने अपने सूक्ष्म्पमेदही उस पेड़ पर चढकर पत्तोमेंच्िपिहृए ही सव हाल देखा । ३१श्रीहुनुमानजी मन ही मन कटूते है-अन मै सीताजी के पावन दर्शन पाकरकूताथं हुखा 1 आज ज प्रसन्नतापूरवेक यदीं सीताजी के.समीप रहं । अव

‹ नैपाली -हिन्दी

१५५
साध्यां काम्‌ पनि रासको भनि तहँ खूृशी भयाथ्या , जसे ।फर्‌ अन्तःपुरमा भयौ र खलबल्‌ त्यो शब्द सून्या तस ॥३२॥-क्याको शब्द भयो भनेर हनुमान्‌ लृक्या ति स्न्‌ पातमा ।आयो रावण जस्दि ताहि नजिकं सन्‌ स्ती लिई साथमा ॥केले मषु म॒ रामदेखि अञ्चतक्‌ सीता हव्यं तापचनिं।आयानन्‌ रघुनाथ भनेर रहंदा देखे स्वप्ना पनि ॥३३॥रामको दरत्‌ अति वीर वानर अशोक्‌ वन्‌-भिल् आई पी ।सीताजीकन देखित्या गरि तहँ वन्‌-भित्र॒लूकी बसी ॥हर्दो सुर्‌ सब कामको खुशि भई स्वप्ना सिलेथ्यो जसे ।सांच्चैहो क्रि भनेर दौडिकन चट्‌ आयो नजीक्मा तसे ।।३४॥साँच्चैपोयदिहो घन्या असलो. दर्वाच्य बोल्छ्‌ जसे ।सीतालाइ यसौ सुतैर रिसले जाला त॒ भन्ला तसै ॥मेरा दुष्ट वचन्‌ सुनैर रघुनाथ्‌ आएरमानेन भनी ।यस्तो निश्चय मन्‌ गरी नजिक भै दर्वाच्य बोल्यो पनि ॥३५॥सीताजी . पनि. दुष्टलाद्‌ नजिकं देखी अधोमुख्‌ गरन्‌ ।श्रीराम्‌का चरणारविन्दमनने अन्तःकरणूमाधरिन्‌ ॥रामकाकायं भी पुराहुञजा।

एेस्ासोचादहीथाकि अन्तःपुर में खलबली-

सी मच गई ओर वडा नमचक सुनायी दिया । ३२ कसी हलचल सचीहै- (सन ही मन) यहु कहते हुए हनुमान ओर भी पत्तों के बीच छप गये ।रावण

शीघ्रही तमाम

वोला-सीता काहरणआचिर कव
स्त्रियों को लेकर वर्हाँआगया।

निकट आकर

करने पर भी रघुनाथ अभी तक नही अये।

तक्म रामकेहाथों सारा जाऊंगा

कहने लगा किं एक

स्वप्न भी देखा है। ३३ स्वप्नमे देदाकि रामके दूत अत्यन्त बलीवानर अशोक वनम प्रवेण कर सीता को देखने-भर की व्यवस्थाकरके पत्ते के अन्दर वहीं पर्‌ छिपकर निडरतापूंक देख-देख प्रसन्न हो रहाहै। एेसा स्वप्न देखकर सोचा कि कदाचित्‌ यह्‌सचही तोनहींहै।यह्‌ जानने के लिए तुरन्त दौडकर निकट आया । ३४ यदिसत्यही होगातो अति उत्तमदहै।! सीता को दुवाक्यि कटटरंगा, जिसे सुनते ही वहु क्रोधितहोकर चला जायगा ओर सव यथाथ (वृत्तान्त) कह उालेगा । मेरे दुष्टवचनो को सुनकर रघुनाथ आकर मक्षे मरेये। टेसरा सोचकर वह्‌ निकटमया ओौर (उसने) सीताङी को दुवेचन कहे । ३५ सीताजीने भी उक्तदुष्ट को देखकर अपना मुह्‌ नीचे किया ओौर अपने अन्तःकरणमें रामके

भानुभक्त-रामायण

१५६
चप्‌ लागि जननी रहिन्‌ जव तहां सो देखि रावण्‌ पनि।लाग्यो भ्ल सलाई देखि किन है लायो अधोमूख्‌ भनी ।॥३६॥
राम्‌ मेरा पति हृन्‌ भनेर तिसिपोमेरी हो यदि भन्दथ्या पनि भन्यामाया छेन तिमी उपर्‌ नबुद्चि क्यायौवन्‌ व्यथं गयो विचार किन यो
भन्छ्यौ उ भन्छन्‌ कहँ ।जानुपर््योयहु)शोक्‌ मात्र गयौ उसे ।यौवन्‌ अफाल्छ्यौ यसे।।२७॥शोक्‌ गदछ्यौ यो कति ।हन्श्‌ म॒तिग्रो पति॥मालिक्‌ हृन्याछठौमतावेगूनि छन्‌ राम ता ॥३८॥सादं अधम्‌ जोत छन्‌ ।आउ्न क्या सक्तन्‌ ॥यस्तो भनेथ्यो जसे।बोचिन्‌ सिताजी तसं ॥२९॥दुवच्यि बक्‌-वक्‌ गरी।सन्यासिको रूप्‌ धरी॥
यौवन्‌ व्यथं नफाल व्यथे मनमाआज तिमिलमैलाई पति मानमेरी पत्ति भयौ भन्या त सवकी
साद प्रेम्‌ गरि राखुला बुञ्च अधिक्‌मानी

मूखं कृतघ्न

मानुषमर्हां

शक्तीका पनि कम्‌ उ राम्‌ पति यहाँतस्मात्‌ छोड नराख रामतिर मन्‌
लाल्‌ लाल्‌ नेव गरादइ्‌ पणं रिसलेपाजी रावण! बोल्दछस्‌ कति वहत्‌राघवृदेखि राइ छत्न भनि एक्‌~~~.
श्रीचरणारविन्दों का ध्यान किया।

सीता को मौन खड़ी देख रावण कहने

लगा-मद्चं देखकर मुंह क्यों नीचे केर लिया। ३६मेरा पतिदहै।

तुम कहूतीहो, राम

यदि एसा समञ्लता

तो उसे यर्हांआना चादिए था।
तुम्हारे उपर उसका कोई प्रेम नहींहै।

केवल तुर्हीं व्यथं में शोकग्रस्त हो

रही हो। विचारे करके देखो यौवनावस्था व्यथं हीजा रहीहै। ३७यौवन व्यथं न गेंवाजो । कहाँ तक शोकमें डबी रहोगी? आजहीतुम
मञ्चे अपना पति स्वीकारकरो) तुममेरी पत्नीहौो जाओगी तो सवकीस्वामिनी वन जाओगी ओौरमै स्वयं तुम्ह अत्यन्त प्रेमपू्वंक रव्खंगा।. समज्नो ओर जानो करि राम तो बहुत ही अवगुणी है । ३८ जिस मनुष्यमेंअधमे, मूखंता एवं अभिमान व्याप्त है ओौर जिसकी शक्ति भी थोडी है, वह्‌(राम) य्ह किस प्रकारसकतादहै। अतः रामको मनसे त्याग दो।रावणनेजंसेही ये वचन कै, सीताजी केने कोधसे लाल हो शयेओरवे बोली-३९ पाखण्डी रावण ! दुर्वचन कहां तक्‌ बोलते हो।रघुनाथसे

भयभीत

होकर छल

करके संन्यासीकासरू्प

धारण

किया।
जिस प्रकार कुत्स यज्ञ में हवन अपितत पदयर्थोकोचृरालेजाताथा, उसीप्रकार रामलक्ष्मण कौ अनुपस्थिति में तुमने मेराहुरण किया समन्नलो

नेपाली-हिन्दी

जस्तै यज्ञविषे

हविस्‌ कृकुरले

तर्कारी

बनाउनु

१५७
हरन्‌ उसेचालले।राम्‌ लक्ष्मण्‌ तहंदा हरिस्‌ तं बुञ्निले मर्लास्‌ यसे कालले ।४०॥घेरादिई।सागर शोषि कि साघुलाईइ रघुनाथ आयेरतेरो वं विनाश्‌ गरेर पछि फर्‌ प्राण्‌ खचि तेरो लिई॥लैजानन्‌ रघुनाथ मलाइ भनि क्षद्‌ दीइन्‌ जवाफ्‌ यो जसं ।लाल्‌ लाल्‌ नेतर गराइ खड्ग पनि ली काटने तयार्‌ भो तसं ।\४१।मन्दोदरीविनतिगने अगाडिसर्दी।यो खड्ग टरं कसरी भनि चित्त धर्दी॥पा परीकन वहत्‌ गरिबिन्ति लाइन्‌।सब्‌ रिस्‌ शमन्‌ पनि गरायर खड्ग टारिन्‌ ।॥४२॥हकम्‌ रावणले तहां यति दिया है राक्षसी! ई सिता।मैहला दूइ यसं बसून्‌ तब उपर्‌ मेरा शयनूमा कि ता॥बरिनिन्‌ बस्तिन पो पनी भनि भन्या कटेर टुक्‌ दुक्‌ गरी।सृटुवा

असल्‌

मीठा मसाला धरी ।४३॥
मासू खाइम छाडंला अज्ञ पनीरावण्‌ फकि गयो ति राक्षसिहरू
चेताउयेतीभनी।एक्‌ मुख्‌ भया फर्‌ अनि ॥
तुम इसी काल-से मरोगे । ४० सागर का शोषण कर सेना-सहित रघुनाथआकर यहाँ घेरा डालेगे ओौर तेरे वंश का विनाशकर तेरे प्राण खींच लेभेतथा उसके वाद रधुनाथ मृन्चे लिवालेजायेगे। सीताने जंसेहीरेसेउत्तर दयि, वैसेही रावणने कोधसे लाल आंखे करके देखा ओर खड्ग लेकरकाट डालने के लिए तत्पर हौ गया। ४१

मन्दोदरी नै किसी प्रकार

खडग को रोका ओर चित्त में विचार करती हई रावणके चरणों पर गिरपड़ी ओर विनती करने लगी । अव शीघ्र ही शान्तहौ जायें ओर खड्क
रोकलें।
मन्दोदरी की विनती सुनकर रावण ने अपने समस्तक्रोधको

ण़ान्त कर खड्ग रोक लिया । ४८२

उस समय रावणने इस प्रकार आज्ञा

दी-हे राक्षसी ! यह सीता दो महीने तक इसी प्रकार रहै, तदुपरान्त मेरेशयन में रहेगी । यदि रहने के लिए अस्वीकार करे तो इसके टुकड़-टुकडेकर देना ओर उत्तम मीठा मसाला डालकर भूनना। ४३ मै इसका मांस
भक्षण करकेरही छोडंग।
अभी भी इसे सावधान कर दो।

इतना

कहकर रावण लौट गया । वहाँ की राक्षस्सियां सब एक-मृंह्‌ होकर कहनेलगीं, क्यों यौवन को नष्ट करतीहो ? रावण को पत्ति स्वीकार करलो।जिसे सुनकर एक राक्षसी कहती है कि वार-वार इसे समन्ञाकर तुम थक
१५८

भानुभक्त-रामायणं

एक्‌ भन्छे किन व्यथं यौवन सक्यौदोसखी क्या भनि उरते कि कति वार्‌काट्नैपष्ठं नकाटि हुच्च भनि बात्‌

हात्मा ली तरवार दौडि पनिगै

आर्की घोर्‌ मूख वाद्‌ उर्‌ दिन नजीक्‌

राव्ण्‌ गराऊपति।भन्छेस्‌तंथाक्लेस्‌कति ।४४।।गदं धई अक्रि ता।
भन्दे म॒ कट्षछ्‌ सिता॥
धाई

सिताथ्ये

जसे।

बूढी राक्षसि एक्‌ थिई र्‌ त्रिजटा

तेस्ले हटाई

तसे \1४५॥
लागी भन्न अभागि दृष्ट्हुरूहो!

क्या दुष्टको

ज्ञ मति।
गषछौ छोड विरोध्‌ नराख गरखप्‌ सीताजिको ता स्तुति ॥पाऊमा परि दण्डवत्‌ गर सबे मालिक्‌ इने हुन्‌ भनी।मेरा आज वचन्‌ लियौ भनि भन्या चुप हीत होला पति ॥४६॥स्वप्नाको सुन भन्छ्‌ लक्षण यहाँ श्रीराम्‌ सिताका पति।एेराव्रत्‌ उपरी चेर संगमा भाई विई वीर्‌ अति॥याहा आइ

रिसाईइ भस्मसब

यो
लकं
गरार्ईदिया ।
रावण्‌ मारि सिता लियेर संगमा पवत्‌ उपर्‌ पो धिया ।॥४७।॥रावण्‌ गोमय कुण्डमा कुल समेत्‌ खुप तेल मदन्‌ गरी।बुडथ्यो सन्‌ मुड आफना उनि उसे मृड्को त माला धरी॥जाओगी । ४४ एक अन्य राक्षसीतो कह रहीहैकिंद्रसे काटनाही पड़गा;विना काटे काम नहीं चलेगा ।

हाथमे तलवार

लेकरसीताको

काट
उालृंगी-यह्‌ कहती हई सीता की ओर दौडी । दूसरी मह्‌ फैलाकर सीताको भयभीत करती हुई, उनकी ओर लपकी, जिसे एक चिजटा नामकराक्षसी ने पकड़कर हटा लिया । ४५ कहने लगी--अभागिन ! दृष्टाओं ।क्यो दुष्टों कौ भांति अपनी वुद्धि करती हो ? विरोधी विचारों को हटाकर,सीताजी की खूब स्तुतिकरो। इन्हींको सवंस्वासिनी सानो । इनकेपांव पड़ो ओर दण्डवत करो। मेरे इन वचनौंको मानोगी तो तुम्हारावड़ा हित होगा 1 ४६सुनो, अपने स्वप्न के लक्षण गँ यहाँ वताती हुं ।श्रीराम, सीता के पति हाथी पर सवार होकर ओर साथ में अपने अत्यन्तवीर भाई (लक्ष्मण) को लेकर यहाँ आये ओर क्रोधितदहौ सम्पूर्णं लंकाको भस्म कर दिया ओर रावणको मारकर सीताको लेकर पवत के ऊपरचले गये 1 ४७ रावण के कुल वाले (अन्य राक्षस) लव तैल मालिश करअपने-अपने सर गोवरके कुण्डमें इवातेये। उन्हींससेंकीमालाधारणकर विभीपण श्रीराम के निकट प्रभुकी भक्ति करते थे ओर्‌ अत्यन्त प्रसन्नहोकर तन-मन-वचन से सेवा करतेथे 1 ४्ठ राग आज रावण को समस्त

नेपालो-हिन्दी

१५९
गरी ।श्रीराम्‌का नजिकं विभीषण धिया, भक्ती प्रभूकोगर्थ्या घूव टहल बहुत खुशि हद तन्मन्‌ वचन्ले गरी ॥४८॥।रासूले रावणलाईइ आज सहजं , मान्‌ कुले सा गरी ।रावणृको अव वृद्धि छैन यसको आयो मरण्‌को घरि॥रामको भक्त विभीषणे अब उपर्‌ बस्नन्‌ . यहाँ राज्‌ गरी।जस्तो हृन्छ हकम्‌ सितापतिजिको सोही शिरोपर्‌ धरी ।॥४९॥जस्तो स्वप्न भयो उ सब्‌ सनिसक्यां येती भनी चप्‌ जसे।लागीथी चरिजटा ति वात्‌ सुनि उन्या सब्‌ राक्षसीगण्‌ तसं ॥बतंरदी।निद्रामा वशमा सवै _ परिगया सीताआधार्‌ कोहि नपाडरी अधिक ताप्‌ सानैर विदच्‌ हूंदी ।५०॥]कसोरीमर्ं।भोकी शोक्‌ गरि धन्दछ्िन्‌ अव यहां पलेदून्का हात परेर मर्तु ननिको ञाफं म॒ मष्ट बरु॥कबे।ताप्ले परणं हुंदी उपाय अरु थोक्‌ केही नजान्दीसत्मा स्वस्थ नपाडंदा विरहूने देख्ती अंध्यारो सवं ॥५१॥।सीतातहाँ।.राम्‌मा चित्त दियेर मनुं वद्या मानेरसुन्डीन्था मतलब्‌ लिईं खडि भद्‌ पक्रेरहगामहां |कुल-सहित सफ़राया कर मारेगे।
रावण की बुद्धि अव क्षीण हौ गयीदहै।
अब उसकी विपत्ति कौ घड़ी आ गयीदहै। राम के भक्त विभीषण ही अबयहा, सीतापति की जसी आज्ञा होगी, उसे शिरोधा्यं कर राजा बनकर

रहम । ४९

जैसा स्वप्न हुजा, वहु सवम वता चृकी हूं, इतना कहकर

जसे ही चिजटा चुप हई सब राक्षसियां उसकी

भयभीत हुई ओर उसी समय

बातोंसे प्रभावित होकर

निन्द्राके वशीभूत हो गयीं!

सहारा न देख असहाय वनकर अत्यधिक रोयी । ५०

सीता कोर

भूखी-प्यासी सीता

अत्यन्त शोकम इडवी हुई कहती हैँकि मै यहाँ सष भी किस प्रकार? इन

लोगोकेहाथोंसेतो मरनाभी उचित- नहीं

इससेतो अच्छा होगा

कि गै स्वयं ही अपना प्राण त्यागदूं। सन्तापग्रस्त मस्तिष्क मे कोईउपाय भी नहीं सूत्चरहाथा। वचिरहसे मनमें चिन्ताछायीथी)सब
ओर अन्धकार ही अन्धकार दृष्टिगोचर हौताथा। ५१ उन्होने सोचा क्रिरामकेध्यानमें लीन होकररही मृत्यु को प्राप्त होना अति उत्तम होगा]यहं निष्चयकर सीताजीने रामका ध्यान किया ओौर वहां एक डलपकड़कर खड़ी हो गयीं । ` राक्षसो के बीच रहकर जीवित रहना धिवकार
है, इसे तो मर जानाही सच्छाहै। अतः अबरम मरही जाडं) लेलम्वीदै, इसलिए यले में फन्दा उअलकर लटकने के लिए, रस्सौ वनाने के
१६०

भानुभक्त-रामायण

मदेषु ।नतिकोराक्षस्का विचमा वसी जिउनुधिक्‌ मरन्‌च्‌ल्टो लाम छ स्ुन्डिनाकन यहां डोरी त यै गदेषु ।।५२॥यस्तो निश्चय सुर्‌ गरीकन सिता ब्ुनृडीन ओआंटिन्‌ जसं।काम्‌ वित्लाभनिसानु बोलिञ्लटपट्‌ बल्याहनूमान्‌ तसं ॥भारतवषं विषे मणी सुकुट स्च नाम्‌ ता अयोध्या भनी)टलो एक शहर धियो मणिमयी सुन्दर्‌ बन्थाको पनि 11५३।।दक्ष्वाकका वुलेमा अति बलि दशरथ्‌ वीर्‌ सहाराज्‌ रद्याछन्‌ ।तिन्का तीन्‌ रानिमध्ये गुणिगुणि अति वीर्‌ चार छोरा भयाछन्‌ ॥जेठा रामजी ति चार्मा उदहि पलि त भरतृजी र लक्ष्मण्‌ इ तीनं ।भन्दा शवृष्न कान्छा सकल गुणमहाँं कम्ति छेनन्‌ ति कूने ॥५४॥जेठा राम पिताजिका हूकूमले सब्‌ राज्य छोडीदिई।
वन्मा बस्त चल्या बहूत्‌ खशि हंद सीता र लक्ष्मण्‌ लिई।एक्‌ दिन्‌ पञ्चवटी गया प्रभु तहीं डयाप्रभूकोपन्यो)रावण्‌ले अति छल्‌ गरीकन तहां सीताजिलाई हव्यो ॥५५॥राम्‌ लक्ष्मण्‌ तहंदा सीता पनितहा

चोरी

जसं
ता
हव्यो ।
चोरी जज सिता हव्यो भनि वहृत्‌जान्थ्या खोजि सिताजिलाइ्‌ वनसातिनूमाथी करुणा भयो प्रभुजिको
वेद्‌ रामलादंपञ्यो॥फेलाजटायुपन्याताहीं जटायु तस्या ।॥५६॥
लिए यही टीकरहै। ५२ इसप्रकार निक्चयकर साहस बरोरकर सीताजसे ही लटक्नेवाली थी, वैसेही केही काम न विगड़ जाय--यह्‌ सोचकरहनुमान तुरन्त ही धीरे से गोले, “भारतवषं मे सरताज के समान एक सुन्दर
सुसज्जित अयोध्या नामक नगरदहै जोबडादही विशालटहै। ५३ इक्ष्वाकुके वंश मे अत्यन्त बली वीर दशरथ नासक महाराजा रहते है । उनकीतीन रनियोंसे बढेही उत्तम गुणवान्‌ एवं वीर चार पृत्रहृए।ज्येष्ठरामजी,
उनके बाद भरत,

शदुष्न,, जो सकल

फिर लक्ष्मण ओर उनसे भी

गुणों से सम्पन्न ह! ५४

कनिष्ठ पत्र

ज्येष्ठ पुत्र राम पित्ता की

आज्ञा से सकल राज्य का त्यागकर वन में रहने के लिए सीता ओर दक्ष्मणको लेकर अत्यन्त प्रसन्नतापूवेक एक दिन पंचवटी गये, जहाँ प्रभु कां पड़ावपड़ा । रावण ने अत्ति छल करके सीताकाहरण किया । ५५ रामलक्ष्मण की अनुपस्थितिमे (रावणने) जैसे ही सीताकी चौोरीकी, वैसेही इस सत्यको जानकर रापके मनम घोर चिन्ता भौर विरह उत्पन्नहो आया।

सीतानीकी

खोजमें

जातेहृए वने (रामस)

जटाु

भेट हई । उन पर प्रभुकी छपा हुई ओौरवे वहीं तर गये। ५६

नेपाली-हिन्दी

१६१
भेट्‌ सुग्रीवसित भो पष्ठी प्रभुजिकोबाली मारि ` रजा बव्सनुभयोवीर्‌ वीर्‌ वानर छानि सुग्रिवजिलेहकम्‌ बक्सनुभो र वीर्हरु गया
लाया मित्यारी पनि ।मित्‌ हन्‌ इ मेरा भनी ॥सीताजि खोज्ने भनी ।सीताजि खोज्ने पनि ।५७।समुद्रं तरी ।तिन्मा एक्‌ विरतामहूंमत यहां आयांसम्पाती-सित भेट्‌ हुंदा खबर भं उन्‌का वचनूले गरी ॥लंका दाखिल भै गयां छिनसमहां रामूका प्रतापूले गरी।फतयां लंकिनि देखि निभेय -भई अण्शोक वनूमा परी ।५८।द्यां सुन्दर वाटिका वरिपरी रूख्‌ वेस्‌ लताले गरी ।बेहुयाका चहुंभोर रत्न सरिका फलू फूल्‌ फल्याका भरी ॥देख्यां आज सिताजिलाइ्‌ र यहाँ आनन्दपार्थां भनी।येती बिन्ति गरेर चुप्‌ भद रह्या ताह हनूमान्‌ पनि ॥५९॥सीताजिले जब इ वात्‌ कमले सुनीधिन्‌ ।आश्चयं भेकन वरीपरि हेरि एक्चिन्‌ ॥
कोही नदेखि ति सिता अस्लाई तार्हां ।भन्छिन्‌ कुरा इ कह्न्या जन को छ
याहं ।|६०॥
श्रम्‌ हो भनूं पनि भन्यासबचेत्‌ छ मेरा।स्वप्ना कसोगरि भनूं निद छेन मेरा॥बादमें प्रभुजी की भेंट सग्रीवसे हुई ओर उनसे मित्रता हृई।

उन्हने

बालि को मारकर ओर उन्हुं (सुग्रीव को) अपना भित्र कहु कर राज्य
सौपने कीक्ृपाकी। एकसे एक वीर वानरोंको चुनकर सुग्रीवजी.नेसमस्त वीर सीता की खोज में चलसीताजी कीखोजमे भेजापड़े! ५७ उनमेसेएकवीरतो्मेस्वयंहुं। संपातीसे भेट होने पर(यह्‌) समाचार मिला ओर उन्हीं के कथनानूसार, राम की कृपा से मैं
क्षण-भरमेही लंकामे प्रविष्टहौगया।

लंकिनीसे भी निभंयतापूर्व॑क

बच निकला ओर अब अशोक वनम ञयाहं | ५८ चारोंओर वृक्ष ओौरसुन्दर लतां देखी, रत्नों के समान फल-फूलों से भरी हई एक सुन्दरवाटिका देखी । आज सीता माताके दशेन पाकर वडा आनन्द प्राप्तहा 1

इतनी विनती.कर हनुमानजी मौन हो गये। ५९

जन इन वातोंकोक्रमसे सुना तो आश्चयं-चकितिदहयोलगीं ओर किसीको

सीता ने

चारों ओर देखते

वहाँ न देख कहने लगीं--यह॒ सब बाते कहुनेवाला

यहु कौन जीवै? ६०

यदि्मैँइसे रमक

तो क्सि प्रकार? जँ

१६२

भानुमक्त-समायण

जोह: वात कहन्या उ अगाडि ञ]ई ।अमत्‌ वचन्‌ इ अति आज भनोम्‌ मन्ना ।(६१॥सीताजिको यत्ति वचन्‌ जव. सूत्र पाया ।सान्‌ स्वरूप लि हनुमान्‌? अगाडि थाया ।।दशन्‌ प्रणाम्‌ पनि गव्या र यिताजिनाई |ताटीं खडा भद द्या अति पंपा ।६२॥
रान्‌मनते सफ तिं एंका परी॥खिहनुमानधाच्याकारावणको छल हो कि यो भनि तहं लादन्‌ अधोमु ज्तं।शंका भो अव माद्टलाद धनि नद्‌ ब्रोत्या हनूमान्‌ तत्त ६३हे माता! मत दास॒ हं हजुरक नमूद हृकूमने गरी |वररमा गम्भीर्‌ समुद्रै तरी ॥हजूरवगेछुआयाकोराजा सूग्रिवको म मन्ति पनि हं वानर पिता हुन्‌ पनि।छा क्या हुन्छ मर्जी भनीयर्ययेती चिन्ति गरेर ॑चप्‌

लाल्‌ मूख पीत णरीर्‌ णरीर्‌ पनि अधन

सीताजी

पति

भच्दछिन्‌ कसरि

यो
लां

क्तं

मित्यारि

व्रानर्‌ मीत~
जानं म मानिस पनि।व्याहन्‌ वुःराकोजनी ॥
+~ +
यदिरवप्तकर्हेतोभसोन्दहीं र्हीहं। जोभी हवतो सचेतमेरे सम्मुख आकन्‌ इन अमृत-नुत्य वचनां को कहू । ६१ सीता जी कैये वचन सुनते ही हनुमान अपना छोटा-सा स्प धारण किये हष उनकेसामने आये। उन्हाने सीताजी का दर्णन कर्‌ प्रणाम किया भौर अच्यन्तहरपोन्मुख होकर उनके यागे खड़ रट्‌ । ९२ दरुमान का नाल मुह्‌ त्था
पीला शरीर भीर गौरेयाके समान यत्यन्त छोटा आकार देख करसीताजी के मनमे का उत्पन्न हुई, उन्टोने सोचा कि कहीं रावण दीन्दी विचारोमे इवी सीतातो नहीं उनके साथ पुनः छल करर२ रहाको मह्‌ नीचा किये देख कर हनुमान समल गये किः उन्हं शंका हो रही(8[ई[१

है, अतः वे तुरन्त वोल पड़-६३

हैमाता! भ तो आपका सेवक हुं

राम की आज्ञासे कस्नि समुद्रकापार्‌ कर

यहां आपकी

चूचना लेने

आयाहं। राजासुग्रीवकामेमंत्रीहूं ओर वायु मेरा पितताहै। इतनाकहकर वे मौन होकर सीत्ता की आना की प्रतीक्षा करने लगे । ९४सीताजी कहती हैकिम महक मान लूँ कि वानर ओर मनुप्य केवीच भी भिचतादहोतीदहै?करहाँक्यावातरहै, मै वास्तविक सत्य कोकंसे जानूं ? अविश्वास प्रगट करसीताजी जैसे हीचुप हुई, वैसे दी

नेपाली-हिन्दौ

१६३

येती बोवि सिताजि चुप्‌ भदरदहिन्‌

साचो नमानी

जसे।

ओंठी दीकन फेर प्रणाम्‌ पनि गरी

जस्स हनूमान्‌ वस्या ।
फेर्‌ वृत्तान्त गरी सुनाइ सव वात्‌ ओँटी दिया पो तसं।६५।जसं

देखिन्‌ ओौठि

खसाडंदे

ओंयु

वरबर्‌

तसं

वखतमा

प्रभृजिको

साह खण हनुमान उपर्‌ भद तहां

हरषश्रुधारा

खस्या॥
ओँठी शिरोपर्‌ धर्‌ ।

प्राणृञ्चपियारो गरिन्‌ ६६

हित गरि हनुमान्‌जीलाइ भन्छिन्‌ ति माता ।
मकन तिमि भयौ खुप्‌ प्राणका आज दाता ॥तिमिसित रधघुनाथूले खूब विश्वास मात्या ।तब मसित पठाया येहि कामूले त जार्न्या ।1६७।॥अव त तिमि हनमान्‌ जल्द गे रामलारई्‌।भन विपत्ति पय्याकी देखिहात्यौ मलाई ॥
जति गरि म उपर्‌ श्रीरामको हुन्छ माया।तति गरि तिमिले खुप्‌ युक्तिले बिन्ति लाया ॥६८।।जिनृतिन्‌ शरीर महिना दुर्द्‌ता म. धषु)तापी त तिमि निश्चय जान मषु ।।खान्या छ दुष्ट तरकारि वनाईइ्‌ येही।छनन्‌ यहं अरु सहाय मलाई कोही ।६९॥
~
~
~
~ +
~ ^ ~~~
हनूमान ने पूनः विस्तारपूवेक सारा वृतान्त सुनाकरअंगूठी दी । ६५
~ ~-~-~~~~----~- ^~

उन्हश्चीरामचन्द्रजी को

अंगूठी देकर हनुमान ने पुनः प्रणाम किया ओौर वहीं
वैठग्ये। सीताजी अंगूठी देखते ही हषं से विभोर हो उरं ओौरउनके नेतरो से प्रेमाश्रु प्रवाहितदहो चले। अश्रु वहाते हुए उन्होने प्रभुकी अंगूठी अपने मस्तक से लगाली। हनूमान के ऊपर अत्यधिकप्रसन्न होकर उन्हे प्राणोंसे बद करप्यार किया । ६६हनुमान के प्रतितज्ञ होकर सीता माता कहती रह-जाज तुमने मृञ्नको जीवनं दियाअतः तुम मेरे प्राण-दाताहुएहौ। अवम मानगयीकि प्रभु ने तुम्हारे
ऊपर विश्वास कर इसी काम से मेरे पाप्र भेजाहै। ९७ हुनूमान !सवतोशीघ्रदही तुम राम के पास जाकर मेरी विपत्तियों का हाल कहदो! जसा तुम देख रहेहो, श्रीराम से उसी प्रकार युक्तिपूणं विनतीकरना, जिससे उनकी महान्‌ कृपा शीघ्रातिणीध्र हो 1 ६० एक-दो माहुतकतोमे किसी प्रकार अपने शरीर को धारण किये रहटूंगी, तत्पश्चात्‌तुम निफ्चित जानो किम जीवित रहने मे असमथंहो जार्गी। ये दुष्ट
१६४

भानुभक्त-रामायण

तस्मात अवश्य इ द्रई महिना नजाई।सम्रीव समेत सकल सन्य लियेर आई ॥यस दणष्टलाद सव वण समेत मारून्‌।म द्:ख-सागर पन्याकि मलाई तारून्‌ ७०सिप सित गरि विन्ती खुप्‌ दयाल्‌ बनाया ।जति छ फजिति मेरा यो सवं थोक्‌ जनाया ॥यति विनति गम्या लौ पाडला धर्मं धेरं।
सकल भनि सक्या वात्‌ क्या भनूं बेरबेरं ।।७१॥विन्ती श्री हनुमानले पनि गव्या माताम सेवक्‌ तहूं ।ख्वामित्‌का इ विपत्‌ सवे म कहुला धर्‌ बात्‌ यहाँ क्या कहूं ।।राम्‌ लक्ष्मण्‌ दुद्‌ भाई सुग्रिव समेत्‌ बानर्‌ कि सेना लिर्ई।वंशं रावणको

विनाश्‌

गरिदिनन्‌

घेरा शहर्मा दिई।।७२॥
ख्वामित्‌लाद लियेर फेरि रघुनाथ्‌ जाननअयोध्यामहां |आवेनन्‌ रघुनाथ, भनेर सनमाशङ्का नलागोस्‌ यहां ॥यो विन्ती सुनि भन्दछिन्‌ तहि सिता राम्‌चन्द्रजी क्या गरी।सेना लीकन आउनन्‌ अति गभीर्‌ यस्तो समूद्रे तरी ।७३॥मृञ्चे तरकारी बनाकर खा डलेगे।

वाला कोई नहीहि। ६९

यहाँ मेरा सहायक, मेरी रक्षा करने

उनसे कहना किये

दो महीने व्यतीत होने

. के पूर्वंही निदिचितखूपसे सुग्रीव-सहित समस्त सेना लेकर आयं ओरइस दुष्ट को सपरिवार नष्ट करके इस दासी को दुःखसागर से उवारलें । ७० अत्यन्त चातुर्यपूवंक विनती करके प्रभु का हदय दया ओरकरुणा से द्रवितकरदेना।

जो भी मेरी कष्टमय दशा है, विस्तार

पूवेक कह देना । केवल इतना ही कर देने से तुम्हं एक महान्‌ धमंकरने का पुण्य प्राप्त होगा 1 अपना सव हाल तुमसे कह डाला, अवओर क्या कहूं? ७१ श्रीहनुमाननेभी विनतीकी, है माता! मतीसेवक हं स्वामिनी की समस्त विपत्तिजनक कथा कहु सुनाऊंगा |
मुह्‌ से अधिक क्या कटं! रामलक्ष्मण दोनों भाई एवं सुग्रीव समस्तवानर-सेना सहित यह आयेंगे जौर सारे नगरमे घेरा उल कर रावण काउसके वंश-सहित नाश कर डालेगे। ७२स्वामिनी को लेकर रधुनाथ
पुनः अयोध्या जायेगे । आप मनमें तनिक भी चिन्ता न करें।
अप
एेसी शंका न करं कि रघुनाथ कदाचित्‌ न आये, वे अवश्य अयेगे।
यह विनती सुनकर सीताजी कहती हैँ कि लंका आने के मागं में पडनैवाले एसे गम्भीर-गहन सागर को श्रीरामजी सेना-सहित किस प्रकार पार

नेपाली-हिन्दौ

१६१५
जननिकन बुक्ञाया यो हृकूम्‌ सूनि ताहां।मइ छ प्रभुजिको दास्‌ बोकंला पीठमाहाँ ॥रघुपति दुद्‌ भार्ईलादइ्‌ क्या दुःख पष्‌ ।सकल अर र सुग्रीव कदि आफंति तन्‌ 1७४1जननि ! मत बिदा ज्ञट्‌ पाठं मर्जीत सून्यां ।अब त हि गयापो हुन्छ काम्‌ जटिदि हन्या ॥जउन चिज दिदामा राम विश्वास मान्छन्‌ ।उहि चिज पनि पाञजान्छ दिन्‌ मात. जान्छन्‌ ।७५॥यति सुनि अधिदेखिन्‌ केशपाशूमा धव्याको ।मणि चिकि दिइहालिन्‌ रामको मन्‌ पय्याको ॥मणि दिद फिरि चनृछिन्‌ चित्रकूट्मा भयाको ।शरण परि नजर्‌ दीः काग बची गयाको ।७६॥एक्‌ दिन्‌ है हनूमान्‌ ! म चिघ्रकुटमा राम्‌का नजीक्‌मा धियां |मेरा काखमर्हां सुत्या र रघुनाथ्‌ हातूको तकीया दियं |मेरा लाल्‌ दुद्‌ पाड देखिकन कार्‌ आयो र द्यो जसंँ।

मेरा ई दइ

पाउदेखि

बहुत आयो रगत्‌ पो तसै ।७७।

करपायेगे? ७३

सीताजीकी यह्‌ शंका-युक्त वात सुनकर हनुमान
ने समज्षाया-मैतो प्रभृजी का दासहूं। उन्हँं पीठ पर्‌ उठा लूंगा)राम-लक्ष्मण दोनों भाइयो को कंसे कष्ट उठाना पड़ेगासमस्त वानरसेना तथा सुग्रीव (आदि) छर्लग मारकरस्वयं ही पार हौ कगे] ७४हे जननी { अव मुने शीघ्रही जानकी आलज्ञादें। आपकी आज्ञा काप्रत्येक शब्द मने ध्यानपूवेक सुन लिया है। अव यहाँ अधिक सकने सेकाम नहीं बनेगा, शीघ्रातिशीघ्र जनेसेदहीहोगा। मुज्ञ कोई एेसाचिह्व दं, जिसे देखकर राम को विश्वासं हौ जाये; मै वही लेकर चलाजाॐ।

समय व्यथं ही व्यतीत्तन हौ जाय! ७५

टसा सुनकर

(सीता
ने) पहले से ही केश-पाशमें, धारण किये हृए मणि को निकाला, जोराम के मन को अधिक भाता था, वही हनूमान को दिया। मणि देकरचित्रकूट मे घटित एक घटना सुनाने लगी} यह्‌ घटना एक शरण मेंआये हुए कौए की, उनकी कृपा-दुष्टि द्वारा चच जाने के विषय मेँ थी.।वे पूनः कहती है-७९ हे हनूमान ! एक दिनि मै चित्रकूट मे रामजीके निकटथी। वेमेरीगोदमें हाथका तकिया लगाकर लेटे हुए थे।मेरे दोनों लाच पवो को देख कर एकाएक, एक कौए को श्रम हआ -ओौरउसने आकर जेसेदी मेरे पावोंमेचोचमारी कि दोनों पावो से रक्त
१६६

` भानुर्भक्त-रमार्यण

ऊटी श्वीरघूनाथको नजर भोपर्याक्या एक्‌ तृण ली तहा प्रभुजिलेत्यो काग चौधभवन्‌ इल्यो त पनि एक्‌फोरी आद्‌ शरण्‌ परी नजर दीमेरो आज शरण्‌ प्यो भनि दयायै माथी त दया कसो हुन गयोहात्‌ जोरीकन विन्ति फरि हनुमान्‌याहा छन्‌ भति यो खबर्‌ नभद्‌ पोरावणूले हरि ली गयो भनि खवर्‌
हीं थियो काग्‌ पनि।यो काग मारं भनी ॥पायेन आधारजस ।
बची गयो काग्‌ तसे ।७८।आयो उ कागूमा पनि।भन्थिन्‌ भन्या यो पनि॥वीर्‌ गनं लाग्या तहांँ।आऊन दीलूृभो यहां।।७९॥हुन्थ्यो त वाच्थ्यो कहां |
आज्‌ तक्‌ रावणको कुले प्रभुजितेदेखछ सर्प त सानु मानु भिरारक्षस्‌ नाश्‌ तिमि गदौ तिमि टलातिम्नो रूप्‌ अति सानु देख्छुभरुता
सन्‌ भस्म गर्थ्या यहाँ ॥
संञ्चनृठे मनले र गमृष्टे मनमायस्तो मजि सिताजिको सुनि तहां
आश्चयं मान्छ पनि॥पवेतसरीकाभया।साम्ने खडा भं रह्या) 5८९१

मेरू तुल्य स्वरूप्‌ गरेर हनुमान्‌

वह्‌ निकला । ७७

जतो कसोरी लडी।हुन्छौ स्वरूपकी वदी ।८०।कत्रा हनन्‌ ञ्चन्‌ भनी)
श्रीरघुनाथ ने उठ कर देखा । कौञाभी वहीं था।
इस कौएको मारने के लिए रघुनान नै कंकृड ठाकर प्रहार किया।कौआ चौदहो भुवन मे घूमा, परन्तु कहीं उसे कोई सहाया न भिला भौरपनः उन्हींकीशरणमेःआगिरा।रसमकी ही कृपादष्टि पाकर उसकौए के प्राण वच गये)!श्रीराम ने देखा कि अन्त मेँ कौभाउन्हींकीशरण में आाया। यही देखकर उनका हृदय पक्षी के प्रतिकरुण हो उठा ओौर उन्होने उसकी रक्षाकी।अतः वे मेरे उपर भीअवष्य दया करेगे शौर इन दुष्टोंसेमेरी रक्षाकरेगे।हनुमान पुनहाथ जोड़कर. विनती करने लगे-है माता ! अप यहाँ ह, यह्‌ पता लगानेमेही विलम्ब हुादहै। ७९ यदि यही निश्चय होता कि रावण दवाराआपका हरण हुआ है तो वह्‌ वच कर कर्हाँं जाता? प्रभु ने अब तक
रावण को उसके वंश-सहित नष्ट कर डाला होता।

हनुमान की विनती

सूनक्रर सीता कहती है किं तुम्हरा रूप तो मँ अव्यन्त सूक्ष्म देख रही हूं)
गौरंया चिड़याकेसमानहो। किस प्रकार लङ़कर तुम रावण के वंशका नाश करोगे? तुम वड़ेहोगे या तुम्हारा स्वरूप वडा होगा| ८०तुम्हारासू्पतो मै अत्यन्त छोटा देती हूं । भै विचार करती हतोसोचती हं, तुम्हारे अन्य साथी कंसेहोगे।

यहु सव सोच कर आश्चर्य

नेपाली-हिन्दी

१६७
जव त ति.हनुमानूको. रूप्‌ ट्लो देखिलीइन्‌ ।खशि भइ तहि बीदा. माइले जल्द दीइन्‌ ॥अव त तिमि हनूमान्‌ धृष्ट चाला छिपाऊ।इनिहरु सब देखृछन्‌ कूदि फर्‌ जाद जाऊ ।८२॥यति सुनि हनुमान्‌ले फेरि बिन्ती लगाया ।. सहज सित म जन्ध्यां केहि फल्‌ खान पाया]वरिपरि फल फूल छन्‌ मजि माते म पाङ ।
हुकुम बिनु कसोरी आज आफं म खां ॥=३॥यति विनति गव्याथ्या खानको मजि पाई।खशि. भइ फल खाई मादथ्ये जलि्दि ' आई ॥चरण परि विदा भे क्ये गया दूर्‌ जसेता।
अलिकति कु काम्‌ फर्‌ गनं आंटया तसै ता ॥८४।आपने मन्मन भन्दछन्‌ ति हनुमान्‌ जुन्‌ वीर दत्‌ भै गई।जक्ती ख्वामितको

हुकूम्‌ छ उतिमा

मात्रे चनाखो

भई ||
उत्ती काम्‌ गरि फिष्ठं पो पनि भन्या ` त्यो दरत्‌ अधम्‌ ह्येभनी।भन्छन्‌ सन्‌ दृनियां त भेटिकन जाँ कस्तो छ रावण्‌ पनि।८१।यति गमि ति बघैचा फक्न मनसुब चलाई] `.खुशि भद्‌ ति महावीर्‌ जल्द फकफि आई ॥
भी होताःहै। सीताकी यह आष्चरथपूरणं वाणी सुनकर मेरु`पर्वत ङेसमान विराट्‌ रूप धारण करके हनुमान सीता के सम्मुख खड्हयो गये । = १
सीता माताने जव हनुमान का एसा विराट्‌ रूप देखा तो अत्यन्त प्रसन्नहोकर उन्हे तुरन्त विदा क्रिया । उन्होने कहा--हनुमान अव अधिक न
दिखाभो, अपने कौशल को ्टुपा कर रक्वो, अन्यथा यहाँ के लोगो के
सम्मुख प्रगट हौ जायगा । अतः तुरन्त कूद कर चले जाओ । ८२ ` यह्‌सुनकर हनुमान ने पूनः विनती कौ कि हे माता। यहाँ चारों ओर फल-
फलादि भरे पड़हैं। यदि इतनी अन्ञाहोतोमैँकुछखा लूंतब जाड,बिना आपकी अज्ञा, मैस्वयंकंसे खा लूं? ८३ उनकी इतनी विनतीसुनकर सीतानेअज्ञादेदी। उन्होने प्रसन्न होकर फल-फूल'- खाये
सौर तुरन्त माता के निकट आकर विदाली। जैसेही कुछ दूर गये येकिकुछ ओर काम करना चाहा । ८४ वे मन-ही-मन वोले-हनुमान एक
वीरदूत होकर गया, जितनी स्वामी कौ आज्ञा हुई, उतना ही करकेवापस लौटने पर सारी दुनिया केगी किं वह दूत अधम है) अतः
१६

भानुभक्त-रामायण

सकल वन उचखेत्दे चौकि सम्पूणं मान्या]फक्त जननि बस्न्या एक्‌ सिसौ शेष पात्या ।८६॥
जव त वन बिनास्या राक्षसी जल्दि आई।पुगि नजिक सिताका सोधि सीताजिलाई॥भन न तिमि सिताजीवीर्‌कोहोक्यान आयो।अति असल बधघेचा मासि मदान्‌ बनायो ।८७॥यति सुनि तहि सीता भन्दछिन्‌ क्या म जानू |विपत परि रह्याकी षट्ूमता चानुमानं ॥तिमिबुञ्लन सवे बात्‌ कौनदहोक्यान आयो।अति असल बनघेवा क्यान मैदान्‌ बनायो ॥८८॥सकल छल तदहे यो राक्षसे गछ माया।जन त यति भनीथिन्‌ राक्षसी सब्‌ उराया ॥कहन भनि गया सब्‌ रावणेका हजूरमा।
पूजि कहन ति लाग्या वन्‌ गयो जो बिसुर्मा ।॥८९॥एले हे महाराज्‌ ! अधीक बलियो आयो र वानर्‌ यहँ।सीताजीसेगकेहि बात्‌चित गरी कृद्यो वेचामरहां॥रावणसे भेट करके भी देखना चाहिए, वहु कंसा है। ८५

एसा विचार

कर अशोकवाटिका उजाइने की आकांक्षा से प्रसन्न होकर वह महावीरपुनः लौट जाया । सारे वृक्षोंको नष्ट करते हए समस्त वाटिका कोउजाड डाला ! केवल वही शिशपा का वृक्ष, जर्हां सीता माता बेहतथीं, शेष रह्‌ गया । ८६ जव सारी वाटिका उजड़ गयी, तव वहाँ एकंराक्षसी तुरन्त आ पहुंची ओौर सीता के निकट आकर वोली-सीता तुमबताओ, यह्‌ वीरकौनदहै? क्यो आया है? एसी उत्तम वाटिका कोनष्ट करके मैदान क्यों बनाया ? ८७ सीताजी ते कहा क्या जानू?मतो स्वयं ही विपत्तिमें पड़ी हूं।

स्वयं ही समञ्लो, कौन हैः क्यो

आया है जौर इन उर्तम बगीचों को मैदान क्यों बनाया? न्प

सर्व॑

छल रहै! सीता की यहु वात सुनकर राक्षसी डर गयी ओौर सब कुष्ठकह्ने के लिए रावण के पास गयी! उसमे रावण के पास जाकर कहा

कि वन मेषएकवीरसूरमाअयारहै। ८९

यहाँ एक बलिष्ठ वानर आया ।

है महाराज

उसने सीताजी से कुठ बातचीत की

सौर बगीचे की यर कूदा ओर सारे वृक्षों को बड़ी सरलता
करसारा वगीचा मैदान वना दिया।

नष्ट करके वाह! ९०

` अभी आज

से उखाड्‌

चौकी को चृणं कर हवेली को

ैतो यही विनती करने के लिषएु.आम्री ह।

नेपाली-हिन्दी

१६९
बनार्दददियो ।सब्‌ तो रूष्‌ सहज उखेलिकन साप्‌ पैदन्‌चौकी चृणं गरी हबेवि पनि सन्‌ नासी बस्याको थियो।९०।आयौ हामित बिन्ति गनं भनियो बिन्ती गम्याथ्या जसे ।सून्यो जल्दि उठेर पक्रनत भनी लश्कर पठायो तसं ॥हुकूम्‌ पायर लाख लश्कर गयो पक्रेर व्याड भनी।एक्‌ ` लाख्‌ ल्करलादइ देखि हनुमान्‌ अत्यन्त गर्जया पनि ।९१।त्यो शब्दै सुनि मोह लश्कर भयो छोडयो हतीयार्‌ पनि ।सब्‌ माग्या हनुमानले क्षणमहं ई हुन्‌ भुसूना भनी॥लोहस्तम्भ उठाई साफ्‌ सब गव्या समचार्‌ पुगेथ्यो जसे ।रावण्‌ खूब रिसा फर्‌ पनि दुलौ सेना पठायो तसे । ९२।सेनाका पति पाच गया हूकुमले ठ्ले थिग्रो तापनि।त्यो सेना पनि साए्‌ तहां गरिदिया उस्ते भुसूना गनी ॥फेर मन्त्री सुत सात्‌ गया हकुमले खुप्‌ भारि लश्कर्‌ लिई ।लोहस्तस्भ उठाइ साए्‌ फिरि गन्था सब्लाद्‌ ठक्कर्‌ दिई।९३।सात्‌ मन्त्री सुतलाइ सैन्य सहितं मारी सक्याथ्या जसै।` रावणपृत्रकान्छोअक्षयकुमार्‌ पो लड्न आयो तसे ॥रावणने जैसे ही यह्‌ विनती सुनी, उसने उठ्करसेना को आज्ञा दी किउसे (हनुमान को) पकड़ लिया जाये । आज्ञा पाकर लाखों सेनिक दौडपड़े। एक लाख सैनिकों को देख कर हनुमान ने तीत्र गजेना की । ९१उस गजना को सुनकर समस्त सैन्य-दल आकृष्ट हो उठा ओर अपने-अपने
हथियार डालद्ि।हनुमानने भी सबको भुनगे की तरह क्षण-भर मेंही नष्ट कर डाला। गदा उठाकर सबका सफ़राया कर डाला। जब यह्‌समाचार (रावण के पास) पहुंचातो रावण ने पूनः एक विराट्‌ सेनाभेजी । ९२ आज्ञानुसार सेना बड़ी होते हुए भी साथ में केवल पाँचसेनापति ही गये; हनूमान ने उस विराट्‌ सेनाका भी उसी प्रकारसफ़ाया कर डाला! इसबारतो गिन-गिन कर एक-एक को समाप्तकिया। उसके बाद रावणने फिर एक भारी सेना भेजी जिसके साथमे
सात मंत गये।
(हनुमान मे) गदा उठाकर इन सबको भी धकेलते हृए

समाप्त कर दिया । ९३

जैसे ही सेना-स्हित सातों मंत्रियों को समाप्त
किथा, वसे ही रावण का कनिष्ठ पुत्र अक्षयकुमार लड़ने के लिए आया ।तितली की तरह जैसे ही वह भारी सेना लेकर पहा, वैसे ही हनुमान
आकाश"क्मै ओर उषैः भौर गदा.से सरलतापूवैक उसके सिर पर प्रहार
१७०

भानुभक्त-रामायण

भारी फौज लिथेर त्यौ पृतलि ज्ञ आई जसं ता पय्यो।आकाशूमा कदि लोहदण्ड शिरमा ठोक्या सहुज्मा मव्यो।९४।पले अक्षकुमार मारि अरु सब्‌ सेना समेत्‌ नाश गव्या ।आड देमा तहि बत्तिका पृतलि ञ्चं हंद अनेक्‌ वीर्‌ मन्या ॥सब्‌ राक्षसूहर्लाइदई मारिसकि फर्‌ आञछ कन्‌ वीर्‌ भनी ।लोहस्तम्भ

लिई खडा

भद्‌ र्या

ताहां हनूमान्‌ पनि ।९५।
जब त भति पियारो पुत्र कान्छो मग्याको।खबर कहन आयो फौज्‌ समेत्‌ नाश्‌ गम्याको ।तब त अधिक ताप भं भन्छ रावण रिसाई।

अब त गड म अफे

मार्दछटे

तेसलाई ।९६॥
कीमार्टं कित बाँधि ल्या यहाँरावण्ूले यति इन्द्रजित्‌ सित भन्योहात्‌ जोरीकन बिन्ति ग्म चदे
तेरा. नजीकूमा भनी ।तेस्‌ इउन्द्रजित्‌ले पनि ॥आफहजरले तहां।

जान्‌पषछठं

त्याज बंधी यहु ।९७।

क्ते

गै सहजमा

क्ये फौज्‌ पनी साभ्‌ लिर्ई।साम्ने मूहृडा दिरई।देख्या श्रीहनुमानले पनि र ॒खुप्‌ गर्जया ति साम्ने भरई।.लोहस्तम्भ चिरई कुदीकन उपर्‌ आकाण बीच्मा गई ।९८।येती बिन्ति गरी चढयो रथमहांआयो श्री हनुमान्‌ भथातिर गयो
किया ओौर मार डाला। ९४इस प्रकार (हुनूुमानने) अक्षयकुमारको मार कर (उसकी) शेषसेनाको भी नष्टकिया।आते ही दीपकके उपर नष्ट होनेवाले पतिगों के समान सारे वीर समाप्तहोगये।सबराक्षसो को मारकर हनुमान यह्‌ सोच कर कि अव कौन सामने आता है,वहीं गदा लेकर खड रहे ।! ९५

जब अपने अति प्रिय कनिष्ठ पत्र के

सेना-सहित मारे जाने की सूचना रावण को मिली तो वहु अधिकचिन्तिति हो क्रोध से कहता है-अव तो मँ स्वयं जाकर उसे मारउालंगा। ९६ अबयातोरउसेमारही उालंगा.या बन्दी बनाकर तेरेनिकट ले आज्गा1 इन्द्रजीतसे रावण नं इतना कहा, तो वह हाथजोडकर विनती करने लगा-मेरे होते हुए श्रीमान्‌ को वहां जाने कीआवश्यकता नहीं । रैस्वयंही जाकर वहाँ से उसे ध कर यहाँलागा 1 ९७ इतनी विनती करके वह्‌ रथ पर आ-चढ़ा ओौर कछ सेनाभीसाथमेंलेली। जहाँ हनूमान थे वहीं जाकर सामने घेरा डाला।श्रीहनुमान ने देखा-भौर तीन बार गरज कर आकाश की ओर उशछले ओर

नेपाली-हिन्दौ

१७१
लोहस्तम्भ उचालि घुम्न विचमापाच्‌ वाण्‌ छोडि लगाई आद्‌ जनि थपीनाण्‌ लाग्या भनि इन्द्रजित्‌ खुशि भईघोडा सूत्‌ रथ चूणं पारि हनुमान्‌फोर्‌ अकर्म रथमा चटेर अव ताफाँक्यो जल्द र ब्रह्मपाश्‌ ति हनुमान्‌
लाग्या गरुड न्च जसै।
बाध श्रीहुनुमानलाईद्‌ संग लीवाँध्याका हनुमान देखि शहूरजुन्‌ रास्का चरणे स्मरण्‌ गरि सहन्‌
वैकुण्ठे सब पुग्दछन्‌ भनि भन्याबधिन्थ्या हनुमान्‌ कहां तर पनी
फरी

लगायो

तसे ॥

गर्ज्यो जसे ता

तहां ।

तेस्‌ ब्रह्मपाश्मा

परी ॥
कूद्याति आकाश मरहा।९९।बष्छ्‌ म॒ एेन्े भनी।जीलाईद्‌ बध्यो पनि॥फवर्यो र॒दर्बार्‌ गयो ।सम्पूणं खूशी भयो ।१००।अज्ञान पाश्‌ नाश्‌ गरी।बन्घन्‌ पन्या स्यं भया ।चुप्चापलागी गया।१०१।
रावण्‌ भेटि त जां भनेर हनुमान्‌जस्सै इन्द्रजिते गयो र हनुमान्‌- जीलाइद बाँध तदहाँ।फकेथ्यो धर जाँ भनी तब तीं आयेररस्तामह |रिस्‌ फेव्या पुरवासिले पनि मुरी उठाई दहान्दा भया।रिस्‌ फन्‌ भुसुना ` भनेर हनुमान्‌ चुप्‌चाप लागी गया ।१०२।

घुमाते हुए गरुड़

गदा लिये हए आकाश के बीच में पहुंचे । ९्ठ

वेगदा

की तरह मध्य आकण

इसी समय

मे ही संडराने लगे!
(इन््रजीतने
उन पर) पांच बाण छोड-आठ बाण ओौर लगाये ओर उसके ऊपर ओरचलाये । बाण लगा, समञ्च कर इन्द्रजीत ने प्रसच्च होकर जसे ही गजना
की, वैसे ही घोड़ा-सहित रथ को घूरकर हनुमान आकाश मे कूदे) ९९फिर वह॒ दूसरे रथ में चढ़ा ओर अव तो इसे वधि लूंगा, यह्‌ सोचकर
शीघ्रता से ब्रह्मपाश फक कर हनुमान जीको वाधि लियाहनरुमानकोबंधे देखकर सारा नगर प्रसन्नतामे इब गया । हनुमान कोदरवारमेंलेजाया गया । १०० जिस रामका स्मरण करते-मात्रसे ही मनुष्य अज्ञानपाशसे मृक्त हो जातादहै ओर वेकुण्ड पहुंव जाताहै, तो भला (उसराम के कृपापात्र भक्त एवं दूत) हनुमान (जिससे इन्द्रजीत ने उन्हे वाधा
था) उस ब्रह्मपाश से कर्हा बंध सक्तेथे?

वेतो केवल कध जाना दिवा

रहे थे (वह बँधना तो) बहाना-मात्र था, जिससे वे सरलता-पूवंक रावणसे मिल सकं 1 १०१ जैसे ही इन्द्रजीत हनुमान को वहम वँधकर घरजनेके लिए लोटा, उसी स्मय मागं मे नगरवासियों ने वदला चकातेंके लिए मुदरी (मुक्का) उठाकर (हनुमान पर) प्रहार किया । यहु सोचकर किं भुनगे बदलाले रहै, हनुमान चुप-चाप (उनकी) मार खाते
१७२

भानुभक्त-रामायणं

पले ता ब्रह्मपास्मा परिकन क्षणभर्‌ बाँधिन्‌ काभ थीयो।ब्रह्याको वाक्य सांचो गरिकन पछि ता पाशले छोडिदीयो ॥बन्धनूदेखी त खुस्क्या तरपनि हनुमान्‌ भेट्‌न मन्सुब्‌ धन्याका ।
पौँच्या रावण्‌ छ जहां खुशिभई्‌ अरुतामान्दछन्‌ करपम्याका । १०३।रावण्‌ वीर्‌ पति मन्विवगेसंगली भारी सभामा धथियो।सुम्पीदियो॥पौच्यो ताहिर इउन्द्रजित्‌ति हनुमान्‌- जीलाईइ्‌हात्‌ जोरी विन्ती गव्यो अति हरीप्‌ वानर्‌ छ सेना पनि।धेर नाशन गरे आज मइ गँ ल्या खुनी हौ भनी १०४।जो गरन्‌ अब पष्ठ मन्ति संगको सत्लाह बात्‌चित्‌ गरी ।यस्को आज टठिक्रान्‌ लगाउनु हुवस्‌ मन्मा विचार्‌ खुप्‌ गरी 1येती विन्ति सुन्यो र इन्द्रजितको हैस्यो नजरले पनि।लायो सोधन प्रहस्तलाइ्‌ किन यो आये लौ सोध्‌ भनी १०५।बर्घेचा पनि।अस्सल्मा पनि क्या भ्न अति असल्‌ मेरोमान्‌ भुसूना गनीनास्यो वीर्‌ पनि नाश गस्योमकनतागई।हकम्‌ यो सुनि त्यो प्रहस्त हनुमान्‌ जीका अगाडीलाग्यो सोध्न सवे कुरा पनि बहूत्‌ आधार दीन्या भई । १०६९।हुए बैठे रहे । १०२ पहुलेतोब्रह्मपाश मे वंध जाने ओर कुष्ठ देर इसीभकार बने रहने काकामथा। त्रह्याके वचन को सत्य करने के वादउन्हं पाशसे मूक्तंकर दिया गया। बन्धन से यक्त दहोनेपर भी हनुमान.कोतीरावणसेभेटकरनादहीथा।अतः वे जहाँ रावण था, वहीं गयेओर लोगोने यही समज्ञा करि वे विवश करके लाये गये, परन्तुहनुमान स्वेच्छापूवेक (वहाँ) गये थे । १०३ रावण उस समय अपने वीरमन्त्ियों के साथ अपनो विराट सभा

का संचालन

कररहाथा।

वहाँ

पहुंचकर इन्द्रनीतने हनूमान को रावण के हाथोंमे सौपदिया। उसनेरावणं के सम्मूख हाथ जोडकर विनती की कि यह वडाही नट्खट वानरहै, इसने बड़ी-वड़ी सेनाओं कानाश कियाहै, अतः आजै स्वयंहीइस हत्यारे को पकड़कर लाया हूं । १०४(इन्द्रजीत नै आगे कहा-) जोकू भी करना उचित हो, अव सव मन्तियों से विचार-विमशं करके, आजही इसको ठिकाने लगाने की करपा करे! इन््रजीतकौ विनती सुनकररावणने मनमें एक पल विचार किया, फिर एके दृष्टि इन्द्रजीत परडाली ओर कहा- पृषो, इसीसे कि यह क्यो आया है? १०५क्याकहं ! इसने मेरे अति उत्तम वगीचेको भीनष्ट कर दिया ओौर सारे

तेपालौ-हिन्दी

१७१
सामने नजर्‌ दी तहां ।कामले त आर्यां यहाँ ॥रामको म दास्‌ हूं, मति ।आयां नले यो मति। १०७।लक्ष्मण्‌ सहित्‌ भै जसे ।राम्‌चन्द्रजी र्ये तसै ॥बक्सनुभयो सुग्रीव राजा. भया।बाली मारि रजासीता खोज्न हकम्‌ हदा विरहरू फेर्‌दस्‌ दिशामा गया १०८।एक्‌ वीर्‌ ता मइ हूंहुकूम्‌ शिर उपर लीयेर आयां य्ह ।पायां देखन सिताजिलाई दूत हुं रामको मजान्थ्याँं करटा |वबघेचा पनि।वानर्‌ हं र उखेलि साप्‌ गरिदियां तेरोआया मानं मलाई जो अगि सरी उन्‌लाईइ मार्व्यां पनि। १०९।यो इन्द्राजित्‌ गइ यसं बिचमा मलाई ।बधिर ल्याइकन आजं दियो तलाई ॥बन्धन्‌. परयो भनि नठान्‌ तं॑दिर्थाँ जनाई |खला छुं अति पनि दिन्छुम सुन्‌ तंलाई।११०॥
यै बीचमा, नडराइ्‌ रावण उपर्‌बोल्या श्री हनुमानले तं बुञ्चिलेभार्या जसूकि हरिस्‌ उने जगतनाथ्‌तेरो नष्ट भयो र अति दिन योआया राम मतद्ध पवेतविषेलाया सुभ्रिवले मित्यारि खशि भै
वीरोंकोतो भृनगा समञ्षकर सरलतासे मार डाला। ेसी आज्ञा पाकरएक प्रहरी हनुमान जी के सम्मुख आया ओौर आश्वासन देते हुए सभीबाते पूछने लगा । १०६ इसी समय निडरतापूवेक रावण कीओर दृष्टिडाल कर श्रीहनुमान जी बोले-समन्नले किमे यहाँ किसी काय॑वशहीआयाहूं। जिसकी पत्नीं का तुमने हरण कियाहै, उन्हीं जगन्नाथ रामकामैदासदहूं। तेरी मति श्रष्टहौ ग्यीहै ओर अव तेरे दिनि. भीनिकट आ गये हः अतः (यदि कल्याण चाहता है तौ) अपनी विचारधाराबदल दे। १०७ जसे ही लक्ष्मण-सहित श्रीराम मतंगपवत पर आये,
सुग्रीवजी ने अति प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी से भित्रता. कर ली।(श्रीरामचन्द्रजी ने) बालिको मारकर सुम्रीवको राज्य सौपकर राजावनाया ओर अब उनकी अनज्ञासेहीसीताको दृंढने के लिए वहृतसे वीरदसों दिशाओंमे गयेहै। १०८ (हनुमान ने अगे कहा-) उन्ही मसेएक वीरभ (भी) हूं श्रीराम की आज्ञा शिरोधायै कर (यहाँ) आया
हुंओर सीताजीको देख चृकाहूं) रामका दरतहं) इसीलिए तेराबगीचा उजाड कर साफ़ करदियाहै ओौरजोकोईभी मृञ्चे मारनेकेलिए भाया, उसेहीरमैने मार डाला। १०९

उसी समय यह इन्द्रजीत

मृक्ञे धकर ले आया ओर तुक्च सौपदियादहै।
यहनसमन्नकि. र.
१७४

भाचुभक्त-रामार्यणे

लोक्को गती सव विचार्‌ गरि आज तंले।यो राक्षसी मति नले हित भन्षुं मैले ।॥ब्राह्मण्‌ ठं होस्‌ ऋषि पुलस्त्यजिको त नाती ।राक्षस्‌ कसोगरि तं होस्‌ बुक्चिले न भाती ।॥१११॥आत्मा स्वरूप उत
ज्लन्‌ छ स्वरूप काहाँ।
जाती र वणे लिइ भवच सकिन्छ याहं ।।
सो आत्मरूप भनि नित्य विचार गनूं।आनन्दमा रहँ भन्या मति येहि धने ।॥११२॥जो यो लोकविषे प्रपंच छ सबै जान्‌ स्वप्प जस्तो भनी।सूतुन्‌ज्याल्‌ सपना छ सत्य उल्ति लाग्देन साँचो पनि।तस्तं ज्ञान्‌ त भयो भन्या त्रिभुवने एक्‌ देख्छ आत्मा फकत्‌ ।अज्ञानूरूपूनिदमा पन्यो पनि भन्या
देखिन्छ नाना जगत्‌ ।११३।
आत्मा सत्य म हूं भनेर बुद्चिलेस्ूटो जान्‌ पृथिवी र जलहर मिलीतर्लस्‌ यो मनमा लिदइस्‌ पनि भन्याजो हुन्‌ विष्णु उ राम हन्‌ शरण पर्‌
यस्‌ देहलाईपनि।टे बन्याको भनी 1.तार्स्यां उन विष्णु छन्‌ ।रिस्‌ उरते रात्षन्‌। ११४।
बन्धनम हूं मै स्पष्टकरदेताहुं किमे मुक्त हूं तुञ्चे उपदेश भी देताहुं, सो सुन ! ११० जगत्‌ की गतिको विचार करो ओर इस राक्षसीमतिका त्यागकरो। तेरे हित की वात कहताहूं। तुम ज्ाह्यणहो 1 श्रीपुलस्त्यजी के पौवर (हो) । फिरतुम किस प्रकार राक्षसदहो।भलीरभातति विचार करो! १११1 वहु आत्मास्वकूपं तो कहता है किस्वरूप कहां है । जाति एवं वणं कोलेकर जोव भी यर्हां कहाजासकता हैः उसी को आत्मस्वरूप समज्ञकर

विचार करो1

यदि आनन्द

पूवेक जीवने व्यतीत करनारहै तोरेसी ही (मेरे उपदेश के अनुसार)मतिको धारण करो! ११२ इस जगत्‌ के जितने प्रपंचरह, उन संब कोस्वप्न-सदुश समञ्नो । जसे सपना सोते समय तक ही रहता, जागनेपर सव कु मिथ्या सावितहो जातारहै, उसी प्रकार जब मनुष्य कोजान प्राप्तहौ जातादहै,

तव उसे तीनों भुवन एकटही आत्माके समान

दिखायी देते हैँ 1 ११३ यहं संमक्चकर कि सत्य आत्मामं हूं इस शरीरको जो पृथ्वी-जल (आदि तत्वों) के मिश्रण सेवनादहैः च्रूठ ही समन्नो।.इस विचार को यदिमन में रखोगेतो तर जाओगे!
विष्णृदहै,
वही रामर;
-मन मे) उत्पच्नहोतादहै,

तारनेवाला वही

उसीकीशरणमें जाभो। क्रोध, जो (तुम्हारे

उसेव्यागदो। ११४

एसी मूखंता कोमनसे

, मैपाली-हिन्दी `

१७१५
यस्तो मूखंपना नली अब सिता सुम्पी शरणूमा तं पर्‌ ।खश्‌ हनन्‌ रघुनाथ शरण्‌ परि गया यो दृष्ट चाला नगर्‌ ॥तरलांउसे।रामको भक्तिः गरेनता कसरियो संसारपर्ला जन्मनु सर्नं ये फजितिमा छृटतेन यो ताप्‌ कसै। ११५।यो जानीकन भक्ति गर्‌ शरण पर्‌ रामूका हजूरमा गई।आपन्‌ आत्म नरक्‌ विषे नलदजा यस्तो तं जान््या भई।सीताराम्‌ सितको विरोध्‌ गरि तंहेर्‌ गिर्लास्‌ नरक्मा पनि।फर्‌ उत्तीणं हुन्‌ किन्‌ छ बुक्िले अर्ती दिर्यां यो पनि ।११९।यस्ता बात्‌ हनुमानका जब सुन्यो रावण्‌ रिसायो तहांलाल्‌ लाल्‌ नेतर गराइ भन्छ रिसले सूनाई्‌संसदमहां ॥मेरो उर्‌ रत्तिभर्‌ नराखि बहुत क्या बोल्दछस्‌ रे यहाँ ।राम्‌ लक्ष्मण्‌ दुद्‌ भाइलाइ्‌ सहजे माष्टम छोडष््‌ कहँ। ११७।सुग्रीव्‌लाई्‌ तंलाई्‌ मष्ट पछि फेर माष्ट सिताजी पनि)राम्‌ लक्ष्मण सित क्या उराञ्ुर की मानन्‌ मलाई भनी ॥तिन्‌का वानर सैन्यको पनि विनाश्‌ ग्न्य येती जसै।नोल्यो रावणले इ बात्‌ सुनि तहां बोल्या हनूमान्‌ तसे। ११८।निकालदो ओौर सीताकोलेकर प्रभुकी शरणमे जाओ। शरणमेआया हुआ देखकर प्रभु प्रसन्न होगे अतः यह दुष्टतापूणे व्यवहार न करो ।राम कौ भक्ति विना किस प्रकार भव-सागर तरोगे ? इन्हीं कष्टों मे जन्मलेना पड़ेगा ओर अन्त में मरना पड्गा। यह (जन्म-मरण का) ताप
(कभी नदीं छृटेगा) । ११५

यह्‌ सव॒ जानकर अब रामकी सेवा में

जाकर उनकी भक्ति करो 1 अपनी आत्माको नकं कीओर मत लगाञ।

बुद्धि धारण करो मौर सीता-रामका

विरोध करतुमनकं मेही गिरोगे,
फिर उबरना कठिन हौ जायगा । अतः मैँ तुम्हें केवल एेसा उपदेश दे रहाहु, एसा समञ्च लो । ११६ हयुमान की यह्‌ उपदेश-पुणं बातें सुनकररावण को क्रोध आया।उसने लाल-लाल नेर कर कहा-मेरा क्रचित्‌मात्र भी ध्यान न रखकर, निडरतापूवंक यहाँ अधिक

क्यावबकताहै

रे [`
राम-लक्ष्मण दोनो भाद्यों को भँ सहज ही मार उलूंगा। भँ भला उन्हेकहां छोड़ सकता हं । ११७ फिर सुग्रीव, ओौर तुक्च मारने के पश्चात
सीता को सार डालूंगा। अँ क्यो उरं कि रामलक्ष्मण कहीं मुञ्लेनमार डालें । उसकी वानरसेना का भै विनाश कर डालुंगा। रावणनेजैसे ही इतना कहा कि हनुमान बोले-११८ इस प्रकार व्यथं ही क्यों
अहंकार करते हौ!
प्रभुकोतो अलग रक्खो,

तुममेरेही बराबर नहीं

१७६

भावनुभक्त-रामायण

यसरि किन बहते गदछस्‌ सेवि धेर ।प्रभुकन त परं राख्‌ जोरि छनस्‌ तँ मेरे॥अधि सरं ततं जस्ता कोटि रावण्‌. म मारूं ।
हुकुम त नभयाको मानं पो आज क्यारू ।११९॥यस्ता

बात्‌ हनुमानका सुनि तहां

रावण्‌

रिसायो

अत्ति।
साचा हृन्‌ इ कुरा हुनाकनत हौ लिन्थ्यो कहाँ दुर्मति ॥यो वानरकन काटि टुक्‌ गर भनी यस्तो हृकूम्‌ पोदियो।हात्‌मा वेस्‌ हतियार्‌ लिई अगि सभ्यो जुत्‌ वीर्‌ नजीकूमाथियो२०यस्‌ बीचूमात विभीषणे अगिसरी
हात्‌ जोरि विन्ती गन्या।
दत्‌ हो यो महाराज्‌ ! कुरा पनि वहां लैजाच्छ को यो मभ्या॥चिन्ह केहि लगाइ छोड दिनुहवस्‌ जावसू र विस्तार्‌ गरोस्‌ ।येसे वानरकाकुरा सुनि यहाँ आउन्‌तिसंग्राम्‌ परोस्‌२१संचो भन्या भनि बुक्ली कपडा मगायो।तेल्‌ धघीरउले मृषि पुर्‌ भरि वेनं लायो ॥हृकूम्‌ दियो अब जलायर्‌ बांधिलेऊ।सारा शहर पनि घुमायर छाडिदेऊ।१२२॥जावस्‌ टुटो पुषछर लीकन फकि वाहीं।पुच्छर्‌ उटी नसकि छोडनु छेन काहीं।।हौ] आगे बढ़करतुम-जसे कोटि रावणो कोम मार डलृंगा। मारनेकी आज्ञा मुज्ञ अभी नहीं मिली, क्या करू । ११९ हनुमान की एसीजओजपू्णं बाते सुनकर रावण को ओर भी क्रोध आयाः। हनुमान की कहीहई बाते यद्यपि सत्य थीं, किन्तु रावण अपनी क्रमति के कारण (भला
उन्ह) क्यों मानने लगा।

उसनेअकज्ञादीकि इस वानरके टुकड़े कर

दिये जाँ । उसकी आज्ञा पाकर, जो वीर निकटथा, हाथ में अतिउत्तम हथियार लेकर आगे वढ़ा । १२० इसी वीच विभीषण ने आगे बढकर करबद्ध विनती की-महाराज, यह्‌ तो दूत है, यदि यह मर जायगातोवर्ह संदेश लेकर कौन जायगा ? कोई निशान लगाकर इसे छोड दे,
जिससे कि यह्‌ वहां जाकर सब विस्तारपूवेक कह सके । इसी वानर कीनोत सुनक्रर वे (राम-लक्ष्मण आदि) संग्राम के लिए (सामने) अये । १२१विभीषण की बात सव्य मानकर उसने (रावण ने) एक वस्त्र. मंगाया ओरउसे तेल-घी में धिगोकर हनूमान की पंछ'मे लपेट दिया ओर अल्ञादेदीकि इसकी पछ मे आग लगाकर सारे नगरमे घुमाओ भौर छोड़ दो । १२२(रावणने आगे.कहा-) अपनी जलती हुईपूं लेकर कहीं चलाजाय । जव.तक

नेपाती-हिन्दी

१७७
यस्तो ' हुकूम्‌ जव दियो तब बधिलीया।आगोपनी पुछरतीरलगाइदीया ।१२३॥बाँध्याका हनुमान्‌ लिएर खृशिभै भेरी अशाडी फुकी।लाग्या घुम्न शहर्‌ ति राक्षसहरू चोर्‌हो भनी षुप्‌ भुकी।चुप्‌ लागी हनुमान्‌ पनी खुरुखुरू गम्‌ हेरि हिड्दं गया ।टोका

पश्चिमा

पोल्यानन्‌

घर
पगी
श्रहुरको ताहींतिसाना भया।१२४।
बन्धन्‌ देखि त खुश्कि रृष्ष्म स्पले पवत्‌ सरीका भया।ट्लो स्तम्भ उठादइ राक्षस अनेक्‌ मान्या र कूट गया॥बल्दो लाम पृषछर्‌. लियेर, घर-घर कटै शहरमा इली।परोल्या सब्‌ शहर ` टेन कहि घर्‌ बक कतै एक्‌ भुली। १२५।लाग्यो बत्न शहर जल्या र सब धर्‌ बन्दरस्ताभई।भागी जान नपाउंदा हूंदि अनेक्‌ रक्षस्‌ अटाली गई 1फाल्‌ हालीकन अग्निमा परि मन्या .यो चालू शहरमा भयो ।एक्‌ विभीषणजिको
येती काम गरी सकी पृछरकोकूदी जल्दि समुद्रमा पमि पृषठर्‌
व्योमावरबाँकी रह्यो। १२६।
आगो निभांचोभी निभाया
भनी।पनि॥
पूं जलकर समाप्त न हौ जाय, इसे छोडना नहीं । एेसी आज्ञा होने पर

हनुमान की पूंछठमें आगलगा

दी गयी 1 १२३

बधे हृए हनुमान को

लेकर नगाड़ बजाते हए ओर चोर कहते हुए राक्षसगण सारे नगरमे

घूमने

लगे। इस प्रकार खूब प्रसन्नतापूवंक चिल्लाते हुए सब आनन्दपूवंकं धूमेलगे। हनुमान भी प्रसन्नतापुवेक सीधे-सीधे चलते रह । अचानकपश्चिम हार की ओर जाते समयवेष्छोटेहो गये । १२४ हनुमान के कसेहुए वन्धन, सूक्ष्म रूप धारण करते ही, सब ढीले पड़ गये 1 अपना सूक्ष्म
एरीर लेकर वे बन्धनं से (मुक्त होकर) बाहर निकले ओर तुरन्त ही एकपर्व॑त के समान (विशालकाय) हो गये । अब हनुमान एक बड़ा स्तम्भ
उठा कर अनेक राक्षसो का संहार करते हुए उछ्यते गये ।पूंछ लिये घर-घरमं कदते हुए नगर में घ्रूमने लगे।

वे जलती हुई

.इस प्रकार उन्होने

सारे नगर को जला कर भस्म कर दिया, एक भी धर रेष न बचा 1 १२५
सम्पूणं नगर के सभी घर जल ग्ये। सारे मागे अवषश्डहो गये। भागनेके लिए मागे न पाकर अनेक राक्षस घवरा कर आग में कृद पड़े)! इसप्रकार बहुत से राक्षस जल करमर गये। नगर में एेसी (प्रलयकारी)स्थिति उत्पन्न हो गयी । केवल विभीषणका ही घर देष रहा, जौ अग्नि

से सुरक्षित वचा । १२६

इतना कायं करके पूछ की आग बुञ्लाने के लिए

१७८

भानुभक्त-रामायण

अग्नीले पनि मित्र-पू् भनि ताप्‌ केही गव्यानन्‌ तहँ ।सीताको पनि प्रा्थेना हन गयो उद्थ्या हनूमान्‌ कर्हां।१२७।राम्‌का फकत्‌ स्मरणले पनि दुःख छट्छन्‌ ।अध्यात्मिकादिहर्‌ ताप्‌ पनि जल्द चछट्छन्‌ ॥साक्षात्‌ उनं प्रभुजिका दूत भं गयाका।उदट्थ्या कहँ ति हनुमान्‌ अति हित्‌ भयाका ।१२८॥फिर्न्या मन्‌ सव ली विदा हून सिता जीथ्यं हनूमान्‌ गया।वीदाखशिभयेर बक्सनुहवस्‌ जान्छ्‌म भन्दा भया॥आाछन्‌ रघनाथ अवश्य भति यो विन्ती गरयाथ्या जसं ।साहं शोक मनमा धरीकन सिता क्ये भन्नलागिन्‌ तसं! १२९।तिमिकन नजिकेमा देखि खुप्‌ खूशि हुन्ध्यां ।घडि घडि रघुनाथृका मिष्ट वार्ता म पुर्यां |अव कसरि म॒ यस्तो दुःखले प्राण धषुतिमी पनि फिरि जान्या फेरि तापूमा म पष्ठ ।१३०।
सीताका इ वचन्‌ सुनैर अ्षट्पट्‌यस्तो शोक्‌ अव छाडि बक्सनुहवस्‌-~-~~-^~^-^-~~
~~ +~ ~+“
~~
~” -~ ~^ ~~
हात्‌ जोरि विन्ती गरया।आपत्ति सादं भया ॥
-~-~-~-^~~
(हनुमान) तुरन्त कूद कर समुद्र मे पहुंचे ओौरः अपनी पृष पानी में इवोकर अग्निबुज्ञादी! यभ्तिने भी मित्न (पवन) का पत्र जानकर उनकी पूठमेंप्रभावन डाला!

उनकी रक्षाके लिएसीताने

हनुमान भला कहां जलते ! १२७

भी विनती की, अत

केवल रामकेस्मरणसेहीदुम्खों का

नाश होता है, आध्यात्मिक तापोंसे भी शीघ ही षटृटकारा भिलता हैफिर साक्षात्‌ प्रभूकेही दूत वन कर (वहाँ) गये हुए हनुमान किस प्रकारजल जाते (जव) प्रभुही उनके पक्षमेथे। १२८ लौटने की इच्छा सेहनुमान विदा लेने सीताके पास गये! कहने लगे-प्रसन्न होकर अपमूल्ञे विदादेनेकीक्पाकर्‌।म जाता हूं, रघुनाथ अवश्य ञआयेगे।हनुमान की विनती सुनकर सीता जी अत्यन्त शोकाकुल मन से कह्नेलगी-- १२९ तुमह अपने निकट पाकर मँ अत्यन्त प्रसन्च होती थी ओरवार-बार रधूनाथ की मधुर चर्चाकरतीथी।अव केसे इन दुःखों केमध्य रहकर प्राणों को रख पांगी । तुम भी लौट जाओगे तो मै पुनः संकटमे पड़ जाऊंगी । १३०

सीता के वचन सुनकर हनुमान ने हाथ जोड कर

विनती की कि आप इस शोककोत्यागनेकी कृपा करे!

यदि आपको

यहाँ रहने मे अधिक कठिनारईहै तो आन्ञा दे, मँ अभी आपको लेकर

नैपाली-दिन्दी

१७९
देले दाखिल ग्ट रामूचरणमा वोको हुकूम्‌ ल। हवस्‌ ।धेर शोक्‌ किन गर्नृहुन्छ मनमा यो शोक्‌ दुरेमा रहस्‌ १३१सीताजी पनि भन्दछिन्‌ मत नजां जाऊ तिमी मात्र गे |विस्तार्‌ बिन्ति गरेर जल्दि रघुनाथ्‌ लीयेरआऊ संगे ॥राम्‌ आर्दकन दुष्टलाइई्‌ सहज मारी मलाईसंगे ॥लेजानन्‌ रघुनाथ्‌ त कीति रहला क्या हुन्छ येसं म मै।१३२।सीताको जब यो हुकूम्‌ हुन गयो बीदा हनुमान्‌ भया।तीन्‌ बेर्‌ जल्द परिक्रमा गरि प्रणाम्‌ गर्दा छदा ती गया॥पर्वत्‌ माथि चदर रूप्‌ पनि टुलो पवत्‌ सरीको धन्या ।आकाश्‌ मागं लिई कुदेर खुशिले खुप्‌ शब्द टृलो गव्या १३३सव्या शब्द त्ति अद्खदादिहर्लं बोल्या परस्पर पनि।भनी |शब्दैले बुक्षियो अवश्य सहजं भेटेर आयायस्ता बात्‌ तिरमा बसेर सबवीर्‌ गदं धिया खुश्‌ भई।पौच्या श्रीहनुमान्‌ तहं तिरमहां आनन्द खूशी रही । १३४भेर्‌ भो अद्कद वीरहरूसित तहां विस्तार्‌ कुरा स्‌ गरथा 1 `अङ्खद्‌ वीरहरु खुश्‌ भई पुरमा पक्रेर चुम्बन्‌ ग्या]रघुनाथ के चरणों में प्रस्तुत कया । मन में अधिकं शोक क्यो करती हैँ?इस शोक को दूर करने की कृपा करे ¦ १३१ सीताजी कहती दम तोनहीं जाऊंगी, केवल तुम ही जाकर विस्तारपूर्वक विनती करना ओर

शीघ्र

ही रघुनाथ को लेकर यहाँ जाना । वेआकरशीघ्रहीदुष्टोको

मारकर

मुज्ञ साथ ले जाये, तभी उनकी कीति रहेगी, अन्यथा केवल मेरे इस प्रकारजनेसेक्याहोगा?
विदाहो गये।
१३२

सीताजी की एसी

आज्ञा पाकर हनुमान

तीन वार (उनकी) शीघ्र परिक्रमा कर प्रणाम करते
हुए वे चले गये । पवत के ऊपर चढ़ कर उन्होने विशाल शरीर धारण
किया 1 आकाशमागं ग्रहण कर्‌ कद पड़े ओर अत्यन्त प्रसनच्च होकरगगनभेदी नाद किया । १३३ उस गजनाको सुनकर अंगदादि परस्परकहने लगे कि अवश्य ही हनुमान सरलता से भेट कर आया है। समस्त
वीर प्रसन्चचित्त हौ किनारे वेरठ कर इसी प्रकार की वाते कर रहै थे, उसीसमय रधघृनाथ भी निकट पहुंच गये, जिससे वहं पूणंत्तया प्रसन्नता छागयी 1 १३४
अंगदादि वीरो से वहा भेट हई ओौर विस्तृत बातचीत हुई ।
अंगद तथा अन्य वीर प्रसन्न होकर (अपनी-अपनी)लगे!

कोड प्रसचच होकर नाचनेलगा 1

पूंछ पकड़ कर घूमने

इसी प्रकार सव लोग भिलकर

१८०

भानुभक्त-रामायंणं

गरदं ति रामूथ्यं गया।सादं वशी ती भया १३५।खाञॐं इ फल्‌ फूल्‌ भनी ।जीका प्रसाद्ले भनी ॥वानर्‌ गयाथ्या जसे ।चौकी बानर जो धिया सब तहां आया र रोक्या तसै। १३६।रोक्न्या बानरलाईइ लात्‌ दिड्‌ पिया मीठो मधुर्‌ रस्‌ तहां ।यो चुक्ली दधिवक्त्रले लिड्‌ गया सुग्रीवजी छन्‌ जहां ।सब्‌ विस्तार्‌ दधिमूखले जव गव्या लूटया मधूवन्‌ भनी ।लूटपीट्को समचार्‌ सुन्या र पनि रिस्‌ ऊटेन क्ती पनि ॥१३७॥
नाच्या कोहि खुशी भयेर यहि रीत्‌सुग्रीवको मधुवन्‌ मिल्यो नजिकमाविन्ती अङ्कदथ्ये गव्या पनि तहांअद्धद्ले पनि खाउ जाद हनुमान्‌दीया मजर खाडं फल फल्‌ भनी

भेटयाछन्‌ बुक्ियो सिताकन नता

ई बात्‌ सुग्रिव गद्या प्रभुजिलेसीताको पनि नाम्‌ लिएर तिमिलेसोधी बक्सनुभो र सुग्रिवजिलंहे नाथ्‌ श्रीमधुवन्‌ थियो अति असलएेले ता हतुमानूहरू बलजफत्‌
लुट्थ्या मधूवन्‌ कर ।सून्या र॒सोध्या तहां ॥
क्या बोल्दछौ बात्‌ भनी ।बिन्ती गच्या वात्‌ पनि १३८मेरो बघेचातहाँ।आएर एक्‌ क्षण्‌महां ।
एक साथ रामकेपास्ग्ये।सूम्रीवको मधुवन के निकट मिले भौरसभी लोग अत्यन्त प्रसनच्च हुए । १३५ (सभीने) अंगद से विनती भीकी कि (वे) फल-फूल आदिखाले। अंगदने भी (उनसे) कहा शलोखा लो~यही हनुमानजी काप्रसादहै। जसे ही फल-एूल खाने कीसहमति देकर (अंगद कै) वानर साथी (वहां से) चले गये, वेसेही (सूग्रीवके मधुवन के) चौकीदार वानरोंने वहाँ आकर (उन्ह) खाने से रोकदिया । १३६ रोकनेवाले वानर (चौकीदारों) कौ (हनुमान के संगीवानरोंने) लात मार कर मीठा मधुरसं पान किया । यह शिकायत लेकरदधिवक्तर सुग्रीव के पास गया ओर दधिमुख ने सविस्तार सव कुछ कह्‌सुनाया । उसने कहा कि मधुवन लुट गया ।. लूट का समाचार सुनकरभी (सूग्रोव को) किचित-मात्र क्रोध नहीं आया । १३७उन्होने(सुग्रीव ने). समज्ञा कि (हनुमान की) सीताजी से भेंट हो गयी होगी, नहींतो मधुवन में क्यो लूट~मार करता ! जव सुग्रीव को इस प्रकार वात करतेप्रभृजी ने सुनातोवे (सुग्रीवसे) प्रष्न करने लगे-सीता का नाम लेकरतुम क्याकह्‌ रहेथे? सुग्रीव ने विनती की-१३८ हे नाथ ! मधुवनमेरा एक अति उत्तम वगीचाथा। अभी-अभी हनुमान के लोगों ने बल-

नैपाली-हिन्दी

१५१
लूटयाछन्‌ मधुरस्‌ अनेक्‌ तरहकाआया आज फिराद गं मधुवत्‌सोही बात म गर्द रघुपते!भेटचाछन्‌ तब पो लृटयार मधुवन्‌
चौकी कुटयाछन्‌ पनि ।लूटया र कूटया भनी १३९इन्‌ले सिताजी पनि ।रोक्ता चुटचाको भनी ॥
आऊन्‌ श्रीहनुमानृहृरू अब यहींदीया निभेय दी हुकूम्‌ उहि बखत्‌
चांडो भनी यो जसँ!
यो बिन्ती गरि जल्द सुभ्रिवजिले ती चौकिलाई तहां ।दीया हूकुम जल्दि फकिकन गै चांडं पठाऊ यहाँ ।। १४०॥।मामा सुग्रिवका गया र दधिमख्‌खशी भै हनुमानूहरू पनि गयाराम्‌ सुग्रीव्‌कन दण्डवत्‌ गरिलियासव्‌ विस्तार्‌ हनुमानले तहि ग्याभेटयां आज सिताजिलाईइ रघुनाथ

जस्स

देखिलियां

सिताकन

तसै
पातका अन्तरमा लुकी जननिकाजो वृत्तान्त थियो सबै हजुरको
फवर्या र दौडया तसै ॥हकम्‌सुनाईदिया ।जाहां रघूनाथ्‌ धिया १४१साम्ने जमीनूमा परी।वृत्तान्त एक्‌ एक्‌ गरी ॥लंकापुरीमागरई।सान्‌ स्वरूपूको भई ।१४२।साम्ने नजीक्मा रहं ।त्यं सुक्ष्म ;रूप्‌ले कल्यां ॥
पूर्वक एक ही क्षण में अनेक प्रकार के मधुरसकी लूट मचायी दहै ओर वहां
के (प्रहरी) मधुरस लुटने ओर मारपीट की शिकायत लेकर आये
है । १३९ हे रघुपते ! मेँ वही बात कह रहा हं । इन्होने सीताजी सेभेट करली; इसी लिए मधुवन को लूटा है ओर, मना करने पर मारपीटभीकोहै। यह्‌ विनती करके सूग्रीवने शीघ्र ही उस (उनमें से एक)प्रहरी को आनज्ञा.दी कि अभी लौटकर जाओ भौर, उन्हूं यहाँ भेज दो । १४०
श्रीहनुमान आदि अव शीघ्रही यहां आ,जाये।सी अन्ना पते ही(वे प्रहरी) निर्भयतापुणं तत्काल लौटकर दौड पड़े! सुग्रीव के मामादधिमुख गये भौर आदेश सुना दिया । प्रसन्न होकर हनुमान आदि भीरघुनाथ के पासःचले गये । १४१

सभीने राम एवं सुग्रीव को साष्टांगं

दण्डवत की । वहीं हनुमान ने एक-एक बात का सविस्तार वणन किथा-ह
रघुनाथ | लंकापुरी मे जाकर आज सीताजीसे भेट करली!

सीताजी

को देखते ही मैने सूक्ष्म सूप धारण कर लिया । १४२ (हनुमान ने आगेकेहा--) पत्तो के अन्दर छिपि केर जननी के सम्मृख हो, निकट रहा।आपके विषयमे जो कुछ भी समाचार था, मैने सारा वृत्तान्त कहु सुनाया ।
मैने उनसे अपने उसी सृक्ष्मरूपमें ही सारी बातें कीं!

श्रीमन्‌ से दूर

भनुभक्त-रामायर्णं

१८२

भोकी

दुव्लि

हजूर

दूर

रहंदा. संस्ेर

राम्‌राम्‌ बोल्दि अनाथ्‌ भरईकन बहुत्‌अश्शोक्‌का वनमा सिस पनि छ एक्‌सुनडीन्या सतलब्‌ लिर्द खडि भडन्‌यो वृत्तान्त सुनी हुकूम्‌ पनि भयोक्या लूकीकन वोल्दषछठस्‌ अव नलुक्‌पायां येहि हृकूम्‌ जसँ जननिकोको होस्‌ भन्‌ भनि सोधिवक्सनुभयोफर्‌ वृत्तान्त गरीसक्यां हजुरकोबर्बर आसु खसालनू्‌ पनि भयोआपन्‌ दुःख हवाल्‌ सवे कहनुभो
साहंरंदी।विह्धल्‌ निरन्तर हुंदी १४३
त्ये वृक्षका बीचमा।सूनिन्‌ उसे बीचमा ॥को होस्‌ तं बोल्छस्‌ कहांआरईज सास्ते महाँ । १४४
वानर्‌ स्वरूपूले गयां ।फर्‌ विन्ति गर्दो भयां॥
ओँठी दियाथ्यां जसे ।विश्वास लाग्यो तसे। १४५।यस्ता विपत्‌ छन्‌ भनी ।मैले वुञ्ञायां पनि॥
आन्‌रघुनाभू भनेर बहुतआज्ञा भो रघुनाथका हजुरमा सव्‌ ` दुःख मेरो कही।लङ्कामा प्रभूको सवारि तिमिल चांडो गराऊ गई ।१४९६।बात्‌चित्‌ गरी जब यतातिर फिनं लाग्याँ |विश्वास पानं जननी सित चीज माग्यां |
वि रह्‌-पीडित, भखी-प्यासी क्षीणगात हो सीता रोती रहती है । वे अनाथसी होकर हर समय रामराम की रट लगाती, विलाप करती रहती हैँ। १४३अशोकवनमें जो एक शीशम का वृक्ष है, उसी के बीच मेँ लटकने के
उदेश्य से जसे ही वे उठकर खड़ी हई उसी समय यह वृत्तान्त सुनकर
उन्होने अज्ञा दी “तुम कौन दहो ओौरकर्हासे बोल रहै हो ? अव दछिपो
मत, सामने आ जाओ" । १४४ जननी का यह्‌ अदेश पाकर मै वानरस्वरूपम गया।(वे) पूछने लगी--“कहो कौन हौ 7?" तव मैने विनतीकी ओर आपकी मद्रिका उन्हंदी। श्रीमन्‌ की अंगूठी पाते ही उनके नेघोंसे अश्रु प्रवाहित होने लगे ओर उन्हं मेरे उपर विश्वास हुआ। १४५
` उन्होने मृञ्ञसे अपनी सारी विरह-कथा कही ओौर अपनी विपत्तियों कासविस्तार वणन कर डाला । तव मैने समञ्नाया कि रधूनाथजी निश्चयही यहां आ्येगे 1 तब उन्होने आज्ञादीकि रघुनाथ की सेवा में मेरीसारी दुःखकथा सुनादेना ओर शीघ्र ही जाकर प्रभु की सवारी लंकापुरी
"मे लाने का प्रबन्ध करना । १४६ ` वातचीत करके जव इधर.की ओर आने
' लगा तो आपको विश्वास दिलाने के लिए जननी कौ निशानी कोई वस्तु
मागी तो उन्होने शिरमे धारण किया हुआ चूडामणि निकाल कर दिया

नेपाली-हिन्दी

चूडामणी

दिनुभयो

१८३

शिरमा

रह्याको ।
कागृको कुरा कहनुभो अधि जो भयाको ॥१४७॥लक्ष्मण्‌लाइ अवाच्य बात्‌ भनि बहुत्‌ बोल्याकि छ्‌ तापनि।त्यो . रिस्‌ लक्ष्मणलें कदापि नलिउन्‌हात्‌ जोरीकन विन्तिः खुप्‌ गरिदियासव्‌ वृत्तान्त सुनी बिदा, पनि भ्यां
येसो भनीथिन्‌ भनी ॥
येती हकम्‌ भो जसँ ।फकर आयां तसे । १४८।
माई सीत विदा भई जब फिन्यां . मनूमा लहृड यो गयो ।रावणलाईभेटी

नभेटि जां म॒ कसरी

रवणलाई्‌

अति
भन्त्या विचार्‌ यो भयो।
पति दीः फिनू "असल : हो भनी ।
फर्कीं ध्वस्त . गर्जया अशोक -वनको मा्यां अनेक्‌ वीर्‌ पनि४९कान्छो रावण-पत्र . अक्षय कुमार्‌ मास्या र रावण्‌ जहांँ।थीयो ताहि गयां भन्यां हित वचन्‌ टेरेन केही तहां ॥गर्थ्यो बक्बक बात्‌ अनेक्‌ तरहका मैले भुसूने गनी ।रावण्कं अधि खाक्‌ गरी सकिदियां पोलेर लङ्का पनि।१५०।येती कर्मं गरी यहाँ हुजुरमा आयां म एेले भनी।येती विन्ति गरी खडा. भद्‌ रहा
श्रीरामूले पनि काखमा लिनुभयावातूले चित्त बुक्चाद्‌ बक्सनुभयो
ताहां ति सेवक्‌ ` बनी ॥
सवेस्व ` दिन्छ्‌ भनी ।सवेस्वये हो भनी।१५६१।
"~~-~-~---------------------------------------------~-~-~~~-~~^^ ~ ^^+~~-~~~~~~~~~~-~~~~~ ~~~-~~~-~~~ ~~ ~~~
ओौर पहले की कभी घटी हुई कौए, सम्बन्धी घटना भी सुनायी । १४७
लक्ष्मण को अनेक अवाच्य वाक्य मने कहा है, इसके लिए उन्होने हाथ
जोड़ कर विनती कीरै किवे उनसे क्रोधित न हयों। फिर मै आज्ञालेकर विदाःहुञा, ओौर लोट कर आया हं । १४८ माता (सीता) सेविदा लेकर चला तो मन में विचार हुआ कि रावण स्मे भट किये विनांकंसे चलू । यह सोच करकि रावणस भेट कर.उसे उपदेश देकर लौटना
ही उत्तम होगा, मैँल्लौट गया ओौर अशोक वन को उनाड डाला ।अनेक वीरोंकोभी मौत.के घाट उतार दिया । १४९ मैने सवण के कनिष्ठपुत्र अक्षयकुमार को मार्‌ डाला ओर रावण जहां था, वहीं वह्‌ पहुंचाया
गया । व्हा मैने उसी के हित की अनेक बाते बतायी, किन्तु उसने किसी
बात पर भी ध्यान नहीं दिया । वह अनेक प्रकार की बातें बकता, किन्तु
मैने सबको भुनगा की तरह समज् कर समाप्त करदिया।

रावण के ही

सामने उसकी लंका जलाकर राख कर डाली । १५० इन सब कार्योको समाप्त कर अव आपकी सेवा में उपस्थित हआ हं । इतनी विनती

भानुभक्त-रामायण

१८४
फर्‌ दीनु बकी रती।यी बात्‌ बताऊ कति॥
मैले खश भद्‌ काख्‌ दिया पनि भन्याकेही चीज्‌ रहदैन सव्‌ मिलि गयो
काख्मा राखि हृकूम्‌ भयो यति जसे खृूशी हनूमान्‌ भया।आनन्दाश्रु गिराद भक्ति रसले हाजिर्‌ हजूरमा रदह्या५२धन्य हुन्‌ इ हनुमान्‌ यि सरीको।कोहि
अरु
छैन

भक्त

हरीको।।

धन्य

कहाया ॥१५२।।
भक्ति खृप्‌ गरि त॒ काख्‌ पनि पाया।

लोकमा

अधिक

, जस्को पुजा तुलससि-पतर चढाई गन्‌ ।उस्ता पनी त .भवसागर-पार `तछन्‌ 1 `ई ता उन प्रभुजिका दुत हृन्‌ त कहां)सक्तन्‌ छ वर्णन गरी यिनको त यहाँ ।१५४॥1! सुन्दरकाण्ड. समाप्त ॥1
करके सेवक बन कर हनुमान वर्ह खड़े हो गये । ` “सवेस्व देता ह"कहते हुए रघुनाथ ने हनुमान को गोदमें बैठा लिया ओर समक्चाते हुएबोले कि यही स्वेस्वहै। वे बोले किं प्रसन्न हकर अपनी गोद अपण कर
देने के वाद मेरे पस कुठ नहीं शेष रहता।
अतः

तुम्हे सव

प्राप्त हो गया, यह्‌ बात कहाँ तक वतां ? गोद में रख कर जसे ही(रामे) यह्‌ आदेश दिया हनूमान. आनन्द से ओतप्रोत हो गये-ग्रेमाश्रवहाते हुएवे (रामकी) शरणमे पड़े रहै। १५१-१५२ , धन्य हैँ यह्‌
हनुमान { हरि के भक्तों मे इनके समान कोई नही । इंसौ भक्ति की शक्ति
से ही उन्हहरिकी गौदप्राप्त हृई। इसी लिएवे जगत्‌ मे अधिक धन्यकटूलाये । १५३ इनकी (हनुमान की) पूजा केवल तुलसी चढ़ा करकौजातीहै। जो-एेसा करते है, वे लोग भवसागर पार तर जातिदै। येतो उन्हीं प्रभुजीके दूत रहै, अतः इनका पुणंतया वणन करसकना भी अत्यधिक कठिन है । १५४1} सुन्दरकाण्ड समाप्त ।।

. युद्ध ` काण्ड

लङ्कापुरी सकल खाक्‌ गरि सैन्य मारी।फेरी समुद्र सहजं तरि आइ

सीताजिको ` जब

`

सबै समचार्‌

वारी

बताया ।
श्रीरामले ति हचुमानूकन खुप्‌ सहाया ॥ १॥
भन्छन्‌ -श्रीरघुनाथ्‌ अहो इ हनुमान्‌- ले खुप्‌ टुलो काम्‌ गव्या |एक्लै गेकन रावणादि विरको सेखी इनैलेहत्या ॥यत्रो क्षार . समद्र कृदिकन फेर्‌ खाक्‌ गर्नु लंका अनि।को सक्ला. सव उदंछन्‌ इ जति छन्‌

सु्रीवका सब मन्तिमा इ सरिको

छोरो रावणको निभाद्कन तासेवक्ले.; जति गर्नुपषे. तत्ति सब्‌

सीताको ` समचार्‌ , बतायर

इन्द्रादि दयौता पनि ॥२॥
हीला न काही भया।
सामनेसेवा
उसकाइनेले
गया ॥गव्या ।
यहं हाम्रो ट्लो ताप्‌ हव्या ।३॥“ˆ
~
.
^+
सम्पूणं लंकापुरी को राख करके तथा सेनाओों को समाप्त करके जव
हनुमान पूनः समुद्र पार करके इस ओर श्रीराम के पास आये ओर सीताजीका सब समाचार वतताया तो श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त प्रसन्न हए ओरउन्होने हनुमान की भूरिभूरि सराहना की । १ श्रीरघुनाथ जी कहते" हैमोहे ! _इस _हनुमान ने अत्यन्त, महान्‌ कायं क्ियाहै।
रावणादि वीरो का अहंकार इसने अकेले हौ नष्ट कियाहै।

व्हा जाकर

महान्‌ओर विस्तृत सागर को छलांग मार कर पार करना, ओौर फिर इतनेलंका कोभस्म करना, दूसरा जौर कौन कर. सकता है । इसी लिए ये इन्द्रादि जितने
देवता है(उससे) सभी उरते हैँ ।२ सुग्रीव के सव मंत्री एवं भादयोंमें इसकेसमान न कोड हुआरहैन होगा, जो रावणके प्रको मार कर उसी केसमक्ष प्रस्तुत हुआ । सेवक को जो कुछ भी करना चाहिए वह्‌ सभी कुछ
इसने किया । सीता का समचार ला कर यहां इसने हमारे विषम तापो
का हुरण किया ! ३ यह्‌ हनुमान महानुबीर दै,तभी तो (इतनी सरलता से)

भानुभक्त-रामायण

१८६
वीर्‌ हुन्‌ ई हनुमान्‌ र कूदिकन गंयो सागर कसरी तरी म अहिलेगो क्षार समुद्र यो छ विचमा
कृदेर आयायहांँ।पौचन्छलंकामहा ॥जत्मा अनेक्‌ जन्तु छन्‌ |

व्यो साभर्‌ कसरी तरिच्छ भनि खुप

आत्तिन्छ मेरो त मन्‌ ।४॥तारू म फौज्‌ यो भनी।.पनि ॥मेरी पियारीपुग्रीव्‌ , अगाडीसरी।

रावणलाईद्‌

कसोरि

मारं कसरी

चिन्ता हृन्छ कसोरि पारं अहो !राघवृका इ वचन्‌ सुनीकन तरह
. क्या हुन्छ चिन्ता गरी।1५।यो फौज वानरको ठलो छ -बलियो -लडन्या. छ घूंडा धसी ।अग्नीमा पनि -पस्नु पदं -भ्रन्या पस्या छ, कृस्मर्‌ कसी ॥सागर्‌ तनं उपाय, माच्त त हवस्‌. यो फौज -जावस तरीःरावण्‌ मानं करिन्‌ छ. क्या सहजमा मारिन्छ. येसेः-- घररि-11६॥

गछन्‌

विन्तिः

हज्‌रमा

रघुपते

मेरो च्िित्तमर्हां त यो. छ रघुनाथ्‌ . साम्ने , हजरमा :; परीलडन्या वीर्‌ कहि छेन विन्ति गरियो साराः तिने लोकःः-भरी 1
ह्रो निश्चय जित्‌ हुव्याछ बृदिया देखिन्छ, ~ लक्षृण्‌ .- -पनि ।माराराक्षसलाइ आज सहजे - साना मुसूत्ता- गनी 11]~~~ -~
“^~
~>
~~
^^
"^
कद कर गया ओर कदकरञआयाभीदहै।यह सागर पार करके-मै किंसप्रकार लंका पहूचूंगा । यह सागर अत्यधिक गहरा हैः ओरं जल 'के मध्यमे अनेक जन्तु ह| मेरा तो मन अत्यधिक्र घबरा रहा है, यहु सागरकंसे पार कियाजास्केगा !४ भूञ्रे यही चिन्ताहोररही.हैकि सेना कोसमूद्र-पार्‌ कंसे ले जाऊ ओरं रावणं को कंसे मार डलं). _अर्वे मै अपनीप्राणप्यारी प्रियतमा को पुनः कंसे प्राप्त, कर्‌ पाङगा । राघव के.इन. दुःखंभरे वचनो को सुनकर सुप्रीव आगे वद्‌ कर सेवा म विनती, करते हेनरघुपते ! चिन्ता करके क्याहोगा।५ येवानरोकी विशालसेना'है जौघुटने धसा कर युद्ध करनेमेंभी बललिष्ट है। इन्हँं यदि अंग्नि-मे. भीकदना पड़्गातो कमर कस कर कृद पड़गे । केवल सागर पार करने काउपायः वताने कौ कृपा करे।येसेना जव सागर पौर हो जायेगी ।रावण को मारना क्या.कठिनि है) `इसी समय सहज. ही मे मारा. जासकतादहै। ६ रधुनाथ! मेरे विचार में 'तो यही है1 - श्रीमन्‌. केसम्मुख आकर तो लडनेवाला वीर कटी तीनों लोक-मे नहीं!मेरी. यहीविनती है, हमारी विजय निश्चय. ही होगी ।' लक्षण- भी, जुभ.-प्र॑तीतहोतेदै। हम्‌ राक्षसो को भाज सहज ही मे भुनगों के. समान. नष्ट कर

नेपालीन-हिन्दी

``
१८७ `
सुश्रीवृक्ता इ :वचन्‌ सुनी हृकृम.भोजुन्‌ पाट्लेत वरिन्छ सो 'गरियलाल्कः -अकवाल्‌ं सुन, त पदिले'सघ `बूञ्चीकन पो गया जिंतियला
श्रीरामजीकोः ˆ` ` तहां 1कस्तो. छ. लंकामहा 1कस्तो छ 'तेस्को तखत्‌ ।यैह विचार्को वखत्‌।।र॥

ठ्घुर्का इ" वचन्‌

ताह ' जगाडी

सुनेर `हनुमान्‌

सरी]
भक्तोले गरि अञ्जली. पनि `वहत्‌ न्यूहधेर :शिर्मा ` धरी॥'
गठन; बिन्ति-, जगत्पतेः :. रघुपते '"लेका -““ "पुरी ` ` सुन्दरी ।देखिन्छ जति :-देख्तछन्‌ ति .सबको `लिन्छे सबे- मन्‌. हरी ॥९॥तीकुट्‌ पवंतका-उपर्‌ .छ. सुनकोः पर्खाल्‌ छ चारौ तरष्‌ |थामै छन्‌ मणिका

जन्‌. धरमहां

देखिन्छ तिनको - रप्‌ ॥
एक्‌ खावात समुद्र भो अरूनजीक्‌:पर्खलृकरा.ः नजिके, छः बेस्‌ःवरिपरी
अर्को खन्याको. पनि।वैरी नआउन्‌, भनी । १०॥
घ्र पनि सुनके छन्‌ गल्लि जो छन्‌ सुनेका ।मणिजडित हुनाले ज्लन्‌, -असल्‌ छन्‌ कुनेका ॥ . `घूमि चुमिकन -हेव्यां सत्‌ बघेचा तला । . - ,__सहंज, ~सित. कसको केहि लाण्देन दाॐऊ ।११॥डालेगे। ७सूग्रीव के इन वचनो को सुनकर श्रीराम की, ान्ञा हुई किजिस उपाय से'संमृद्रपारहो जाने की सम्भावना दहै वही किया जाएगा ।पहले यह्‌ व्रताओ कि लंकामे क्या दशा है, वहं का वणेन.तो सुनें कि वहांकी. राजगरी.कंसीरहै। सव समुंस्-वृक्च करहीजानेसे तो विजय प्राप्तरोगी.। यही विचार करनेकासमय है! ठ. प्रभ के इन वचनो कोसुनकर. हनुमान आगे बहे ओर भक्तिपूवेकं पर्याप्त अंजली अपित की, तथांमस्तक मे लगाते हुए विनती कंरने लगे-जगत्‌पते ] रघुपते ! लंकापुरी की
सुन्दरी अत्यन्तं सुन्दर दिखाई देती है भौर जितना देखती, है. सव. के मनं
को मुग्धं कर लेतीहै। ९. विकट पव॑तके- उपर चारौं ओर सोने की
दीवारहै। जिन धरोंमें मणि के-मन्दिर है उन्हीं पर उनके लेख दिखाई देते `है'1 एक स्तम्भ तो समुद्र ओर दूसरा समीप हीमे खड़ा हुआ है । दीवारके निकट चारों ओर खाई है, जिससे श्तु न आ जाय. .१० व्हाँके षरतथा मग सभी सोने के है! कहीं-कहीं तो मणिजटिट होने के.कारण अच्यन्तरमणीकषहो गेया रहै! मैने घूम-घूम कर. चारों .गर सारे वगीचे तथातालाव देख लिए हैः सरलता. से वहाँ प्रचेण होने.का किसी को अवसरनहीं मिलता । ११ नगरकेचारद्वारदहैःकहीं वीरोंकी विशाल सेना तत्पर

भ॑नुभक्त-रामार्यण

१८८
टोका छन्‌ चार्‌ शहरका तदहि विरहरको फौञ्‌ छ टूलो बस्याको ।जो ताहाँ परस्न जाला उ सित तहि लड़ी मनं कम्मर्‌ कस्याको ॥एक्‌ अर्बृद्‌ पूवं ढोकातिर भति बलवान्‌ जङ््ि पाले.बस्यकि ॥रक्षस्‌ छन्‌ हात्ति घोडा रथ अरु खजना ली खडा भे रह्याका।१२।ढोकंपिच्छे यसै. रीतूसित खडि . पहरा छन्‌ सदा नित्य ताहाँ ।येती जम्मा छ फौज्‌ सब्‌ भनिकन त खबर्‌ पाइसक्न्‌ छ काहाँ ॥यस्तो मज्‌न्रुतिको फौज्‌ छ .तपनि उदहि फञ्‌ ध्वस्त चौथादइपास्याँ |लंका पोलेर सन्‌ खाक्‌ गरिकन सहज वैरिको सेखि चार्य्या ।१३॥यहि डिल किन ख्वामित्‌ ! जाडं सागर्‌ छ जाह ।क्ट हिल तहि होला तरनुपर्न्या छ ताहां |
यति विनति हनूमानूने गन्याथ्या जसँ ता1हुकुम. पनि ति सूग्रीवलाई भगो यस ता॥ १४
हे सुग्रीव सवे ! असन्‌ विजय योयस्‌ सायेतमहां मूहूतं नचुकीतेस्ले जित्छ अवश्य यै बखतमामेरो दक्षिण नेत्र फुं बद्िया
महतंटले.पन्यो।जस्ले त साइत्‌ गभ्यो ॥सायेत फौज्ले गरून्‌ ।लक्षण छधीरज्‌ धरून्‌। १५।
है,जो भी वहां जाएगा उससे लङ्कर मार डालने के लिए कमर
है।
क्से हए.
पूवे की ओर जो द्वार है व्हा एक बलवान जंगी द्वारपाल है।
राक्षसगण, हाथी, घोडा, रथ एवं खजाने लेकर खड़े है । १२ इसी. प्रकारप्रत्येक द्वार पर सदैव पह्रेदार खड़े रहते हैँ । वहां की सेना के सैनिकोंकी संख्या ज्ञात करना भी सम्भव नहींहै। एेसी बलिष्ठ सेना है, फिरभी उसका चौथाईभागकातो ध्वंस कर द्विया ओौर समस्त वीरो केघमण्डको चूर कर आयां । १२३ स्वामी अव यहा. विलम्बं क्यो.कर रहेहै। सागरकी ओर चलिए, भले.ही वर्ह कुछ लोगों को उतारे में कुछ.
विलम्ब हो जाये.। ` हनुमान के विनती करते हीं सुप्रीव को आदेशदे दिया
गया । १४ ` हे मित्र सुग्रीव ! यही वास्तविक विजय के शुभ मृहृतं काअवसषरदहै। इस अवसर को व्यथं गेवाये बिना जो कायं करता है वह्‌अवश्य ही विजय प्राप्त करतारहै। मेरातो दक्षिण नेत्र फड्क. रहा है,
यह्‌ उत्तम लक्षणहै।
यदि इस शुभ अव्सरको सेनाः हाथ से न. जाते.
दे, तो हमे.अवश्य ही विजय की प्राप्ति होगी 1१५ वानरसेना लंका मेंप्रस्थान करकैः लंका पर आक्रमण कर दै तथा रावण को वंश-सहित नष्टः

नेपाली-हिन्दी

१८९

रावणलाईइ कुलेसमेत्‌ क्षय गरी

ल्यादइन्छ. सीता - पनि।वानर्‌को जति फौज्‌ छ सन्‌ अब चलोस्‌ ठोकिन्छ लंकां भनी ।।.लक्ष्मण्‌ अंगदमा . चदून्‌ दुंद जना हामी ` हनूमान्‌. महां ।सुभ्रीवूलाइ यती हुक्‌म दिद ग्या. प्रस्थात्‌ प्रभूले तहां । १६॥राम्‌, सुग्रीव्‌ हनुमानमा चदि चल्या लक्ष्मण्जिः अंगद्महाँ ।वानर्‌को सब फौज्‌ च्यो पृथिवि सब्‌ डग्ूमग्‌ गराई . तहां .॥।
चाहीदेन रसद्‌ सवे विरहगजेन्छन्‌, सब वीर्‌हृरू तस बखत्‌
खान्छन्‌ फलैफूलू फकत्‌ 1,सब्‌ काम्न लाग्यो जगत्‌ १७,

रात्दिन्‌ फौज चल्यो टिकेन बिचमा

काहीं कतं एक्‌ घरि,
विन्ध्याचल्‌कन नाधि फेरि मलया- चलू नाधि यस्तं गरी 1पौच्या क्षार समूद्रका तिरमहां डेरा प्रभूको प्य ।वानर्को . त्यति . फौजले खचित भं साराकिनारा.भग्यो ।१८।वानरको सब फौज्‌ तहां हृकुमले तिर्मा जसे ता बस्यो।सागर तर्न उपाय केहि नहुंदा मनूमा टुलो ताप्‌. पस्यो ॥भन्छन्‌ वीरहरु यो कसो गरितरों साष्टं कठिन भो यहाँ ।यो सागर्‌ नतरी. त जान नहुन्या हीडर लंकामहां ।१९॥करके महारानी सीता को स्वतन्त्र करे। लक्ष्मण अंगद की. सहायता लेंओर हम दोनों हनुमान की सहायता लेंगे । सूम्रीव को यह आज्ञा दे कर
प्रभूने भी वहाँ से प्रस्थान किया । १६ राम-सृग्रीव, हनुमान के,उपर सवार हुए तथा लक्ष्मण अंगद पर सवार हए ओर इस प्रकार : लकाविजय के लिए सम्पूणं बानरसेना को लेकर चल पड़े । बानरोंके प्रस्थान `करने पर उनकी भीड से समस्त पृथ्वी ठक गर्द. रसद की कोईआवश्यकता ही न थी, क्योकि सभी वीर फल-फूलादि खा कर ही दिनपार कर सक्ते थे - सारे वीर गजंते हुए जा रहै थे। उनके गर्जन से
समस्त भ्रू-मण्डल कापि उठा। १७ सेना सारी-रात, सारा-दिन चलतीरही, क्षणभर को भी कहीं नहीं सकी । विध्याचल ओौर फिर मलयाचलको लाँघते हुए इसी कम से सव लोग क्षीरसागर के किनारे पहुचे ओरवहीं प्रभ ने पड़ाव डालने की आज्ञादी.। वानरों.को. असंख्य सेना सेसमुद्र-तट खचाखच भर गया । १८ आज्ञा पाकर एक-एक कर सभी लोगकिनारे बैठ.गए ओर सागरपार करने का उपाय सलोचने लगे! कोईउपाय समञ्मेन आयातोवे गहरौ चिन्ता तथा ताप से: भर गए।वीरजन कहते हँ कि इस सागर को किस प्रकार पार किया जाए, यह तोअस्यन्त कठिन समस्या उत्पन्च हो गई है । ` अभ्य कोई एेसा मागं भी नहीं
१९०

भातरुभक्त-रामायण `

सव राक्षस्‌कन `मादथ्यों यहि वखत्‌आपसूमा यत्ति वात्‌ परस्पर गरी

सीताजीकन

सागर्‌ तरी पार्‌ गया।जम्मा प्रभूध्य-' चया.॥'

नान. स्वरूपी

सन्नि संज्ञि रघुनाथ्‌

लाग्या गनं विलाप्‌ अनेक तरहलेरामको नाम फगत्‌ लिन्याकन पनीआफ ` श्रीरघुनाथलाद्‌ पनि क्या
पनि)“
सीते! कहाँ छौ भनी २०५सव्‌ दुःख ताप्‌ ट्दछन्‌ ।सन्ताप्‌ कतं ` पदंछठन्‌ |.स्वरूपी
सच्चित्‌ रूप्‌ परिपूणं अद्धितिय -एक्‌ ¦ आत्मा

पनिः।'

गन्‌ मानुष भे लिला पति अनैक्‌ युक्खी र दुक्खी वनी 1२१कूदि वदि सब लङ्का पोलि फर्‌ पत्र मारी।बहुत विरहरूको सन्य ॒खुप्‌ ध्वस्त पारी।। ''गरिकन सब येट्धादट्‌ फोर हनुमान्‌ फिन्याको ।‡ सुनिकनः तद्धि रावण्‌ भं गयो नूर्‌ गिच्याको ||२२॥ ^उहि बखतमहाँं स्यो- मन्तरणा ग्नलाई्‌। `"`सब विरकृन ताह डाक्न जल्दी पठाई।।
-
चरिपरि सव राखी सन्तिथ्यं भन लाग्यो ।कसरि सहज उम्‌की त्यो हनूमान भाग्यो 1 २३॥. अवत जसरिमेरो हृन्छ सो हत्‌. चिताऊ 1बुञ्चिकन संवदे एक्‌ मन्रणा लौ' वताऊ॥~~~
~~~

जिससे पेदल चलकर ही.लका पहुंच जाए 1 १९

=
इसी समय किसी प्रकार.
सागरपारकरपातेतोसभी राक्षसोको मार्‌डालते।परस्पर इसी'प्रकार का विचार-विमशं करते हुए सव लोग.प्रभु के पास एकच्वित हौ गए ।सीताजी को वारम्बार स्मरण करके जान-सागर. 'धीरघुनाथजी. भी, सीतेकहां हो ! 'कहते हुए विलाप-करने लगे ।.२० ` सच्चिदानन्द-खूपी होकभी. मनुष्य के समान अनेक प्रकारसे सुखी एवं दुखी वन कर वे लीलाएःकरते हैः: परन्तु वास्तवमे, रासका'तो केवल नामलेने सेही सारे द्ःख-ःसंकट टल जाते हैँ ।.२९१. `रावण को.समाचार मिला कि हनुमान

ते कूद-

कूद करः सम्पूणं लंका को जला डाला है}, ''उसके पृत्तःको मार कृर. अनेकवीरोंकाो सेनाको ध्वस्त.करके,सीता,से भेंट करके, पुनः हनुसान लौट..गयाहैतो वह्‌ किकन्तेव्यविमूढष्हो गयाः) २२ उसी समय. विचार-विमश्नं करने:के लिए सव वीरोंको बुलावाभेजा।

सवकोचारों ओर बैठा कर रावण

मंचरियो से कहने लगा. कि हनुमान इतनीःसरलताः से वच कर किस प्रकारगिः निक्रला 1 २३,

जब तो किसी प्रकार 'मेर.हित का कोई. उपाय

;, नेपाली-हिन्दी

` १९१

तिमि, सबकरनः ताघ्री क्राम,सिद्ध्याड्‌ भाग्यो ।
;, ~" म्रकत्त त. -हनुमा्तर्का .कासले- लाज : लाग्यो॥। २४ ॥यत्ति, हुकुम-सुनी ;सब्‌; घोचिंयाः.संःति `जाग्याः।अगि.सरि.सरिःबित्ती सेखिको गने, लाग्याकिन; बहुतः हजूरको तेहि ``रमुदेखि शंका ।:{‡ -5 क्सुर; सहज ;जित्‌ला .रामले ,अज लंका ॥ २५॥>}
;कतिः;विनति; गरौ .धैर्‌. इन्द्रजित्‌. पत्र जंस्को।-,
+,
, {3

;--फकतः

}.
,; {+
छत्‌ कसरि ति जित्छन्‌ पुग्छ जोर्‌ ओज कस्को ।।हजुरका

एक्‌. .पृ्रले. ,इन्द्र जीत्या 15}

यह्िःबुङ्खि अरु.दिक्पाल्‌का समेत्‌ सेखि बीत्या ॥.२६। ~~ "7; अधिप्रति"मय हुन्‌ `सन्‌ दैत्यका, सो उरेले ।,; -^ ~; खुरखुर दर्याहि आई छोरि शुम्प्ा करेले 1}, . `; 1~+अर अक्लक्हि-छन्‌ त्रया.वीर्‌ हजुरका सरीका 1, }/ :":।९ ६ \ ननयूसुब विर ःवृशमै छन्‌ः ई तिनं लोकभरीका ।( २२७ ५:, ,:¡- अलिक्रति हनुमानूले जो यहाँ -वीर मान्यो] ¦ 1:, 7 कुदि-कुंदि सव्‌;लद्काःपोलि जो ध्वस्तः पान्यो 15 1:निकाललोःस्ौर सव लोग सोच-समन्च कर अपना-अपना विचारः प्रकंट करोः।
परायेगा ॥२६.

ˆसमस्त देव्यो ने भयभीत होकर, सीधे यह आ

कर

:विवेशं

हो -आत्मसृमपण, "एकर :अपनी पत्री आपको सौप दी 1. हे श्रीमन] -व्यांअवः-भी आपके समान कहीं अन्य कोई वीर, है.? तीनों" लोकः कै, समस्तरीर आपके वशम हो, चूके हैँ ।.२७ „हनुमान 'छकेला था । ` वह अकेलाव्या .क्रर लेगा, यही सोत्र-कर हम-लोगःचूक गए `गौर. वह कद-कद' कर
सम्पूणं लंका को भस्म करर गया।

.जो कुंभी तहुस-नहस }वह कर गया

१९२

भानुभक्त-रामायण

उ.त फकत यसेले गनं क्या सक्छ भन्दा।चुकिदियौं गरिहाल्थो फेरिको क्या छ घन्दा ॥ २८॥हकुम दिनुहवस्‌ लौ दश्‌ दिशा वीर जाञं।जति जति अगि सछन्‌ मारि तिनूलाइ आ ॥सकल पृथिविमाका वानरे षद गरछौँ।सकल हजुरको ताप्‌ एकं क्षणमा त हरौ ।॥ २९ ॥येती गवै गरी सवे ति विरले विन्ती गग्याको सुनी ।
मेरो मत्‌ पनि बिन्ति गदेषु भनी अआफ्ना म्नेले गुनी ॥गछ॑न्‌ विन्ति ति कुम्भकणं विरले है नाथ्‌ लियौ क्या मति।सीता क्यान हन्यौ चुक्यौ तिमि यहां कृन्‌ हुन्छ तिस्रो गति ।३०।

श्रीराम्‌चन्द्रजिले अवश्य

अधि नै देख्थ्यात एक्‌ वाण्‌ धरी।

तिसा प्राण नलिन्या थियार्ताहि कहं

रवाच्थ्यौ तिमी एक्‌ घरि ॥
सीता चोरि गघ्यौ रपो तिमि वच्यौतेस्को ` फल्‌ सब पाउंछौ अव भन्याराम्‌ जो हुन्‌ प्रभु ई अनन्त अधिनाथ्‌लक्ष्मी हुन्‌ . जगदस्विका इ यिनकी
को टिक सामने परी।मान्‌ कुलं साफूगरी।३१।चौधं भुवन्‌का धनी ।पत्नी सिताजी पति॥
वह्‌ केवल इसी कारण हुआ कि हमे उसकी एेसी एर्तीली का्यं-कुशलता काअनुमान नहींथा। अव आगे इस प्रकारके भयकी कोई आशंका नहीं)अव हम सब पूणेतया उसका सामना करने योग्यदहैँ। २८ आक्ञादेने की
कृपा करे । दशो दिशाओंकोसारे वीर चले जायें ओौर जो-जो शतुसम्मुख पडता जाये उसे मार आएं । इस प्रकार सम्पूणं पृथ्वी के समस्त
वानरोंकासफ़रायाहौ जायगाहम सव मिल कर श्रीमन्‌ कै सकलतापोंकाहरण करलेगे 1 २९ उन सव वीरो द्रारा की गई गव॑पूणंविनती को सुनकर कुस्भकणं मन में विचार करते हुए कहता है-हे नाथ !आपने कंसी मति को धारण क्रिया सीता का अपहरण क्यों किया।आपने यहाँ पर बडी चूक करदीदहै। .अव पत्ता नहीं आपकी क्या गतिहोगी । ३० -यदि श्रीरामचन्द्र जी ने पहले ही देख लिया होता तो अवश्यही उसी समय उनके एक ही वाणके प्रहार से आपके प्राण `चले जाते;फिर आप कहीं एक क्षण के लिए भी जीवित न दिखाई देते आपने
सीताकाहरणचोरीसे किया है, इसी लिए अभी तक जीवित हैँ । उनके
सामने- पड़ने से कौन टिक सकेगा, इसका परिणाम अपः अव भोगोगे ।
सव तो, श्रीरामचन्द्र जी जापको वंश-सहित मार ालेगे । ३१. राम चौदह
१९३

नेपाली-हिन्दी

सन्‌ राक्षसूहरु नाशू गराउन यह सीता तिमीले ह्यो ।साचा हृन्‌ इ कुरा अवश्यत्तिमिनले आपने बहुत्‌ नाश्‌ गव्यौ ३२
जुन्‌ काम्‌ गर्नु उचित्‌ थियेन उहि काम्‌सब्‌ हास्रा भरले गग्यौ अधिक वीर्‌लद्ष्ठौ निश्चय भाद वं पनि सब्‌स्वस्थै भै रहत्‌ हवस्‌ हजुरलेतेस्‌ कुम्भकणं विरले सबश्री रामलाइ्‌
एेले गय्यौ तापनि।छन्‌ भाद छोरा भनी ॥हामी जती छौं यहांशोक्‌ गर्नुप्लां कहां ।३३।यो भन्याको।गन्याको |

परमेश्वरमा

सून्यो र इन्द्रजित भन्छ हकम्‌ म पाञ।` सेना समेत सहज राम्‌कन सारि आॐ 1! ३४॥यस्तं तह्य विरदृरू सब बिन्ति पर्थ्या ।केवल्‌ गफ गरि मुखे तरवार मार्थ्या॥श्रीरामभक्त

ति विभीषण

ताहि

आई।
विन्ती ग्या वहत हत्‌ मनले चिताई ॥ ३५॥श्रीरामजीरसित विरोध्‌ किन हौ गव्याको।सीताजिलाईइ तिभिले किन हो हन्याको।
[वसवनके स्वामी हैँ, अनन्त अधिनाथ प्रभु है! उनकी पत्नी सीता,जगदम्बिका लक्ष्मीरहं सारे राक्षसोंका नाश करानेके लिए ही आपने
सीताकाह्रणकियाहै। ये बातें सत्य रहै आपने निश्चय ही अपनी वड्ीभारी हानि को स्वयं निमंत्रण दियाहै। ३२ जौ काये करना उचित नहींथा उसे भी आपने किया, केवल हम लोगो के भरसे पर। भाई ओौरपुत्रादि अत्यन्त वीर है, लड़गे ही।

श्रीमन्‌ अब

आप
शान्त हो जापं।
रोक व्यो करते है, धैय्यं धारण करनेकीटेपा करं। ३३

उस वीर

में गिननेकुम्भकणे की सव बातों को तथा श्रीराम को परमेष्वर की श्रेणीउनकीद्री बात को सुन कर इन्द्रजीत ने कहा, मृज्ञे अल्ञाहो ! मै राम कोप्रकारसेना सहित सहज ही मे अभी मार कर चला आऊ] ३४ इसीवहं पर समस्त वीर-केवल वाक्‌ प्रहार कर रहे थे । लेकिन श्रीराम के भक्तकीविभीषण ने वह॑ आकर मन में शुभकामनाएं कीं ओर कई प्रकारसे पूछा कि एसेविनती की 1 ३५ श्रीरामभक्त विभीषण ने रावण जंसेबलिष्ट वीरोमहावली श्रीराम, जिसने कि खर, त्रिशिर ओर दूषण
। अतः रेसको मार डाला दै, उसके सामने कोई विजय नही पा सकताक्यो हैकिया? ३६
पराक्रमी से विरोध कंसा, ओर्‌ मापने सीताजी का ह्रण
१९४

भानुभक्त-रामायण

श्रीरामचन्द्रकन सक्तछठ जित्व कंस्े।माच्या खर त्रिशिर दूषण वीर जस्ले। ३६॥ट्ला भन्न इ कुम्भकणं विर हुन्‌ क्या चल्छ इनूको पनि।सेखी गरदं इन्द्रजित्‌ नवृक्ि यो रामूलाइ्‌ माषं भनी॥सेखी गनं जती छ सन्‌ यहि गरून्‌ को टिक्छ साम्ने परी।सन्‌ राक्षस्‌हर नाश्‌ हनन्‌ जव तहां चेत्तन्‌ चृक्याको घरी ।३७।सीताजी ग्रहतुल्य भैकन सवे खाक्‌ गनं आंटिन्‌ यहांँ।यो प्राणान्तं वबखत्‌ भयो अञ्न पनी चेत्‌ छेन चेत्‌ गो कहाँ ।बस्नाको यदि सन्‌ पोत महाराञ्‌! श्रीरामजी्येगई ।सीता सुम्पिदिन्‌ यही बखतमा सोक्चो र साम्ने भई ।२३८)श्रीरामृचन्द्रजि फौज्‌ लिदकन यर्हां आईनलड्दं गया।आयो आज शरण्‌ पत्यो भनति वहुत्‌ ग्नेन प्रभूले दया ॥चडि आज सिताजि पुम्पनुहवस्‌ सीताजि लंका रही।
वाची सवनु कदापि छेन अर्ध्ये काही शरण्‌मा गई ।३९॥हित्‌ अमत्‌ सरिको विभीषणजिको
सून्यो वचन्‌ यो जसं।
लिन्थ्यो त्यो इ कूरा कहां अधिक ञ्चन्‌ रावण्‌ रिसायोकुम्भकणं कंसा ही वहादुर वीरक्योन हों!
तसं ॥

श्रीराम के समक्ष उसकी

भी कुछ नही चलेगी । इन्द्रजीत भी रामको मारने का व्यथं अभिभान
कररहाहै। जितनी डींग मारनीहौ यहीं मारलो, प्रभु के सामने कोईभी नहीं टिक पायेगा। समस्त राक्षणगणनष्टहो जाने पर वीते अवसरके लिए पश्चाताप करेगे । ३७

सीताजी प्रहु-तुल्यहो कर यहाँ पर सव

खाक करना चाहती है । अव प्राणान्तकासमयदहौ चुका है। सबकीचेतना करटा लुप्त हो गयी है ? अतः किसी को चेतना नहीं है! विभीषणरावण से कहता है किं महाराज, यदि जीवित रहनाहैतो यही अवसर हैकि आपश्रीरामके पास जाकरसीताजीको उन्हुं सौपदें। ३८ श्रीरामचन्द्र जी सेना लेकर यहाँ आ पहुंचे, इससे पहले ही यदि आप शीघ्र जाकर
आजहीसीताजीको उन्ह सौपदे, तो यह जानकर कि यहु शरण मेंआथा है, वे अस्यन्त दया प्रदशित करेगे । सीताजीकेलंकामेहीरहमे सेआप सभीलोगोंका जीवित रहना कठिन है 1 ३९ जंसेही विभीषण कीअभृत-बाणी रावणने सुनी, वैसेही उस वात को महत्व देने के वजायउसको क्रोध आ गया । अत्यन्त ही क्रोधित होने पर उसने लोगों से कहा
कि जज यह्‌ हमारा शतु बन गया है तथा इसे रामचन्द्र के प्रति श्रद्धा

नेपाली-हिन्दी

१९५
भयो।लाग्यो भन्न रिसाईइ आज सुन यो शत्‌ सरीकोमेरा शतु ति रामचन्द्र सित खुप प्रीत्‌ बस्न यस्को गयो।४०।आपनं ज्ञाति बद्यो भन्या अरु सबं ज्ञाती गिरोस्‌ यो भनी ।भन्छन्‌ निश्चय भन्दथ्या उहि छटा यस्ले जनायो पनि॥एेले मारिदिन्या धियां अरु भया भाई भयो क्या गषं।राक्षस्का कलमा अधम्‌ यहि भयो धिक्कार दिन्‌ बर ।४१॥मेरो आजनजीकमा रहनको लायक्‌ तं छेनस्‌ भनी ।धिक्कार्‌ हो तं अधम्‌ भद्रस्‌ भनि बहुत्‌ धिक्कार दीयो पनि॥।धिक्कार्को यति बात्‌ सन्या र्षटपद्‌ श्रीरासमा मन्‌ दिई।आकाशूमा क्लटपदट्‌ कुदीकन गया चार्‌ मंति साथ्मा लिई ।४२।लाग्या रावणलाई भन्न महराज्‌ ।
हतं

भ्यां

तापनि।
धिक्कारं तिमिले गव्यौ नबुञ्ि न्‌ शत्रू त हो यो भनी ॥दाज्युहौो पित्र तुल्य छौ यति सही एेले फरक लौ भ्यां ।खृशी भ तिमि राज्‌ गन्यामत उने रास्का शरणूमा ग्यां ।।४३।।काली हुन्‌ जगदम्बिका भगवती सीताजि राम्‌ काल हुन्‌ ।भूभार्‌ हनेनिमित्त यो छ अवतार्‌ बाच्न्या छ पापी कन्‌ ॥
उत्पच्च हो गयी है । ४० अपनेज्ञानको देख कर दूसरों के ज्ञान काआभास दहो जाता है, एेसा निश्चय ही कहा जाता था, टीक उसी प्रकारलक्षण इसने भी दिखाये । राक्षपस्तवंश मे यही एक अधम उत्पन्न हुहे । यदि मेरे स्थान पर कोई ओर होतातो इसे अभी समाप्त कर देता ।लेकिन क्या कर सकता हूं अपना ही भाईतो है । ४१ अत्यन्त ही क्रोधितहोने के कारण रावणने विभीषण को धिक्कारते हुए कहा, तुम मेरे साथरहने के योग्य नहींहो ओर अधमदहो।रावण के मूख से एेसी बातसुनकर विभीषण ने श्रीरामचन्द्रजी का ध्यान किया ओौर चार मंचियों कोलेकर व्हा से चला गया । ४२ विभीषणने रावण से कहा किं महाराज!हित की बात कहने पर भी आपने मूञ्च पर व्यथं ही क्रोध किया) आपमेरे भाई है ओर वडा भाई पिताके तुल्य होता है, यह टीक है! लेकिनअव कृ भी नहीं हो सकता । अब आप प्रसन्नचित्त होकर अप्रना राज्यचलाय, ओौर मने तो अब श्रीरामचन्द्रजीकी शरण स्वीकार की है । ४३महारानी सीता जी काली, जगदम्बिका तथा भगवती का रूप है ओौर
श्रीराम कालदहँं। वे भू-भारकोहरनेकेलिएही इस संसारमें अवतरितहुए दै; एसे प्रभु से कौन पापी अपनी जान बचा स्केगा।श्रीराम ने
१९६

भानुभक्त-रामायण

श्रीराम्को मतलव्‌ छ मानं तव पोकालूरूप्‌ श्रीरघुनाथको अर्‌ यसब्‌ राक्षसूकुलको हुन्या छ अव नाणतिघरा नश्‌ कसरीमदेखुंमतलौखूशी भं चिरकाल तक्‌ गर यहांयेती बिन्ति गरी विभीषण सवे
फिर्दन तिम्रो मति।को बुहन सक्छन्‌ गति ।४४।छोडछन्‌ प्रभूले कहां ।जान्छ प्रभू छन्‌ जहा ॥राज्‌खृप्‌ चिरायु भया ।
छाडेर रामूथ्यं गया ।४५।पासमा ।चार्‌ मन्तीसेग ली विभीषण गया श्रीरामकावाहं जान उराइ्‌ सम्सुख भया ठे ति आकाशमा॥हेनाथ्‌ ! आज शरण्‌ पव्या चरणमा आर्यां म॒ सेवक्‌ भनी।उच्चा शब्द गरी गन्या विनति घृष्‌ वृत्तान्त आप्नू पनि ।\४६।।हे राम्‌ ! रावण कुम्भकणं विरको भाई विभीषण्‌ म ह|रावण्‌ आज अधम्‌ भयो हजुरमा विस्तार्‌ कहां तक्‌ कहं ।।सीता क्यान हत्यौ फिराउ भनि खुप्‌ हीते भर्न्यां तापनि।सन्‌ धिक्कार्‌ गरि खङद्धु लीकन उट्यो काट्ष््‌ तलाई भनी ॥।४७।।यस्तो रावणले गन्यो र रघुनाय्‌ अयां हजूरमा म॒ता।संसार्‌ पार्‌ सहजं उता जसले सो छोडि जाञॐं कता॥तुम्हारा नाश करने के लिए ही जन्म लियादहै, इसी कारण से तुम्हारी मतिमे कोई परिवतंन नहीं होता ह]अतः कालरूपी श्रीरघुनाथ की गतिको यहा कौन समञ्च सक्ता है ? ४अवतो वे समस्त राक्षस-वंश कासमूल नाण कर डालेगे । लेकिन तुम्हारा नाण होते हूए मँ कैसे देखसकगा, इसलिए मँ तो भगवान
श्रीरामचन्द्रजी की शरण रमें जाता (हेंतुम प्रसन्न होकर राज्य संभालो ओर चिरायु र्हो। एसा कहू करविभ्रीषण सव कुष्ठ व्याग कर राम के पास चला गया | ४५ चार मंच्रियोंको साथ लेकर विभीषण श्रीरघुनाथ के पास चला गया । व्हा जाने से
भयभीत होकर आकाशमें ही दर सम्मुख हुजा ओौर अपना वृत्तान्त सुनातेहए विभीषण ने श्रीराम से विनतीकौ किह नाथ ! मै आपका

ही सैवक

करने के लिए दौड़ा ओर मुभे तरह-तरह से धिवकाया। ४७
जव
हं गौर आज आपकी शरणमेञा गया हूं | ४६विभीषण ने राम सेअपना वृत्तान्त सुनाते हुए कहा कि हे प्रभु ! मँलंकाके राजा रावण काभाई हूं) वह जाज अधम हा गयाहै, मै कहं तक उसकी सेवा करतारहं । सीता को वयो हरण किया? उदे श्रीराम को वापस सौपदो', जबमैने उससे एेसा कहा तो वह्‌कोधित हो-कर मुज्ञ पर खद्ध लेकर प्रहाररावण

नैपाली-हिन्दी

१९७
जसे ।यस्तो बिन्ति सुन्या विभीषणजिको सुग्रीवूजीलेरावण्कै छल ज्ञौ बुह्या र क्ञटपट्‌ वबिन्ती गन्यायो तसै ।।४८॥विश्वास्‌ नमान्तु रचुनाथ !इतदृष्टपो हृन्‌ ।गनेन्‌ इ ओसर पन्या हूंदि जीयमा खन्‌ ॥
मर्जी हवस्‌ इ सव पक्डि निभाई हालुम्‌ ।भाई म हं पनि भन्यो उ छदं छ मालम्‌ ।॥ ४९॥विश्वास्‌ क्ति नमानि वक्सनुहवस्‌ सब्‌ दृष्ट पो हन्‌ इता ।रावण्‌ कं यदि भाइहोत किन दील्‌ मारन न्ह म॒ ता॥
जले पदं छिद्र उस्‌ नखतमामार्नालाइ हुकूम्‌ हवस्‌ सहजमामेरो मत्‌ विनती ग्यां हजुरकोसुग्रीवृको विनती सुनेर रघुनाथ्‌हे सुग्रीयस्वे ! म आष्ट न सवैफर्‌ सृष्टी क्षणमा गरू सहजमा
मानन्‌ इ दागा गरी।मारिन्छ येसे .घरि ।॥५०॥क्या मत्‌ छ ख्वामित्‌ भनी ।हसिर बोल्या पनि॥लोक्‌ ध्वस्त एेले गरी।लाग्वैन एक्काल्‌ घरि ।५१।
ने मेरे साथ एसा व्यवहार किया, तोहे रघृनाथ !। मै आपकी शरणमेगया ओर अब आपकी ही सेवा करने की इच्छाहै।

जोप्रभु संसार को

तारनेवाले हँ उस प्रभूको छोडकर मै ओर किसकी शरण मे नाङं।
विभीषण की एेसी विनती सुनकर पुग्रीव ने भय के कारण श्रीराम सेविनतीकी 1सुग्रीवश्रीराम से विनती करते हुए कहने लगे, “हेरघुनाथ † यह तो दुष्टहै। इसपरभअषप जरा भी विश्वास न करे।कहीं एसा नहो कि अवसरपातेही आक्रमण करदे।अपने को रावणका भाई वताताहैओौरलगताभीेसाहीदहै।अज्ञा देतो मै अभीइन सव को पकड़ कर समाप्त केर डालूं। ४९हे रघुनाथ, आप
किचित्‌मावर भी इसका विवास न करें । यदिरावणकाही भाई है तोफिर इसका नाश करने मे विलम्ब कंसा । कोई अवसर पिलने पर उस
अवसर का लाभ उठाकरये हम पर आक्रमण कर दे, इससे पहले ही आपमारने को आज्ञा दे, जिससे इसका सहज ही नाश कर दिया जाय! ५०मेरातो यही विचाररहै, हे प्रभु] आपका क्या सतत है!सुग्रीव कीविनती सुनकर श्रीरामचन्द्र जी हुसकर बोले, “हे सिर सुग्रीव ! यदि मँ
चाहं तो अभी सारी सृष्टि ध्वस्त कर डालूं ओर चाहूंतोक्षणमें ही पनःसृष्टि निर्माणकरलूं। एेसाकरनेमेंतो कुष भी समय नहीं लगेगा । ५१अपना भक्त समक्न कर विभीषण को अन्दर आने की अनुमति दे दो।
१९८

भानुभक्त-रामायण

तस्मात्‌ भक्तं बुक्ेर निर्भय दियां आनू यि. त्याऊ यहां ।उस्‌ माथी पनि शबरदल्‌ यदि भया मार्थ्या म छोडर्थ्यां कहाँ ।।श्ररणूमा यहां ।तूका इत ओरि हृन्‌ तर पनी आयामेरो आज शरण्‌ पव्या पनि भन्या तिन्‌लादइ छोडष्ट्‌ कहां ।५२।एकौ बखत्‌ पनि शरण्‌ भनि जो मलाई।संन्नेरं परदछठ शरण्‌ त म तेसलाई॥लिन्छ शरण्‌ यदि उ शतु हवस्‌ दयैले।

मेरो व्रतं छ यहि छोड

श्रीरामूचन्द्रजिको हुकूम्‌ यति हृदाहजुरमारघुनाथकापौचायाविभीषणजिलेश्रीराम्‌चन्द्रजिकोखुप्‌ साष्टाग गरी प्रणाम्‌ पनि ग्यादन्‌ श्रीरघुनाथको जव मित्योजो ती दुःख धिया विभीषणजिकासर्वात्मा रघुनाथको स्तुती गय्यासर्वात्मा रघुनाथ्‌ स्तुती सुनि वहत्‌व्या माग्छौ वर माग दिनम भनीभक्ती सात्र थियो वहं मनमहां

कसोरि

एेले । ५३ ॥
ल्याया विभीषण्‌ पनि।ल्याई इनं हुन्‌ भनी ॥पाया र दशन्‌ तहांँ।पर पृथ्वीमहाँं ॥५४॥।खूशी विभीषण्‌ भया ।ताहीं वुरुन्तं गया॥ईष्वर इनं हुन्‌ भनी।खूशी हुनूभो पनि ॥५५॥हकम्‌ भएथ्यो जसे ।त्यो भक्ति माग्या तसं ॥
मरदि सिमीषण केसाथ तू दलभीदहोतेतो मँ उन्हं अवश्य मार डालता,छोड क्यो देता । शतूकेतोये सम्वन्धी है, तथापिमेरी शरण मे आयेह! जव मेरी शरण मेआ पडतेर्हतोमे भी उन्हं छोडंगा कहां? ५२श्रीराम ने वतताया कि मून्ञे स्मरण करके जो भी एकं वार मेरी

शरणं

मे आ जाता है उसे मँ अपनी

चाहे वह्‌ शव हौ क्यों न हो।
शरण
में नले लेता ह,

यही मेरा सवसे वड़ा त्रत है, इसे

मै कंसे व्याग सकता हँ । ५३ श्रीरामचन्द्रजी को सी आज्ञा होने परविभीषण को उनके सम्मुख लाया गया । यहीदहैःले आया हँ, एेसा कट्‌कर रघनाथ की शरण मे पहुंचाया गया । वहम पहुंच कर विभीषण नेश्रीरामके दशंन प्राप्त किये जौर पृथ्वी परलेट कर रधुनाथ को प्रणामकिया । ५४ श्रीरघूनाथजी के दशन पाकर विभीषण अत्यन्त प्रसन्न हुआ
तथा विभीषण का सम्पूणं दुःख क्षण भर में समाप्त हौ गया।यही है, एसा सोच कर विभीषण ने श्रीरघुनाथ की स्तुति की।सुनकर सर्वात्मा श्रीरधुनाथ वहत प्रसन्न हए । ५५

क्या वरदान

ईश्वरस्तुति

मांगते '

नेपाली-हिन्दी

१९९
हे नाथ्‌ ¡1 भक्ति रहोस्‌ सदा हजुरमा केले नविग्रोस्‌ मति।छोटे मान्छ म भक्ति देखि अर चीज्‌ यस्‌ सुष्टिमा छन्‌ जति ५९तस्मात्‌ कमं विनाश गनंकन एक्‌ ध्यात्‌ मातर तिस्रो हवस्‌ ।येतीले म॒ कृतार्थं छ विषय सुख्‌ सम्पूणं दूरं रहोस्‌ ॥केवल्‌ भक्ती मिल्या प्रसन्न पनि बिन्ती गव्याथ्या जसे ।होला लौ तिमिलाइ्‌ भक्ति पनित्यो दीनूभयो वर्‌ तसे ॥५७॥जस्ले यो तिभिले गय्यौ स्तुति जती मेरो यती पाट्‌ गरोस्‌ ।तेस्लाई यत्ति वर्‌ म दिन्छु सहै संसार सागर तरोस्‌ ॥येती भक्त विभीषणे सित हुकूम्‌ भो फेरि लङ्कामहां।राज्‌ दिन्छ्‌ अहिले भनीकन लहड्‌ आयो रमन्‌मा तहां ।1५८॥।भाई लक्ष्मणलाद्‌ मजि पनि भो हे भाइ ! लंकामहां।राज्‌ ग्नेन्‌ पछि तापनी म॒ अभिषेक्‌ दीने दिन्छ्‌ यहां ॥ल्याऊ जल्‌ तिमि जाउ सागर भनी हकूम्‌ भणएथ्यो जसँ ।दौडीसागरमा गर्द क्षणमहं व्यार्ईदिया जल्‌ तसे ।५९।राजा भै तिमिले रह अब उपर्‌ लङ्का पुरीको भनी।श्रीराम्‌चन्द्रजिलेविभीषण-उपर्‌ दीया अभीषेक्‌ पनि॥हो, मागो।
रँ तुम्ह दुगा, कह करजंसेही यह्‌ अन्नाहुयी वैसे ही जौ
उस .समय उसके मन में भक्ति थी वही मांगते हुए उसने कहा, है नाथ ।मेरी भक्ति सदैव आपकी ओर रहै ओर मेरी मति कभीभी भ्रष्ट न होने
पाये । इस संसार में भक्ति के अतिरिक्त ञन्यजोभी वस्तुं है उन मै

तुच्छ समक्ता हूं । ५६

कर्मकरा विनाश करने के लिए केवल आपका

ही ध्यान रहे । वस इतनेसे हीमे आपका कृताथं हँ, सम्पूणं विषय-सुखदुरहीरहै।! केवल भक्ति-प्राप्तसे हीम प्रसन्न हं। जसे ही उसनेएेसा कहा, वसे ही प्रभू ने यह्‌ कह कर कि तुम्हें भक्तिप्राप्त हो वरदानदिया । ५७. तुमने जितनी मेरी स्तुति कौ है यदि उतनी स्तुति कोई ओौरभी करतातोउ्सेभरीर्मं इतनादही वरदान देता, जिससे वह सहज हीसंसार-सागरसे तर जाये | भक्त विभीषणसे एेसा कहु कर राम ने पुनः
कहा, भेरे मनमे विचार ञआयाहैकिलेकामें तुम्हारा ही राज्याभिषेककर्गा । ५८ है भाई! भले ही तुम वादमें लंका पर राज्य करो, परन्तु
मै तो तुम्हें अभी ही राज्याभिषेक करूगा।' एेसा कह कर श्रीराम नेलक्ष्मण को सागरसेजललानेकीञल्ञादी।वैसे ही लक्ष्मणने दौडकर

सागरसे जल लाकर दिया । ५९

अव तुम लंका के राजा वनकर रहौ,

भावुभक्त-रामायण

२००
लंकाका अधिराज्‌ विभीपण हंदताहीं सुग्रिवजी विभीषणजनिकाखूशी भैकन अङ्कुमाल्‌ पनि गरीसेवक्‌ हौं सव रामक्रा तर तिमीयस्‌ रावण्‌कन मानंलाइ्‌ महाराञ्‌ ।सुग्रीव्‌ूले यति वात्‌ गन्या जव तहांहे सुग्रीव्‌ महाराज्‌ ! सहाय दिनकोतीन्‌ लोक्का अधिनाथ्‌ परात्म रघुनाथ्‌दास्‌ हूं श्री रघुनाथको म गरंलायस्तं बात्‌चित गर्दध्या दुत तहांरावण्को बुक दूत त्यो अगिसरीवाहीं जान त डर्‌ भयो र डउरलेलाग्यो सुग्रिवलाइ भच महाराज्‌ |राम्‌लक्ष्मण्‌ सितको मिलाप्‌मस्सितकोभाई हो मितको जनाउनु असल्‌
हकम्‌ रावणको~~~
~~ ~~~

भयो र

-~ ~~
~ ~

युग्रीवृहरू

खश्‌ भया]

साम्ते नजीक्मा गया ।६०।सुग्रीव भन्छन्‌ तहां ।,
छौ मृख्य सवमा यहा ॥साहायदेऊभनी।वोल्या विभीषण्‌ पनि।६१।व्या शक्ति मेरो यहाँ।आफ खडा छन्‌ जर्हां ॥सेवा त॒ भरसक्‌ गरी।आये अगाडी सरी ॥६२॥सुग्रीव सामने भई)आकाश वीचूमा रही॥सूग्रीव्‌ खरावी भयो।वैरी हुन्या मन्‌ गयो।\६३॥सम््ातेजा लौ भनी ।अहिले याहं म॒ आयां पनि ॥
-~---~-------~~-~
--~
--- ~ ~~~
~~~
~~~
4
एसा कह कर रघुनाथ ने विभीपण का राज्यभिपेक क्िया।
>

विभीपणके

लंका का अधिराज वन जाने पर, सग्रीवं इत्यादि अत्यन्त प्रसन्न हुए ।
तत्पश्चात्‌ सुग्रीवे विभीषण के सम्मुख गये । ६०अत्यन्त प्रस्ता सेआलिगन करते हुए सम्रीव विभीषणसे कहने लगे कि हम सव राम केसेवक हैँपरन्तु हम सवे से तुम मुख्यहौ 1 दहे महाराज! अवं रावण
को मारने में सहयोग दो । सुग्रीव की यह्‌ वात सुनकर विभीषण वोले-- । ६१
हे सुग्रीव महाराज ! सहयोग देने के लिए मेरे पास णक्तिकहां!यै तोश्रीरघुनाथ का दास हूं। अतः मृक्षसेजो कु भी सहयोग हो सकेगा मैंअव्य करूंगा । जहा तीनो लोक के अधिनाथ परमात्मा श्रीराम कीशक्ति विराजमान है, तो वहां उनके सम्मुख किसी अन्य की शक्ति क्यादै? इसी प्रकार कौ वार्ताललापके वीच ही दूत उनके सम्मुख आ खड़ाहुजा । ६२ रावण का शुकदूत सुग्रीव के सम्मुख आया, लेकिन भय 'केकारण अकराशके वीचमे ही रहकर वोला-“ हे सूग्रीव महाराज | बहुत
बुरा हा जो राम-लक्ष्मण से मित्रता करके 'मुञ्लसे वेर करने का विचार मनमे आयाहै। ६३. तेरे भाई(वालि)के मित्र होने के नाते यह कहना उचितः
समञ्ञकर कहता हूंकि त्र यहां से चला जा'-सी जज्ञा रावणने दी है।

नेपाली-हिन्दी

२०१
तस्मात्‌ रावणको हुकूम्‌ सुन तिमीस्‌ ल्कर्‌ लिइ फकि जाउ तिमि फर्‌लंका यो. जितिसक्नु छेन अहिलेबानरपोतिमिहौत क्या गरू कुरां
क्या काम आयौ यहाँ ।लौ राजधानी महं ।।६४॥इन्द्रादिले ता ` पनि।
यो स्थान्‌ जितौला भनी ।सीता जो अह्लि ह्यं त मदने श्रीरामकी पो हूर्व्याँ।भाद्‌ हौ मितका विरोध्‌ नगरयो तिस्रो बिराम्‌ क्या ग्यां |मेर भाइ समान हौ भनि बहूत्‌ हित्‌ जानि अर्तीं दियं ।जो गर्छ तर फक्रि जाउ म त हत्‌ गदं छ -गदं भियां ॥यस्तो रावणको हुकूम्‌ छ महाराज्‌ येती भनेथ्यो जसे ।पक्तया वानरले त॒ खेंचिकन खुप्‌ हान्या मूटीले तसे ।६६॥वानरले बहुते फजित्‌ जब गव्या | हे राम्‌ ! मर््यांलौ भनी ।श्रीराम्‌चन्द्र सुनून्‌ भनेर शकले साहं करायो पनि॥दूत्‌ हू सानं उचित्‌ त होदन प्रभू | विन्ती गरेथ्यो जसे ।कुट्न्‌ छेन भनी हकम्‌ हुन गयो सून्यार छोडो तसं।।६७॥।वानर्‌ देखि षुटयो जसं उहि बखत्‌ कूदेर आकाश्‌ गयो।क्या उत्तर दिनु हुन्छ पाडंम जवाप्‌ जान्छू म भन्दो भयो ॥उसके बाद रावण की आज्ञा पाकर आप, जिस कामस, यहाँ पर आये हैँ
(उसे त्याग) समस्त सेना को लेकर आप राजधानी को लौट जाइए । ९४इन्द्रादिकरे द्वारा भी लंका पर कोई विजय नहींपासकेताहै। आपततो वानरहीर इस लिए मे यह कंसे कटं कि यह स्थान आप जीत हीलेगे। रावण
ने सीताजी का हरण यदिकियाहैतो राभकीौ पत्नीसीता का दही. हरणक्रिया । आप उनके मित्र के भाई है, अतः विरोधन करं । आचल्िर उन्होनेआपका बिगाडादहीक्या है?६९५मेरे भाई के समान हो, इसलिए
तुम्हारे हित की बात कहता हूं। वेते तुम जसा चाहो करो, मै तो तुम्हाराहित चाहता था ओर चाह रहा हुंओर महाराजा रावण की यह्‌ आज्ञा है
किञापलौटजयें।

जसेहीदूतके मुखसे यह बातें सुनी, वानर ने

उसको अपनी ओर खींच कर मुष्टिकेट्वारा उस पर प्रहार किया। ६६वानर ने जव अधिक परेशान किया तो शुक ने श्रीराम को सुनाने केउरेष्य से कुछ तेज आवाज में चिल्लाकर कहा, है राम ! लो अब मरा)जसे ही उसने यह विनती कि कि दूत हुं, अतः दूत को मारना उचित नही,उसीक्षणन मारते की आज्ञा हुई ओर आज्ञा सुनकर तुरन्त ही छोड दिया
गया
६७. वानरोसेज्योंहीषटुटकाराभिला त्यों ही उछ्ल कर वहु

भानुभक्त-रामायण

२०२९
यस्को सुभ्रिवले जवा तहि दियावाली ज्ञ गरि मारुला अधम होस्‌श्रीराम्‌चन्द्रजिकी सिता हरि करांयस्ते रावणथ्यं भन्यास्‌ भनति भ्यायस्तो सुग्रिवले जवाफ्‌ जव दियापक्छून्‌वानरले नषछोड अहिलेश्रीराम्‌चन्द्रजिको हुकूम्‌ यति हुंयस्‌ भन्दा अधि आइ शादुलल फिव्योविस्तार्‌ शादु्लदेखि राम-बलको
सित्‌दाज्यु हयस्‌ तापनि)भन्दीनं दाज्यू पनि 11६८॥।
उम्केर जालास्‌ उसं।सूग्रीवजीलेतसं ॥राम्को हकूम्‌ भो तहां ।क्थ दिन्‌रहोस्‌ यो यहा।६९।त्यो शूक बन्धन्‌ पय्यो |विस्तार्‌ यसैले
गृत्यो ॥
सून्यो र रावण्‌ पति।चिन्तामा परि गैगयो अति टुलो आये लशटकर्‌ भनी।।७०॥यै बीच्मा रधृनाथ्‌ रिसाउनुभयौ आयेन सागर भनी।लाल्‌ लाल्‌ नेत्र गराइ्‌ लक्ष्मणजिका साम्ने हुकूम्‌ भो पनि ॥हे भाई! तिमि हामिलाई्‌ -यसले सामान्य मानिस्‌ गनी ।भेटे आज गरेन हर तिमिल यस्को तमाशा भनी ।॥७१॥सागर शोषण गर्नलाद धनु ली वाण्‌ खेंचनूभो जसै।कामिन्‌ भूमि पनी भयंकर स्वरूप्‌ राम्लाइ्‌ देखी तसं ॥आकाश को गया भौर कह्ने लगा, बोलो, क्या उत्तर देना है ? उत्तर मिलजायतो मै चला चाङं। सूग्रीवने वहीं पर उत्तरदिया। मित्रहोयाभ्राताहो अर्रत्‌ भ्राता होने का विचार नहीं स्खंगा। बालि की तरह मारूगाफिर चह अधमदहीक्योनहोजाये 1 ६८ सुग्रीवने वताया कि रावणसे कहना कि तुम श्रीरामचन््रजी की पत्नी सीताजी को हूर करके बचकरकहाँ जाओगे । सुग्रीव नेजव एेसा जवाव दिया तबश्रीरामने आज्ञा दी
कि वानरोंसे कहो कि उसे पकड़ले भौर अभीन छोड तथा कुछ दिन वह्‌यहीं रहले । ६९

श्रीरामचन्द्रजीका यह्‌ आदेशहोते

बन्धन में कर लिया गया।

ही उस

ञ्युक को

इससे पहले ही शार्दूल वापस लौटा ओौर

उसीने रावणको सारा विस्तार बताया।

शार्दूल के मख से राम की

शक्ति के वारे में विस्तार से सुना, ओर अति विशाल सेना आयी हुई है यह्‌सुनकर रावण भी अति गम्भीर चिन्तामें पड़गया। ७०इसी बीच मेंश्रीरघुनाथ सागर के न आने पर अत्यन्त कोधित हुए। लाल-लाल नैतकरते हुए लक्ष्मण को आदेश दिया ओौर कहाकिदहे भाई । जरा इसकातमाणातो देखो ! इसने आज हमे ओर तुम्ह एक साधारण मनुष्य समक्ष

केरभेटतक नहींकी 1७१

जंसेदही सागर का शोषण करने के लिए

२०३

नेपाली-हिन्दी

चार्‌ कोश्‌ तक्‌ त समुद्रको जल पुण्यो दश्‌ दिक्‌ अंध्यारा भया ।जो जन्तू जलमा' धिया ति पतिता स्‌ खल्‌बलाई गया ।७२।यस्तो देखि उराइ सागर तहां सुन्दर्‌ स्वरूप्‌ एक्‌ धरी ।भेटी खातिरलाईइई रत्नहरु बेस्‌ लीयेर क्लट्पट्‌ गरी॥अगाडीधरी।श्रीराम्‌चन्द्रजिका गयाशरणमा भटीपामा परि दण्डवत्‌ पनि ग्या सब्‌ रेखिशान्‌ दूर्‌ गरी७६३।हात्‌ जो रीस्तुति बिन्ति धीर्‌ गरि गव्या हे नाथ्‌ म हूं जड यसै।सीतानाथ्‌ प्रभुलाद्‌ जानुं कसरी क्यै चेत्‌ नपाई उसे॥चेत्‌ एेले प्रभूले ददा हजुरमा आई शरण्‌मा पर्वया ।रस्ता दिन्छु दया रहोस्‌ म छु अनाथ हात्‌ जोरि बिन्ती ग्यां ७।सागरका इ वचन्‌ सुनी हुकूम भो संचो भन्यौ ता पनि।वाणुको थान्‌ त खटाउनाकन पय्यो यस्लाइ्‌ लौ हान्‌ भनी ॥रेलयसै।मेरोवाण्‌ त अवश्य काम नगरी फिर्देनज्यान्‌ राख्छौ त अवश्य देड बदला टर्देन यो वाण्‌ कसे ॥७५।।श्रीरामूचन्द्रजिको हुकूम्‌ यति सुनी हात्‌ जोरि बिन्ती गन्या।पापी छन्‌ द्र मकूल्यमा अदहिर हुनु उत्तर्‌ दिशामा परया ॥श्रीरघुनाथ ने धनुष-बाण खीचा, वैसे ही रामको देख कर भूमि भयंकर रूपधारण करके कापने लगी । समुद्र काजल चार कोस दुर तक पहुँच गयातथा जो जन्तु जलमे निवास करते थे उन सब में भी खलबली मचगयी । ७२
यह्‌ सब देख कर भयभीत होकर सागर एक सुन्दर स्वरूप
धारण करके भेट देने के लिए रत्नादि लेकर श्रीरघुनाथ की शरण

में गया

ओर भेंटको रघुनाथ के सामने रखकर उनके चरणो मे भिरकर प्रणामकिया । ७३

धीरज धर कर तथा हाथ जोड़कर स्तुतिकौी ओर

कहा, हे

नाथ ! भैतोरेसे ही जड हूः मै सीता-पतिप्रभ्‌ को कंसे जान सक्ता हूं |८ तनिक भी चेतनार नही आयी । प्रभु द्वारा चेतना जाग्रत कर देनेमुञ्जमेसे म आपको शरण में आपकी सेवा करनेके

लिए आया

ह|
अतः
रँ
आपको रास्ता देता हं, मृञ्च.पर दया करने को कृपा कर्‌ क्योक्रि मे अनाथहं । ७४ सागर के इस वचन को सुनकर आज्ञा हुई कि रहने दो, यदितुम सत्य भी कहते हो तव भीबाणका लक्ष्य तो प्राप्त करना ही है।
अतः इससे प्रहार करते है । मेरे बाणतो अवश्यही विना कायं को पूणंकिये वापस नहीं लौट सकते । यदि प्राण चाहते हौ तो बदले मे कोई ओरप्राण दो लेकिन यह्‌ बाणकिसी भी रूप में टलने वाला नही है। ७५
२०४

भानुभक्त-रामायेण

ठाकुर्का यहि वाणले जतितिषछन्‌

पापी सवे नाश्‌ गरोस्‌।
यसृकाम्ले म अनाभू गरीव्‌ हजुरको दास्को सवं ताप्‌ हरोस्‌।७६।यति विनति गय्याको सूति घुम्‌ हषं मानी ।सकल
ह्रिदिन्‌भो तेहि वाण्‌ जल्दि हानी ॥
रिससित गद वाण्ते पापिको नाश्‌ गराई ।सकिकन फिरि योकक्र॑मा पव्यो वाण आई 1७७]यै वीच्मा त्ति समूद्रले चरणमां पलेर विन्ती गन्या।कीर्तीं खुप्‌ रहन्याछठ सेतु वलियो हालर लश्कर्‌ तव्यासेत्‌ वधनमा समथं नल छन्‌ इनूले त वर्‌दान्‌ पनि)पायाको छ इ विश्चक्मं युत हन्‌ रवाधून्‌ इ सेत्‌ भनी ॥७८॥
येती विन्ति गरेर पाड परि फ़र्‌ सागर्‌ अदृष्य भया।सागर्को विनती पुनी नल पनी राम्का हजुरमा गया॥हकम्‌ भो नललाद सेतु तिमिते चांडं वनाऊभनी।लण्कर्‌ साथ लिया र जल्दि नलले सेतु बनाया पनि ॥७९॥खशि भद्‌ नलले सव्‌ वीरको तेज्‌ जगाई |वरिपरि जति छन्‌ सन्‌ वृक्ष पवत्‌ मगाई ।श्रीरघुनाथ का एसा आदेश सुनकर हाथ जोड़कर उसने विनती की कि
उत्तर दिशा कौ ओर द्ुमकुल्य नामक नगर मे अनेक पापी ग्वाले रहते ह ।प्रभू के इसी वाणद्वारा उन सव पापियोंको नाश किया जाय।एसाकरने के पश्चात्‌ मन्न दीन अनाथ ओौर प्रभु के दास के समस्त संतापो काहरण करं । ७६ उसकी एसी विनती सुनकर राम अत्यन्त हुरपितत हुएयर तुरन्त ही उस वाणसे प्रहार करके सकल ताप का हरण किया।वाण सीधा जाकर पापियों का नाण करके पूनः लौटकर तरक्म में प्रवेश
कर गया 1 ७७ इसी वीच समुद्रनेचरणोमंलेट कर विनती की किशक्तिशाली पल को वाध करसेनाको पार लाने से अच्यन्त कीत्ति होगी)पुल वधन मे नल समथं है तथा इ्हं वरदान भी प्राप्तहै।! यह्‌ विश्वकर्मासुत है, अतः यही. पुल को वधे । ७८ इस प्रकार से विनती करके सागरपुनः अदृश्य हौ गया । सागर करी विनती सुनकर नल भी राम के पास
गया । नल को शीघ्रतास्ते पुल र्वाधने की आज्ञा हुई । अतः वह सेनाको साथ लेकर पुल का निर्माण करने लगा। ७९प्रसन्न होकर नल नैसव वीररोको शक्ति जाग्रतकी। चारोंओरनजो कु भी वृक्ष ओौर पर्व॑तथे उनको म॑ँगवा कर आगे आकर पुल र्वांधने लगा। उसी क्षण रघुनाथ

नेपाली-हिन्दी

२०५
अगि सरिकन सेतु वाध्न लग्या जसे ता।शिव भनि रघुनाथूले मति थाप्या तसं ता ।॥८०॥]याहा लिई।रामेश्वर भनि नाम्‌ चलोस्‌ अव उपर्‌ संकत्पगद्खाजल्‌ लिन काशि गैकन उ जल्‌ ल्याई्‌ नुहाई दिई॥पयक्ला कामरु त्यो समद्र जलमा जस्ले वगोस्‌ यो भनी ।त्यो जन्‌ मुक्त हवस्‌ भनेर रघुनाथ कोयो हुकूम्‌ भो पनि।। ८ १॥बाध्या सेतु छपन्न कोश पहिले दिन्‌ दोसरा दिन्‌ असी।कोण चौरासि सक्या तृतीय दिनमा कस्मर्‌ सबले कसी ॥कोश्‌ अद्भासि सक्या चतुथं दिनमा वकी बयान्नव्बे कोश्‌ ।पाचौं दीनमर्हां सक्या नजर भो निस्क्येन एक्‌ काहिदोषूरर्‌तेही मागे गरेर फौज्‌ सब तरयो ढाक्यो च्िकृट्‌ पवते ।टाप ढाकिदियोरहन बिचमा खाली भन्याको कतं |,हन्‌मान्‌महां ।भाईलाइचटढाइअद्धदमहां आफू` चदनूभो रघुनाथ र जानु पनिभो थीयो जगा ऊच्‌ जरहा।८३।ताहीं गैकन त्यो विचित्र नगरी लंक नजर्‌ भो जसे ।त्यो रावण्‌ पनि कौसिमा गइ तमास्‌ हर्थ्यो नजर्‌ भो तसै ॥ये बिच्मा शुकलाइ छोडिदिनुभो दौडेर त्यो जुक्‌ गयो,रावणः सीत तुरन्त गेकन सबं विस्तार गर्दो प्रयो ।८४॥ने शिवजी का स्मरण करके मूति-स्थापना की । ८० रामेश्वर के नाम सेप्रसिद्धि हो, एेसा सोचकर वर्ह पर संकल्प क्रिया | काशीसे गंगाजललाकर स्नान किया जो यह्‌ सोचकर समुद्रम कामरू फेकेगा कि यह्‌बह्‌ जाय तो वह्‌ प्राणी मुक्त हो जायगा, यह्‌ कहते हुए रघुनाथ ने आज्ञादी। ८१
पहले दिन छप्पन कोसक्ा पल ्वाधा।

दूसरे दिन अस्सी

कोस तथा तीसरे दिन सबने कमर कस कर चौरासी कोस समाप्त करदिया । चौथे दिन अदासी कोस ओौर वाक्ती व्यानवे कोस, पाँचवे दिनसमाप्त कर दियादेखने पर कहीं कोई दोष नहीं दिखायी दिया 1 ८२
उसी रास्तेसेसारीसेनापारहौो गयी। त्रिकूट पवेत ओौर टाप्‌ सव ढकदिया । कहीं पर कोई रिक्त स्थान नहीं बचा । भाई को अंगद पर चढा
कर स्वयं हनुमान पर सवार होकर चल पडे, यद्यपि स्थान काफी चाथा।.८३जंसेही वहां जाकर विचित्त नगरीलंकाको देखातो वहां पर
रावण भी तमाशा देखते हुए नज्ञर आया 1 उसी बीच लुक को छोडदिया 1 शुक दौड कर गया ओौर वहां जाकर रावणको तुरन्त ही सारा

भानुभक्त-रामायण

२०६
एेले हे महाराज्‌ ! ग्यां हजुरकोबाध्या

वानरले

पर्व्यां

सकसमा

हुकुमलेएेले पो रधघुनाथकावाच्यां बल्ल भनैर हषंसित खुप्‌आयो फौज्‌ रघुनाथको अति टृलोजीतीसक्नु क्विन्‌ हृन्याछ वललेसीताजी लगि रामक्रा गश्ररणमालङनं मन्‌ छ भन्या तुरन्त अवलरामको एक्‌ समचार्‌ म भन्दच्ु हरिस्‌संग्राम्‌ गनं अगाडि सर्‌ वखत भोभोली ध्वस्त गरा अधि खवर्‌हाकी भन्छु तंलाइ छोडदिनं यसरावण्‌लादइ सुनाउन्‌ यत्ति धियोते जान्छस्‌ त॒ पठाडं को अर तहांभोयस्तो श्रीरघुनाथको हुकुमसंचो विन्ति गरीसक्यां उ समचार्‌
विस्तार सुनाया । ८४गया!

हकम्‌

हनाने

तहां ।
आऊ कसोरी र्हा ॥छोडी दिया जा भनी।दौडर आर्यां पनि ॥८५॥
याही समूद्रेतरी।एेले लडाईगरी॥की आज परनू हवस ।संग्राम गर्न हवस्‌ ॥८९।सीताजि उन्मत्‌ चिरई।साम्ने मूरादिई।॥दी्यां उचित्‌ हो भनी।मैले नमारी पनि ।>७।।हे शुक्‌ ! सुनाई दियास्‌ ।तले मनेमा लियास्‌ |भन्न्‌ समचार्‌ भनी।मैले हजुरमा पनि ॥८८॥]
“हे महाराज ! अभी श्रीमन्‌ के आदेशानुसारमें वर्हा
यदि वानर द्वारा वाध लिया जातातो संकटमे पड़ जाता ओर
य्ह न आ पाता। अभीतो रघुनाथकीञआन्ना से छोड दिया गयाहूंताकि मँ चला जाञं। अवै संकट से वच गया इसी कारणस तीत्रगतिसे दोडकर यहां आ गया हँ । ८५श्रीरघुनाथ अपनी विशाल सेनाके साथ समुद्र पार कर यहां आ पहुचे है। उनसे युद्ध करके भी विजयपाना किनिही रहै, अतः आजदही सीताजी कोश्रीराम की शरण मेलेजाकरसौँपदेनेकीकृपाकरे। यावृद्धहीकरनादहैतोशीघ्रही संग्रामप्रारम्भ करने की कृपा करे । ८६

रामचनजी

ने एक संदेशमभेजाहि उसे

म वताता हूं । कौन सी मति को अपनाकर आपने सीताकाहुरण किया दहै।अव समय हो चूका है अतः मुह्‌ समक्ष रख कर संग्राम करनेके लिए आगेआभो। कल तुञ्चे मेँ ध्वस्त कर उालूंगा, अतः मै तुल्ञे पहले से सूचनादेता हं । मेँ तुक्षे ललकार कर कहता हूँकि यदि तुञ्चकोनभी मारा तोएेसे नहीं छोडंगा 1 ८७ हे शुक 1 केवल इतना ही तुम रावण को जाकरसूनादेना।! जवतुमदहीजारहैहोतो ओर किसको भेजु ? अतः तुमअपने मनमें समक्षलेना।एसा समाचार कहने के लिए श्रीरघुनाथ काआदेश हुआ है । अतः वह्‌ समाचार मने श्रीमन्‌ के सम्मुख सत्य वर्णन

नेपाली-हिन्दी

२०७

मेरो बुद्धि म॒ विन्ति ग्ट अहिले

राम्‌ हुन्‌ जगत्‌का पति ।जीती सक्तु कदापि छेन अरुले क्याभो हजुरको मति॥सीता आज 'लगेरः सुम्पनु हवस्‌ राम्‌का चरण्‌मा परी)वाँचन्या येति उपाय देषु नहि ता आयो सरणूको घरि ।।८९॥यो `बिन्ती शुक्ले गव्यो र सुनि खुप्‌ रावण्‌ रिसायो तहां ।लाग्यो भन्न मलाइ्‌ पाजि युकयो अर्ती दीन्या भो यहं ।।` ओौरे कोहि भया त निश्चय यहां मारीदिन्यां पौ धियां |यस्का गृण्‌ अधिका थियार गुणले वाँचिस्‌ बिदा जा दिर्या।९०।रावण्ले जुकलाई्‌ जा भनि तहा बीदा जसं ता दियो ।त्यो शुक्‌ ब्राह्मण हो अधी पछि सराप्‌ पर्दा तहां व्यो थियो ॥भयो)राक्षस्‌ हनु सराप्‌ पनी तहि षटयौ बीदा तुरुन्तंरावण्देखि विदा भयो र प्रछि ता लुक्‌ब्राह्मणे भे गयो ॥९१॥ब्राह्मण्‌ हुन्‌ धरमा थिथा शुक्षी एक्‌ दिन्‌ अगस्ती गया।भोजन्‌ दिन्छ्ु अगस्तिलाइ म भनी निम्ता ति गर्द भया॥स्तान्‌ सन्ध्या गरि आू तब भनी हीडया अगस्ती जसे ।आयो. राक्षस व्रदंष्ट्‌ रिसले पायो र अन्तर्‌ तसं ।॥९२॥कियाहै। ठठ मै अभी यही विनती करताहूं किमेरे विचारसे श्रीरामसंसारके स्वामी है, अतः उनसे कोई भी नहीं जीत सकता। श्रीमन्‌ कीबुदधिकोक्याहोगयारहै। अवतो बचनेकाएकही उपाय दीखता हैकिरामकी शरणमे पड़कर सीताजी को सौपनेकी कृपा करे, नहीं तोमृत्यु की घड़ी नजदीक आ गयी है!" ८९शुक की इस विनती कोसुनकर रावण को बहुत क्रोध आया ओर कहने लगा-पाजी शुक } आजतूहीमृक्षे शिक्षा देरहाहै।तेरी जगह यदि कोई ओौर होता तोअवश्य ही उसे मार डालता । लेकिन पहले के तेरे कु गण (सेवाएं) है
उसी कारण बच गयाहै; जा तुङ्ञे छोड दिया | ९० रावण ने शुकंकोविदाकिया। वैसे दही उस शुक ने जो पहले शाप के फलस्वरूप व्हा,ब्राह्मण से राक्षस की योनि में उत्पन्न हुआ था, शप से तुरन्त मुक्ति पाईभौर रावणसे विदा लेने के पश्चात्‌ वह पुनः ब्राह्मण हो गया] ९१ब्राह्मण होने के समय, बुकके धरम एक दिन ऋषि अगस्ति पधारे।उसने अगस्ति को भोजन के लिए निमंतरितक्या। जैसे ही अगस्तिजीस्नानादि करके आऊगा' कहकर चले गये, वैसे ही ब्रजदष्ट्‌ नामक राक्षस

र्ध होकर आ गया । ९२

जैसारूप मुनि अगस्तिकादहै, ठीकवैसाही

भानुभक्त-रयामायण

२०८
जस्तो रूप्‌ छ अगस्तिको उदहि स्वरूपमासू खान मलाइ देउ तिमिलेयस्तो छल्‌ पहिले गम्यो र पछि फर्‌मासु मानिसको लगी मिसिदियो
धान्यो र॒वोल्यो पनि।इच्छा छ मेरो भनी॥खान्या वखत्मा पनि।टीक्‌ शुकिकि पत्नी वनी ।९३।

भाग्‌ देख्ता ति अगस्तिकारिसउय्यो

दीया

सरापै

पनि।

मास मानिसको दिइस्‌ त तं भयास्‌

रक्षस्‌

अवश्ये

भनी ॥
शवले विन्ति गस्या खवर्‌ हुन गयोचाड चट हन्या अगस्ति ऋषिलेहेशुक्‌ ! राम्‌ अवतार हुन्याछ बसलौरामको दशेन पाउला तहि सराप्‌यस्तो अति अगस्तिको सुनि उसरामको दशंनले सराप्‌ षुटिगयोरावण्की महतारिको पनि पितारावण्‌का नजिकं गर्ईदकन भन्योराम्‌ नारायण हुन्‌ सिता पनि उनसीता सुम्पिदिहाल राख मनमा
यो छल्‌ परयाको जस ।वेला बताया तसं ॥९४॥रावण्‌ कर्हां गै -तदहीं।टुटूला नजाऊकहींमाफिक्‌ गरचाका धिया।फेर्‌ वृत्तिआपफ्नंलिया।॥।९५॥हं हित्‌ म॒ भन्छ्‌ भनी।दहत्‌ मात्यवानूले पनि॥ल्मीभनीज्ञानले।पूजा गरी ध्यानले ।९६॥
स्वरूप धारण करिया भौर वोला, किमुन मांसदो, मेरी मांस खनेकीइच्छा! इसप्रकार का छल पटले भी किया ओर भोजन के समयभी क्रिया! ठीक युक की पत्नी वनकर मनुप्यका मासि से जाकर मिलादिया । ९३ मास्त देखते ही अगस्ति ऋपिकोक्रोध आ गया। उन्होनेउसी समयशापदे दिया कि तुमने मनुष्यका मांसिदियारहै, तुम अवश्य
ही राक्षस हो जाओ। इसछ्लकियि जनेकी वातविनती की। तव अगस्तक्छषि नेशीघ्र हीषुटकाराबताया 1९४

हे शुक | रामका

अवतार होगा।
सुनकर बुकनैपानेका समय

अत्तः रावण के यहां

जाकर राम के दशेन पने परही तुम्हारा शाप समाप्तहोगा; अवअन्यत्र कहीं न जाजो । अगस्तिका एेसा उपदेश सुनकर जुक ने उसीके कहे अनुसार किया। फिर राम के दशंन पाकरशापसे मूक्ति पायीओौर पूनः अपनी (ब्राह्मण-) वृत्ति को अपनाया ९४ हे रावण ! मँतेरी माताका भी पिताहं अतः हितके लिएही कहतादहं कि रामनारायण हें ओर सीताजी साक्षात्‌ लक्ष्मीरहं! अतः तुमत्तो स्वयं ज्ञान-
वान्‌दहयौ।

सीताको

विनादेर क्थिही श्रीरघुनाथ को सौपदो।"

राव्णके पास जाकर, मल्यावान ने इस प्रकार कहा भौर समज्ञाया

कि मनमेंध्यान देकर राम का पूजन करो! ९६

नगरमे उत्सवका

२५९

नेपाली-हिन्दी

उल्का हुन्छ अनेक्‌ अनेक्‌ शहरमा उत्सव्‌ भन्याको रती ।काही छैन बताऊँ यो म महाराज ! यहां .हजूर्‌मा कति ॥तस्मात्‌ बिन्तिछ यो बहुत्‌ हजुरमा दहत्‌ जानि लीनू हवस्‌ ।
'सीतानाथूकन ईश्वरे बुक्ि सिता सुम्पेर दीन हवस्‌ ॥९७॥यो. बिन्ती सुनि माल्यवान्‌ सित बहुत्‌ रावण्‌ रिसायो तहां ।लाग्यो भन्न रिसाइ आज तिमि क्या - बोल्छौ ब्ुढा भै यहांँ॥.क्थाले राम्‌ परमेश्वरे भनि भन्यौ मानिस त हृन्‌ ती.पनि।
जानुं म ईश्वर्‌ भनी ।॥९८॥।जाऊघरेमा भनी।
लिन्छन्‌ .. वानरको सहाय कसरीतिख्रा-बात्‌ सुनि चित्त पोल्छ तिमिता
मन्ती , वग लगाई साथ धरमा जल्दी पठायो पनि॥रावण्‌ उच्च अटालिमा बसि कती आया बडा वीर्‌ भनी।हर्दे. लडन त मन्‌ . गरीकन हृकूम्‌ दिन्ध्यो चडन्‌ वीर्‌ भनी।।९९॥।

देख्नूभो रघुनाथले र॒ तदि वाण्‌

छोडीदिनूभो

जसँ ।
तेस्‌ बाणले दश छत्रदश्‌ मुकुट सन्‌ काटी खसाल्यो तसै ॥आप्ता छत्र र दश्‌ मूकुट्‌ जब भव्या लाञ्‌ मानि रावण्‌ पनि।ओर्त्यो जल्द अटालिदेवि र` गयो हान्नन्‌ इ फेरी भनी।।१००॥कहीं नामोनिशान नहींहै। उधमकुछ भी नहीं जो आपको बताॐं।
ही मत्र है। हे महाराज ! यहइसीलिए श्रीमन्‌ से मेरी यह्‌ विनती
है कि इसे हित की बात समज्ञं ओर सीतापति को ईश्वर जानकर सीताको उन्हं सौँपने ,कीछृपा करं! ९७ इस विनतीको सुनकर रावण कोमाट्यवानः पर अत्यधिक क्रोध आया भौर क्ोधावस्थामें दही कहने लगाकि वृद्धःहोकर भी तुम भाज यह्‌ क्या कह रहे हो, राम को केसे परमेश्वर
कहा, वह॒ भीतो मनुष्य हीदहै। ` वहतो वानरोंकी सहायतानलेतारहै,उसे मै किंस प्रकार ईश्वर मानं । ९८ तुम्हारी बातें सुनकर तो मेरा चित्तही जलने लगता है! अतः तुम घर लौट जाओ। तुरन्त ही माल्यवानको मन्नियों के साथकरके उसे घर भेज दिया। वहां उच्च अद्रालिकामें बैठ, कितना बड़ा वीर आया है, देखते हुए लड़ना समाप्त करके, वीयं

को लडनेकौ अज्ञादेरहाथा।९९

अपने बाण से प्रहारक्िया।

रघुनाथने जैसेही देवावैसेही

उस वाणके प्रहारसे हीदस छत्र ओर

दसो मुकुट टूट कर गिर्‌ गये । अपने दस छत्र तथा -मूकरुटो को गिरा
देखकर रावण अत्यन्त ही लज्जित हुभा ओर अट्टालिका सै उतर करचला गया, इस भयसे रामफिरसे प्रहारन कर दे! १००

दरबारके

२१०

भानुभक्त-रामायण

दर्वार्‌ भित्र पसी हृकूम्‌ पनि दियो लौ लडन जाऊ भनी]निस्वया लन भनी प्रहस्तहरु वीर्‌ छोपेरभूमीपनि॥संगा उट्‌ गदहा र सिहहरमा वीर्‌ वीर्‌ सवारी ` भया।नाना शस्त्र र अस्त्र लीकन अनेक्‌ वीर्‌ लडन जल्दी गया।। १०.१॥चार्‌ ढोकातिरवाट निस्किकन फौज्‌ सम्‌नेभेयेथ्यो जरसैँ।वानर्ले नजिकै गर्ईकन जगा धेरी लिया सब्‌ त्सै।॥।रावणूको सब फौज निस्कन तहां पायेठाॐंपनि ।गजैन्छ्न्‌ सव वीर वानरहुरू राम्चन्द्र जित्छन्‌ भनी।। १०२॥यस्तं रीत्सित घेरि हान्न पनि जन्‌ लाग्यायि वानर्‌हर।राक्षस्‌को पनि फौज्‌ हटेन उरले प्राण्‌ त्यज्न लाग्या वर ॥संग्राम्‌ यस्‌ रितले जसे हन गयो तार्हां ति वानर भन्या।श्रीरामूको करुणा कटाक्ष हुन अत्यन्त योद्धा वन्या ।।१०३।।राक्षस्‌तफं भन्या घटयो वल सवे ट्ला टला वीर्‌ मव्या।मान्या वानरले ति राक्षस सवं चौथाइ्‌ रवाँकी गन्या॥भाफ्नू फौज्‌ सब नष्ट देखिकन वीर्‌ सावंलडकी्ुरो।आयो इन्द्रजितं म लड्दष्ट भनी सवस्तिमाको पुरो ॥१०२॥अन्दर प्रवेश करतेही रावणने वीरोंको लडनेके लिए जाने की आज्ञादी। समस्त वीर नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्र लेकर, भस, उट, गदभ,भौर सिह पर सवार होकर युद्ध केलिए शीघ्ररही चल दिये १०१जैसेही चारोंओरके द्वारोंसे रावण की सेना निकली, वैसे ही वानरसेनाने आकर उन सवकोधेर लिया)रावणकी, सेनाको वर्हसेनिकलने का कोई स्थान नहीं रहा 1 समस्त वीर वानर गजना करतेहुए कह र्हैयेकि श्रीरामदही विजयी होगे । १०२ इसीक्रमसे रते
हुए वानर-ेना रावण की सेना पर प्रहार करने लगी।

राक्षसो की

फौज वहं से भागी नही, वत्कि राक्षसगण भयभीत होकर अपने प्राणत्यागने लगे। जवसंग्राम इसप्रकार होने लगा तव वानर कहने लगे,“यह्‌ सव श्रीराम की महिमारहै। उन्हीकी कपा करि हम सव अत्यन्तयोद्धा वन गये है" । १०३ राक्षसोंकी सारी शक्ति जाती रही ओरसब वड़-वड़ वीर मारेगये।! वानरोंने सभी राक्षसो को मार डाला,जिनमे से अव केवल चौथार्ईूही वकीये।अपनी सेनाको इसप्रकारसमाप्त होते देख वीर सरमा इन्द्रजीत, जो सब अस्त्ौमें प्रवीण था,
युद्ध करने के लिए आगे वा । १०४--वानर ओर सेना पर हथियारोंसे

नेपाली-हिन्दी

२११
वानर्को सब फौजलाइ हतियार छाड़ेर मदेन्‌ गव्यो ।श्रीसम्ले पनि त्रह्यपाश अति दुलो जान्नै र मान्न पन्यो ॥एक्‌ छन्‌ चृप्‌ रहन्‌ भयो र रघुनाथू ` फंरी तयारीभई।एेले मार्ष्टु मेघनाद्कनं भनी साम्ने उसका गई। १०५॥।माग्नूभो धनु देड लक्ष्मण ! भनी श्रीरामजीलेजसं ।मान्‌, की भनि. मेघनाद उरले फकर भाग्यो यसं ॥भार्दामा प्रभृजी मुयुक्क , मनले हसिर भन्छन्‌ अनि।,यो बच्चा पनि जोरि खोज्त मकनं चाहुन्छ कच्चा बनी।।१०६॥पृथिवितव गिव्याका वीर्‌ . वचाऊनलाई।हकूम प्रभुजिको भो वीर्‌ हनूमानलाई ॥टिल नगर हनूमान्‌ ! क्लषीर.सागर्‌ छ जाऊ ।तहि छ अगम पवत्‌ द्रोणः लीयेर आऊ ॥१०७॥वखति तहि छ तेही ख्वाइई यो फौज्‌ बचाऊ ।यति गरि जुभकीति दश्‌ दिशामा चलाऊ॥
- हकूम सुनि तुरन्त द्रोण लीयेर आया।पृथिवितल गिग्याका वीरलाई बचाया ॥१०८।यत्ति गरि हनुमान्‌ले कीतिले लोक छाया ।
फिरि लगि उहि पेत्‌ द्रोण राखेर आया ॥प्रहार करने लगा।श्रीरामचन्द्र को अत्यधिक विराट ब्रह्मपाश काज्ञान प्राप्त करनेके लिए बाध्यहोनादही पड़ा। श्रीराम एक दिनितोचृप रहे, किन्तु पुनः तमार होकर, यह्‌ कहते हए कि मेघनाद को अभीमारताहँ उसीके सामनेजा उटे। १०५ जंसेही श्रीरामने मेघनादको मारनेके लिए लक्ष्मणस धनुष-बाण माँगा, वैसे ही भयभीत होकर
मेघनाद वहां से भाग खड़ा हुभा । उसको भागते देख कर प्रभु मन हीमन मुस्कराते हृए कहते हँ कि यह बच्चा इतना कमजोर होते हृए भी मुल्प
लड़ने की अभिलाषा रखता है । १०६भूमिपर भिरेहृए वीरो कोबचाने का आदेश वीर हनुमान को देते हृए प्रभु रामने कहा, है हनुमान ।अव विलम्ब नकरो। तुम क्षीरसागर चले जाजो गौर वहाँ पर एकअगम द्रोणपवेत है, उसे उठा लाभो । १०७ उसी ओौषधि के हारा इससेना को बचाओ ओौर एसा करके दसो दिशाओं मे अपनी कीति फैलाओ ।श्रीराम की एेसी आज्ञा सुनकर हनुमान तुरन्त ही जाकर द्रौणप्कव॑त उठालाये ओौर उस ओौषधि को चिलाकर धराशायी वीरो को वचाया। १०८

भानुभक्त-रामायण

९१९
|जब त वखति पार्द होश भो वानरे ता)तव त भडई्‌ खुसालू नाच्च लाम्या सवं ता ।१०९।)लाग्यो वानर-सैन्य गजेन यसे वीच्मा र राव्‌ तहां ।,लाग्यो भन्न मलाद्‌ मानं बलवान्‌ यो शतु आयो यह ॥जाऊ लौ अत्तिकाय वीरहरु तहां खुप्लड्न कम्मर्‌ कस्या ।मार्या तिमिलाइ निश्चय न्ग याहीं घरेम वस्या।। ११०॥हुकुम यो अतिकाय वीरहृरुले सून्या र॒कस्मर्‌ केसी ।पौँच्या वानर सन्य माननं हतियार्‌ छोड्या अगाडी पंसी ॥वानर्ले पनि वृक्ष पवेत्त॒मुटी दाहा नैवे गरी।रावण्का वलको विनाश्‌ गरिदिया ताहां गाडी सरी।॥१११।कति ।मानं भो रधुनाथले कति तहां सूग्रीवजीचेअद्धद्‌ श्री हनुमान लक्ष्मण इनं वीर्ले गिराया कत्ति॥श्रीरामूको करणा कटाक्ष हुन गै वानर्‌ वलीया भया।राक्षसूमा करुणा भयेन र तहां रक्षस्‌ मरीगे ग्या ११२॥
सर्वेश्वर्‌ स्वंरूपी प्रभुकन `यसरी लडन पो क्यान पर्थ्यो।वाकूवाण्‌एकृषछछोडि दींदा पनि तति रिपृको नाश उसेले त मर्थ्यो ॥^^.
एसा करने से हनुमान का यश सम्पूणं लोक में व्याप्त हौ गया।
फिर
से जाकर हनूमान उस द्रोणपवंत को वहीं पर स्ख आये |! ओषधि

खाकर

जव उन वान्योकौ चेतना आयी, तोवे सव प्रसन्तताके वशीभूत हौनाचने लगे । १०९ इसी वीच वानरसेना की गजना हुई । इस गजनाको सुनकर रावणने कटा किमृज्ञेमारनेके लिए णक्तिशाली शतु यहां
अयेदहैँ।
है विशाल शरीर वलि वीरो} कमर कस कर शत्रु सेलने

के लिए जाओ भौर यदि वहन

जाकरघर

सवक निश्चयही मार डालंगा । ११०

परदहीवैठे रहेतोर्मँ तुम

रावण की विशालसेना ने

आज्ञा पाते ही कमर कञ्च कर वानरसेनाको नष्ट करनेके लिए अगेवद्‌ कर प्रहार किया। वानस्सेनाने भी रावण की विशाल सेना पर
पवत, गदा, मुष्टिक, एव नाखृनों से प्रहार किया।ने रावण कौ शक्ति को नष्टप्राय कर डाला । १११
ने स्वयं मारा ओौरक्ितनों कोसूप्रीवने मारा।

उनके इस प्रहार

कितनों को रधूनाथ

अंगद, हनुमान शौर

लक्ष्मण जसे वीरोने न जाने कितने को समाप्त कर डला!

श्रीराम

की छपा से समस्त वानर्‌ बलवान हो गये ओर राक्षसौ पर कोई कृपानहीं की; अतः अनेक राक्षस मारे गये । ११२ सवके ईश्वर प्रभ राम

नेपाली-दहिन्दी

२१३
मायाले सच्चिदात्मा नर भद्‌ नरका युद्ध लीलादि गछन्‌ ।जन्‌ लीलाले त पापी अधम पत्तितको पाप सन्ताप हृन्‌ ॥ ११३
रावण॒ल्े अतिकाय वीरहरुको फौज्‌ मारिएको जसे ।सून्यो दुःखि भएर पूणं रसने घुप्‌ लड्न आंव्यो तसै ॥सुन्दर्‌ एक्‌ रथमा चढयो र हतियार्‌ शस्त्रास्त्र फर्‌ सब्‌ लियो ।लङ्का

रक्षण

गनं इन्द्रजितले

केही फौज्‌ पनि साथमा लिड गयो

भन्न्याहुकूमूयोदियो।।११४॥

श्रीरासजी

छन्‌
जहां ।

रोक्या वानर सैन्यले र रिसले

माभ्यो अनेक्‌ वीर्‌ तहाँ॥
सुग्रीवादि बड़ा वडा जतिथियाजीतीसवनु .भयेन सन्‌कन जित्यो
वीर्‌ वीर्‌ तिनैले पनि।साय्यो जसीन्‌मा गनि।। ११५।।

देख्यो विभीषणजिलाईइई

आयो
गदा ' लियाका ।
श्रीरामका चरणमा दृढ मन्‌ दियाका॥सन्‌ मुख्य शतु. त॒ यही छ भनेर ठान्यो ।साहं रिसाईइकन शक्ति. उठादइ हान्यो ॥११६॥शक्ति तहां विभीषणजिको प्राण्‌ खंचन्या सुर्‌ गरी।

लक्ष्मण्ले तहि क्षद्‌ ` बचाउनु भयो

आफ्‌

अगाड़ी

सरी॥
के साथ युद्ध करनेकीक्या पड़ीथी।

एकही वाकृप्रहार सेतो वे

शतरृओं को वहीँ नष्ट कर सकते थे 1 मायामोह से रहित सच्चिदानन्द,मानव-जन्म लेकर, मानव हीकी भांति लीला करते रहै, जिस लीला केदारय अनेक पापियों, अधम लोगों ओर पतितोंके पाप ओौर संताप का
हरण होता है। ११३रावणनेजेसे ही यह सुना कि उसकी विशालसेना मार डाली गयी दहै, तो उसे बहुत दुःख हुआ ओौर करुद्ध होकर वह्‌ स्वयं
ही.युद्ध करनेके लिए तत्पर हो गया। तत्पश्चात्‌ एक सुन्दर रथ परसवार हा, ओर शस्त्रास्त्र सब कुष लेकर आदेश दिया कि इन्द्रजीत अबलंकाकी रक्लाकरेगा । ११४. कष्ठ फौज लेकर श्रीराम जर्हांये वहीं
जा परहुचा।
वानरसेनाने उसे रोककर अनेक वीरोंको मार डाला।
सुग्रीव आदि बड़े-बड़े जितने भी वीर थे उनको कोई भी नहीं जीत सका;बल्कि रावणके वीरोकोही जमीन पर भिरा-गिराकर मार डाला । ११५श्रीराम के चरणो मे ध्यान करता हुआ ओौर हाथों में . गदा लिए विभीषणको देख कर सोचा कि असली . शतु तो यही है, ओर क्रोधित होकर उसीपर अपनी शक्तिसे प्रहार किया-। ११६शक्ति विभीषणके प्राणों कोसमाप्त करनेके उह्यसे सारी थी, लेकिन लक्ष्मणने आगे बढ़कर उन्है
२१४

भासूभक्त-रामायण

गयो
लक्ष्मणूजि मूर्छा पच्या।
उठाउनाकनलक्ष्मणलादइतहंकहाँसक्थ्यो रावणले उठाउनबखतमाउठाउन्यालक्ष्मणलाइ
दौडेर रावण्‌ गयो।आश्चयं मन्दो भयो॥देख्या उस्यो रिस्‌ पनि।

शक्ती

चक्ष्मणलाइ्‌

बचन
मूर्छा पर्नुं कहाँ धियो प्रभुजिले चेष्टा नरको गय्या | ११७॥
यै बीच्मा हनुमान्‌ गया नजिकमा रावण्‌ गिराऊं भनी।॥।११८॥हान्या बच्र समान्‌ कठोर

मुव्नि

बज्य्यो मुठी त्यो जसं ।
रावण्‌ हो बलवान्‌ तथापि रगते छाद्दै भगिन्यो पो तसै ॥लक्षम्‌ श्रीहनुमानदेखि खृशि भे सादं हलूका भया।लक्ष्मण्‌ लाइ उठाई जलि्दि हनुमान्‌ राम्‌चन्द्रजीधथ्ये गया।। ११९॥
लक्षम्‌ नारायणे हृन्‌ भनि बुक्ि डर भ शक्तिले छाडिदीयो |सवण्‌ मूर्छा पर्याको पनि उरि उ बखत्‌ फेर्‌ धनुर्बाण लीयो ॥सीतानाथ्‌ श्रीजगन्नाथ्‌ प्रभु पनि हनुमान्‌. वीरका पीठमाहां।चद्नूभो लड्न सनुसूब्‌ गरिकन चिनु भो फेर्‌ धनुर्बागताहां ॥१२०॥टङ्कार्‌ खुप्‌ धनुको गरी हुकुम भो उम्केर जालास्‌ कहां ।तेरा बन्धु निभाई यो रणमर्हां मष्ट तलाई यहाँबचा लिया।
शक्ति लक्ष्मणके जाकर लगने से, वे मूछतिहो गये।
लक्ष्मण कामूरछिति होनाथा किश्रीराम मनुष्य कौ ही भांति प्रयत्नकरते रहे । ११७लक्ष्मण कौ उठानेके लिए रावण दौडकर वर्हगया, लेकिन रावण कहां उठा सकता था । यहु देखकर भाश्चयं हुआ ।लक्ष्मण को उठाते देख (हनूमान को) क्रोध आया।इसी वीच हूनूमान
रावेणको मार गिरानेके उदेष्यसे उसके नजदीकनजा पहुवे) ११८उन्होने आकर

व्र के समान

दृढमूदी से रावण पर एसा

प्रहार

किया कि रावण इतना बलिष्ठहोते हुए भी रक्त वमन करते हुए उसीक्षण गिरपड़ा। लक्ष्मणने हनुमानसे प्रसन्न होकर अपने कोभारोंसेविमूक्त अनुभव किथा।तत्काल ही हनुमान लक्ष्मण को उठाकरश्रीरामके पासले गये! ११९ लक्ष्मणको नारायण जानकर शक्तिनेमूछिति मात्र करके छोड़ दिया

से उठकर अपना

उसी समय रावणने

धनुष-बाण संभाला }''

भी मूर्छीवस्था

सीतापत्ति श्रीजगच्नाथ प्रभुने

भी वीर हनुमान की पीठ पर सवार होकर युद्ध करने की इच्छा सेधनुष-बाण संभाल लिया। १२०धनुष-बाण को ठीक करते हुए आज्ञादी, “वचकर करां जाओगेतुम्हारे सभी बन्धुं को समाप्तं कर

नेपाली-हिन्दी

२१५
रावणूले इवचन्‌ सुन्यो र विजवाप्‌ भे रिस्‌ मनमा लियौ।हान्यो ` श्रीहनुमानलाईइईशरले घाऊ लगाई दियो।। १२१॥घाऊश्रीहूनुमानकांशरिरमा देख्न्‌ भयेथ्यो जसं ।साहं रिस्‌ उठि कालरुद्र सरिका ठकुर्‌ हृन्‌ भो तसै ॥घोडा रथ्‌ ध्वज सूत शस्त धनु सन्‌ छतेपताके पनि।काटी राबणलाइ्‌ हान्नु पनि भो मूर्खा परोस्‌ योधनी।। १२२॥काटी रावणलाईइ हान्त पनि भो मूर्छा तुरन्तं पम्यो।हातैमा धनु थास्न शक्ति नहुंदा हात्देखि भमा ज्ञग्या ॥यै बीच्मा. शिरका किरीट शरले काटी खसाली दिया।रावण्‌का सब सेखि सान्‌ प्रभुजिले खे चेर ताहीं लिया।।१२३।।पनि।बाधा रावणलाद्‌ खुप्‌ सित भयो बीदा प्रभूलेएेले जा घरमाभनी दिनुभयो भोली लडौँला भनी॥सेखी सान्‌ रतिभर्‌ तहां नरहंदा रावण्‌ मच्या स्च भयो।लाज्‌ मानीकन लड्न शक्ति नहुँदा फकंर घर्मा गयो ।। १२४॥लक्ष्मण्‌ मू्ति न्च भया र रघुनाथ्‌ शोक्‌ गनं लाग्या हरि।जस्तो मानिस गणं सोहि रितका चेष्टा अनेकौ गरी॥तुमको भी इसी रणभूमि मेंमार डालुंगा।रावणने इन बातों कीसुना तो अत्यन्त कोधित हुआ ओर करद्धावस्थामे ही हनुमान को सरसे टक्कर लगाकर आहत किया। १२१ जंसेही ध्रीरामने हनुमान केशरीर मे लगी चोट देखी, वैसे ही अत्यन्त क्रोधित होकर उन्होने कालरूप
के समान देवताकारूप धारण कर लिया, ओर घोड़ा, रथ, ध्वज, सूत,स्त्र धनुष तथां पताकां को काटकर अंत में रावण पर भी प्रहारकिया, जिससे वह मृति हो जये । १२२ च्योही श्रीरामका बाणलगावैसेही रावण मूत होकर गिरपड़ा।

श्क्तिक्षीण हौजाने के

कारण धनुष हाशसे भूमि परगिरपडा। इसी बीच उन्होने रावणकेसिर कामूकूट भींकाट करः गिरादिया ओौर उसके सारे अभिमान कोखीचं लिया । १२३ रावणको भी अत्यन्त बाधा हूर्ई्‌। प्रभुभी विदाहोते हुए वोदे कि अभी घर जाओ, कल फिर युद्ध करेगे! अभिमानइस तरह टूट जाने पर रावण मृत के समान हयौ गया जओौर शक्ति न
होने के कारण.लज्जित होकर वापस लंका लौट गया] १२४
के मूषित होने पर प्रभृजी शोक करने लगे)!

लक्ष्मण

ओर जिस प्रकार मनुप्य

प्रयत्न करते हँ उसी प्रकार प्रभु-भी चेष्टाकरने लगे।

लक्ष्मण कौ

२१६

धानुभक्त-रामायण

लक्ष्मण लाइ वचाउ फेरि हनुमान्‌ ।

ली आड

ओषध्‌ भनी।
हकम्‌ यो रघुनाथको तहि हदा दौउयाहनूमान्‌ पनि।। १२५॥ओषध्‌ लीन गवा जसंत हनुमान्‌ चालू पाइ रावण्‌ पनि।रातीमा उठि कालनेमि सित गौ क्यं विघ्न पारू भनीराजा रावणलाद राति विचमा देख्यो अकस्मात्‌ जसे ।सन्मान्‌ खुप्‌ गरि ताहि हाजिर र्यो त्यो कालनेमी तसं १२६॥मैले क्या गरं कीन आउतु भयो यो राति एक्लं यर्हा।यो विन्ती सुनि कालनेमि सित सव्‌ विस्तार वतायो तरह ॥यस्तो भो सुन कालनेमि अहिन लक्ष्मण्‌ गिन्याका यिया।तिन्‌लाई पनि फेर बचाउन टृलो राम्चन्द्रले सुर्‌ लिया) १२७ओषध्‌ लीन भनेर आज हनुमान्‌ द्रोणाचचेमागयो ।ओषध्‌ ल्याउन विघ्न पार तिमिते लौ जाउ वेला भयो॥भुलाऊगई।मायाले मृति वेष्‌ धरेर हनुमान्‌- लाईसक्न्या छौ तिमिल भूलाउन टुलो गी सरीका भरई।।१२८॥यस्तो रावणे हुकृम्‌ जव दियो लौ विघ्न गर जा भनी।राम्‌ ईश्वर वुक्चि कालनेमि विरले वये विन्ति पाल्यो पनि ॥वचाओ
हनुमान ¡{ शीघ्रही ओौषधि ले जायो!

रधुनाथ की इस

सान्नाको भूनकर हनुमान भी दौड पड़। १२५ गौपधिलानेके लिएहनूमान का चले जाना जसे ही रावण को नत्ति हुभा उसी क्षण रावण कोईविघ्न डालने के उह्यसे राच्तिकोही उठकर कालनेमि के पास गयां)साचि मे अचानक राजा रावण को जैसे ही देखा कालनेमिने व्हाउपस्थित रहकर अतिथि-सत्कार किया । १२६

मै क्या सेवा कर सकता

हं? इतनी राचि गये अकेले केसे पधारते की कृपा करी ? यह्‌ विनतीसुनकर रावणने कालनेमिसे सारा विस्तार कहं सुनाया।रावणनेकहा पेस्ला हभ है, सुनो कालनेमि ! अभी लक्ष्मण मृषितिहो कर गिराहै ओर उसे वचानेकेै लिए श्रीरामने एक वडा उपाय किया दहै! १२७आज हनूमान ओौषधि लानेके लिए द्रौणाचल को गयाहै। ओषधिलनेमें तुम विघ्न उत्पन्नकर दो। समयहौ गया है ओर तुम अभीजाओ।मायारूपी मुनि काभेष धरकर हनूमान को भुलावा, दोएक महान्‌ योगी वनकर तुम अवश्य ही उसको भृलावा दे सकोगे । १२८जंसेही रावणने विघ्न उत्पन्न करते की आजादी कालनेमिने भीश्रीराम को ईष्वर जानकर रावण से विनतीकी कि हे अधिराज मै आपके

नेपाली-हिन्दी

२१७
येती हित्‌ बुञ्चि बिन्ति ग्ट अधिराज्‌! हीतं भन्यो यो भनी ।मेरो -बिन्ति सथघाइ वक्सनु हवस्‌ होला टुलो हित्‌ पनि।। १२९॥ज्यान्को आश पनि कत्ति छेन अधिराज्‌ दीन्यैष्े यो ज्यान्‌ पनि ।जीतीन्या तर छेन जान इत हुन्‌ यौधै भुवन्‌का धनी |भाई

बन्धु मराईइ

पो
क्या सोख एक्लो भई ।
ईश्वर हुन्‌ पर रामका शरणमासीता सुम्पिदिहाल राज्य पनि यो
एेले तुरन्त गई ।१३०॥देऊ विभीषण्‌ गर्न ।

खृशी भँकन

बचिक्न

रघुनाथ्‌

तिञ्रा विपत्ती हरन्‌ ॥

जाऊ लौ वनमा र लेड

मनमा

आत्म

मायाले

जगतमा यस्तं छ तिनूको गति।। १२३१॥

आजदेखि

भुलाउंछिन्‌

आत्मा चिच्च अवश्य पं सहाराज्‌आत्मा चिन्न समथं होड नसक्याकौस्तुभ्‌ हार किरीट केयुर अनेक्‌

विचार्को मति)

एकाग्र भं ध्यात्‌ गरी।राम्‌ भनज्नु एक्‌मन्‌ गरी ॥भुषण्‌ शरीरमा धरी।
आप्ना यै हृदयारविन्द बिचमा राखेर खुप ध्यान्‌ गरी।।१२२॥सीतारामूकन भनज्तुपषछं अधिराज्‌ ! राम्‌ हुन्‌ जगत्‌का पति ।ईश्वर्‌ जानि अष्य छोड तिमिले यस्तो विरोधूको मत्ति॥हितके लिएही यह कहता हूं। मेरी विनतीको स्वीकार करने कीकपा करे, बड़ाही हितहोगा। १२९प्राण की तो मृक्षे तनिक भीचिता नहींहै अधिराज! येप्राणभीदे दूंगा, तब भी आप जीत नहींपयेगे। स्वयंही सौोचिएकिवे तो चौदह भृवनकेस्वामीरहैं। भाईबन्धुओं को मरवाकर राजाके बचे रहनेमें क्यासुखदहै।! राम ईश्वरही है, अतः तुरन्त रामकी शरणमे जाये ! १३० आजहीसीताको
भीसौपदें ओरराजभीसे रघुनाथ आपकी

विभीषणको

देदे।

तत्पश्चात्‌ प्रसश्चचित्त

विपत्ति का हरण करेगे।

वनम जाकर मन में

आत्मतत्व का चिन्तन करें । उनकी गति हीरेसीदहै कि इस संसारमेंमाया द्वारा भुलाया जाता है। १३१एकाग्रचित्त से ध्यान करकेआत्मा को अवश्य पहचानना पडता है ।

ओौर यदि पह्चानने मे असमं

हो, तो एक मनसे रामका भजन करें। कौस्तुभ, हार, मुकूट ओरकेमूर, अनेक प्रकारके आभ्रुषणोंसे युक्तं राम को अपने इसी हृदयअरविन्द में ग्रहण करध्यान करे! १३२सीता तथा रामको तोअवश्यही

भजना चाहिए

श्रीरामतो जगत्‌ के स्वामी हँ।

उनको

ईश्वर समज्ञकर इस विरोधूणं मति को अवश्यही त्यागदं।

इतनी

२१८

भानुभक्त-रामायण

येती बिन्ति गरेर चृप्‌ भडइरह्यो

त्यो

कालनेमी

तहां ।
अमृतूतुल्य वचन्‌ सून्यो तपनि त्यौ लिन्थ्यो अधमूले कहा। १२३३॥रावणूले त रिसाईद तेस्कन तहां सन्‌ मारन मनूसुब्‌ गम्यो ।मान्ये मन्‌ बुञ्चि कालनेमि विरले फर्‌ विन्ति ताहां गन्यो ॥यस्तो क्यान रिसानि हुन्छ अधिरान्‌। पले तहां मै गई।सरकारको सब काम बन्दछठ भन्या जान्षू तयारी भई।। १३४॥।येती बिन्ति गरेर तेहि विचमा उठेर दौडयो पनि)लाग्यो गनं उपाय फेरि हनुमान्‌ फिनैन्‌ नपाउन्‌ भनी ॥रस्तामा गइ एक्‌ तपोवन असल्‌ तेस्ले तयारी गरो ।मायाले फलका र॒ फल्‌ सहितिका वृक्षादि ले वन्‌ भव्यो १३५॥आप्‌ मुनीश्वर बनी ।तेसे ` आश्रममा वस्यो म हनुमान्‌- लाई छलुंला भनी ॥तेस्का शिष्य अनेक्‌ धिया वरिपरी ताहीं हनूमान्‌ गया ।क्या देयां अधि आश्चमै पनि व्हा थीयेन भन्दा भया।।१३६॥कस्को आश्रम हो बदली जल पिरई जालां म॒ जल्दी भनी।बुञ्नै खातिर तेहि आश्रम विषे पौच्या हनूमान्‌ पनि ॥एक्‌ आश्रम्‌ पनि कल्पना तहि गन्यो
लेकिन वहु अधम रावणक्रोधित होकरदन अमृत तुल्य वातोंको क्यों मानने लगा। १३३अपने मारे जने केरावण ने उसे मार डालने की सोची।निष्वय को जानकर कालनेमि ने फिरसे विनती की, हे अधिराज ।
विनती करके कालनेमि शान्त हौ गया।
आप वृधा क्रोधिते क्यों होते हँ।

यदिमेरे व्हा जाने से आपका

काम वनता है, तो मै अवश्य ही जागा । १२३४इतना कहकरउसी समय वहु उठकर चला गया।वह एेसा उपाय करने लगा
कि हनूमान पनः लौट ही न सकं। रास्ते मे उसने एक उत्तमतपोवन की स्वनाकी जो मायारूपी फूल तथा फलों के वृक्षोसे भरगया । १३५
मूनीश्वर.बन कर वहाँ पर उसने एक आश्चम की कल्पना
कीओौर उसी अश्वममें हनुमानसे छल करनेके उहेष्यसे बैठ गया।उसमे चारों ओर अनेक शिष्य वेठे थे। हनुमान वर्ह गये ओर कटायह्‌ मैं क्या देख रहा हुं? पहले तो यहाँ पर कोई उपवन नहीं था । १३६आश्म किसका है,, यहु पता लगानेके लिए तथा जल पीने के लिएहनूमान उस आश्रमम पहुंचे)योगीके रूपमे कालनेमि शिव का

पूजन करके

हनूमान के कायं में वाधा

डालने का उपाय सौचने

नेपाली-हिन्दी

२१९

योगी भं भद्‌ कालनेमि शिवको

पूजा विधानूले गरी ।कन्‌ रीत्‌ले हनुमनलाइ स्गला भरन्या इरादा धरी। १३७थीयो आश्रममा र दशन गकं सन्न्या इरादा धव्या ।योगेश्वर्‌ बुक्चि भक्ति रावि हनुमान्‌ ज्यूले नमस्कार्‌ गत्या ॥द्‌ तहूं श्रीरघूनाथको म हनुमान्‌ भन्छन्‌ मलाई पनिओषध्‌ -ल्याउन जो हुकृम्‌ प्रभुजिको ह्‌ंदाम आयां भनी।। १३८॥सब्‌. वृत्तान्त गन्या र जलूपिउनको इच्छा बहते थियो ।खोज्या जल्‌ हनुमानले र खुशिभें तेस्ले तहां जल्‌ दियो ॥आऊ फल्‌ फुल खाउ पीठ हनुमान्‌ ठ्ण्डा छयो जल्‌ पनि।सादं हत्पत गर्न छेन तिमिल कले म जालां भनी।। १३९॥योगी हूं सब जाम्द््‌ म अहिले रामूले नजर्‌ खृप्‌ गरी ।लक्ष्मणलादइ बचाइ बक्सनु भयो सम्पूणं बाधा हरी ॥नानर्‌ को पनि फौज्‌ खडा सब भयो येती भनेथ्यो जसे ।तिर्खा मेटिइन्या नदेखि जलले नोत्या हनुमान्‌ तसं।। १४०॥तिर्खा ज्यादि छ जल्‌ कमी छ यत्तिले मेट्तेन तिर्ख पनि ।धेर जल्‌ छ करां बताउनु हवस्‌ वाहां म॒ खालां भनी ॥सून्यो श्रीहनुमानका र इ वचन्‌ क्वे एक्‌ तलाऊ थियो ।त्यो देखाउनलादइएक अगवा शिष्य पठाई दियो। १४१।
लगा)
१३७

आश्रम के अन्दर दशन

करनेके

विचारसरे जाकर ओर

कालनेमि को मूनी समन्न कर हनुमानने उसे प्रणाम किया।
वे बोलेमै श्रीरघुनाथ का दूत हूं, मक्षे हनुमान कहते हैँ । प्रभुजी द्वारा ओषधिलनेकी आज्ञा पाकरमै यहाँंञायाहं। १३८सब वृतान्त घुनाकर,पिपासा-शान्ति के लिए हनुमान ने जल मागा, ओर उसनेभी प्रस
होकर जलदे दिया।

आओ हनुमान, फल फूल आदि खाकर ण्डा

पानी पियो । उसने पुनः कहा कि तुम्हु लौटतेके लिए शीघ्रता करनेकी आवश्यकता नहीं हे । १३९भैयोगी हं ओौर सव कुछ जानता हँअभी श्रीरामने कृपादृष्टि करके सब बाधाओंकोदूर करके लक्ष्मण कोबचानेकी कृपाकी।वानरोकी फ़ौजमभी पुनः खड़ी हो गथी है।जसे ही यह बात कही वैसे ही, प्यासन बुक्षते देख कर, हनुमानबोले ! १४०प्यास अधिक लगी ओौर जल इतनाक्म हैकि प्यासबज्ञेगी भी नहीं । अधिक जल करहांहै मै वहीं जाकर पी लूंगा; बतानेकीकृपाकरे। हनुमान की बात सुनकर' एक शिष्य को अगवा बनाकर
२२०

मानुभक्त-रामायण

यहाँ।आऊएेले जाउ र जल्‌ पियेर हनुमान्‌ फकरकेही मन््र म दिन्छत्यो सुनि गया मिटन्या छ ओौषध्‌ तरह ॥सून्या श्रीहनुमानले र इ वचन्‌ वेस्‌ हो हवस्‌ लौ भनी।पौच्या जल्दि तलाउमा र हनुमान्‌ वीर्‌ले पिया जलूपनि। १४२॥मकरी
क्वे एक्‌ बस्याकी यिरई।

स्वर्गेमा म त अप्सरा अधि धिर्यां

नाम्‌ धान्यमाली धियो।
ताह

तेहि

तलाउ-भिव्र

निलुंला भन्या ठुलो सूर्‌ लिई॥श्रीहुनुमानलाइदखेचीच्यापू च्यात्ि पषछठारि ताहि मकरी- लाई निभाया जसे।स्तीको सुन्दर रूप्‌ बन्यो र विनती त्यो गनं लागी तसै।। १४३॥
बराह्मणका त सरापले मकरिको सू्प्‌ यो वनारईदिया॥तेस लूप्‌कन मारि वक्सनु हुंदा आपत्ति मेरा गरई।जान्ह्‌ स्वगेविषे म॒ फेरि हनुमान्‌ जस्ताकितस्ती भई।। १४४अर्को बिन्ति म गष अति सरिको त्यो हये हजूरको खुनी।जस्लाई मनि भन्नु हुन्छ हनुमान्‌ !
थीयो कहाँ त्यो मूनि॥

ओषध्‌ लीन

लौ विघ्न गर्‌ जा भनी।

गयेषठ आज

हनुमान्‌

रावण्ले उपदेश्‌ दियो र बलवान्‌ त्यो कालनेमी पनि।। १४५॥~~~
जर्हा पर एक तालाव था, उसे दिखाने के लिए भेज दिया । १४१ अभीजाो हनुमान ! ओर जल पीकर यहीं लौट आना।भँ तुम्हें कुषरहस्य वताञगा।उसे सुनकर जाने से ओषधि मिलेगी । हनुमान नेइन वचनो को सुना ओौर तालाव मे पहुंच कर शीघ्र ही जल पिया १५२उसी तालावमे एक भगरमच्छिनी रहती थी।हनुमान को निगलजानेके इरादेसे उसने उन्हे खींच लिया।तत्काल ज्योंही जवडा
फाड़कर उस घड़यालिनि को पष्ठाड़ कर मार डाला त्योंही एक सुन्दरस्तीका रूपधारण कर विनती करती हुई बोली । १४३ मैँस्वगंकीअप्सरा थी!मेरानाम धान्यमाली था।ज्राह्मणके श्रपसे मैमगरमच्छ बन गयी।उसीलूप कोनष्ट कर देने से मेरी विपत्तिसमाप्त होगयी है। हे हनुमान! भमैँजंसी कीतैसी ही होकर पनःस्वगंको जाती हूं । १४८४ एक विनतीकरती हूंकि वह्‌ आपका वधकरने वाला है, जिसे जप मुनि समक्षतेहँ। हनुमान ! वहु मुनि करांहै? आज हनुमान ओषधि
लेने गये,

सा जानकर

रावण ने उस

बलिष्ठ कालनेमि को विघ्न उत्पन्न करनेके लिए यहां आनेकी आज्ञादी1 १४५

तभी उसने विषघ्न उत्पन्न करनेके

लिए एक चाल

यहं
विघ्नं गनं भनेरतेस्लाई तहि मार

नैपाली-हिन्दी

२२१
आइ महिलेओषधि पनी
व्या चाल तेस्ले गन्यो।ली जाउ बेला पञ्यो॥
यो वबिन्ती गरि इन्द्रका हजुरमा त्यो धान्यमाली गडईं।आश्रमूमा हनुमान्‌ फिञ्या उहि बखत्‌ केही नान्या भई।। १४६॥
नजिकंदेष्योश्रीहनुमानलादमेरो काम्‌ अब सिद्ध गदे भनी
आई पुग्याको जसे ।त्यो बोट्न लाग्यो तसै।
एले दिन्छ म सिद्ध मन्त हनुमान्‌ !देऊ लो गुरू-दध्षिणा पनि टुलाछलूछामूका इ वचन्‌ सुन्या र हनुमान्‌हान्या मुडकि उठाई तेहि बिचमा
यो मन्त लेऊ पनि।मेरागरुरू हौ भनी।। १४७वीरको उठो रीस्‌ पनि !लौ दक्षिणा ले भनी

जस्तो राक्षसको स्वरूप्‌ अधि थियो

सोही स्वरूपूको भयो।। १४८॥।

पायो चोद्‌ तहि मुडकिको र मुनिवेष्‌

तेस्को

तुरन्त

गयो।

माया

राक्षसको

अनेक्‌ तरहका

त्यो गनं लाग्यो जसं ।

येती

कर्म॑

गरेर

जल्दि हनुमान्‌

द्रौणाचलैमा

हान्या मृडकि उठाद फेरि शिरमा

ताहीं मन्यो त्यो तसे ॥
गया ।
पर्वेत्‌ बोकि तुरन्त फकि सहजं दाचिल्‌ प्रभूथ्ये भया।। १४९॥खूशी खुप्‌ रघुनाथ्‌ तहां हुचभयो ओषध्‌ सुषेण्‌ले गव्या ।बाधा लक्ष्मणमा सबै जति थिया त्ये ओपधिले हत्या ॥
चली कि उसे वहीं मारकर ओषधि लेकरचला जाये। इनद्रजी कीसेवा मे वह्‌ धान्यमाली भी गयी ओर उसी समय आश्रमे श्रीहनुमानभी अनजान बनकर अये । १४६हनुमान को निकट आते देख करउसने सोचते हुए कि अब म अपना कायं सिद्ध करता हं, कहने लगा--
ष्टे हनुमान 1 अभी मँ तुमको एक सिद्धमत देता हूं इस मंत कोस्वीकार करो त्तथा मुज्ञ अपना गुरु जानकर दक्षिणा दो! १४७

उसके

मुख से इस प्रकारके कपट के वचन सुनकर हनुमान अस्यन्तं क्रोधितहए । तुरन्तही मदी बाँध कर उस पर प्रहार करते हुए कहा-लोदक्षिणा । प्रहार होतेही उसकामूनि कारूप भंगहोगया। तत्कालही वह राक्षस-रूप बन गया । १४८जब वहु राक्षस अनेक प्रकारतेछ्ल करने लगातो कद्ध हनुमानने फिरसे उस पर अपनी मुष्ठिसे
सिर पर प्रहारक्िया, एेसा करने से वह्‌ राक्षस तुरन्त ही मृत्यु कोप्राप्त हुआ । इस कायं को समाप्त करके हनुमान तुरन्त ही दोणाचल कीशरण मे गये ओर
(उस)

पवेत कौ उठाकर

श्रीरघूनाथ के समक्न आ उपस्थित हुए । १४९

बड़ी ही सरलता

से

यह्‌ सव देख कर

भानुभक्त-रामायणं

१२२
रावण्माथि दगा धरेर सहजे लक्ष्मण्‌ उढ्याथ्या जसे ।वाच्या भाद्‌ दया गव्यौ र हनुमान्‌! भन्त्या हुकूम्‌ भो तसे॥ १५०संग्रामूको सतलव्‌ गरेर प्रभुजी सामूने हुनूभो तहां।वानरको पनि फौज्‌ सवै अधि सन्यो ऊ श्चन्‌ रहन्थ्यो कहां ॥जस्ते सपं भिराखंछन्‌ मरुडले सोही तमासा गरी।रावण्लाद गिरादइ बक्सनु हदा गीरेर पूर्छा परी॥१५१॥उठी

दुःख

बहत
पाड

मनने

हारी

गयाको

धथियो।
शरीरामचद्द्रजिको प्रचण्ड वल त्यो बून्ली लहड्‌ खृप्‌ लियो ॥वेस्‌ सिहासनमा वसी सकल वीर्‌ राखी सभा खृप्‌ गरी।लाग्यो भ्म. मर्हहेर विरहो! रामुकाञजगाडी परी १५२॥राम्‌ नारायण हुन्‌ अवश्य बुक्चियो चौधै भुवनूका धनी ।मानिसूको अवतार्‌ लिया प्रभृजिले मान्‌ मलाई पनि ॥मानिसुदेखि त॒ मर्तृपषं मदले ब्रह्माजिको वर्‌ छयो।मानिस्‌ भै रघृनाथ्‌ सन्या अधि भल्या काल्‌ दानं सदल्याछ को।। १५३॥राजा वीर्‌ अनरण्य सूयं कलमा क्वे एके महात्मा थियो,

पैले व्यथं विरोध ग्यां रउ बखत्‌

तिनूले सराप्‌पोदिया॥
रघुनाथ अत्यन्त प्रसन्न हुए ओौर ओषधि लेकर लक्ष्मण का उपचारकरने लगे।
लक्ष्मणके शरीर में जितनी पीड़ा थी, समस्त पीडा उसी
यौषधिसे शन्त हुदै। रावणसे प्रतिशोध लेने की भावना के उत्पन्नहोते ही लक्ष्मण उठ खड़ा हुआ)भाई को तुरन्त ही स्वस्थ हा,देखते ही श्रीरघुनाथ ने प्रसन्न होते हुए हनुमान को धन्यवाददिया । १५०संग्राम करनेके विचारसे श्रीरघुनाथ सामने आये तथासमस्त वानरसेना भौ वरहा उपस्थित हो गयी)जिस प्रकार गरुडनेसपेको

भिरानेके लिए तमाशा

किया था, उसी प्रकार रघुनाथ ने

रावणकोभी भिराकर मूछिति कर दिया। १५१बडे कष्टकै साथ(वह्‌) उठ कर मन-ही-मन अपनी हार पर पश्चाताप करने लगा।अतः श्रीरामचन्द्र को प्रचण्ड शक्ति को रावण समञ्न गया। तत्पश्चात्‌समस्त वीरो को बुलाकर एक सभा कीओौर कहने लगा, वीरो! भँराम के आगे जाकर ही मृघ्यु को प्राप्त होगा । १५२श्रीरामनारायण ह तथा चौदह भुवनो के सालिक है-यह बात रावण की समञ्चमेआ गयी।मञ्चे मारनेके लिएही रामे मनुष्य का अवतारलिया है। मनुष्यके हाथोंदही सृज्ञे मरना है-यही वरन्रह्याने दिया

नेपाली-हिन्दी

२२३
लिनन्‌ ।मेया वंशमहं अवश्य अवतार्‌ नारायणैलेमारि सहजं . तंलाईइ सारी दिनन्‌।। १५४॥।तेरो राक्षसवंशदीया येति सराप्‌ र तेस्‌ बखतमा राजा विती पो गया।सोही पूणं गराउनाकन ` यहां श्रीराम्‌ तयारी भया॥आया श्रीरघूनाथ्‌ मलाई अहिले मानं इरादाधरी।माछठैन्‌ निश्चय आज मुं सहजं राम्काअगाडी परी।। १५५।॥।भाई मूखं छ कुम्भकणे अज्ञतक्‌ यस्तो पन्यो तापनि।सुतेको छ ` उठाइ ल्याउ अहिले चांडो हृकूम्‌ भो भनी ॥हकम्‌ पाइ बडा बड़ा विर गया
पौची जल्दि उठाई क्लट्‌ हजुरमापामा परि कुम्भकर्णं बलवान्‌रावण्‌ ले पनि दीन्‌ वचन्‌ गरि सबैहे भाई! सुन कुम्भकं ! अहिलेछोरा नाति समेत्‌ बडा विरहरूप्राणको अन्त्य हुने बखत्‌ भडइ गयो
राम्‌ शत्रू बलवान्‌ बु्चिन्छ तिमिलौ~~~
~~
~ ~ ~~
~
~
~+ ~~
~~
~
त्यांउठाई भनी]ल्याई पूल्याया पनि।) १५६साम्ने बसेथ्योजसं ।
विस्तार युनायो तसै ॥आपत्‌ मलाई पव्या ।एेल्हे बहुत मच्या॥ १५७॥

वच्न्या उपाये

कहू ।

साहं

.रहू।

चनाखा

~~
है । १५३ ` (रावणने आगे कहा-) सूये-कुल मे एक महात्मा राजाअरण्य थे। उनका विरोध करने पर उन्होने सुज्ञ शापदे दिया थाकि नारायण मेरेवंशमे अवश्यही अवतारलेगे ओर तेरे राक्षस वंश
के साथ तुक्च भी सहज ही समाप्त कर डालेगे । १५४ एसा शाप देकरउस समय उस राजाका प्राणान्तदहो गया।उनका कायं पणं करनेके लिए. श्रीरघुनाथ ने यहाँ अवतार लिया, वे मञ्चे ही समाप्त करनेके लिए अवतरित हुए दहैँ। आज वे निश्चय ही मृन्चे मार डलेगे | १५५रावण कहने लगा कि कूम्भकणें महामूखंदहै, जो इतना सब होने पर

भी अभी तक सो रहादहै, अतः

(प्रहुरियोंको) आज्ञादी।
(उसने) उसेजगा लाने कै जिए

जआज्ञापाते ही बड़े-बड़े सैनिक उसे उठने

के लिए गये ओर लाकर रावेण के सम्मुख उपस्थित किया । १५६जसेही कुम्भकेणें रावेणके पांव में पड़कर सम्मूख बैठा, तभी रावणने दीन वचनोंमे उसे सारा विस्तार कह सुनाया ओौर वोला-देखो भाई
कुम्भक्णं | उस समय मृज्नपर भारी विपत्ति आयीदहै।पुत्रपौत्रसहित अनेक वीर मारेजा चकेहै। १५७अव तो प्राणों के अन्तहोनेकी घड़ीओआ गयीदहै। अव बचने काक्या उपाय किया जाय?
२२४

भानुभक्त-रामायण

गम्भीर्‌ येहि समुद्रमा पनि सहन्‌ साध

लगाई तव्यो।
बानरको सब फौज्‌ समेत्‌ तरि यहाँ धेर वीरको नाश्‌ गव्यो ५८॥बडा।वानर देष्छम वीर्‌ अनेक्‌ तरहका सूरा लडकीहारा लश्करमा अनेक्‌ विर मन्या बानर्‌ सबं छन्‌ खडा॥तिन्को नाश्‌ गरिसक्तु देख्तिनं यहां कौनेउपाये गरी।नाश ॒तिन्को तिभिले गराउ अहिले चाडो अगाडीसरी।।१५९॥
रावणले इ वचन्‌ विलाप सरिका बोली सकेथ्यो जसे।हस्यो चप्‌ सित कूम्भकणे र तहां बिन्ती गन्यो साप्‌ तसे ॥मैले क्यागरं बविन्ति आज अधिराज्‌ पले गव्यार्थ्याँं ` पनि।रामनारायण हुन्‌ सिता प्रभुजिकी हुन्‌ योगमाया भनी।। १६०॥मेरो बिन्ति सधेन उस्‌ बखतमा इन्‌ खुप्‌ रिसानी भयो।तेसेको फल हो अवश्य अधिराज जो वीरको ज्यान्‌ गयो ॥एक्‌ दिन्‌ पवेतका उपर शिखरमा थीयाँं म॒ रात्री महाँ।नारद्जीकन मध्यरात्ति बिचमा देख्यां अकस्मात्‌ त्हा। १६१॥ध्यं आउनुभो हजुर्‌ किन यहां

जानू छ

कहां भनी।

मेरो बिन्ति सूनेर सब्‌ ति ऋषिले

विस्तार्‌ बताया पनि॥
हमारा शत राम काफी बलिष्ठ मालूम देता है, अतः तुम लोग अस्यन्तसतक रहो । इतने गहरे समद्रमेभी वह सेतु ्बाधकर सरलतासे इसपारगया है (जौर उसने) वानर-सेना-सहित (आकर) य्ह के अनेकवीरोंका नाशकियाहै। १५०८ रावण कहरहारहै किम देखरहा हंकि वानरोंमे प्रत्येक शुर, वीर ओर कुशल. योद्धा है; उनको नष्ट करनेका मृञ्ले कोई उपाय नहीं दीखरहारहै। अबतुम ही इन सबका नाशकरो १५९जंसेही रावणने ेसाकहा, वसे ही कुम्भकणं ठटाकेलगाकर हंसा ओर विनती करते हृए बोला, हे अधिराज | आजै क्यानिवेदन करू? मैने तो आपसे पहले ही कहा था कि रामचन्द्र नारायणहँ ओर सीताजी उन्हीं प्रभ की योग-माया हैँ! १६०उस समयआपने मेरी विनती स्वीकार नहींकी ओर मेरे उपर अच्यन्त क्रोधित हुएथे।हे अधिराज ! यह्‌ उसी अस्वीकृति का फल दहै, जिससे अनेकसनिकोंका प्राणन्तदहो गया।एकदिन राच्चिके समयम पवंत्त केशिखर पर था कि अचानक बीच वनम नारदजी दिखायी दिये । १६१मैने नारदजी सेपूछठा थाकि श्रीमन्‌ आप य्ह कैसे .पधार पड़े भौर
इस समय कहां जायेगे ? मेरे विनती करने पर उन्होने सब विस्तारपूर्वक

नेपाली-हिन्दी

२२५

विस्तार्‌ लौ सुन कुम्भकणं ! अहिले

जीतेर सब्‌ लोक्‌ लियौ ।

इन्दरदीहरुलाद

दुःख

तिमिले अत्यन्त साहं दियौ।॥ १६२॥
सब्‌ इन्द्रादि ति विष्णुका हजुरमा - पौँची शरणूमा प्या ।यस्‌ रावण्‌कन मारिदेड भगवन्‌ भन्त्या त बिन्ती गस्या॥ब्रह्याको वरदान्‌ छ मर्तुं तदहंले मानीसदेखीभनी ।मानिस्‌ भैकन मारि बक्सनु हवस्‌ मर्न्याछठ रावण्‌ पनि।। १६३॥येती बिन्ति गरेर देवगण सब्‌ पाऊ पय्याथ्या जसँ।सोही रीत्सित मारंला भनि हुकूम्‌ श्रीविष्णुको भो तसै ।सोही बात्‌ परिपूणं गने रधृूनाथ्‌ एेले तयारी भया।मान्येछन्‌ तिमीलाईइ निश्चय भनी उटठेर नारद्‌ मया।।१९४॥।`तस्मात्‌ अवश्य रघुनाथूकन देव जानी ।ई वैरि हुन्‌ भनि यहाँ रति भर्‌ नमानी ॥यो वैरभाव तिमिले अब छाडिदेञ।भक्ती गरीकन भजन्‌ गरि आज लेऊ ॥१६१५॥।भक्ती मुख्य छ सवे साधनमहां भक्ती छ सब ज्ञान्‌ दिन्या।भक्तीले सब मूक्त हृन्छं दुनियां हो नित्य जानी लिन्या॥भक्ती -हीन्‌ भई कमं गदे भन्या यो निष्फले हौ भनी।जानी

श्रीरघुनाथका

चरणमा

भक्ती लगाऊपनि।।१६६॥
बताया ओर कहने लगे-हे कूम्भकणं | तुमने इन्द्रादि देवो कोअधिकाधिक कष्टदियादहै। १६२वे सब विष्णु भगवान के पास गयेओर विनती करनेलगे किडइस रावणका वधकरने कौकपा करें|उसे मनुष्यके हाथों मरना है-यही ब्रह्याका वरदान दहै। अतः भाप
मानव-रूप धारण करके उसका वध करने की कृपा करे । १६३

जैसेही

देवगणो ने इस प्रकार विनती की, वैसेही विष्णु देवताने कहाकि मै उसेमार उलूंगा। वही कायं पूुराकरते केलिएरघुनाथतैयारहुएहैः वैतुम्हे निश्चय ही मार डालेगे-इतना वता कर नारद उठ खड हए । १६४
अतः ठे अधिराज ! रघुनाथ को देव जानकर इस आपसी वैरभाव कोसमाप्त कर दे तथा भक्तिपूवेक भंजन (राम-नाम-जप) आदि करे । १६५इन सभी साधनों मे भक्ति ही महानद, भक्तिही ज्ञानको वड़ातीहै।भक्ति के अभावमें व्यक्तिजो भी कायं करता है, उसे निष्फल जानकर आप
श्रीरघुनाथ कौ भक्तिमें लीन होने की कृपा करे | १६६९

श्रीरघुनाथनजी

२२६

चानुभक्त-रमायण

हज्जारन्‌ अवतार छन्‌ प्रभूजिकाअर्को छेन भजन्‌ गव्यो पनि भन्याजालादुःख कते नपाद्‌ सहजं

सोही

ठम्‌

पुगिजान्छ

पणेरूपले

रामावतारलेसरी।जस्का भजनूले गरी ।तरी ।संसार-सागर्‌
जहां रहन्छन्‌ ह॒रि।। १६७॥जो रामचन्द्रतिर रात्‌ दिन चित्त धछेत्‌ |रामकं चरि पठि ख॒प्‌ सित मग्न पठेन्‌ ॥तिन्‌का ति कमंवशका सब पाप छंट्छन्‌ |बेकुण्ठका सकल सौख्य तिनं त लुटछन्‌ ॥१६८।।

सून्यो विन्ति र कुम्भकणे विरको

साहं रिसायो पनि।लाग्यो भन्तं तलाद्‌ डाकिनं यहां जलान्‌ सन्न देलास्‌ भनी ॥जस्तो भन्छम सोहि मन्नु भन्या गर्‌ युद्ध सामने सरी।सुत्नाको मतलब्‌ छ पो पनि भ्या जा सुत्‌ पलङमा परी।1६९॥रावणूका इ वचन्‌ सुनैर अहिले साहं रिसाया भनी।क्वे उत्तर नगरी उठीकन गयो खृप्‌ लड्न आंट्यो पनि ॥पर्ल नाधि गयो र लड्नकन सुर्‌ बाँधी करायो जसं।कालेतुल्य बुन्षेर वानरहुरू साधं उराया तसे।। १७०॥वीर्‌ वीर्‌ वानरलाईइ पकरि युखमा हाल्दं र तिल्दं गयो!वासर लागीकन पवेत उडि तहां आई गया ज्ञ. भयो॥के हजारो अवतार हृएरहै, उनमें श्रीरामके बराबर कोई अन्य नहींहै । उनका भजन किया जाना चाहिए, जिससे कि मनुष्य समस्तसंसार-सागर तर जायेगा तथा उसी स्थान का आनन्द प्राप्त कर सकेगा,
जर्हा प्रभ विराजमान हैँ । १६७ जो मनुष्य श्रीराम की ओर अपनी भक्ति ,लगाये रखते हँ ओर राम के चरित्र को पठते रहते ह, उनके पापस्वयंही
नष्ट हयौ जाते है!

अतःवे ही स्वगं का आनन्द प्राप्त कर पाते

है 1 १६८ दस प्रकार कुस्भकणें को एेसी विनती सुनकर रावण अत्यन्तकरोधित हुमा ओर कटने लगा यर्हां तुम्हे ज्ञान का उपदेश देनेके लिए
नहीं बुलाया ग्याहै)अतः जो मँ कहता हूं, व्ह तुम्हे मानना हीपड़गा 1 तुम राम के सामने जाकर युद्ध करो मौर यदि सोने की इच्छाहै तो जाकर पलंग परलेट सक्तेहो। १९९ रावणके इन शब्दों कोसुनकर वह (कूम्भकणं) समञ्च गया कि यह अत्यन्त क्रोधित है, `वहु उठकर खडा हो गया ओौर युद्ध के लिए चल प्डा। वहु दीवार लाव कर :'जसेही लड्नेके लिए गगरा, वसेही वानर-सेना (उसे साक्षात्‌) काल `समञ्च करर भयभीत हौ गयी । १७०युदध-स्यल मे अये हृष वीर.
(अ
+~

नेपाली-हिन्दी

२२७

सक्थ्या कुन्‌ अधि टिक्न तेस्‌ बखतमा

तेस्का

अगाडी

परी।

वानरको सब फौज्‌ तहां हटिगयो

साह सकसूमा परी। १७१॥
दाज्य्‌ भनी तहि विभीषण भेट्न आया ।पा परीकन बहूत्‌ गरि बिन्ति लाया॥कान्छो विभीषण म हूं करुणा म पाञं।लद्कामर्हां सकन बस्न मलेन ठाडं।॥१७२॥सीता नराख घरमा तिमि सुम्पिदेऊ।राम्‌चनद्रलाइ्‌परमेष्वरजानिलेऊ ॥
विन्ती गव्यां यति र लात्‌ पनि मारिलीया।निक्लेर जा भनि मलाई निकालिदीया ।१७३॥
चार्‌ मन्ति साथ लिड्‌ निक्लिम याहि आयां ।श्रीरामका शरणमा परि बिन्ति ला्याँ॥
ठ्लो दथा गरिलिया प्रभुले मलाई ।आज्काल्‌ खृशी छु रघुनाथ्‌ सित वस्त पाई ॥ १७४॥विन्ती

विभीषणजिको

जब
सूनिलीया।
भाई चिन्हीकन खुशी भइ काख लीया॥।~~~ ~~
वानरो को (उसने अपने) मूख मे रखकर निगलना आरम्भ केर दिया ।उसी समय एक पवेत उड़कर वहाँ आया, फिर भला उस विशाल पव॑तके सामने कौन व्यक्ति टिक सकताथा | सभी वानर संकटमे पड़ गयेओर भय के कारण वर्हासे दूर भाग गये । १७१ विभीषण अपने भाईरावणसे भेंट करने वहम आया तथा रपव पकड कर विनती करने लगा
भे आपका भाई विभीषणहूं]मृन्ञे लकाम रहने की कोई जगहनही मिली, अततः सुज्ञ पर कृपा करें ! १७२ विभीषणने रावणस जैसेही यह कहा कि आप सीता को अपने महलमें न रखें तथा श्रीरामको परमेष्वर जानकर सीताको उन्हे सौपदे, वैसेही रावणने उसेलात मारते हुए, महल से निकल जाने की आज्ञादी) १७३ रावण केद्वारा निकाल देने पर विभीषण श्रीराम की शरणमे गये तथा चार मंचनियों
को (अपने) साथ (भी) ले लिया।साथही यह विनती भी कीकिञआजम श्रीरघुनाथके चरणौ मे रहकर अत्यन्त प्रसघ्न हं, क्योकिप्रभूते मेरे ऊपर महानङ्पा की! १७४ विभीषणकी रेसी विनतीसुनकर श्रीरघुनाथ ने विभीषण को अपनी गौोदमें वैठा लिया ओौरआशीर्वाद दिया-भाई)} तुम चिरंजीव रहो आर श्रीराम को देव
२२८

भानुभक्त-रामार्यंण

भाई ! चिरल्जिवि रह्या तिमि देव जानी ।राम्‌चन्द्रको गर भजन्‌ अति हषं मानी ॥ १७१५॥
खुप्‌ भक्त छौ वुक्षिलिर्यां तिमि भाद्लाई ।भन्थ्या चिन्हैर अधि नारदले मलाई ॥साँच्चं भयो ति ऋषिले जति हौ भन्याको ।
प्रत्यक्ष देख्छु तिमि भक्त बडा बन्याको | १७६भाई विभीषण! परे रह जट्दि जाऊ।संग्रामकाबखतमानजिकं नञऊ ॥यस्ता वचन्‌ सुनि बिदा भई फकि आया।थामी नसकेनु भई आंघु पनी सखाया ॥ १७७]वीदा भै जव ता विभीषण फिञ्या यो फौज्‌ भिराॐंभनी।लाग्यो घुम्न र कुम्भकणे विरले धेर्‌ फौज्‌ गिरायो पनि।बानर्‌को सव फौजलाइ बलले थिच्तं र मिच्त गयो ।
कुन्‌ सक्थ्यो अधि टिक्न तेस्‌बखतमा खुप्‌ ध्वस्त गर्दो भयो॥। १७८॥मुद्गर हत लियेर येहि रितले त्यो घुम्न लाग्यो जसै।फौञ्को नाश्‌ वहते गव्यो र रघुनाथ्‌ साधं रिसाया तसं ॥वायव्यास्त्र उठाइ मृद्गर समेत हातं खसाल्छ्‌ भनी।हान्या

श्रीरघुनाथले

र सहजे

~~ ^~~+“

काटी खसाल्या पनि।। १७९

~~~ ~~~ ~
जानकर हषित मनसे (उनका) भजन करो । १७५ पहले ही किसीसमय मूर नारदजी नै वताया थाकि तुम मेरे बड़े भक्त हो।उन्होने जो कुछ भी वताया,

वह्‌ सव कुष सत्य निकला । अतः मै तुम्हें

एक महान भक्तके रूपमे प्रत्यक्ष देख रहा हूं । १७६ भाई विभीषण |दूर ही रहो, युद्ध के समय सामने मतञाओ।से वचनोंको सुनकरविभीपण लौट पड़े (उस समय) उनकी ्जखोंमे जो आम्‌ मचल रहथे भौर वाहुर निकल पडना-चाहूतै थे, उन्हं वे रोक न सके । १७७विभीपण वहसे विदा लेकर लौट पडे! वीर कुम्भकणे सेनाको मारगिरानेमे लीन था ओर अनेक (वानर-) सैनिकोंको धराशायी भी करदिया।वहु बानरों के अनेक संनिकों को अपनी शक्ति से रौदतारहा। १७८हाथों मे गदा लेकर जव उसने (वानर-) सेना कोक्षति पहुंचायी तो रघुनाथ अत्यन्त ही क्रोधित हुए 1

गदा-सहित हाथो

को गिरानेके लिए वायव्यास्वर से श्रीरघुनाथ ने प्रहार किया ओौरवड़ो ही सरलता से (उसके हाथोंको) काटकर भिरा दिया) १७९

नेपाली-हिन्दी

२२९
गीभ्यो हात्‌ जब कूम्भकणं विरको मृद्गर्‌ सहित्‌को तहां ।ट्लो शब्द गरेर फेरि रिसले धाया प्रभू छन्‌ जहां ॥
साल्को वृक्ष उखेलि हान्न भनि त्यो आयो नजीक्मा जसे ।तेही हात्‌ पनि काटिवक्सनुभयो वानर्‌ भया खुश्‌ तसे।। १८०॥।हातं भिच्या जब दुवे तब घृष्‌ करायो।साहं रिसाईइ रघुनाथृत्िर दौडि आयो ॥फोर्‌ अधंचन्द्र सरिका दइ वाण लीया।गोडे पनी सहज कारि खसालिदीया ।१८१॥हात्‌ पाउ केहि नहुंदा अति दुःख पायो ।मूख बाई राम्कन निलूं भनि घसति आयो ॥राम्‌चन्द्रले पनि मृखेभरि वाण हान्या।त्यो देखि फौजहरुले . अति हषं मान्या ॥१८२॥ये रीत्‌ गरेर अधिबाट थला बसाया।फर्‌ हानि इन्द्रशरले शिर ने खसाया॥
ढोका थुन्यो शहरको शिरले त तार्हाँ।
फेर उफरि गेकन पय्यो र समुद्रमाहाँ ॥१८३२॥जन कूम्भकणे का (एक) हाथ गदा-सदहित (कटकर) नीचे गिर षडातो श्रीरघुनाथ भयंकर गजेना के साथ वहां गये। (परन्तु दुसरे हाथसे एक) विशाल वृक्ष को उखाडकर जव वह पूनः प्रहार करने के लिएअगेबढातो

वह्‌ हाथ

(भी)

श्रीरघुनाथने फिरसे

(बाण मारकर)
नीचे गिरा दिये। एसा होते देखकर वानर-सेना अत्यन्त खुश हुई“ १८०जव उसके दोनो हाथ कट कर गिर गये तब व्ह पीडित होकरचिल्लाने लगा तथा अत्यन्त करोधित हकर वहं रघुनाथ की भोर दौड़ा ।फिर (रामचन्द्र ने) अधं-चन्द्रके समानदो बाण चलाकर उसके पावभी काटकर गिरा दिये । १८१ (जब उसके) हाथ-पाँव सभी समाप्तहो गये तो (वह्‌) मुख खोलकर
हुआ आगे आया।
किया।
(उन्हं) निगलने के लिए चिसकता
श्रीरामने भी निरन्तर बाणोंसे (उस पर) प्रहार

यहु दृश्य देखकर

(वानर-) सेना में अत्यधिक

हषं फल

गया । १०८२इसप्रकार श्रीरामने प्रारम्भसे लेकर अन्त तक उसेधराशायी किया । बाद में (रामचन्द्रने) इन्द्रशरके प्रहारने उसका
सिरभी काट गिराया, जिससे उसका समस्त चेतन (होश) समाप्तहौ गया।

उसके पश्चात्‌ जेसेषही (शेषधड के बल)

उछला, वसे ही वह्‌ समुद्र मे (जाकर) गिर पड़ा । १८३

वह्‌ (अचानक)

(श्रीरवुनाथ
२३०

भनुभक्त-रामायण

ग्रहादि जन्तु भिचि नाश बहते गरायो।इन्द्रादि देवगणको पनि ताप्‌ हरायो॥खृप्‌ पुष्पवृष्टि रधुनाथ-उपर्‌ खसाया ।राम्लाईइ भेटन भनि नारद ताहि आया ।१८४।।नारद्ले स्तुत्ति चप्‌ यव्या प्रभुजिको नारायणे हुन्‌ भनी ।भोलीदेखि हन्या कुरा जति थिया सो सब्‌ वताया पनि॥हे नाथ्‌ ! वीर्‌ यहि कुम्भकणं विरहौ यो ता सहज्‌मा गयो।

खूपै वीर्‌ अब इन्द्रजित्‌ छ उसको

लौ भोचि वेला भयो।॥।१५८॥।

भोली

मदं इन्द्रजित्‌ पनि यहं

लक्ष्मण्‌जिका हात्‌ परा।
अफे मारतृहुन्याछठ रावण भन्यादेख्न्ये छन्‌ मूनि देव सिद्धगणले
पर्सी लडाईगरां॥त्यो सब्‌ तमाशा भनी ।

तारद्‌

त्यो ब्रह्मलोक्मापनि।।१८६॥

ताहि बिदा भर्ईकन गया

रावणूले पनि कुम्भकणं त॒ मन्यो भन््या सुनेथ्यो जसै।सां दुःख परी विलाप्‌ पनिगरी मूर्छा पन्यो खुप्‌ तसं ॥रावणूलाइवबुज्ञाउनाकन अधी त्यो इन्द्रजित्‌ वीर्‌ सव्यो ।जल्दी बिन्ति गव्यो खडंषुम छंद कुन्‌ ताप्‌ हजूर्मा परयो।॥। १८७॥ने) ग्राह आदि जल-जन्तुभं का भी दमन कर कितनो (ही अनाचारियों)को नष्ट किया।इन्द्रादि देवगणों के अन्दरजो ताप था, वहु शीतलतामें वदल गया ओर उन्होने श्रीरघुनाथ के ऊपर पुष्पों की वृष्टि करकेउनका स्वागतक्िया।इस अवसरपर नारदजीभी रामचन्धजी से

मिलने आये

१८४

नारदजी ने प्रभुजी के समक्ष दोनों हाथोंको

जोड़कर स्तुत्ति की ओरञगेजो कछ बातें घटने वाली थीं, उन सवकीसूचनादी।हेनाथ | यही (वह) वीर कुम्भकणं था, जो परलोकसिधार गया । इसके बाद (लंका) कावीर इन्द्रजीत है, जिसको कलही सामना करके समाप्त करना होगा} १८५नारदजीने वतायाकि कल यही इन्द्रजीत लक्ष्मणके हाथों माय जायेगा तथा परसो के युद्धमे आपस्व्यंही रावणका वध करेगे ओर यह्‌ सारा तमाशा मुनिगणतथा सिद्ध लोग देखेगे-एेसा कहु कर नारद जी व्हाँंसरे विदा हो

गये | १८६

रावणके कानोंमे जैसे ही कुस्भकणें की मृत्यु की खवर
पड़ी, वहु विलाप करता हा मूषित होकर भगिरपड़ा।रावण कोसान्त्वना देते हृए वीर इन्द्रजीत भागे बढ़ा ओर कहने लगा--अभी मैं
जापके साप्रने जीवित खड़ा हं । मेरे होते हए आपके उपर कौन-सा संकट

नेपाली-हिन्दी

२३१
शतको भय आज क्ति नरहौस्‌ ई. श्तु मै मारेला।सब्‌ शतूहर मारि ताप्‌ हजुरको चडि सहज्‌ टारुला ॥होम्‌ गर्‌ म निकुम्भिलास्थल महां एेलेतुरुन्ते गई।होम्‌ सस्पणं ग्या सलाद

अहिले

अग्नी प्रसन्ने भई।।१८८॥
दीन्याछन्‌ हतियार्‌ तिने लिडइ गई संग्रामगुजसंकुन्‌ साम्ने भद दिक्छ तेस्‌ बखतमा सनब्‌ ध्वस्त हृन्छन्‌ तसं ॥येतीः विन्ति गव्यो रहौम्‌ गरुंभनी उठेर जल्दी गयो)भक्ती राखि निकुम्भिलास्थल मर्ह दहोम्‌गनं लाग्दो भयो।। १८९॥सून्या त्यो समचार्‌

विभीषणजिले

सो विस्तार्‌ रधुनाथकाएेले है
रधुनाथ |!
होम्‌ गनं लाग्यो भनी।

हजुरमा

गे विन्ति पा्या पनि॥

इन््रजितले

होम्‌ गनं लाग्यो भनी।
सूर्यां यो सुनि बिन्ति गर्नु अहिले आयां हज्‌रमा पनि।।१९०॥होस्को विघ्न त गनुं पछं अधिराज्‌ | होम्‌ सिद्ध पाञ्यो भन्या।राक्षस्‌ृगण्‌ जितिसक्नु छेन अहिले ई सब्‌ अजेय वन्या |]लक्ष्मण्लाइमलाईबक्सनुहवस्‌ हकम्‌ म॒ जान्छ्‌ तहां।माछन्‌ लक्ष्मणले अवश्य

अहिले

~
व्यो बांँच्न सक्ला करहं।। १९१।।
आ पड़ा । १८७(इन्द्रजीत ने आगे कहा-) अप शवृओं से बिल्कुलभी भयभीत मत होये । मै समस्त शतुओं का नाश करके आपके तापकोहर लगा!वह्‌ हवन करनेके लिए कुम्भिला नामकं स्थल परचला गया, हवन के सम्पूणं होने पर अगति देवता प्रसच्नहौ गये! १८हवन करने से पहले इन्द्रजीत ने सोचा, अग्निदेव प्रसन्न होकर मृक्ञे हथियार
प्रदान करेगे ओर जिस समय म संग्राम करूंगा सबको ध्वस्त कर उालंगा;कोई नहीं टिकर सकेगा मेरे सामने) एेसा सौचकर (वह) तुरन्त हवन
करने के लिए चल पडा । १८९हवन करने की बात जैसे हीविभीषण ने सुनी, वैसेही श्री रघुनाथ के पास जाकर (उसने) विनतीकी हि रधुनाथ ! इन्द्रजीत हवन कर रहे है, यही कहने के लिए मैं यहाँ

उपस्थित हआ हूं । १९०

(विभीषणने आगे कहा-) हे अधिराज ।
इस हवन मे. तो विघ्न उत्पन्न करनाहीहोगा।

यदि यहु हवन सिद्ध

हो गया तो राक्षसगणो को पराजित कर सकना असम्भवे होगा तथावे सव विजथीहो जायेगे।! लक्ष्मणकोमेरे साथभेजदें।यै उनके
साथ जाकर उस हवन को भंग कर दुगा! अत्तः मुञ्चे आक्लादे; मैं वहांजाञगा .ओौर लक्ष्मण तो उसे निश्चयही मार डालेंगे} १५१उसकी
२३२

भानुभक्त-रामायण

येती चिन्ति सुनी हृकूम्‌ हुन गयौ जन्षट म॒ मा्‌ भनी ॥फरी विन्ति विभीषणे सरि गव्या यस्तोषछयो वीर्‌ भनी।खदि क्ति नखाइ क्ति नसुती रात्‌ दिन्‌ नियम्‌ खुप्‌ गरी।जस्को वते छठ वाह वषं उ पुरुष्‌ तेराभगाडीसरी।।१९२॥
तेरो प्राण लिच्याछ यो छ वरदान्‌मारीसक्नुकदापि छेन अहिले
हनालेअगडी
यस्तोकही
गरी।सरी॥
रात्‌ दिन्‌ क्ति खाई कत्ति नसुती तेस्तो रद्याको वर्ह ।लक्ष्मण्‌ छन्‌ अब लौ हुकूम्‌ दिनुहवस्‌ तेस्लाइ मारून तहा ।। १९३।।ईए्वर्‌ तिमी हौ रध॒नाध्‌ इ भाई)लक्ष्मण्‌ त देष हुन्‌ केरुणा जनाई॥भूभारहर्नाकनजन्मलीयौ |यो रूप्‌ भजन्‌ गनं वनाइदीयौ । १९४1सांचो विन्ति गव्यौ म जान्दष्ु सवै थो वीर्‌ छ यस्तो भनी।
हिददेदेखि नखाइ क्ति नसुतीजानीजाति म चृप्‌ र्यां किन भन्या
लक्ष्मण्‌ रह्याको पनि॥लाग्न्येषछठ यो काम्‌ भनी ।
उत्तर येति तहं विभीषणजिकासाम्ने हकम्‌ भो पनि।।१९५॥एसी विनती सुनकर श्रीरघुनाथ ने कहा कि मे स्वयं उसे मारने के लिएजाता हूं! पनः विभीषण (ने रामकरा) मागं रोककर कहा किलक्ष्मण एेसा महान वीरटहै कि जिसने विना खाये-पिये-सोये निरन्तर
बारह वषं तक त्रत कियाद) १९२इन्द्रजीत लक्ष्मणके हाथोंमाराजयेगा-एेसा वरदान है । इस कारण अब कोई भी (अन्य व्यक्ति)
अग्रसर होकर उसे नहीं मार सकता!दिन-रात न सोकर विनाखाये-पिये, सचेत होकर रहने वाले (वह्‌) लक्ष्मण (ही) है (जो उसमार सकते है) अत. अव उन्है (लक्ष्मणं को) इन्द्रजीत का वध करने

की आज्ञादे। १९३

हे रघूनाथ { अआपरईश्वररटै।

ये आपके भाई

है अत्‌ लक्ष्मण तो (जापकेही) देप भाग (अंश) है। भौरभू-भार हरनेके लिएही (आप दोनोंने मानवलू्प मे मृत्यु लोके)जन्म लियादहै ओर इस ख्पका

निर्माण भजन

करनेके लिए (ही)

कियागयादहै। १९४मँ यह जानतां कि इनसव वीरोंके वारे मेंजो कुछ भी कहा गया दै वहु सव सत्य कहा गयादहै1 चलते समय भीविना खाये ओौर विनासोये ही लक्ष्मणरहेर्हः लेकिनफिर भीर चपही रहा, क्योकि मँ जानत्ताथा किकिसौन किसी समय यह्‌ भी काम

अयेगा। १९५

भौर उसी भणे लक्ष्मणको

(राम की) आज्ञा हई

तेपाली-हिन्दी

.
२३३

लक्ष्मणलाई पनी हुकूम्‌ तहि भयो

भाई !

तयारी

भया।

केही फौज्‌ पनि साथमा लिइ तहँ

रएेले

तुरुन्तं

गया ॥
चाड प्राण्‌ लिइहाल इन्द्रजितको जान्छन्‌ विभीषण्‌ पनि।सबको दछिद्र॒ बताउनन्‌ बखतमा यस्तो छ याहा भनी ॥ १९६॥हकम्‌ यो रघुनाथको सुति धन्‌ लौईतयारीभया।राम्‌का पाड .समाइ लक्ष्मण तहां क्ये बोत्न लागी गया ॥मेरा बाण्‌ अव इन्द्रजीत विरको प्राणलाइईं जल्दीहरी।पाताल्‌ भोगवतीमहां पुगि तहां निर्मल हुन्‌ स्तान्‌ गरी।। १९७॥येती चिन्तिगरी धमी वरिपरी लक्ष्मण्‌ चरणूमा पव्या ।नीदा भे रघुनाथका हुकूमले साइत्‌तुरुन्तं ग्या |केही फौज्‌ लिइ जाम्बवान्‌ र हनुमान्‌ अद्घद्‌ इ साथ्मा गया।पच्या जल्द र इन्द्रजीत विरका फौज्‌लाद्‌ देख्ता भया।। १९८॥हकम्‌ सिरोपर धरीकन जल्दि पौँची।लक्ष्मण्‌ अधी जब सव्या धनुलाई खंची |लश्कर॒हरू पनि अगाडि सरेर धाया ।कालो
ताह विभीषण अगी सरि बिन्ति लाया ।१९९॥मण्डल देखिइन्छ अधिजो त्यो फोज हो वीरको ।

ट्क्‌ टुक्‌ पारि भिराइबक्सनु हवस्‌

सब्‌

वीरका

शीरको॥
कि है भाई) कुषसेना साथ लेकर, तुरन्त जाकर, तुम इन्द्रजीत कानाश करो।तुम्हारे पीले विभीषण भीजायेगा।(इन सबका)रहस्योद्घाटन यथा समय होगा । १९६श्रीरघुनाथ की सी आज्ञासुनते ही लक्ष्मण धनुषलेकर तेयारहो गयेतथा श्रीरामके चरणोंमेंपड़्कर वू विनती कर बोले किमेरा बाण अब वीर इन्द्रजीत काप्राणान्त करके पातालभोगवती मे जाकरनिमंल जल मे स्नानकरेगा! १९७चारों ओर परिक्रमा करके लक्ष्मण श्रीरामके चरणोंमे पड़े; फिर विदा लेकर रघुनाथ की आज्ञानुसार तुरन्त महतं निकाला ।
फौज के साथ जामवन्त, हनुमान, भंगद आदि भी गये (ओौर) वहाँपहुंचकर वीर इन्द्रजीत की फौज को निहारने लगे । १९८ आज्ञा पाकरलक्ष्मण शीघ्रही वहां पहुंचे ओर तुरन्त जब धनुष-बाण खींच आगे बेतो विभीषणे चिनतीकी। १९९हे लक्ष्मण! अगेजो काला दलदीख रहा है वह्‌ सब इस पफ़ोजके वीरैइनके सिरो के टकङड-टकडेकर डालिए ओर

इनको धराशायी करतेकी

कृपाकरं!

यदि अप

भानुभक्त-रामायण

रद
एेले जल्द नहानिवक्सनु भया होम्‌ सिद्ध गर्न्याछ यो।छयो ।२००॥होम्को सिद्ध गन्यौ भन्या हुंदि कसे जीती नसकनतेस्‌ फौज्‌लाई गिराइवक्सनुभया त्यो इन्द्रजित्‌ वीर्‌ पनि।होम्‌ छोडीकन चड्न आञंछ यहाँ त्यो फौज्‌ गिरायो भनी ।येही ' युक्ति तहां विभीषणजिले विन्ती गन्याध्या जसं ।लक्ष्मणूले पनि सैन्यमाथि शरको वर्षा गराया तसे ॥२०१॥वानरले पनि बुक्ष पवेत शिला फौोजूमाथि फेक्या जसे ।राक्षस्‌को पनि फौज्‌ अघी सरिसरी खुप्‌ लड्न लाग्यो तसै ॥लक्ष्मणुले शरले अनेक्‌ तरहले मान्यो र नाश्यो भनी ।सादु क्रोध गरेर इन्द्रजित वीर्‌ होम्‌ छोडि आयो अनि।।२०२॥पक्का वेस्‌ रथमा चदी धनु लिद्‌ साम्नेअगाडीसरी।लाग्यो लक्ष्मणलाई भन्न अवरहैर्‌ मेराअगाडीपरी।ओं टिस्‌ मरनं भन्या रताहि नजिके थीया विभीषण्‌ पति।तिन्लाई पनि खृप्‌ भन्यो तँ कुलको शत्रू धम्‌ होस्‌ भनी ।२०३।येती भन्यो र रिसले रथमा वस्याको।सवूलाइ जित्न भनि कम्मर खुप्‌ कस्याको ॥इसी समय शीघ्रतासे प्रहार नहीं करेगेतो वह्‌ हुवन सिद्ध करलेगाओर यदि हवन सिद्ध होगयातो फिर इस पर विजय पाना असम्भवह्ये जायेगा । २०० उससेना कोयदि आपधराशायी कर देतो वीरइन्द्रजीत अपनी सेनाको धराशायी होते जानकर, हवन को त्याग देगा
मौर युद्ध करने के लिए पहुंच जायेगा । विभीषण की रेसी युक्तिपूणेविनती लक्ष्मणने सुनी गौर उसी समय विपक्षी सेनाओं पर वाण-वर्षाआरम्भ
कर

दी।२०१

शिलाभों

से उन

सेनाओं

जसे ही

पर

प्रहार

वानरो ने वृक्ष तथा

किया,
अगे बढी ओर उसने युद्ध आरम्भ कर दिया।

राक्षसी सेना

पव॑त

भी

इन्द्रजीत को जसे

ही लक्ष्मण द्वारा चलाये गए वाणो तथा अनेक प्रकार से सेनिकों
के मारे जाने की सुचना सिली, वह्‌ अत्यधिक क्रोधित होकर हुवनको त्याग कर लड़ने के लिये आ पहुंचा । २०२वह्‌ एक उत्तमर्थ पर सवार तथाहाथ मे धनुष लियेहृए अग्रसर हुजा भौर लक्ष्मणसे कहने लगा, अरे मेरे सम्मुख आकर अपनी मृत्यु को क्यों आमंतितकरने लगेहो।वहीं निकटसे विभीषण भीञा गया अतः उसेभीतुम कुल के अधम शतु हौ" आदि कह कर कटु-वचनों से प्रहार करतेलगा 1 २०३

इतना कहकर क्रोधित मनसे वहु रथ पर सवार हो

नेपाली-हिन्दी

२३५
केही नटेरि अरु वानरलाइईदहैला।साद्व गराइकन भन्छ परे इ फेला ॥२०४।।वाण्‌ हानि प्राण सबको म हरेर लिन्छु।
तिस्रो शरीर्‌ प्रथिविमा म गिरादइ्दिन्छ॥यस्ता वचन्‌ सुनि ति लक्ष्मणजी रिसाया।
- हान्या र वाण्‌ तहि तुरन्त थला बसाया ।२०५॥मूर्छा पत्यो दइ घरी र जुरूक्क उठ्यो।लाल्‌ लाल्‌ नजर्‌ गरि रिसाईइ अगाडि छूटयो ।मेरो पराक्रमरती नबुज्ञेर पेले।हानिस्‌ पराक्रम तं लौ बुक्चिले न एेले ॥२०६॥
येती भन्यो र मनले अति वीर मानी ।लक्ष्मणलिलाईइ तहि सात्‌ शर जल्द हानी ॥दस्‌ वाणले त हनुमान्‌ विरलाइ हान्यो।सन्‌ मुख्य श्तु त विभीषणलाइ्‌ मान्यो ।२०७॥हान्यो फर्‌ सय शर्‌ विभीषण उपर येती गरेथ्यो जसै।हान्या

लक्ष्मणले

कवच्‌

शरिरको

काटीदिया

पो तसै ।॥
गया।सब ओरसे मन हटाकर केवल विजय प्राप्ति हेतु समस्तवानरोंको तिरस्कृत करके वहु कह्ने लगा कि अवये सब अपने पंजेमेआ गथेहैँ। २०४प्राणलेने वाला वाण चला करमै सबको मारडालूंगा तथा उनके .शरीर को धराशायी कर दूंगा)उसके ये वचनं
सुनकर लक्ष्मण जी क्रोधित हृए जौर तुरन्तही बाणसे प्रहार करकेउसे वहीं धराशायी कर दिया | २०५वहदो घड़ी मूचछितिहो कर
पड़ारहा।पूनः चेतन होकर उठा ओौर लाल नेव करके कोध सेआगे बढा भौर कह्ने लगा कि तुमने मेरे पराक्रम को किचित मात्रभी
नहीं समन्ञा ओर पहले ही प्रहार कर दिया।

लेना । २०६

अतः अब

समक्न

इतना कहु कर॒ उसने मनमे अपने को एक बडा वीर
समञ्ल कर लक्ष्मण पर सात बाणोंसे प्रहार किया ओरदस

हनुमान पर फेके। _ विभीषण को

तो उसने

बाण वीर

विशेष शत्र

ही
` समज्ञा । २०७ . पनः सौ बाणो का प्रहार विभीषण पर जैसे ही "उसने
किया लक्ष्मणने अपनेबाणसे उसके शरीरके कवच को काट दिया।अपने शरीरके कवच को कटे हुए देख कर उसनेभी हजार शरो केप्रहार से लक्ष्मण के कवच के दुकड़-टुकडे कर दिए । २०८ लक्ष्मणे
२२३६

भानुभक्त-रामायणं

` हञ्जार्‌ शरकन हानि लक्ष्मणजिका गाथूका कवचूको पनि।टुक्‌ पारेर गिराडं दो तहिं भयो मेरो गिरायो भनी ।२०८॥लक्ष्मण्ले पनि फेरि पाच शरले घोडा र रथ सूत्‌ धनु।उठायोधनु ॥काटी वक्सनुभो उसे बखतमा अर्कोफर्‌ ॒तेस धनुलादइ काटिदिनुभो तीन्‌ वाणले फर्‌ धनु।लीयो लक्ष्मणलाइ्‌ धेर शरले हान्यो छिटो क्या भनू।।२०९॥बाणैले गरि सब्‌ भव्यो दश दिशा वानर्‌ सकस्मा पन्या।लक्ष्मले पनि इन्द्रजीत विरको प्राण्‌ लीन मनृसुब्‌ घन्या |अगाडीसभ्या।जुन्‌ इन्द्रास् थियो उही धनुमहां लाईचिन्तन्‌ श्रीरघूनाथको गरि तहां जल्दी प्रतिज्ञा गव्या।।२१०॥धर्मात्मा यदि सत्य दाशरथि छन्‌ हन्‌ नाथ्‌ जगतृकाधनी ।शरलेभनी॥सच ता अब इन्द्रजित्‌ यहि मरोस्‌ येसंजसै।छोडया बाण र इन्द्रजीत विरको शीरं खसायाइन्द्रादीहर पृष्प वृष्टि खशि भँ खुम्‌ गनं लाग्या तसं।।२११॥।हर्षेले नगरा बज्या पृथिविको जून्‌ भारिहो त्यो गयो।बहते भयो ॥हषले जय शब्दको ध्वनि पनी ताहांलक्ष्मण्‌ लेपनि शद्भुको ध्वनि र खुप्‌ टङ्कार धनूको गत्यावानरले गहुते ग्या स्तुति तहां आनन्दमा सब्‌ पन्या।।२१२॥भी पूनः पाच शरोंसे प्रहार करके उसके घोड़े, रथ, सारथी तथा धनुष
काट दिये ओौर उसने उसी क्षण दूसरा धनुष धारण करलिया।उसधनुषकोभी लक्ष्मणने तीन वाणोंके प्रहारसे पूनः काट दिया। उसनेफिर धनुपधारण किया बौर व्ड़ीदही तीव्रतासे लक्ष्मण को अनेकशरो से पुनः प्रहार किया । २०९ वाणोंके प्रहार से वानर-तसेना दसौंदिशाओं से संकट में धिर गई। लक्ष्मषणने भी वीर इन्द्रजीत केप्राणलेने कीठनली।

जो इन्द्रास्ये उन्हं वह धनुष पर चढाकर

आगे वटे ओर श्रीरघूनाथजी का चिन्तन कर तुरन्त यह प्रतिज्ञा कीकि-- २१०यदि सत्यावादी दशरथ वास्तव मे धर्मात्मा हैँ ओरश्रीरघुनाथ जगतपति देँ तो अब इन्द्रजीत इसी बाणसे यहींपर मरजायेगा । इतना कहकर उन्होने वाण से प्रहार किया ओर वीरइन्द्रजीतके सिर कोजंसे ही गिराया, इन्द्रादि देवगण अत्यन्त प्रसन्नहो कर पुप्प-वर्पा करने लगे। २११ पृथ्वी पर वड़-वड़े नगाड़े वज
उठे गौर जय-जयकार की ध्वनि गूजने लगी।

लक्ष्मणने भी शंख

तेपाली-हिन्दी

-२३७

लक्ष्मण्‌जी सब फौज्‌ लियेर रघुनाथ

ज्युका

हजुर्मा

गया।

खुशी खप्‌ हुनुभो सुनेर रघुनाथ्‌

हुकूम्‌ भयो बेस गग्यौ।
मेरो शतु अवश्य छेन अब वीर्‌यस्‌ रावण्‌कन मार्नलाइ सजिलोएेले युद्ध हुंदा म मष्ट सहजेरावण्‌ वीर्‌ पनि सब्‌ सुन्यो रसमाचारमूछदिखि उठी विलाप्‌ अत्ति गरी
जुन्‌ वीरदहौ सो गयो।यै वीर जादा भयो॥भन््या हुकूम्‌ यो भयो।मूर्छा परी गै गयो ।॥२१४॥फौञज्‌ लडन पत्यो पनि।

हातूमा एक्‌ तरवार्‌ लिएर रसने

सीता म काट

पामा परि दण्वत्‌ गरि तहां सब्‌ बिन्ति ग्य भया॥माच्यौ इन्दजितं त॒ आज
तिमिल सब्‌ शतको मूलु हव्यौ।।२१३॥
भनी॥
दोड्यो व्यो र सुपाश्वे मन्ति नजिकं थीयो अगाडी सन्यो।स्वरी घात्‌ गर्नु अवश्य छेन महाराज्‌! यो जलिदि विन्ती गभ्यो।॥।२१५॥सुपाश्वेकों बन्तिसुन्यो र ताहाँ।फर्कर्योफरक्कंदरबारमाहाँ ।शोक्ले बहूत्‌ मूखं समानभैगो।फोरी सभाणषुभनेरगो ।२१६॥की ध्वनिकी ओर धनुष को बड़ी जोर-जोरसे टंकारा ! आनन्दितहोकर सभी वानरोने भीखृूव स्तुति की । २१२लक्ष्मणनजी समस्तसेनाको लेकर रधघुनाथजी के पास गए ओौर उनके चरणोंमे गिरकर दण्डवत को ओौर सविस्तार सब हाल कह सुनाया)सारा
समाचार जानकर रधुनाथ जी अत्यन्त प्रसन्न हुए 1 उन्ेने प्रशंसाकरते हए कहा कि आज इन्द्रजीत को _मारकर तुमने शतृओं की जड़
नष्ट कर दी । २१३ अवश्यदही अवमेरा कोई शतु नहीं, जो वीरशत्र थावह सो ग्या। इस वीर केचले जनेसे अव रावण कामारना सरल हौ ग्यायुद्ध होने पर मै सरलता से उसे भारडालूंगा।एसा श्रीरघूनाथ ने कहा।उधर रावण ने जब यह्‌समाचार

सुनातो वह मूछ्ति होकर गिर पड़ा। २१४

जव मार्छा से

उठा तो विलाप करने लगा, फिर मन स्थिर करके अधिकाधिक सँनिकों
को लड़ने के लिए भजा । स्वयं हाथमे तलवारले क्रोध मे भरा हृ
ओर यह्‌ कहता हु कि सीता को्मै अभी मार डालंगा दौडा किन्तुमंत्री ने रोकं लिया ओर विनती की कि स्तरीघात करना उचितनहीं । २१५सुपाश्वं को विनती सुनकर वह तत्क्षण दरबार को लौटगया । , शोक में इूवा हमा वह किक्तव्य-विमूढ सा पुनः दरवार -सं
२३८

भानुमक्त-रामार्यणं

सन्‌ मन्विलि संग

बसेर विचार

गर्दा ।
हीते हन्या वह्रियो र अगाडि सर्दा॥जो बाकि राक्षस धिया सव साथ लीयो ।खृप्‌ लड्नलाइ्‌ रधुनाथ्‌ तिर चित्त दीयो । २ १७त्यो अग्तिमा सलह सं जव पनं आयो।सक्थ्यो कर्हाँ अधिक ठक्कर फेरि पायो |धेर्‌ वीर्‌ मन्या हृदयमा पनि वाण लाग्यो ।टिक्ने तहां नसकि जल्दि फिरेर भाग्यो ॥२१८॥सम्श्यो गुरूकन विपत्ति पन्यो र ताहां।चांडे गुरूसित गई शिरपाउमाहां॥
राखी गव्यो विनति दुःख वहूत पायां ।यै दुःखको विनत्ति गनं त आज
आयां ॥२१९॥
हे नाथ्‌ | हूर गुरु भई पनि दुःख पर्न्या।क्या भो मलाई कसरी अव चित्त धर्न्या॥यस्‌ रामले सकल बन्धु र पुत्र माग्यो।सुरा अनेक्‌ विरहरू पनि षछुद्टं पाग्यो ।।२२०॥रावणूको विनती

सून्या र गुरुले

पाए

आपत्‌

भनी,

' गरनृसम्म

भनेर

दीया

गुरूले

पनि॥

गरोस्‌

उपदेश्‌^
सभा करनेके विचारसे प्रविष्ट हुआ । २१९६रावण के हिताथं विचार-विमणं किया।

लेकर आगे वढृकर

सव मंत्ियोने वैठ्कर

शेष वचे हुए राक्षसो को

रघूनाथजी से युद्ध करना ही उत्तम ब्हराया

गया । २१७ रणभूमि में पहुंच कर राक्षसोंकी वही दशा हई जो आगमे कूढने परहौतीदहै। वे अधिक क्या कर सक्तेथे। पुनः पराजितहुए । अनेक वीर मारे गएु। उनके हृदयम वाण लगा। वै टिकन सके ओौर भाग खड़े हुए । २१८विपत्ति पड़ने पर रावण` ने गुरं कास्मरण किया ओौर उनकी शरणमे जाकर चरणो में भिरकर` अत्यधिक शोक ग्रस्त होकर विनती कीकिदुःखके कारणही मँ आनज

आपके पासप्राथेना करने आयाहूं । २१९

हिनाथ ! आप जंसे गुरं

को पाकरभी इतना दुःखपा रहा! अव मेरे चित्ति को केसेशान्ति मिलेगीमूञ्षे आखिरये क्याहौ गया, इस राम ने मेरे सभीवन्धु-बान्धवों को मार डाला ओर मेरे अनेक शुर-वीरोंको वीर गति'देदी। २२० रावणकी दुःख भरी विनती सुनकर गुरने उसे सांत्वना
नेपाली-हिन्दी ,
२३९
हे रावण्‌ ! चुन संतर दिच्छु अबे होम्‌ गन खुप्‌ ध्यान्‌ धरी।होम्‌ सम्पूणं गच्यौ भन्या त हतियार्‌ मित्नन्‌ तिले गरी ॥२१॥.गुरूको , ` जसं ।जित्‌न्याछौ सब वीरलाद्‌ भनि यो आज्ञापाएथ्यो खृशि भै उठी घर गई होम्‌ गनं आद्यो , तसे ॥1.पाताल्‌ तुल्य गुफा खनी तहि बस्यो होम्‌, गनंलाई;ः पनि,।.ढोका बन्द गभ्यो सबै शहरकोलूक्यो रावण येहि रीत्सित्त र खुप
कोही नआउन्‌ .भनी।।२२२।।.
होम्‌ गनं लाग्यो ` तहां ।लूक्यो रावण तापनी तर धर्वा लूृकी रहन्थ्यो कहाँ ।॥।.देख्या तेहि धुवां विभीषणजिले होम्‌ गनं लाग्यो भनी ।पायां भेद्‌ भनि रामका हजुरमा गैबिन्ति पाय्या पनि।।२२३।।;लाग्यो रावण होम गनं महाराज्‌ ! होम्‌ सिद्ध पाग्यो' भन्या।साचो बिन्तिम गदे हजुरमा ई सब्‌ अजेयं बन्या।।हकम्‌ वानरलादबक्सनुहवस्‌ वीर्‌ वीर्‌ अगाडी सरी।'जल्दी गैकन यज्ञ नाश्‌ गरिदिउन्‌ हकम्‌ शिरोपर्‌ धरी।। ररणा `विन्ती येति गन्या विभीषणजिले हकम्‌ प्रभूको ` भयो।अङ्घद वीर्‌ हनुमान्‌ दुव इ खटिया दश्‌ कोटिको फौज्‌ गयो ॥हे.रावण ! सुनो, मँ मंत्र देता ह| ध्यानपुवेक हवन करना । यदि हवनादि सम्पणं ल्पसे करोगे तौ उसकेप्रभाव से तुम्हं शस्त्र प्राप्त होगे । २२१ जसे ही गूर का यहु आशीर्वदिमिला कि सन शत्रृजों पर विजय प्राप्त होगी, वह्‌ अच्यन्त प्रसन्न होकरउठा ओर हवन कीतेयारीमें लग ग्या।पाताल के समान शुफाबनाई 1 नगरके सारे द्वार बन्द कर द्यि जिससे कोई भी अन्दरप्रवेशन कर सके। इस प्रकार पूणं प्रबन्ध करके वह अन्दर: बैठ
के लिए उपदेश दिया ।

गया । २२२

इस प्रकार रावण ध्यान-मश्न हो केर हवन करने केलिये छप कर बेठ गया।परन्तु धुवां कंसे छप सकता धा । उसधूवे को देखकर विभीषणने भेद को जान लिया। उसने राम कीसेवामे जाकर
यह्‌सारा समाचार सविस्तार वर्णन.कर दिया। २२३
महाराज { रावण हवन करनेलगा है। यदि उसने हवन सिद्ध- करलियातो भं सत्य कता हूंकि वह अजेय हो जायेगा। आप वानसेंको आज्ञादें किवे वीर उसको शिरोधा्यकर शीघ्ही जाकर उसकेयज्ञ को नष्ट कर दें । २२४विभीषण की विनती सुनकर प्रभ ने
आज्ञा दी कि अंगद, वीर हनुमान तथा दस कोटि सेना दौवार लांघकर
२४

भानुभक्त-रामायण

पर्वन्‌ नाधि गया र तेस्‌ शहरमाचौकी रावणका धिया जति तहां
दर्वार्‌ पुग्याथ्या जसें।तिनृलाइ माव्या तसे।।२२५॥
रानी हुन्‌ सरभी विभीषणजिकीराव्‌ लूकिरदेछठ ताहि छ भनी
लकंशहरमातिनूले इशारा
गूफाका सुखमा त पत्थर ट्लोहोम्‌ गर्थ्यो ताहि भित्र रावण उहींत्यो पत्थर्‌कन लात्ति अद्धःदजियेहोम्‌को विघ्न गराउनाकन तहांरावण्‌ येति हदा पनी दृढ भईवीर्‌ वीर्‌ वानरले अनेक्‌ तरहलेरावणूले तहि होम गनं भति एक्‌खोस्या श्रीहुनुमानले र॒रिसने
लाएरपक्कागरी।पच्या टुलो वेग्‌गरी।(२२६॥दीया धुले भै खस्यो।क्ये फौज भित्र पस्यो॥ध्यान्‌ गनं लाग्यो जसं ।त्यो यज्ञ नाशया तसै।।२२७।सूरो लियाकोपनि।हान्या उठोस्‌ यो भनी॥

ध्यानैमा दृढ मन्‌ गरी अचलमभे

रावण्‌

बत्ेथ्यो

भिइन्‌।दिइन्‌ ॥
जसै।
ल्याया अङ्खदले त खचि नजिकं मन्दोदरी पो तसै ॥२२८॥ती मन्दोदरिलाई रावण नजीक्‌ पौचाइ हुमंत्‌ ल्िया.।चोलो खोलि अफालि फेरि कटिको सारी खसाली दिया ॥लायाका गहना समेत शरिरका वस्ते अफाल्याजसै। `दै रावणका नजीकरदी विन्ती गरिन्‌ यो तसे।।२२९॥नगरके द्वारम पहुंच कर, रावण के सभी रक्षकोंको मार डाले । २२५विभीषण की रानी उप्ती नगरर्मे थी ओौर उन्होने ही यह सकेत कियाथाकि रावण वहां छिपा हुभआरहै। गुफाके द्वार पर दृढ पत्थर लगा
कर रावण छिपा हज हवन कररहाथा।

वहींसारे वानर अधिके

समान पहुंच गए 1 २२६ उस पत्थर कोलात मारकर अंगदने धूलके समान विशेर दिया। हवन में विघ्न डालने के लिए समस्त सेनाअन्दर प्रवेश कर गर्ई। इतना होने पर भी रावण दृढतापूवेक ध्यानमग्न
वैठा हवन करता रहा । वीर वानरो ने यज्ञ को विध्वंस कर दिया । २२७रावण ने हवन करते समय एक शुर को भी अपने साथ रक्वाथा। उसेभीश्ची हनुमानने प्रहार करके भगादिया। रावण अभी भी घ्यान-मगनअटलवैठाथा। अंगद मन्दोदरी कोभी वहां खींचकर ले आया। २२८वहु मन्दोदरी को.रावणके सामने लाकर सताने लगा। चोली उतारकर फक दी ओरस्रड़ीभी कमरसे नीचे गिरादी। उसके शरीर पर
धारण किए हुए समस्त वस्त्राभुषण जव उसने उतार कर फेकदियेतो

नेपाली-हिन्दी

२४१
हे नाथ्‌ ! आज कता गयो हजुरको लज्जा अनाथ क्या गरू।पत्नीका इ विलाप्‌ सुनी जिउनु धिक्‌ मरत्‌ निको हयौ बर ॥येती बिन्ति गरन्‌ र पृत्रकन खुप संस्षेर लागिन्‌ रुन।अर्को कोहि थिएन ताहि ` तिनको साहाय हन्या कुने।।२३०॥भतलि पनि रवाँचुला भनि यहां लज्जं समेत्‌ व्याग्‌ ग्या ।तेरो ज्यान्‌ अधिग गयो गरं कसो एेल्हे विपत्ती प्या ॥ती मन्दोदरि रातिको अत्ति विलाप्‌ साम्ने सुनेथ्यो जस ॥उरट्यो खड्ग लिएर अंगदजिका हान्यो कटीमा तसे।।२३१॥होभूको नाश गरादइ्‌ अंगदहरू दौडेर रामूर्ये गया।ती सन्दोदरि रानि रावण यिनं का बात्‌ तहां खृप्‌ भया ॥बाँच्न्‌ असल्‌ हो भनी ।येती हुंदामा पनि ॥२३२॥बां चेदेखि त देखिइन्छ सब थोक्‌ यस्तो बुञ्ली ज्ञानले।यो शोकद्ुर्‌ गरिहाल हुन्छ अव क्या यस्ता असत्‌ ध्यानले ॥अज्ञानं छ भुलाउन्या शरिरमा यो देह मै हूं भनी।लाग्यो रावण भन्न रानि ! अहिलेब्त खात्तिर ताम चप्‌ भद्रह्यां
त्यं अज्ञान्‌ बलवान्‌ भयो पनि भन्या फलिन्छ संसार्‌ पनि।।२३३॥
वी होकर मन्दोदरी रावण केनिकट जा कर विलाप करती हुईकहनेहे नाथ ! आज आपकी लाज कर्हाँं चली गई! मँलगी । २२९अनाथा क्या करू | पत्नी का विलाप सुन कर रावण काध्यान भंगहृ । वहु सोचने लगा, इस प्रकार जीवित रहने सेतो मर जानाश्रेयस्कर है । मन्दोदरी एेसी बिनत्ती कर पत्र को सोच-सोच कर रोनेलगी । २३० स्वामी द्वारा बचाये जाने की आशासे उसने लज्जा काभी त्याग किया ओौर बोली कि यदि पहले ही आपके प्राण चले गएतो
इस विपत्तिमे मै क्या करूगी।

मन्दोदरी का रेरा विलाप सुनकर वह्‌

खड्गनले करउठा ओौरअंगदकी कमरमें प्रहार किया। २३१ हवनका विध्वंस कर अंगदादि राम के पास दौड गये। रानी मन्दोदरी ओररावणकेही विषयमे चर्चा हृई। रावणने कहाकिं रानी! अभीबच के रहना ही उत्तम है, यही सोच कर इतना सब कु होने पर भी मँ
चृपचाप बैठा रहा । २३२ बच जायेंगे तो सब कुष देख सकंगे, यहीसोच कर अपने मनसे शोकको दूर करो। अब ध्यान से अज्ञान कोहटा कर रखना है । यह्‌ धारणा भीव्यथंदहैँ किशरीर मेजोप्राणरैंवहम हीह, एेसी अज्ञान की धावना यदि प्रबल होगयी तो यहहे मन्दोदरी ! अत्मा को ज्ञानसंसार भरसे फल जायगी 1 २३३
२४२

भवुभक्त-रासा्यण

आत्मज्ञान स्वखूप्‌ वबुभ्चेर मनले अज्ञानको नाश्‌ गरी ।स्वस्थे भे रह शोक्‌ नमानि तिमिले क्या हृन्छयो शोक्‌ गरी ।॥।हे मन्दोदरि | माषं रामृकन सहन्‌ संग्राम ट्लो गरी।रामैले यदि मादेछन्‌ त पनि वेस्‌ जान्याष्ठु संसार्‌ तरी।।२३४॥संग्रामूमा मरिगै ग्यां पति भन्या मान र सीता यहाँ।अग्नीमा तिमिले प्रवेश तब गरी आयाम जान्छ्‌ जहां ॥रावण्का इ वचन्‌ सुनैर अति ताप्‌ मान्दी त्ति मन्दोदरीसाँचो बिन्तिम गणं आज महाराज्‌ ! भन्दं अगाडी सरी।।२३५॥।विन्ती रावणथ्यें गरिन्‌ पनि तहां राम्‌ हुन्‌ जगच्चाथ्‌ हरि ।जीती सक्नु कदापि छेन अरुले कस्ते लडाई गरी॥वैवस्वतमनुलादइमत्स्यरुपले जस्ले र॒रक्ना गथ्या।फेरी कमे भएर मन्दर पनी जस्ले पिठेमा धय्या।।२३९६॥दहिरण्याक्षको।प्राण खेचेर लिया वराह रुपले जस्तेवची कोहि फिरेन लड्दष्टुं भनी सामूने गयाको छ जोठ्लो दैत्य थियो हिरण्यकशिपू माव्या नृसिहै भरई।राज्ये खेंचिलिया छलेर बलिको वामन्‌ स्वरूपूले गई।।२३५७॥स्वरूप समन्न कर मनसे अज्ञान का नाशकर
रहो । शोकनकरो।

दो ओर स्वस्थमन से

शोक करनेसेहोगा भीक्या? मँ रामसेषोर

युद्ध करूगा ओौर उन्हे मार डालंगा | यदिमं रामके हाथों माराभीगातो भी उत्तमहोगा। मुज्ञ मोक्ष मिलेगी ओौर मै संसार सागरसेतर जाऊंगा । २३४ यदिसंग्राममें मैँमरभी जातो सीताजी यहाँहै उन्हे मार डालना भौर तुम अग्निमें प्रवेश कर वहींआ जाना जहांभैजार्हाहूं अर्थात्‌ स्वगं को। .रावण के वचन सुनकर मन्दोदरी कोअत्यन्त ताप हुआ । वहु विनती करते हुए आगे बढी ओर बोली महाराज !मे सत्य कहती हं । २३५ राम जगन्नाथ हरि हैँ । अतः संग्राममे किसीप्रकार उन्हुं कोई भी पराजित नहीं कर सकता। जिसने मत्स्यरूप धारण
कर॒ वंवस्वल्मनुकी रक्षाकी ओौर पूनः कमं होकर मन्दर को भपनीपीठ पर धारण
कावध क्िया।

किया । २३६

वाराहरूप धारण कर जिसने हिरण्याक्ष

जो भी युद्ध करनेके लिए सामने आया कोर्दभी

वचकर नहीं निकला । हिरण्यकश्यपु एक बहुत ही बड़ा बलवान राक्षसथा उसे भी उन्होने नरसिह कूप धारण कर मार डाला । बावन रूप धारण

केरलं से वलिके ` राज्यको छीन लिया 1 २३७

पृथ्वीमें परशुराम

नेपाली-हिन्दी

थीया क्षिय प्रृथ्विमा परशुराम्‌तिस्रो प्राण्‌ लिनलाईइ्‌ आज पनि नाथ्‌
२४३

भे नाश सवेको

गव्या ।

राम्‌ भे अगाडी

सन्या ॥
सीताजिहर्नभयोये काम्ले इ विपत्‌ पन्या हुजुरमा ञ्यान्‌ इन्द्रजित्‌को गयो।।२३८॥गई ।सीता - सुम्पनुपषछं आज अधिराज्‌ राम्चन्द्रजीथ्येलङ्कामा पनि राज्‌ विभीषण गर्न राम्‌का पियारा भई ॥भनीथिन्‌जसं ।सन्‌ छोडीकन आज जाउ वनमा येतीरावणले पति ई वचन्‌ सुनि जवार्‌ खुप्‌ दीन लाग्यो तसं।।२३९॥हे मन्दोदरि! इन्द्रजित्‌ पनि मय्यो ्ला टला वीर्‌ मन्या।कुम्मैकणं मय्यो अनेक्‌ अरु पनी संम्राममा वीर्‌ पय्या॥पाऊ , पं।येतीसम्म भएपषछठी कसरि फर्‌ लतेरशवृथ्यैः गड्‌ लचि बँच्नु ननिको प्राण्‌ आज जावस्‌ ब९।२४०॥सीता

हनुः थिएन

दहैलन

गरी
भनी जान्दषल |विष्ण्‌ हुन्‌ रघुनाथ सिता पनि यिनं लक्ष्मीजानी जानि सिता ह्यांत म उसं क्या आज उर्‌ मान्दषट्‌॥हन्यां ।रासृका हात परी मरू भनित हर्‌ सीताजिलाईरामृका हात परी मर्व्याँ पनि भन्या संसार्‌ सहज्‌मा त्प्यां।। २४१॥।अआजराम केरूप मे नाथकारूपधारण कर सवका विनाशन कियाआपके प्राणलेने के लिए सम्मुख अयेरहै। आपको सीता काहुरण नहींकरना चाहिये था। आपने विना किसी विचारके सीताजी कोहुरनेकी धृष्टता की, इसी कारण आपके उपर विपत्ति आर्ईहै। इन््रजीतकाभी प्राणान्त इसीकारण हौ गया | २२८है अधिराज! आज रामचन्द्रजी के पासजाकर आपसीतानजी कोसौपदं।यही उचित ओर
उत्तमहोगा) लंकामे विभीषणदही रामका त्रिय होकर राज्य करे।सब छोड़कर आप वनको चलें। मन्दोदरी के वचन सुन कर रावणबोला-- २३९ हे मन्दोदरी ! इन्द्रजीत भी मर गया तथा वड़-वड़ वीरमारे गये।कुम्भकणे भीमर गयातथा अनेक वीर संग्राममे मारेगये । इतना सब कूछहोजाने परमभी अवम किस प्रकार स्क कर
पांव पड़ं।
शतके सामने इस प्रकार ्ुक्ने सेतो अच्छायही हैकि
मेरा प्राणही चला जाये! २४० रघुनाथ विष्णु हैँ ओर सीता लक्ष्मीहै, यह्‌ मै भली प्रकार जानता हुं" यह्‌ सव जानबृञ्च कर भी र्मने सीताजीकाहरण कियात्तो फिरअव भयभीत क्योँहौऊं!रामके हाथों

मरनेकी इच्छासे हीर्मैने सीताजीका

हरण किया।

रामके हाथों

२४४

भानुभक्त-रामायण

फेरी तुरन्त रधुनाथ सित लड्न जान्छ।मानन्‌ मलाई रघुनाथ्‌ तब घृशि मानु ।सकल ' तापृहर्लाइ तोडी ।संसारकाजान्याछल पारि त्िमिलाइ त वारि छोडी ।२४२॥ःराग्‌ दवेषका भेल चल्छन्‌ भंवरि सरि यि युग्‌ घुम्दषन्‌ बीचमाहां ।पुव्रादी मत्स्यञ्चँ छन्‌ रिस पनि वडवानल सरीको छ ॒ताहां ॥कामैको जालु छ ट्लो तर पनि बचियो ताहि जालूलाई्‌ फारी।
4
संसार्‌-सागर्‌ सहज्‌मा तरिकन हरिथ्ये बस्न जान्याष्ल परि ।२४३॥
मन्दोदरी सित यती भनि लड्नलाई।कम्मर्‌ कसेर बलियो रथ एक्‌ मगा ॥रथूमा चदढेर रधुनाथ सित जान आयो!राम्‌चन्द्रको सकल वानर फौज्‌ उरायो ॥(२४४॥।त्यो रावण्‌ रणभूमिमा जव पुम्यो सास्ते हनूमान्‌ गया।मूर्छा पारि गिरां यस्कन भनी एक्‌ मुड्कि हन्दा भया॥छातीमा जब मुडकि ब्रन गयो घृष्‌ व्र तुल्ये गरी।

घूँडा टेकि भिच्यो पनी दुद घडी

यदि

सरा तोसहजदहीमे

मूर्छा तुरन्त परी ॥२४५॥

संसारसागरसे तर जागा । २४१

पनः
शीघ्रही रघुनाथनजी से युद्ध करने जातां! रघुनाथ मुञ्चे मार डालेंतबभी्मैँ प्रसन्नहूं। संसारके समस्ततापों सेद्रूर, वुम्दं इस ओरछोड़ करम उस पार चला जाञ्गा | २४२ रागद्धेष की नदी बहगीगौर इस के मध्य जीव भंवर के समान चर्कर लगायेगा। पुत्रादि मछलीके समानर्ह। क्रोध भी वड्वानलके समानदहै, कामसे युक्त महाजालंविष्ठा हृभा है तथापि इस देह को जलाकर चला जाऊंगा भौर सहजदहीइस संसार सागरसे

तरकर

हरिके पास सदाके लिए उसपार चला

जाऊंगा । २४३ मन्दोदरी से इतना कहु कर, उसने युद्ध के लिए कमर,कसी ओर एक शक्तिशाली रथ मंगवाया ओर उस प्रर सवार होकर रामसे लड़ने के लिए आया।

रामचन््रकी

समस्त वानर सेनाएक बार

भयभीत हो गर्ह । २४४ रणभूमि में पवते ही रावण के सामने हनुमानगया । उसे मूछिति कर धराशायी करने के उदेश्य से उसने रोवण परएक मुक्केसे प्रहार किया। वक्षस्थल पर मक्का पड़ते ही ब्र केसमान आघात हुषा ओर वह दो घड़ी तक मूचछिति पड़ा रहा । २४५सू्छासे उठकर रावणने हनुमनको (शावाशी) देते हृएक्डा कित

नेपाली-हिन्दी

२४५
मूषठदिखि .उट्यो र रावण तहां स्याबास्‌ तं होस्‌ वीर्‌भनी ।ठ्लो वीर्‌ हनुमानलाइ बुक्ि खुप्‌ साहं सद्धायो पति ॥रावण्ले हनुमानको सनि सुप्‌ ताह गरेथ्यो जसे ।रावण्का सब सेखि तोड्न हनुमान्‌ वीर्‌ बोटन लाग्या तसे।(४६॥हे रावण्‌ | किन गद॑छस्‌ सनि यो धिक्कार्‌ म मान््‌ बरु ।मेरो सुड्कि पन्यापषछठी पनि बचिस्‌ बोल्छस्‌ यहं क्या गरू ॥एक्‌ चोद्‌ हान्‌ तें पनी तंलाई म पनी फर्‌ हन्छ छातीमहां ।एक्‌ मुडकी अब हानुँलात नमरी उस्केर जालास्‌ कहा) २४७॥ई वात्‌: श्री हनुमानले जब ग्या वेसं भतन्यो यो भनी।एक्‌ चोट्‌ श्री हनुमानका हूदयमा ताकेर हान्यो पति॥फेरी श्रीहनुमान्‌ सम्या अधि तहां मुडकी उठाईजसे।रावण्‌ टिक्न सकेन एक्‌ क्षण पनी अन्यत्र भाग्यो तसै।।(२४८॥रावण्‌का संग चार्‌ जना विर धिया मन्ती लडाकापनि।भनी॥ई चार्‌ वीर्‌कन चार्‌ जना अधि सन्या एेले निभांअद्द्‌ श्रीहनुमान नील नल यी चार्‌ वीर कूदी गया]रावण्‌का सेंगका ति चार्‌ विर सहञ्‌ मारेर फिर्दा भया ।२४९॥ती चार्‌ जना जब मन्था तब ञ्लन्‌ रिसायो।रामूका उपर्‌ अधि सरीकन वाण्‌ खसायो ॥ही एक वीरदहै।
हयुमान को महावीर समञ्न कर उनकी सराहना की ।
रावण की प्रशंसा युक्त वातं सुनकर हनुमान ने कहा, "हे रावण! तुम क्यों
इस प्रकार प्रशंसा कर रहै होतो इसे धिक्कारता हूँ अर तुच्छ समन्नताहु 1" २४६ मेरे मुक्केके प्रहारसेभी तुम बच गए ओौर कहते हौ क्याकरू । एक वार तुम भी मूज्न पर्‌ प्रहार करो तव पुनः मँ तुम्हारे वक्षस्थल
पर प्रहार कलूगा \ अब एक सुक्कौ ओौरमारलूं तो फिर देखे तुम क्चकर कहांजातेहौ। इतना कहं कर हनुमान चूप हो गए। तुमने दीक `कहा है, यह कहते हृए-- २४७ . (रावण ने भी उसी समय) हनुमान केहदय को लक्ष्य वना कृर एक चोट कसकर प्रहार करिया।पुनः एकमु बाधि कर जव श्री हनुमान अग्रसर हृएतो रावण एकक्षणभी वहुटिक नहीं सका, वह्‌ अन्यत्त भागगया।रावणे संग चार लडाक वीरभीथे। २४८ इनवचार वीरोंको हम चार वीर अग्रसर होकर अभीसमाप्त करदे, एेसा सोचकर, अंगद, श्री हुतुमान, नील तथा नल चारों
वीर कूद पड़े!=

रावणके साथजोचार

वीरथे वै उनको सहजहीमें

२४६

भवुसक्त-रामायण

बाक्ला बद सरि ति शर्‌ जव खस्न आया।खृप्‌ वानरादि विरले पनि दुःख पाया ।२५०॥यो चाल्‌ वानरको बुन्ली रधुपती ` सामूने अगाडी सरी।लाग्या लडन तहां अनेक्‌ तरहले वैलोक्यका नाथू हरी ॥त्यो रावण्‌ रथमा थियो रघुपति खाली जमीनूमा थिया।राम्‌का खातिर इन्द्रले अति असल्‌ एक्‌ रथू पठाई दिया।।२५१॥जल्दी मातलि सारथी रथ चिरई रामूका हज्‌रमा गया।हात्‌ जोरीकनरासका हजुरमा यो बिन्ति गर्दा भया॥हे नाथ्‌ ! रथ्‌ लिड इन्द्रका हूकरुमले आर्यां खडा षट पनि।ये रथ्मा चहिवक्सियोस्‌ हजुरले बेस्‌बिन्तिपाव्यो भनी।५२॥यो बिन्ती गरि मातली अधि सम्या

तेस्‌ रथूलाई परिक्रमा गरि चदथा

ख्वामित्‌ सितानाथ्‌ पनि।
चदन उचित्‌ हो भनी ॥
ताहाँ देखि त मच्चियो अधिक ज्लन्‌ संग्राम्‌ निरंतर्‌ गरी।जुन्‌ बाण्‌ रावणले त छोडछउहिवाण्‌ काट्छन्‌ रमानाथ हूरि।॥५३॥यस्ता रीत्सित शस्त्र अस्त्र सब थोक्‌ काट्या प्रभूले जे ।
रावणूले पनि राक्षसास्तर लिदइ खुप्‌ फर्‌ हान्न लाग्यो तसे ॥
मारकर लौट अये । २४९ जव उनवचारींवीरोंको उन्होने मार डालातो रावण क्रोधित होकर आगेबढ़ा ओर रामके उपर बाण फका।मूसलाधार पानी के समान जब वाण-वर्षा होने लगी तब वानर सेनाघोर संकट मे फंस गई । २५० वानरों की एेसी अवस्था देखकर श्रीरघुनाथआगे बढ़े ओर यृद्धकरनेमे लीनदहोगये।रावणरथ परथा तथारघुपति नाथ भूमि पर विराजमानथे। इसलिए उनकी सुविधाके लिएएक अत्यन्त सुन्दर रथ इन्द्रने भेज दिया । २५१

मातली सारथी र्थ

लेकर श्रीरघुनाथ के पास पहूवे ओर. विनती की किह}! रघुनाथ,इन्द्रदेव की आज्ञानुसार रथ लेकर आयां हूं, अतः इस रथपर अपविराजने की कृपा कीजिए । २५२ मातली के विनती करने पर सीताजीआगे वदीं ओर रथ की परिक्रमा करके उस पर सवार हौ गयीं । तत्पश्चातसंग्राम ओर अधिक भयावह क्प धारण करने लगा तथा जिस बाणको
रावण छोडता है उसे श्रीरघुनाथ अपनी शक्ति से नष्ट कर डालते हैँ । २५३जब श्रीरघुनाथने रावण के सारे अस्त्रशस्त्र काट उलि तोरावण नेराक्षसशस्तर का उपयोग करना शुरू कर दिया} रावण जितने भी बाणौंकाप्रहार कररहाथा

उसके सारे बाण सपेरूप होकर धरती पर गिर

1

नेपाली-हिन्दी

रावण्‌ हान्दछ बाण्‌ जती जति तहां

हान्या वाण्‌ रघुनाथनले पतिर तीकाट्या सपं पनी सबे गरुडले
सब स्पस्प्‌ न खस्या।बाण्‌ता गरुड्भखस्या। ४

तेस्‌ बीच्मा शरवृष्टि ख॒प्‌ सित गव्यो

धक्का केहि दियो प्रभूकन तहांहान्यो मातलिलाई वाण्‌ र पछि फेर्‌घोडंलाद्‌
पनी

अनेक

२४७

शरले

पक्रेर टुक्‌ दुक्‌ गरी।राम्का अगाडी सरी)फेरी भिराॐंभनी ।केतु खसाल्यो पनि।।२५५॥ख॒प्‌ हाच लाग्यो जसं।चेद मान्न लाग्या तसं ॥
आश्चर्ये भई देव पितु ऋषिगण्‌लीलाले रघुनाथ्‌ पनी जब तहां दुःखी सरीका भया।वानरको सब फौज्‌ विभीषण समेत्‌ सादं उराई गया।।२५६॥बीस बाह दश शिर्‌ भयङ्कर स्वरूप्‌ मैनाक्‌ सरीको भई।लड्थ्यो रावण रामका ह्जुरमा सामूने नजीके गई॥उटथ्यो रिस्‌ प्रभूको र तेहि बिचमा कालाग्नि जस्ता बनी ।रावण्का दश शिर्‌ भगिराउन लिया जल्दी धनुर्वाण्‌ पनि।।२५७॥कालाग्नी सरिको भयङ्कर स्वरूप्‌ रामको बनेथ्यो जसं ।कामिन्‌ पृथ्वि पनी भयद्धुर स्वरूप्‌ देखिन्‌ र॒रामूको तसै ॥रावण्‌ को पनि चित्तमा भय पन्या उत्काबहूतं भया।क्या गछन्‌ प्रभूले यहां भनि तहां सब्‌ लोक्‌ उराई गया।।२५८॥पडते थे । परन्तुजो बाण रघुनाथने छोड़ा था वह्‌ बाण गरुड लू्पमेंनीचे आ भिरा। २५४ सम्पूणं सर्पो को पकड़कर गरुड ने टकड़-टुकड़ेकर डाला! ओर श्वीरामचन्धजी परवबाणोंको वर्षाकी। श्रीरघुनाथको इससे धक्का तो लगा पर उन्होने आगे बढ़कर मातली पर बाण प्रहारकियाओौर

केतुकोभी मार भिराया। २५५

जब घोडोंके ऊपरभी

बाण प्रहार होने लगातो देवपित ऋषिगण भी आश्चयं-चकित ओरअत्यन्त ही दुखित हुए

साथदही साथ श्रीरघुनाथ को भी अत्यन्तही

खेद हुआ ओर विभीषण सहित वानरोंकी सेना भी अत्यधिक भयभीत दहोगयी । २५६
बीस हाथ ओर दस सिर वाला रावण भयंकर स्वरूप धारणं
करके श्रीरघुनाथ के सामने युद्ध करने मे मस्त था।यहु देखकरश्रीरघुनाथ को अत्यन्त ही क्रोध आया मौर उन्होने भी रावण कौ भृजाओंओर सिरोको

काट भिरनिके

लिए धनुष बाण सम्भाल

लिया

२५७
ध्रीरघूनाथ के कालाग्नि जंसे भयंकर स्वरूप को देख कर पृथ्वी भी कांपने
लगी ।
उनके इस भयंकरलरूप को देखकर रावणमभी बहुत भयभीत

भावुभक्त-रामायण

२४८
आकाशमा वसि हेदथ्या जति थयाकस्ता रौत्सित मठं रावण तहांसमकोरावणको परस्पर तहांरा्रीको दिनको प्रकाश्‌ नभद्‌ काल्‌रावण को शिर काटनलाइ्‌ जब बाण्‌तालैका फल ञ्चंगिय्या तपनि शिर

सव्‌ देवतागण्‌

पनि।
हेयो.
भनी॥

तमाशा

खुप्‌ युद्ध टठलो भयोधेर्‌ युद्ध हदा गयो २५९फेक्याप्रभूले तहां ।गीरेनपृथ्वीमरह ।एकोत्तर्‌ शय शिर्‌ भिन्या जति गिरन्‌ सब्‌ वन्न लाग्या जसे ।क्या भो आज भनी प्रभुकन पनी माश्चयं लाग्यो तसे।।२६०॥।टला दैत्य बडा बडा विर पनी जुत्‌ बाणले सारिया।सोही वाण्‌ पति आज रावण्‌-उपर्‌ ताकेर घृष्‌ हानिया॥काट्छन्‌ शिर्‌ पनि वाणले र दशशिर्‌ भमा खसाल्छन्‌ पनि ।फेर्‌ ज्यूंकातिउं शिर्‌ हन्या गरं कसो क्या भो यहाँको जनी।।६१॥यो चिन्ता रधघुनाथमा जब पन्यो साम्ने विभीषण्‌ गया ।यो हेत्‌ छ भनेर हेतु जति हो स्‌ विन्ति गर्दा भयाब्रह्याको वरदान्‌ छ शिर्‌ खसिगया फर्‌ उस्रनन्‌ शिर्‌ भनी ।फोर्‌ अमृत्‌ पनि नाभिमा छतवयो मर्दन काट्या पनि ॥२६२॥हा मौर साथ ही यहु सोचकर कि करोधमेंप्रभ नजाने क्या कर डलं
सभी लोग अत्यन्त भयभीत हृए ओर चारीं ओर कोलाहल मच गया । २५०समस्त देवगण अकाशसे
माराजताहै।

यहु तमाशा देखने लगे कि रावण किस प्रकार

राम ओर रावण में परस्पर युद्ध छिडा हुभा था, गत दिनि
उसमेही वीत गया । २५९ जवप्रभुने रावणके सिरको काटने केलिए प्रहार कियातो जितने सिर वह गिराते जाते उतने हीफिरसे वहाँ
वन जाते। यह्‌ देखकर राम अत्यन्त ही अश्चयं मेँ इब गये ओर दूसराउपाय सोचने लगे । २६० जिन वाणो से बलशाली दैव्यो को मार गिरायागयाथा

उन्हीं वाणोसे तो रावणके

सिरोंपर प्रहारकिया जारहारहै

लेकिन वे सिरतो ज्योंके त्यों फिर अपनी जगह आ जाते है, यह्‌ सोचकरश्रीरघुनाथ अस्यन्त ही चिन्तित हृए । २६१ जब विभीषणने देखा किश्रीरघुनाथ अत्यन्त ही चिन्तिततो उसने श्रीरघुनाथ को बताया किउसे ब्रह्मा का वरदान प्राप्त है, इसलिए उसका सिर कटकर फिर से उत्पन्च
हो जतादहै। उसकी नाभिमें अमृत है, अतः सिर कटने पर भी वह्‌ नहींमरताहै 1 २६२ विभ्नीषणनेश्री राम से विनतीकी करि है रघुनाथ!अप उस अमृतका शोषण कीजिएु। जव सारा अमृत सूख जायेगा तो

नेपाली-हिन्दी

२४९

त्यो अभूत्‌ सब शोषि बक्सनुहुवस्‌

सब्‌ सुक्छ अमत्‌ जसे ।उट्तेन फेरी कसं॥यो गह्य खोलीदिया।
चडत्यो मरिजान्छ तेस्‌ बखतमाहात्‌ जोरेर जसं विभीषणजिलेठाकरुरले पनि अग्निवाण स्लटपट्‌ हानैर शोषीलि या २६३त्यो अमृत्‌कन शोषिबक्सनु भयो यो दिन्छ अर्तीं भनी।रिस्ले शक्ति लिई विभीषण उपर्‌ तकेर हान्यो पनि॥राम्ले शक्ति र शिर्‌ दशं छिनिदिया फर्‌ एक शिर्को भई।नाना शस्त्र लिएर खृप्‌ सित लड्यो राम्काअगाडी गई।।२६४॥तेस्‌ बीच्मा पनि मातली अधिसरी हात्‌ जोरि बिन्ती गन्या ।हे नाथ्‌ { रावण लड्छयो अन्न भन्या फर्‌ शस्व हान्त प्या ॥बरह्यास्ते अब छोडि बक्सनुहवस्‌ खुप्‌ ममं तोड्न्या गरी ।मार्या युक्तित एक्‌ यही छ नहिता मर्दन काट्या पनि।२६५॥।एक्‌ बाण्‌ तुरन्त लिया ।जस्मा अग्निर वायु, सुय्ये इ समेत्‌ लोक्पाल्‌ बस्याका थिया।।मन्ती वेदविधानले र धनुमा त्यो वाण लगाया जसे।प्राणीलाई पनी बहूत्‌ भय भयो खृप्‌ भूमिकामिन्‌ तसं।।६६॥विस्ती

मातलिको

सुनी प्रभृजिले

वह्‌ तुरन्त ही मर जायेगा तथा फिर वह्‌ उरु नहीं सकेगा । इस रहस्य
को सुनकर श्रीरघुनाथ अत्यन्त ही प्रसन्न हुए भौर उन्होने अग्निबाण काप्रहार करके तुरन्त ही उसके नाभिके अमृत को सुखा डाला । २६३श्रीराम ने जब उसके नाथिका अमृत सुखा डाला तब रावणने कोधित
होकर विभीषण के ऊपर शक्ति बाणसे प्रहारकिया। इतनेमें रामनेभी शक्ति बाणसे प्रहार किया तथा उसके दसो सिरोंको छिक्न-भिन्न करदिया तथा रावण पुनः एक ही सिरवाला रहगया।!रावण भी रामके सम्मुख आगे बढ़कर भांति-भाति के हधियारों द्वारा रामचनदधनजी से

खून लड़ा । २६४

इसी बीच मातलीने हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथसे

विनतीकीकिहिनाथ | रांवणतो अभी तकलड्हीरहादहै -ओर इसकेउपर फिरसे प्रहार करना ही पड़गा, अतः इस बार आप ब्रह्मास्त्र छोडिये
जो अत्यन्त ही ममंभेदी हो तभीये मरेगा।

इसके मारने की यही एक

युक्ति है अन्यथा यहु किसी प्रकार नहीं संर सक्ता है । २६५ मातलीकी विनती को सुनते ही प्रभुने. एकरेसा बाण लिया जिसमे अग्नि, वायु
तथा सूयं इन तीनों से युक्तं स्वयं लोक पाल प्रविष्टयथे।सम्पूणं वेदविधान के साथ उन्होने जंसेही उस बाणको धनुष पर रखा रावणके
२५२९

भानुभक्त-रामायण

दाञ्यूको किरिया गरन्‌ सब हूनहकम्‌ येति मिल्यो र॒ लक्ष्मण गया

लाग्या भन्न अहो विभीषण ! तिमी

ती रानिका शोक्‌ पनि।जल्दी बुञ्चाॐं भनी ॥क्यायो न जान्त्या सरी।
लाग्यौ गनं विलाप्‌ अनेक्‌ तरहले खाली जमीन्मा परी।।२७४॥तिम्रोयो अधि जन्ममा कन हौ ेले त दाज्यु भयो।फेरी क्या हूनलाडइ्‌ रावण यहु छोडेर कायं गयो॥जम्मा भैकन बालुवा जसरि फर्‌ फिन्‌ र. गद्धामहां ।यस्तं ॑रीत्‌सित फिदंछन्‌ ईइ दुनियां क्वे छेन आपन्‌ यहां २७५॥अज्ञान्‌को मति यो नलेड तिमिल सूठो जगत्‌ हो भनी।जानी श्री रघुनाथका चरणमा खृप्‌ ध्यान लगाऊ पनि ॥प्रारब्धे बलवान्‌ वुज्ञेर सब यो राज्यादि गदं रहू।जो परन्‌ परिआआउन्या सब करा नीका ननीका सहू।। २७६॥दाज्युको गहिराल आज तिमिले क्रीया विधानूले गरी।रन्छन्‌ रानिहरू बुक्ञाउ अहिले चांडे अगाडी सरी॥कहते है कि तुम सवदुःखमेही इवे हुए हो, समस्त रानियां शोके मेँ वीहृई विलाप करर्हीदहँ ओौर तुम भी उनके साथ केवलरो रहैहौ ओरअपने कन्य काकुभी ख्याल नहीं करते। उठो ओर मनम शति `धारण करके विलाप करना छोडो तथा भाई का क्रिया-कमं यथोचित रूपसे सम्पच्च करो । २७४लक्ष्मणजी विभीषणसे कहते कि पिठतजन्ममे रावण तुम्हारा कौन था कौन जानताहै पर इस जन्ममेंतो वह्‌तुम्हारा वड़ा भाई हुभा।

अब पूनः वहु तुमह छोडकर कर्हां चला गया

कुछ पता नहीं । जिस प्रकार बालू गंगाजीमे जन्मलेती है ओर एक
जगहसे दूसरी जगह वहती रहती है उसी प्रकार मानव जीवन' ओर'आत्माभीरएेसीदहै। क्िसीके जीवन का कोई ठीक नहीं अर्थात जीवनअमर नहींहै। २७५ यह संसार ङ्लृठादहै, अतः मनम अज्ञान बस इस
संसार को कोई महत्वन दो ओर समस्त मूढ बातों से अपने ध्यान को
हटाकर श्रीरघुनाथ जी. के चरणोंमें लगालो।

संसारमें समयी

बलवान ह एेसा समञ्च कररहो) समयके प्रभावसे ही मनुष्य किसीसमय यहां राज्य करतादहै जौरकभी दुःखभी पाताहै।' समय केप्रभावसेजो कुभीहोतादहै वहु सव सहन करना ही पडता है। २७६
इसलिए वड भाई का क्रिया-कमे उचित ढंगसे कर डालो।

देखो

रावण की सब रानियां रो रही रहै, आगे बढ़कर इन्दं समक्षाभओो।

श्रीराम-

चन्द्रजीकी आज्ञानुसार लक्ष्मणने पूणं प्रयास के साथ दुःखी परिवारको

तेपाली-हिन्दी

२५३
यस्तै. ठकूरको हुकूम्‌ छ भनि वेस्‌ रीत्‌ले बुक्षाया जसे ।विस्तार्‌ लक्ष्मणको सृन्था र क्लषटपट्‌ उट्या विभीषण तसै। २७७बिन्ती गनं भनी जहां प्रभु धिया ताहाँं तुरन्त गया।हात्‌ जोरीकन रामका हजुरमा क्या बिन्ति गर्द भया ॥हेनाथ्‌ मजि भया कबरूल्‌ गरि लिया

अज्ञा

शिरोपर्‌ धरी।
बिन्ती गर्छ तथापि सत्य भगवान्‌ ! एक्‌ भारि शंका परी।(२७८॥
यो करूर होप्रभू | परस्ति पनीत हर््या।यस्को क्रिया कसरि योग्य भनेर गर्त्या॥बिन्ती गव्या यति विभीषणले र॒ताहाँ।खूशी भई हृकुम भो उदि बीचमाहाँं ।॥२७९॥बाचुन्ज्याल्‌ रिस हुन्छ शत्ुसितको पले मरी यो गयोयस्को रिस्‌ अब गर्नु छेन अब ता मेरोत रिस्‌ दूर्‌ भयो॥रन्छन्‌ रानिहरू वृक्षा गर लौ कीया विधानूले गरी।पले यै नगरी हंदेन तिभिले येहो क्रियाको घरि।॥२८०॥हकम्‌ येति सुन्या जसे प्रभूजिका योग्ये हृकूम्‌ भो भनी ।रानरीलाइबुञ्लाउनाक्नगया चंड विभीषण्‌ पति॥समन्षाया । लक्ष्मणजी के सात्वना भरे वचनों को सुनकर विभीषणक्लटपट उठ वैठा । २७७ श्रीरामचन्द्रजी के पास कुछ विनती करने के' लिए वहु गया ओौर उनकी शरणमे

आपकी

विनती करने लगाकि

आज्ञा शिरोधारि है लेकिन मेरे मनम

उसका समाधान करदं । २७८

हे नाथ!

एक शंका आई, है आप

विभीषणने कहाकिहे प्रभु! यहतो

एसा पापी जीवथाकि पराईस्ती का इसने हरण किया।

एेसेपापीका

मै क्रिया संस्कार किस प्रकार करू आप मृन्ञे बताये । विभीषण के यह्‌बचन सुनकर प्रसन्न. होकर श्रीरामचन्द्र ने कहा-- २७९ है विभीषण |क्रोध तो जीवित ओर चल मनुष्यसे कियाजाताहै

अब तो वहु मर चका

है। उसके साथ क्रोध करने से क्या लाभ, उससे किसी प्रकार का करौधकरना उचित नहीं । अतः मेरा कोध समाप्त हो चुकारहै। सवेप्रथम रोतीहुई रानियों को समन्ञाभो ओर क्रिया संस्कार पूणं विधानसे करो। अब
तो यही समय है, यह्‌ तुरन्त होना चाहिए 1 इसको न करना उचित नं
होगा ।२८० प्रभुजी की आज्ञा को सुनकर विभीषण तुरन्त रानियों को समक्षाने
के लिए गया। रानियोंको समज्ञा वुक्ञा कर घर भेज दिया भौर पुणेविधान के साथ रावण का क्रिया-कमं सम्पन्न किया ओर फिर स्वयं रामःके

सानुभक्त-रामायण

२५४
रानलाईइ बुक्लाद सब्‌ गरिसक्या क्रीया विधानूले गरी।रानी सब्‌ घरमा पठायर गया जाह िया रामृहरि॥२८१॥खशी खुप रघृनाथ्‌ पनी हुनुभयो सम्पूणं घृणी भया।बीदा भकन मातली पनि तहां फर्‌ इन्द्रथ्यें गे गया॥लक्ष्मणलाइ्‌ हुकूम्‌ दिया प्रभूजिले पले द्यां तापनि।गादीमा लगि फर्‌ विभीषण उपर्‌ एेले त्िमीले पति ॥२८२॥देऊ लौ अभिषेक्‌ भनी प्रभुजिको हकम्‌ भएथ्यो जसं ।लक्ष्मणले पनि गादिमाथि लगि फेर्‌ दीया अभीषेक्‌ं तसं ॥गया ।गादीमाथि बसाईइ साथ लिड्‌ फर्‌ राम्चन््रजीथ्यंलक्ष्मणूलेरधुनाथकाहजुरमा सब्‌बिन्ति गर्दा भया।\२८३॥तेस्‌ बीच्मा रघूनाथ्‌ प्रसन्च हुनुभो
पूग्यो प्रतिज्ञा भनी।तिस्रो कृपा हो भनी॥
सुग्रीव्‌लाइ पनी स्वाउनु भयोएले हे हनुमान्‌ ! विभीषणजिको मतले सिता््यँं गई ।सब्‌ सम्चार बताउ जाउ अहिले सूनुन्‌ बहूत्‌ खुश्‌ भई।।२८४॥जो भनठिन्‌ ति कुरा बताउन यहां फर्‌ जल्दि आ भनी।हकम्‌ हन गयो विभीषणजिका मतले हनूमान्‌ पनि ॥पास गया । २८१ सब काम से निवृत्त होकर विभीषण जव श्रीराम के पासगयातोवे उसे देखकर अत्यन्त प्रसन्न हए गौर एक खुशी का वातावरणछागया। मातलीने भी प्रस्ता पूवक व्हाँसे विदा हकर इन्द्रकेनिवास-स्थान को प्रस्थान करिया । तत्पश्चात रामचन्द्रजी नै लक्ष्मणजीकोआज्ञादी। २८२ हथेलीमें सामग्री रखकर प्रभुजी नेकहाकिलोविभीषण अव तुमको भी अभिषेक करतेहँ।लक्ष्षणने भी हेली मेंसब सामग्री रखकर विभीषण का अभिषेक किया।पनः हथेली मेंसामान रखकर साथी साथ वे रामचनद्धजीके पास गये ओौर उनकेसस्मयुख लक्ष्षणने विनती की । २८३श्रीरघुनाथ जी इस अवसर पर
हादिक प्रसन्न हुए ओर बोले कि अन प्रतिज्ञापूरी हूरई। सुग्रीवसेभी
यही कहा क्रि यह्‌ सब तुम्हारी ही कृपा है, तत्पश्चात हनुमान को आज्ञादीकिं हे हनुमान ! विभीषण की सलाह लेकर सीताके पास जाओओर यह सवे शुभ समाचार सुनाभो जिसे सुनकर वहु बहुत प्रसत्च

होगी 1 २८४

सीताजीनजो कु भी पृष्ठे वह सब विस्तारपूवंक कहना
ओर ्रीघ्रदही वापस आना।

एेसी आज्ञा पाकर विभीषणसे

परामश

` लेकर हनुमान सीता की जोर गये, जब सीता के पास हनुमान परहुवेतो

नेपाली-हिन्दी

२५१
सीत्य हनुमान्‌ पृग्या रुखमनीपामा

हनुमान्‌

प्या

सीता बस्याकी धिडन्‌ ।जननिले चुप्‌ भं नजर्‌ खुप दिइन्‌।।८५॥
चीह्लीन्‌ ई हनुमान हृन्‌ भनि र खुप्‌ खृशी भर्ईथिन्‌ जसं ।तसं ॥विस्तार्‌ बिन्ति- गव्या सने जननिथ्ये श्रीरामजीकासन्‌ खूशी जननी भडइ्न्‌ खुशि हद क्य बोत्न लागिन्‌ तहां ।क्या दीन्या तिमिलाइ चीज हनुमान्‌ खूशी गरायौ यहा।।२८६॥तिख्रो यै प्रिय वाक्य तुल्य त अनेक्‌ रत्नादिको हार्‌ पनिः।लाग्दैनन्‌ अरु चीजदेखि त टृलो यो चीज्‌ दिन्या हो भनी ॥ट्‌ बिन्ती अरु चीजदेवित टलो श्रीराम्‌ जगत्‌का पति।खृशी खुप्‌ हुनुहृन्छ ता खुशि म्‌ चाहित्च दौलथ्‌ रती।।२८७॥यो बिष्ती सुनि खृशि भैकन तर्हां येती अद्ाइन्‌ पनि।रामको दशन ग्ट बिन्ति गर गँ भेट्‌ गनं खोज्‌चछिन्‌ भनी ॥सीताका इ वचन्‌ सुनेर हनुमान्‌ रामूका हजूरमा गया ।दशेन्‌को मतलब्‌ थियो जननिको सो बिन्ति गर्दा भया।1२८८।॥]वह॒ चृपचाप वैटीथीं। हनुमान जातेही उनके चरणो में ज्ुकं गये।सीताजीने भी जंवो-अयिों मेही आशीर्वाद दिया । २८५ सीताजीनेहनुमान जी को पहचाना ओर उन्हें देखकर बहुत ही प्रसन्न हु । हनुमानने विस्तारपूवेक सब हाल कटा!सीताजी यह्‌ सब समाचार सुनकरबहुत ही प्रफुटिलित हुई ओर कहने लीं कि तुमने एेसी शुभ सूचना दी हैजिसके प्रत्युपकारमें तुम्हेक्या दुं। २८६ हनुमानने सीताजी के वचनसूनकर यह प्राथनाकीकि हे माता! तुम्हारे प्रिय वचन ही अनेक रत्नोंसे जटितहारसेभी बढ़कर!आपके प्रेम भरे वाक्य ही इतने अमूल्यहै कि उनके सामने हर वस्तु तुच्छदहै। हनूमान ने इतनी विनती करकेकहा कि श्रीरामतो इस संसारके मालिक ह, उनकी कृपा मज्षे प्राप्त
है, अब इससे बढ़कर आप मञ्चे ओर क्या ठेना चाहती हैँ । आप हमसेप्रसन्न है ओौर मै आपकी कृपा पाकर गौरवान्वित हु हँ .अतः अब मृन्चोकुछ नहीं चाहिए । २८७ हनुमान की ेसी प्रेम भरौ बातें सुनकर सीताजीअत्यन्त प्रेम विभोरहो गई ओौर उन्होने रामके दशन पाने की इच्छा
प्रगटकी जौरकहाकि्ै श्रीराम के पास चलना चाहतीहूं!

सीताजी

के इन वचनो को सुन कर हनुमानजी तुरन्त राम के पाक्ष गये। ओरसीताजीकी अभिलाषाको रामके सामने प्रगट किया। र्नसीताकीस इच्छाको सुनकरश्रीरामने हनुमान ओौर विभीषण दोनों को

भानुभक्त-रामायण

२५६
यो विन्ती हुनुमानले ह्जुरमा ताह गच्याथ्या जसं ।मर्जी भो प्रभुको विभीषणजिको साथ्‌ लागि आया तसे ॥जाऊ ल्याउ सिताजिलादइ्‌ तिमिल सब्‌ देह निर्मल गरी।आउन्‌ भेट्न सिता अनेक्‌ तरहका भुषण्‌ शरीरमा धरी।।२८९॥हुकूमूलेहनुमानलाईइसंगमा 'लीडई्‌ विभीषण्‌ गथा।जल्दी स्नान गराउनाकनतहां खुप यत्न गर्दा भया ॥पले स्नान गराइ रुद्ध कपड़ा पाइभूषण्‌ पनि।दीया सुन्दर जुन्‌ धिया खृशि हंद पून्‌सिताजी भनी।।२९०॥डोली माधि सिता चढाद्‌खृशिभं हींडया विभीषण्‌ जसं ।दर्शन्‌ गनंभनेर बानरहरू आयेर घेम्या तसे।।चौकी गनं भनेर डोलि नजिके जोता रद्याका थिया।सब्‌ वानरहरुलाइ तेस्‌ बखतमा तिनूले हटाईदिया।।२९१।कोलाहल्‌ अधिकं भयो प्रभुजिले सून्या नजर्‌ भो पनि।हकम्‌ भो रघुनाथको किन तर्हाँ वानर हटाया भनीआमा

जानति ति हेदंछन्‌ सब जना

डोलीमा किन चद्दछिन्‌ अब सितासूनिन्‌ ख्वामितको हुकूम्‌ र जननीपाऊ पुं भनेर खुप्‌ खृशि हदंआज्ञादी कि नहा धोकेर
हेरून्‌ ति वानरहुरू ।पदल्‌ति आन्‌ बस।।२९२॥
जल्दी जमीन्‌मा अरिन्‌ ।साम्ते अगाडी सररिन्‌ ॥
(निमंल होकर) वे दोनों जाकर सीताजी
कोले आबे तथासीतानजी से कहें कि वे अपने समस्त आभूषण शरीरमे धारण करके सजी-संवरी हुई भये । २८९ विभीषण हनुमान के साथसीताजी को लेने गये।सीताजी स्नानादि करके शुद्ध वस्तो सेसुसज्जित हई ओर उन्होने सारे आभ्रुषण पहनकर अपना श्छुगार किया।रामचन्द्रजी के भेजे हुए आभूषण पहनकर सीता जी अत्यन्त प्रसन्नहर । २९० असेही सीताजोको विभीषणने डोली में वैठाया समस्तबानर उनके अंतिम दशन के लिए दौड़ पड़ ओर उन्हं चारों भोर सेषेरलिया। जोलोग डोलीकी रखवाली कर रहैथे उन सब वानरो कोउस समय वहांसे हटा दिया गया । २९१ इतने बीच में वहाँ कोलाहलहने लगा।सबनेदेखा किप्रभजी आज्ञादे रहँ भौर कह रह हैकि उन बानरोंको वर्हासेः क्यो हटाया गया सीता सभी की माता हैभी उनका दशेन पाने के लिएरहै, अतः डोलीमें चढ्‌ कर आने
को क्या आवश्यकता है अव सीता पैदलदही अयेंगी। २९२

सीताजी

नेपाली-हिन्दी

२५७
कामृको सिद्ध गराउनाकन सिता माया लियाकी यिन्‌ ।काम्‌ हो रावण मानंको कूल समेत्‌ सब्‌ सिद्ध पारीदिइन्‌।।२९३॥अग्नीमा अधि राखियाकिकन फेर वीन्या तहां सूर्‌ गरी।
दोष्‌ दीया रधुनाथले किन यहां ` आयौ नजीके भनी ॥अर्कका घरमा बस्याकि भनियो दोषे दिनूभो जसं।लक्ष्मणलाईइ हुकूम्‌ दिइन्‌ जननिले विश्वासखातिर तसे।(२९४॥हे लक्ष्मण्‌ ! तिमि अग्नि बाल अहिले ताहीं प्रवेश गदेषु ।मदे ॥सच छ्तम बाचँला सुटि भया रेल्हे तहींहकम्‌ लक्ष्मणले तहां जननिको सून्या र॒ रामको पनि।मत्‌ पार्क अग्नि खुप्‌ गरि दलो बालीदियाबेस्‌ भनी।।२९५॥सीताजी पनि खृप्‌ प्रदक्षिण गरन्‌ रामूको र भक्ती गरी।अग्नीको नजिकं खडा पनि भडइन्‌ केही अगाडी सरी॥द्यौता ब्राह्मण संचि रामचरण को ध्यान्‌ भित्रिमनूमाधररिन्‌।सवका साभिभनेर अग्निसित हात्‌ जोरी पुकारा गरिन्‌।।२९६॥
जस्ता रीतुसित रामका चरणमातस्तं रीत्सित अग्नि शीतल हउन्‌
ध्यानुमा रद्याकी मदुतापे नलागोस्‌ कष ॥
ने प्रभूके आज्ञा भरेस्वरको सुना ओर तुरन्त ही जमीन में उतर पड़ीं।अत्यन्त हीं प्रसच्च होकर प्रभुके चरणोंमें प्रणाम किया मौर सबके सामनेही आगे वड गयीं । कायं सिद्ध होनेके लिएसीताजी ने मायारूप धारण
किया था अब वह्‌ सब कायं सिद्ध हो चूके!चृकाथा। २९३

सीताजीतो

रावण कुल सहित समाप्त हो

पहलेही अग्निमें प्रवेण कर

चृकी थीं

क्योकि रघुनाथ जी ने उनके ऊपर दोष लगाया था करि इतने दिन परायेघर में रहकर आयी हुई स्वी शुद्ध नहीं हो सक्ती ।

उस समयसीताजी

ते अपनी शुद्धता का विश्वास दिलाने के लिए लक्ष्मण से कहा- २९४हे लक्ष्मण ! तुम अभी अग्नि की चिता जलाकरतैयार करोम उसमेंप्रवेश करूंगी । अगर मै शुद्ध हूं तो बच जाऊंगी अन्यथा मर जागीलक्ष्मणने राम ओर सीताकी आज्ञा सुनी, चिता तैयार की ओौर उसमेआग लगादी।एकबड़ीसीचिता तेयारहो गई २९५सीताजीने अपने हृदयम रामकी भक्तिओरप्रेमको संजोकर अग्निकी परिक्रमाकी!समस्त देवता, ब्राह्मण ओौर रामचनद्रजी कोमनदही मन प्रणामकिया। सबको साक्षी करके दोनों हाथःजोडइ के अग्निं को संबोधित

करके सीताजी ने कहा-- २९६

ह अग्निमाता! तुम साक्षीहो।

मेरे

२५८

भानुभक्त-रामायण

बोलिन्‌ येति र॒ अग्तिमा पसिगदइन्‌ ताह सिताजी जसै।सबको ताप्‌ सनमा भयो विरहका वात्‌ गनं लाग्या तसै।(२९७॥सीता अग्तिविषे जहां त॒ पस्िथिन्‌

बरह्मा रद्र समेत्‌ सबे ठहि गया

इन्द्रादि

लोक्पालृहरू.।
जो देवता छन्‌ अरू॥
जम्मा भ रघुनाथको स्तुति गव्या सब्‌ देवगणूले पनि।बरह्माले पनि खुप्‌ गन्या स्तुति तहां मालिक्‌ यिनं हुन्‌ भनी।।९८॥अग्नीर्ले पनि विन्ति खुप्‌ सित गय्या रामका चरण्‌मा परी

भूषण्‌ वस्त॒ अनेक्‌ धथ्याक्रि जननी

सीता अगाडी

धरी॥

सीताजीकन

यहं

राखी

धियां ।

सीतानाथ्‌ ! म त आउन्यापछि फेर

वहीं

आजसम्म

दियाको

काम्को सिद्ध भया लिन्‌ अव हवस्‌. सीताहजूरमा दिरयां॥२९९॥अग्नीले पति बिन्ति बात्‌ गरि तहां सीता जसं ता दिया।खुशी मन्‌ रघुनाथको हून गयो सीताजिलाईःलिया॥सीताजीकन काखमा लिड तहां ठकुर्‌ बस्याथ्या जसं।भक्तीले स्तुति इन्द्रले पनि गव्या खृशी भया सन्‌ तसै।(३००॥फोर्‌ बिन्ती शिवले खुशी भई गव्या राम्‌का हजूरमा तहाँ।

ध्यानम केवल राम ही राम रहे

अयोध्यामर्हा ॥

गौर हर समय रहम, यदिपेसाहैतो

तुम शीतल हो जाओ ओर मृह्े बिल्कुल भी तुम्हारातापन लगे)कहकर सीताजी अग्निम प्रवेण कर गर्यीं।

इतना

यह देखकर वहाँ सारे

उपस्थित जन अत्यन्त दुःखी हुए मौर सभी शौकयुक्त बातें करने लगे । २९७
सीताजीने अग्निम जर्हा पर प्रवेश किया था कहां पर इंद्रादि तथासमस्त लोकपाल प्रविष्टथे। ब्रह्याजीभी रुद्र सहित अन्य देवताओं
के साथ आ पहुंचे । समस्त देवता रघुनाथ जी की वन्दना करने लगे ।ब्रह्माजी नेभी रासकौ घोर स्तुतिः कीओर कहने लगे कि श्रीरामःमनुष्य नहीं साक्षात परमेश्वर हैँ ओर तीनों लोक के मालिक हैं। २९८
श्रीराम के चरणों में भिरकर अग्निने भी स्तुति कीओर समस्त वस्त्राभूषणंसे सुसज्जित सीता जी को उनके सम्मुख रख दिया ओर कहा कि यह्‌ वही
सीताजी है जिनको आपने मु्लमे प्रवेशकर दियाथा 1 २९९ने विनती की कि अव सीता आपकी सेनाम हाजिर)

अग्नि

इतना' कहकर

सीताको अ्योँकात्योँरामके हार्थोमें लौटा दिया।रघूनाथजीनेःप्रफुल्लित मनसे सीताको ग्रहण कियाओौर एक राजाके समान सीताको अपने पास बैठाकर सुशोभित हुए । एेसा सुहावना भवसर देखकरसभी के मन प्रसच्नतासे ज्लूम उठे। ३०० शिवजी ने पनः प्रसन्न हौकर

नेपाली-हिन्दी

२५९
एेले ई दशरथ्‌ पिता हचजुरका मिल्लाकि दशन्‌ भनी ।आज बक्सनुहवस्‌ स्वामित्‌ प्रभूले पनि।।३०१॥आया दशनयो बिन्ती शिवको सुनेर दशरथ्‌- जीका हजूरमा गरई।शिर राखिबक्सनुभयो अत्यन्त खूशी भई ॥पामाआलिद्धन्‌ दशरथूजिले पनि गव्या ताव्यौ मलाई भनी ।बीदा भे दशरथ्‌ खुशी भई गया पफेर्‌स्वगं लोक्मापनि।।३०२॥वानर्को जति फौज्‌ मय्यो रणहुंदा ती सन्‌ बचाऊ भनी ।अमुत्‌ वृष्टि गराउनाकन हृकूम्‌ भो इन्द्रलाई पनि॥हकम्‌ पाइ ति इन्द्रले पनि तहां अमत्‌ गिराया जसे।वानरका सब फौज्‌ खडा पनि भया राम्का कपाले तसे।३०३॥बिन्ती ताहि

गय्या विभीषणजिले

रामूका

चरणूमा

परी,
मंगल्‌ स्तान्‌ गरिबविसयोस्‌ हजुरले यो स्नानको हो घरि।॥मंगल्‌ स्तान्‌ गरि वस्त्र भुषण धरी

राज्‌ आज

याहीं हवस्‌ ।
सेवक्‌ हूँ करूणा निधान्‌ ! हजुरको प्रीती म माथी रहौस्‌॥।३०४।विन्ती सूनि हुकूम्‌ भयो हन त हो जान्यात दहो स्नान्‌ गरी।

क्यार आज घरे

भाद्‌ त भरत्‌

मै ज्ञ जटाजूट धरी॥
~~~
श्रीराम के समक्न विनतीकी।! सीतानाथ! मतो बाद में पूनः अयोध्याआगा अभी तो आपके दशरथ पिताजी के दशंन पाने की इच्छासे आयाथा अतः स्वाभित्‌ ! आज प्रभु आप भी दर्शनदेने कीङ़पा करें । ३०१शिवजी की यहु विनती सुनकर दशरथ जी के पास जाकरपैरों मंसिर
रख दिया । अत्यन्त प्रसन्न होकर दशरथ जीने भी आलिगन करते हूएकहा कि मेरा भी आपने उद्धार किथा। इस प्रकार प्रसन्न होकर दशरथ जी
ने विदा ली भौर पुनः स्वगंलोक को चले गथे। ३०२

रणभूमि में जितने

भी वानर सेना मारे गये थे उन सब को बचाने के लिए भमृत-वृष्टि कराने
हेतु इन्र कोभी आज्ञा दी।
वृष्टि की।

आश्ञापाकर इन्द्रने भी वसे ही अमृत

रामकीङ़रपासे वानर सेना पूनः खड़ीहो गयी । ३०३.
विभीषणनेभी श्रीरामके चरणोंमे पड़कर विनती कीकि यह्‌ स्नान
करने का समय है अतः आप कृपया मंगलास्नान करने का कष्ट करें ।मंगलास्तान के पश्चात्‌ वस्तराभूषणादि धारणकर आज यहीं विराजने
कीङपा करे।
हे करुणानिधान ! मैँसेवकह श्रीमन की कृपादृष्टि
मृञ्च पर रहौ ! ३०४ ४ विनती सुनकर कहने लगे-- है तो टीक ही।परल्तु क्या करूं घरमे भाई भरतमेरेही समान जटाजुट होकर बैठा
२६५

भानुभक्त-रामायण

वन्‌ रीतल्ले स्तान्‌. गद ।सुभ्रीव्‌ वीर्‌इरछन्‌ इ देड तिमिले यिनूलाइ खिल्लत्‌ वर ।।३०५।।वृष्टी गन्या।हकम्‌ येति हदा विभीषणजिले रत्नादिजस्ले जुन्‌ चिज खोज्छ सो चिज दिरई सब्‌ फौजको ताप्‌ हप्या ॥सब फौज्‌ूलाईइ बिदा पनी दिनुभयो रामूले कृपा घुप्‌ गरी।फौज्‌ वानरहरको पनी तरिगयो आनन्दमा खुप्‌ परी ॥३०६॥काम्‌ सन्‌ सिद्ध भयो यहाँ किन वसू जान्‌ अयोध्याभनी ।

त्यो भाई पर राखि आजम यहाँ

सीता, लक्ष्मण साथमा लिद चढ्यासुग्रीव्‌ अद्धदजी विभीषण समेततिन्‌लाई पनि जाउ राज्‌गर भनी
श्रीराम विमानूमा पनि॥रामूका हजृर्मा धथिया।बीदा प्रभले दिया । ३०७1

ती सबले तहि विन्ति खुप्‌ सित गन्या

जान्छौ

अयोध्ये

भनी ।
सबको आग्रह्‌ देखि खूशि हुनुभो तहां रमानाथ्‌पनि॥पूभ्पक्मा चढ आज टु अब लौ भन्त्या हकम्‌ भो जसं।सुग्रीव्‌ श्रीहनुमान अङ्कद चद्या पृष्पक्‌ विमानमा तसं ।।३०८॥।आप्ना मर्ति चिई विभीषण पनी तेसंविमानमावस्या।सेना सुभ्रिवका पनी हुकुम सम्पुणंताहीं वस्या ॥है इसलिये भारईको अलग रखकर आज भँ यर्हां किस रीतिसे स्नानकरू । सुग्रीव वीर आदि यहद, इन्दं तुम आश्रय दो! ३०५ एसीआज्ञा होने पर विभीषण जी ने रत्नादि की वृष्टि की। जो जिसप्रकार की वस्तु आदि चाहते थे वही वस्तु देकर सव सेनाओंकातापहरण किया। अतति कृपाकर रामने सव सेनाओंको विदाभी देदी।बानर सेना भी अत्यन्त आनन्दित हौ मुक्तहो गयी} ३०६

सव कायं

सिद्ध हो चुका है-- अव यहां क्यौ रहं, अयोध्यादही चला जाताहूं।
एेसा सोचकर सीता ओर लक्ष्मण को साथ लेकर श्रीराम विमान में चद ।सुभ्रीव्‌, अंगद जी ततथा विभीषण सव रमही केपासथे। उन्हभीजाकर राज करने को कहते हृए प्रभु ने विदा दी। ३०७ उनसबने भी अयोध्याही जानेके लिये विनती की। सभी के इस आग्रह
को देखकर श्रीरामनाथ अत्यन्त प्रसन्न हए 1 तव सबको पुष्प विमानमे चद्ने कीजसे ही अज्ञादी; सुग्रीव, श्री हनुमान ओर अंगद पुष्पविमान मं चट्‌ गये । ३०८ अपने मंत्नीको साथ सेंलेकर विभीषण भौउसी विमानमें बठ गये। सूग्रीव की सम्पूणं सेना भी आन्नानुसार वदी
२६१

, नेपाली-हिन्वी

णोभा अधिक्‌ गर्देथ्या.।सरे शोभाकन वानरादि विरले देखेर छक्‌ परदेथ्या ॥ ३०९ ॥सेना समेत्‌ सब विमान उपर्‌ चढाई।.सवे बसि

सीतानाथहरू

रही
हकम्‌ दिया प्रभूजिले जब जानलाद्‌ ॥आकाश मां गरि जान विमान धायो।शोभा अपूव रघुनाथ चद्या र पायो ॥३१०॥ ,बीच्मापसी।दौडयो पुष्प ॒विमान्‌ जसे हृकुमले आकाशबसी ॥पृथ्वीको पनि याद्‌ सबं हुन गयो तेसे विमानमा
जुन्‌ जुत्‌ काम जहां जहाँ अधिभयोसीतालाइ नजर्‌ गराउन भयोयो लङ्कापुरि हो अगम्‌ छ बललेत्यो भूमी रणभूमि हो तहि मय्या
ताहीं रावण कुम्भकणे त मन्यालक्ष्मणूले तहिदन्द्रजित्‌कन जित्यासागरमा पनि हैर सेतु बलियोरामेश्वर्‌ भनी नाम राखि शिवको

याहं

ग्यां

यो
भनी।
खृश्‌ भे प्रभूले पनि ।३११॥
को जान सक्छन्‌ अरू।स्ला टलावीर्हरू॥भारीलडाईगरी।सामूने अगाडी सरी ।३१२॥
बाध्यं र॒सागर्‌ तरयां।स्थापन्‌ किनार्मा गरथां ॥
बैठ गयी । सीतानाथ आदि सब वरहा बेठे रहने से अधिक शोभायमानहयो रहा थाओौर उस शोभासे वीर वानरो का मन ओर हुरषित

होता था। ३०९

सेना सहित सवको विमानमें

चडाकर जब प्रभुने

चलनेके लिये आल्ञा दी, विमान आकाश मागें से जाने लगा।श्रीरघुनाथ जौीके विराजमान होने से विमान की शोभा ओौर भी बढगयी । ३१०

आज्ञा पाकर

पुष्प विमान आकाशके

मध्यसे उड़ने लगा

तव श्रीरामचन्द्र जी को पृथ्वी की समस्त घटनाओं का स्मरण होने
लगा । जर्हा-जहां जो-जो कायं हृभा था इस-इस स्थान पर किया
गया था, कहते हुए प्रसन्न होकर प्रभ सीताको दिखाने लगे। ३११यह लंकापुरी है, अत्यन्त अगम-बलपूवंक यहाँ कौन प्रवेश कर सकताहै। वह्‌ भूमि रणभूमि है, जर्हां अनेक बड़े-बड़े वीर योद्धा मारे गयेवहीं पर भीषण युद्ध करके रावण ओर कुम्भकरण भी मारे गये । वहींलक्ष्मण ने अग्रसर होकर इन्द्रजीत कोभी परास्त किया था! ३१२सागर पार करनेके लिए एक दृढ पुल कानिर्माण किया जिसके ऊपरसेसारीसेनापार उतरीथी। किनारे पर शिवजी की स्थापना करकेरामेश्वर नाम रखा । उसी जगह पर चार मंत्रियों सहित विभीषण

भानुभक्त-रामायण

२६२
चार्‌ मन्त्रीसंग ली विभीषण तहांकिष्किन्धा यहि हो यसं नगरिमावार्ता येति गरया सिरासित र फर्‌सुग्रीव्‌लाई हुकूम्‌ भयो प्रभुजिकोतारा रानिहरू समेत्‌ चदिसक्यासीतालाइ नजर गराउनुभयोसीता! हैर अगाडि पञ्चवटि वेस्‌त्यो आश्र पनिहो अगस्ति ऋषिका
तेसं पल्तिरको सुतीक्ष्ण ऋषिकात्यो हो पवेत चित्रकूट भरतलेजो आश्वम्‌ यमूनाजिको छ तिरमागंगा हृन्‌ इ अगाड़की नजरलेजो देख्छयौ अज्ञ न्‌ परं सरयु हुन्‌ह सीते ¡ गर लौ प्रणाम तिमिलसीताजीकन येहि रित्सित सवेभारद्राज्‌कन गे प्रणाम पनि गव्या
आईशरण्ूमाप्या।सुग्रीव राजा भया ।॥ ३१३ ॥ताराक्िकायापनि।ताराक्ञिकाऊभनी॥
ताहां विमानमाजसे ।वाली भिम्याको तसं ।।३१४॥।राक्षस्‌ तहां धेर मरया।जस्ले कृपा खुप्‌. गरया ॥धेर ऋषी
छन्‌
जहाँ ।
भेट्नं गयाथ्या जरह । २ १५॥

ताहां

भरद्राज

छन्‌ ।
देख्ते खुशी हृन्छ मन्‌ ॥ती हन्‌ अयोध्या पुरी)भक्ति मनैमा धरी ।। ३१६॥
खोलेरी विस्तार गरी।जद्द्री जमिनूमा ज्लरी॥
आकर प्रभुकौशरण मेंपड़ाथा। यह्‌ देखो, किष्किन्धा पवेत है जहांपरःबसी हुई नगरी का राज्य सुग्रीव को दिया गया । ३१२ सीताजीके
साथ इतनी बात करके तारा को बुलानेके लिए सुग्रीवको आज्ञा हई।उनकी आन्ञानुसार तारा को बुलाया गया।

तारा भी रानियों सहित

जसे ही विमान मे चढनेजा रही थी उसी समय सीताजी को वहु स्थान
दुष्टिगत हआ जहां बालि धराशायी हुआ था। ३१४

सीते! देखो [|

अगि पंचवटीको देखो । वह्‌ स्थान जहां अत्यन्त बलिष्ठ राक्षसगणमारे गयेथे। वह आश्चमं अगस्त्य ऋषि काह जिन्होंने वड़ी सहायता
कीथी।
उसी केआगे सुतीक्ष्ण का आश्रम है जिसे चि्नकूट पवेत

कहते

जहां पर भरत जी हमलोगों से भेट करते अआयेषथे। ३१५
यमृनानदीके किनारे जो आश्रम है वहु भरद्वाज मूनि काटहै। अगेदेखने से दूसरी गंगा नदी दहै जिसके दशन मात्र से मन आनंदित होताहै

उस्कैभीञगे

सरयू नदी है जिसके तट से लगी हुई अयोध्या

नगरी है भक्तिपूवंक शीश ज्लुकाकर इस नगरी को प्रणाम करो। ३१६
श्रीरामचन्द्र सीता तथा लक्ष्मण सहित भरद्वाज सूति के आश्वममेंउनसे भेट करने गये! वहां वे सब अयोध्या नगरी तथा अपने माता

नेपाली-हिन्दी

२६३
हात्‌ जोरीकन सोध्नुभो अनि यहां सब्‌ जन्‌ कुशल्‌ .छन्‌ भनी ।

वृद्धे हुन्‌ महतारिको छ गति क्या

ज्युदेति छन्‌ की भनी ।(३१७॥
क्याबात्‌ भाइ दुला भरत्‌ पनि भया सबका उपर्‌ काम्‌ गरी।चौधै वषं र्या ब्रती भद तिन्‌ चिन्ताम-माथी गरी ॥भारद्वाज ऋषिले पनी सब कशल थीया.बताईदिया ।हे नाथ्‌ ! छन्‌ कूशलं सवे भरतका माते विपत्ती थिया।। ३१८॥हजुर पर हुनाले रोज्‌ फले मात्र॒खान्छन्‌ ।हजुर सरि खराऊ गादिमा राखि मान्छन्‌ ॥शिर भरि छ जटाजुट्‌ वल्कलं छन्‌ धञ्याका ।फकत हजुरमा छन्‌ प्राण भर्पण्‌ गव्याका ।॥३१९॥सब्‌ जान्दष्ट्‌ हजुरले पनि काम्‌ गच्याको ।
राक्षस्‌ विनाश गरि भार्‌ भूमिको हग्याको ॥

पित्ता व भायां कासमाचार

जाननेके लिये उत्युक होतेदटै।

सीता

जीको मागमे अये हुए महत्वपूणं स्थानों के विषय मे रामचन्द्र जी,विस्तारपूर्वक ज्ञान कराते हैँ। इतने में ही आश्रम में पहुंच गये।वे तुरन्तही पृथ्वी पर उतर गये ओौर मुनि के पास जाकर शीघ्रतासे ज्लुककर प्रणाम किया। तत्पश्चात्‌ हाथ जोड़कर सबकी कुशलतापुछ्ते हैँ । ३१७ वे सोचते ह-मातये वृद्धाहौ गयी होगी परःजीविततोहोगीही।. उन्होने प्रष्न किया तथा भरत केहाल पूधे। इसपरभरद्वाजजी कहते है कि भरत मानवो में सर्वोपरिहै। वे राज्य-कायं
संचालन करते हुए भी एक ब्रती के रूप मे रह्‌ रहै हैँओर वितनमननमे ही चौदहु-वषं पुरे कर रहैरहैँ अर्थात्‌ वे राज्य सुखों के बीचरहकर भी उनके भोगसे उदासीनरहैं। शेष सबकी कुशलता के बीच

केवल भरतके ऊपर दही विपत्तियां छायी

हुदै । ३१०८

दूर रहकर भरत उपवास मे रहरहै हैँ।

वे केवल फलाहारपरही

जीवन निर्वाह कर रहैहैँ।

श्रीमान्‌ से

राजगही पर आसीन आपकी पादुकाओं

मेवे आपकेही रूपका दशन पाकर, आपहीकेध्यानमें खोये रहते हैँ।
सिर पर जटा-जूट धारणकरलियादहै ओर आपके ही चरणों मे अपनेप्राण अपित किये हए)भरत आपके हीः प्रेम मेँ मग्न होकरआपके ही नाम से राज्य संचालन कर रहैरहै। ३१९

श्री

भरट्ाज

कहते हैँकि चौदह वषे वन में भ्रमणकरके जो परोपकारी कायं आपेकिथेहै बहुभीभलीभांति जानताहूं। इस.स्थान के दुष्ट राक्षसोंको मारकर आपने पृथ्वीका भार हल्का कर दिया। यहांके क्षि मृच्नि
२६४

भानुभक्त-रमायण

हो सब्‌ प्रसाद्‌ हजुरको सव तत्त्व जान्यां ।जो ब्रह्म हौ उत

हजूरकन आज

म्न्य ॥३२०॥
. लीला गरी हजुरले अवतार्‌ धव्याको।ब्रह्मादि देवगणको पनि ताप्‌ हन्याको ॥जो ई चरित्रकन खुश्‌ भद्‌ गान गछन्‌ ।संसार्‌ समुद्र सहजं सित पार तन्‌ ॥३२१॥ब्रह्माजिका वचनले यहि रूप धारी ।भार्‌ हनुभो सकल रावणलाई मारी ॥सन्‌ लोकको हित हुन्या अरु काम्‌ गरीनन्‌ ।चौधे भुवन्‌ हजुरका यसले भरीनन्‌ ।॥।३२२॥मेरो आज पवित्र घर्‌ पनि हवस्‌ एक्‌ रात्‌ यहाँ राज्‌ गरी।भोली जानु असलू हुस्याछ पुरिमा विन्ती छ पाऊ परीभारद्राज्‌ ऋषिले यती हजुरमा विन्ती गव्या राज्‌ भयो।सन्मान्‌ सैन्य समेतको गरिलिया सम्पूर्णको ताप्‌ गयो ॥३२३॥सभी उनके आतंक सेदवे हुए थे। हमारे यज्ञ-पुजा आदि में विघ्नडालनेवाले राक्षसो को समाप्त करके आपने हम सभी के ऊपर महानकरेपा कीरहै। उन प्रसाद स्वरूप तत्वों को आज जानगया हंजो ब्रह्महै वही आज आपको

मान गयेरहैँ। ३२०

आपकी

इस मानवलीला

को जान लिया। पृथ्वी पर अवतार लेकर आपने दुष्टों को समाप्तकिया तथा ब्रह्मादि देवगणो के तापों का हरण किया। आपके इसचरित्रसे प्रसन्न होकर आज सभौ आपकी इस महत्वपूणं लीला काभक्ति तथा प्रेम से गुणगान करतेहै। आपके एसे पुरुषार्थं भरे चरित्रका गुणगान करनेवाले सहज ही इस संसार सागर से पार हौ

जाते हं । ३२१

ब्रह्मा जी के वचनो के अनुसार आपने यहु मानव

रूप धारण करके रावणको मारा ओर इस

प्रकार सारे भू-मण्डलका

भार हरण किया । यह्‌ समस्त पृथ्वी शान्तिका सास्राज्य वन गयी । इसप्रकार आपने इन कार्यो से समस्त लोकका दहित किया। उनकी यही
मनोकामना है कि इसी प्रकार लोकहित के ओर भी कायं आप करेंजिससे आपके

यशगान

से चौदहों

भुवन

परिपृणं हों । ३२२

इतना सव कुछ कहकर ऋषि ने प्रभू के चरणों मे ज्लुककर विनतीकिया कि आज की रात बाप यहीं मेरे आश्रम मेही व्यतीत करें ओरकल दही नगर को पधारं जिसपेमेरया आश्रम भी पवित्र हो जाये यही

नेपाली-हिन्दी

२६५
हृक्‌म्‌ भो हनुमानलादइ हनुमन्‌ ! लौ _ श्ृङ्खवेर्मा ग्ई।मेरा खुप्‌ श्रिय छन्‌ सखा गुह तहां तिनूथ्ये समाचार्‌ कही ॥भनी ।आयानन्दीग्राम्‌ गद भादइलाइ गरि भद्‌ श्रीराममेरो

लक्ष्मणको

सिताजिहरुको

सम्‌चार्‌ बताऊ पति ।(३२४॥
गरी।

मैले काम जती ग्यां भरत्ये

सम्पूणं

विस्तार

नन्दीग्राम्‌ जब देखियो तहि ग्या

जाम्या

उहीं हयो भनी॥
जटा
धन्याका।
वाहांको समचार्‌ लिर्ईकन फिन्या सन्ताप सबैको हरी ॥बनी ।हकम्‌ यो हनमानले जव सून्या मानिस्‌ सरीकाजल्दी गै गुहलाइ सब्‌ कहिदिया आयासिताराम्‌ भनी।)३२५॥फेर जल्दी सरयू तरीकन गया देख्या अयोध्यापनि।
वैलाई रहंदा जउन्‌ तरहलेतेस्तै रेयतिको दशा नजर भोदेख्या तहां

भरतलाईइ

श्रीरासका

चरण-चिन्तन

फूल युक्छ पफुखो भई।साधं करूणा भई ।।३२६॥खुप्‌ गव्याका |
अत्यंत शुभहोगा। प्रभुने ऋषि की विनती स्वीकार किया ओर उसरातिवे सैन्य समेत वहींरुक गये! भरद्ाजजी ने सब भतिथियोकासम्पृणं रूप से सम्मान सत्कार किया जिससे उनके मन को अलौकिकशान्ति भिसी। २३२३ प्रभने हनुमानजी को अनज्ञादी किं तुरन्त ्पुगवमंचले जाओ ओर वहां" मेरे परम मित्र गहसे मिलो। उनसे कहना किंवे नन्दी भ्राम जाकर भारईसे मिलले ओर मेरे अनेका समाचार भी कहदे। मेरे साथ लक्ष्मण एवं सीता के समाचार भी अवगत करादें। ३२४
यहां वन में रहते हए ्मैनेजो कुषछभी कायं कर डलेवे सब भरतकोविस्तार-पूकंक समन्ञादें। इस प्रकार वहां के सब समाचार लेकरतथा उनको हमारे कुशल समाचार देकर समस्त जनोंके मन को शीतलकरके तुम तुरन्त यहां लौट आओ । हनुमान ने जब यह्‌ आदेश सुनातोवे तुरन्त मनुष्य रूपकोप्राप्तहो गये भौर गुह के पास पहुंचे तथा रामलक्ष्मण सीता, सहित सवके वहां पहुंचने का समाचार दिया । ३२५पूनः शीघ्रता. से जाकर सरयु पार किया ओर अयोध्या नगरीका भी
अवलोकन किया । नन्दी प्रामजव देखातो मनमे सोचा कि यहींजाना है अतः वे वहां गये! उन्होने देखा समस्त जनता की रेसी दशा
हो गयी है जिस प्रकार मुर्घाया हुजा फूल सुखकरं पीला पड़ जाता है!जनता कौ यह दशा देख उनका मन करुणा से भर उठा 1 ३२६ उन्होनेदेखा भरत सिर पर जटा रमाये श्रीराम के चरणों मं स्वथं कोपित
२६६

भानुभक्त-रामायण

राम्‌का खराउकन मालिक जानि सानी ।हकम्‌ दिदा पनित सेव्रकं आफ्‌ जानी ।३२७॥सन्‌ गेर्वा पिरि मन्त्रि पनी बस्याका।
राम्‌को भजन्‌ तिर त कम्मर खृप्‌ कस्याका ॥देख्या भरतूकन र॒खुश्‌ भई हात जोडी ।बिन्ती गव्या भरतका सव ताप तोड़ी ॥३२८॥जस्को चिन्तन गरनृहन्छ महाराज्‌ सो नाथ्‌ सिताराम्‌ पनि।आई पुम्नुभयो मलाईइ अधि जा भेट्‌ भादलाई्‌भनी॥हकम्‌ भो रघुनाथको रम यहां आयां हुकूमूलेगरी।सीता लक्ष्सणले सहित्‌ कुशल छन्‌ वलोक्यका नाथ्‌ हरि ।३२९॥।येती वीरहरु साथ छत्‌ भनि कुशल्‌ विस्तार्‌ सुनाया जसे ।खृशी भैकन अङ्कुमाल्‌ पनि गव्या ताहाँंभरत्‌ले तसं ॥राम्‌को सुभ्रिवको कहां हुन गयो भेट्‌ सब्‌ बताऊ भनी।सोध्या ताहि भरत्‌जिले र हनुमान्‌- ने सब्‌ बताया पनि 1३३०सुग्रीब्‌ सीत भित्यारि गनुंपनिभो साहायसूग्रीव्‌ भया।लंकामा रहिछन्‌ सितार रघुनाथ्‌ ज्यूका संगे ती गया॥कयि हुए चिन्तन मेंड्बेहुएरैँ।

रामकी पादुकां को ही स्वामी

मानकर रखा है उन्हीं की पूजा उत्तम समञ्चकर कर रहेर्ह। राज्यशासन की भान्ना पाकर भी वह्‌ स्वयंको सेवक ही जानते हैं । ३२७भरतजी

गेरुए वस्त्र धारणकर

एक यती के समान

प्रभुकेध्यानमें

मग्न रह । चितन भजनम कमर कसकरबंठे हुए भरत को प्रसन्नतापूवक हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा उनके ध्यान को भंगकरविनती किया । ३२८ है महाराज ! जिसके ध्यान में आपं खोयेहृए हैँ वे नाथ सीता-रामभीओआ गयेहैँ।

आगे जाकर

भाई से भेंट

करनेका अदेशपाकर ही मै यहां आयाहूं। उन्होने यह समाचारआपके पास भेजा है सीता, लक्ष्मण सहित प्रभू कूशलपृवंक हैँ । उनकेसंग अनेकों अन्यवीर भीरहैँ। ३२९ इतने वीर आदि साथमे कहतेहए कशल समाचार सविस्तार सुनाया जिसे सुनते ही भरत जी नेप्रसन्न होकर उन्हं आलिगन बद्ध कर लिया। उन्होने पृष्ठा करि रामओौर सुग्रीव की भेंट कहां ओौर किस प्रकार हुई सन विस्तारपूवंक कहौ ।तो हनुमान ने भी विस्तार-सहिते सब कह सुनाया । ३३० हनुमान नेभरत को बताया किं सीता को रावण ने हरण किया ओौर अत्यन्त

नेपाली-हिन्दी

सीता रावणले

ह्रे र बहुत

सीताजीकन खोनि खोजि रधघुनाथ्‌

लंमामा गड भारि युद्ध गरिथोलंकामा अधिराज्‌ विभीषण गरीसब्‌ विस्तार्‌ हनुमानदेखि रधुनाथ्‌,भाईलाइ हकम्‌ दिया नगरिकोहे शतरष्न | गराड सब्‌ नगरिकोसब्‌ देवालयमा पूजा अब गरून्‌सुत्‌ वैतालिक बन्दि जनूहरु समेत्‌सब्‌ जाउन्‌ रघुनाथका हजुरमाभारी फौज लियेर मन्विहुरुलेत्राह्मणूलाइ अगाडि लायर हिडन्‌हकम्‌ येति दिया तहां भरतलेहात्मा भेरि लियेर लश्कर चल्यो

दुःखी ` सरीका

२६७
भई।
फर्‌ ऋष्यमुक्मा गई।।३३१॥सब्‌ रावणादी ` गिव्या।श्रीराम्‌ अयोध्या फिञ्या.॥
ज्युका सुन्याथ्या जसं ।संस्कार-खातिर्‌ तसे।।३३२॥
संस्कार अगाडी सरी।नाना विधानूले गरी)निस्क्न्‌ ति कस्वीहरू।जो जो यहाँ छन्‌ अरू ।।३३३॥सब्‌ राजपत्नीलिया,सब्‌लाइ ऊर्दीं दिया ॥हकम्‌ बमोजिम्‌ गरी।
खृप्‌ हषे भो तेस्‌घरि ॥३३४॥।
दुःखित होकर प्रभु सीताको खोज रहै थे ओौर उसी समय सुप्रीव भीउनके साथ सीता कीखोज में ऋष्यमूक गये। इसप्रकार सुग्रीव अौर्‌रघुनाथ कौ मित्रता घनिष्ट होती गयी । ३३१ हनुमान ने बतायाकि लंका जाकर भीषण यद्ध करफे रावण को मौतकेघाट उतारदिया 1 तत्पश्चात रावण के भाई विभीषण को वहां का राज्य सौँपकरश्रीरामचन्द्र जी अयोध्या को लौटे हँ । इस प्रकार हनुमान द्यरा सविस्तारहालचाल ज्ञात होते ही भरत जी उठे ओर रामचन््रजी के स्वागतार्थंप्रबन्ध में लग गये! उन्ह बड़ सत्कारके साथ नगर में लने की आज्ञासारे नगरमे देदी। ३३२ हे शतृघ्न। अगे बो ओर नगरमे

राम-आगमन

प्रबन्ध करो)

की शुभ सूचना दो तथा भलीभांति नगर को सजाने
का
कह दो सभी देवालयों मे विधिवत्‌ पूजा-हुवन प्रारम्भहो
जये) सभी नौकर, चाकर तथा बन्दीजन जो उपस्थित हँ वहु इसीसमय शीघ्र जाकर श्रीरघुनाथ के चरणों में पड़ जायें। ३३३श्रीराम-आागमन की शुभ सूचना सारी अयोध्या नगरी में फैल गयी ।असंख्य सेनानियों को लेकर समस्त मंत्रीगण सपत्नीक चल पङ!ब्राह्मणों को आगे रखकर सवे लोगों को चल पडने की आज्ञा हयी ।भरत की आज्ञानुसार सब लोग हाथों मे पूजा-सामम्री तथा भेट-सामभ्रीसहित अत्यन्त प्रसन्नतापुवेक चल पड़े! ३३४ श्रीरामचन जी के
२६८

भानुभक्त-रासायण

श्रीरामृचन्द्रलिका खराउ शिरमाभाई साथ लिई भरत्‌ प्रभुजिथ्ये
राखीहीडर
तयारीपंदल्‌
भया।गया॥
बनी ।सरीकोआयो श्रीरधघुनाथको पनि विमान्‌ चन्द्रदेखाया हनुमानले प्रभूजिको तेही विमान्‌ हो भनी ।॥३३५॥गन्या।देख्या श्रीरघुनाथको जब विमान्‌ कीतेन्‌ सबलेघोडामा रथमा जती विरथिया ती सब्‌ जमीनूमा ्षभ्या॥।जसं।पृथ्तरीमा, नक्षरीकनै प्रभुजिको दशन्‌ _ मिलेथ्योटैनाट गव्या प्रणाम्‌ भरतले खुप्‌ हष मान्या तस ।३३६॥भार्ईलाई विमानमा लिनुभयो ताहीं जमीनूमा स्षरी।फेरी जल्द प्या भरत्‌ चरणमा सष्टङ्ध - सेवा गरी॥काखैमा पनि राविबक्सनुभयो राम्‌ले भरत्‌ खश्‌ भया ।सीताजीकन दण्डवत्‌ गरं भनी सास्ते अगाडी गया ॥२३३७॥पुकारागरी।ख्वामित्‌ ! हूंम भरत्‌ पर्या चरणमा यस्तोसागरपरी॥सीताका पनि पाउमा परिगया आनन्दलक्ष्मण्‌ लाइपनी प्रणाम्‌ तहि गय्या कामले बडा छन्‌ भनी।आलिङ्खन्‌ गरि सुभ्रिवादि विरको दिल्‌ खुश्‌ गराया पनि।(३३८॥
खदा सिर पर रखकर अपने भाईको साथ लेकर भरत जी पैदल ही चलपड़े ओौर दौडते हुए जाकर प्रभु के पास पहुचे । श्रीरघुनाथ का विमानभी चन्द्रमाके विमान के समानञआगया।हनुमानने उसी विमानकीओर संकेत किया, कहा कि यही प्रभ जी का विमान है। ३३५
श्रीरघुनाथ के विमानके दशन करते ही सवने एक साथ कीतंन.आरम्भकिया। घोड़ों तथा रथों पर सवार समस्त वीर उतर पड़े! पृथ्वीपर उतरनेसे पूवं ही प्रभुके दशन मिलगये। भरतने दूर से देखकेरही प्रणामकर हर्णोल्लास प्रगट किया । ३३६पृथ्वी पर उतरकरभारईको आदर सहित ने जाकर विमान में बिठाया ओर भरत जीनेतत्काल ही श्रीराम कै चरणोंमे
पड़कर साष्टाग दण्डवत्‌ किया।
राम
ते प्रेम-विभोर हौ उन्हँं गोद में उठा लिया। एेसा प्रेम-आल्लिगनपाकर भरतं हरषोन्माद में डूब गये। पुनः वे सीताजी को दण्डवत्‌ करने

के उटेश्य से आगे बढ़! ३३७

स्वामिन { आपके चरणों मेभिराहुभा

मे भरत हू, एेसा कहते हुए भस्त ने सीताजी के पावि पकड लिये ओौरआनन्द-सागरमे इव गये । वहीं उन्होने लक्ष्मणको भी प्रणाम कियाक्योकि करतंन्यपरायण होनैके कारण वे वरिष्ठ है। तत्पश्चात्‌ सभी
२६९

तेपाली-हिन्दी

सुश्रीवादि जती त वानर धिया ती मानिस. स भर्ई।सोध्या प्रश्न कुशल्‌ सब भरतको आपन्‌ कूशल्‌ सब्‌ कही ॥मर्जी सुभ्रिवलाद्‌ तेस्‌ बखततसा यस्तो भरतूको . भयो।या्हीबाट दया भयो प्रभुजिको सब्‌ शतको ज्यान्‌ गयो।।३३९॥हनूभो . यहांचारे भाइ धियौ अगाडि अहिले पचौभारई्का सदं यो सहाय नभया रक्षस्‌ जितिन्थ्या कहां ॥गई ।यस्ता प्रेमृसित बात्‌ गव्या भरतले सुग्रीवजीथ्येश्रीराम चन्द्रजिका प्या चरणमा
शवघ्न खृूशी भई ॥२३४०॥
लक्ष्मण्‌जीकन दण्डवत्‌ गरि सितासेवक्‌ हँ करुणानिधान्‌ ! हजुरकाश्रीराम्‌चन्द्रजिका खराउ शिरमाबेला भो पनि पाउमा भरतलेहात्‌ जोरी विनती ग्या पनि तहांयो गादी लिइबविसयोस्‌ हजुरले

ज्यूका

को प्रेम विभोर दहो आलिगन

चरणमा

पय्या।
यो ताहि बिन्ती' गव्या ॥राखी

गयाका

थिया।
ताहीं लगाई दिया ।२३४१।।नासो लियाको भियां ।
एले

हजूरमा

दयां ॥

करके सवको आनन्दित किया]

सूग्रीवतथा अन्य वीर उनके आलिगन से अत्यन्त हषित हुए । ३३८ भरतनेसवकी कुशलता पृष्ठो । सुग्रीव आदि जितने भी वानर थे सभी नेमनुष्य के समान होकर अपनी-अपनी कुशलता से उन्ह परिचितकराया । सबकी वीरता की कहानी सुनकर भरत जी उन सबके प्रतिअत्यन्त कृतज्ञ हृए ओर कहने लगेकि हेप्रभुजी! अपलोगोंकीदहीदया से हमारे समस्त शत्रुओं का नाश हुआ है। ३३९ वे कहने लभेपहले हम केवल चार भाईहीथे अब पांचवे अआपहुएु) भाई के समानयदि आप सहायक न होते तो राक्षसों पर विजय किस प्रकार मिलती, \
तत्काल ही सुभ्रीव के निकट जाकर उन्होने इस, प्रकार प्रेमपूर्वकवार्तालाप किया । श्रीरामचन्द्र जी के पास जाकर शतृध्न भी उसी समथउनके चरणों मे पड़कर अत्यन्त प्रसन्न.हुए । ३४० लक्ष्मण जी को भरतंने दण्डवत्‌ कौ ओौर सीताजीके चरणो में भिरकर कहने लगे, हे करुणानिधान मै भापका सेवक हुं। इस प्रकार विनती. करकेवे राम की ओर
अग्रसर हृएओरनो राम की पादुकायें अपने सिर पर रखकर लयेयेउन्हँ उचित अवसर देखकर उनके चरणों मे पहना दिया । ३४१उनक्तेचरणों भें पादुक्रायें धारण

करवाकर

वे विनती

करते लगे-हे प्रभ ।
आपकी यह्‌ राजगही भने अमानत के रूपमे सुरक्षित रखी है आज यह
२७०

भानुभक्त-रामायण

सन्‌. कोष्मा पनि अन्नको र धनकोराख्याको छु दयानिधान्‌ । हजुरकोयो. बिन्ती खुशिले तहां भरतले
दस्‌ खण्ड बता गरी।सेवाविषे मन्‌ धरी ॥२३४२॥साम्ने गव्याथ्या जपै।
देष्या भक्ति भरत्‌जिको खुशि भईनन्दीग्राम्‌ पूगि उत्रिबक्सनु भयोपुष्पक्लाईइ बिदा पनी दिनुभयोताह श्रीरघुनाथ्‌ वशिष्ठ गुरुका
सम्पूर्णं रोयातसै ॥ठकूर्‌ जमीनृमा पनि।कूवेरथ्यें जा भनी ॥३४३॥पाऊनमस्कारमरी।
याहं राज्‌गरिबकिसियोस्‌ भनि असल्‌आसनूमा गुख्लाई राखि नजिकंपाया दश्ंन रामको र सबकोकेकेयी र भरत्‌ मिलेर रधघुनाथ्‌
आसन्‌अगाडीधरी ॥आसन्‌ विषे राज्‌ भयो।सम्पूणं सन्ताप्‌ गयो ।। ३४४

ज्यूका

चरणूमा

परी।
हात्‌ जोरीकन राज्य अपंण गन्या विन्तीबहुतगरी ॥जसूले एक कटाक्षले सहज यो ब्रह्माण्डसब्‌ हदंछन्‌ ।जो एे्वये छ इन्द्रको उ पनि एक्‌ क्षण्‌मा तयार्‌ गदंछन्‌।। २४५।।यस्ता शुद्ध अनन्त पूणं सुखरूप्‌ ब्रह्मस्वरूपूलेपनि।क्या राज्‌ गनं थियो तथापि लिनुभो खूशी हउन्‌ ई भनीसव कुष आपको सौप रहाहूं अव अआपही इसे संभाले । यह सारीराज्य सस्पदा पुनः स्वीकार करने की कृपा करे! समस्त भंडार तथाकोषागार मे अन्न तथा धन को दस गुना वृद्धि करके, मै केवलश्रीमन्‌ का ध्यान धर के सम्हालता रहाहूं। ३४२ भरत की एेसी भक्तिपुणं विनती सुनकर वहां के समस्त उपस्थित जन रो पडे।नन्दी ग्राम
पहुंचकर भगवन्‌ भी पृथ्वी पर उतर पड़े। पुष्पक को कुवेर के पासजाने कौ आज्ञा देकर विदादेदी । ३४३ श्रीरघुनाथ जी गुर वशिष्ठ के पासपहुचे ओर उनके चरणों मे गिरकर प्रणाम किया। गुरू की ओर एकउत्तम आसन

बढाकर

उनसे विराजने का अनुरोध किया।

स्वयंभी

उनके आसन के ही निकट आसन म्रहण किया । समस्त ॒उपस्थित जनउनके पावन दशंनोंको पाकर पपोंसे मुक्त हो गये! ३४४ केकेयीगौर भरत दोनोंही रधृनाथजीके चरणों में नत हो, हाथ जोड़करराज्य-पाठ सौपत्ते हृए विनीत भाव मे डव गये। एसे महाशक्तिशाली प्रभु जिनके संकेत मात्रसे सारा त्रम्हाण्ड हिलि उठता है तथाइन्द्र के एेष्वयं की सी रचना क्षण भरमेंकर देतेहैँ। ३४५ ठेस शुध
अनन्त सुखसागर प्रभु जिनमे ब्रम्ह मेद टपा पड़ा है जिसका पता कोई

` नेपाली-हिन्दी

पेल्टे स्तान्‌ भरतादिले जब गव्यास्तान्‌ सीतापत्िको पी तहि भयोमाला

चन्दन वस्त्र हार पहिरी

राम्को स्तान्‌ र सिताजिको तहि सगेसीताराम्‌ रथमा सवार्‌ हुनुभयो` हात्तीमा रथमा सवार्‌ हून गयारास्‌कासारथिता भरत्‌ हुन गयासेतो छतर लिया बहूत्‌ खशि हंदष्का लक्ष्मणले लिया प्रभुजिकोअर्को चामर एक्‌ विभीषणजिलेमानिसूले त॒ बखान्‌ कहांतक गरूरम्‌को कीतेन खुप्‌ गव्या र सुनियोभेरी शङ्खः मृदङ्ग आदि नगराश्रीरास्को पनि कुच्‌ भयो रथ ची
२७१
कषौरने जटा साष्‌ .गरी ।तेस्तं प्रकार्‌ले गरी ॥३४६॥आसन्‌ विषे राज्‌ भयो ।
हदा सवे ताप्‌ः गयो ॥सु्रीव्‌
विभीषणृहरू ।
घोडंमहां क्वे अरू ।।३४७॥।सेवा म ग्ट भनी,शतृघ्नजीलेपनि ॥सूग्रीवलेताचंवर्‌ ।खूशी भया सब्‌ अवर्‌।२४८॥सब्‌ देवतालेपनि।मीठोमधूरो ध्वनि ॥खुप्‌ बज्जन लाग्या पनि'।जाऊ अयोध्या चनी । ३४९॥
नहीं लगा सका, उन्हं क्या राज्य करनाथा उन्हुने तो सबके संतोषकेलिए भरतद्वारासौपि हुए राज्य भार को स्वीकार क्िया। सवंप्रथम
भरत ने स्नान किया ओर अपनी जटाओं का कत॑न किया। उसी प्रकार

सीतापति रामचन््रजी नेभी स्नानादि करके

छुटकारा पाया । ३४६

रामचन्द्र जी सीता सहित स्नानादि से निवृत्त होकर वस्त्रादि धारण किथे-।उन्होने चन्दन से अपना अंग सुगन्धित किया तथा मालाओं से सुसज्जितहुए । तत्पश्चात प्रभु सीता सहित आसन पर आरूढ हुए जिसे वहां
के उपस्थित्त जनके हृदयकासारा दुःख भूल गया ओर वहं एक सुखपृणंवातावरणबन गया।सीताराम रथ मं सवार हुए। सुग्रीवविभीषणादि हाथी व रथ पर सवार हुए 1 अन्य लोग घोड़ों पर सवारहो गये । ३४७ भरत ने कहा मै आपकी सेवा करूगा ओर उनके सारथीबनकर उनके रथ पर बैठ गये । शतरृष्न ने अत्यन्त प्रसन्न भावसे छतहाथमे धारण किया। लक्ष्मण नेप्रभु पर पवा ज्ललनेका काम लियाओर सुग्रीव ने चंवर इलने का कर्तव्य पालन ` किया।एक ओर्चंवर लेकर विभीषण भीतत्पर हो गये। एसे आनन्दमयवातावरण में अन्य सभी लोग आनम्द-- विभोर हो गये । ३४८ एसे समय
मे मनुष्य द्वारा किये गये कीतेन भजन का वणेन कहं तक किया जायेयहां तक किं देवताओं ने भी प्रसन्न होकर कीतंन-भजन अत्यन्त मधुर ध्वनिमे गाया। घंटा, शंख, मृदंग तथा नगाड़ा आदि भी बज र्ठे। श्रौरामने

भानुभक्त-रामायण

२७२९
श्रीरामृको पुरिमा प्रवेश्‌ जव भयोनिस्क्या बालक वृद्ध दशन गरोदेव्या श्रीरचुनाथलाइ रथमाफ्याम्‌ सुन्दर छशरीर्‌ किरीटशिरमालालू छन्‌ नेत्र विशाल खुप्‌ हूदयवेस्‌णोभा चन्दन पुष्पको पनि छ वेस्‌सून्या स्त्रीहरुले पनि शहरमासबको चञ्चल चित्त भो र वहतंछोडचा काम्‌ घरको चद्या गृहु-उपर्‌लावा पुष्प गिराडंदे प्रभुजिकोरामको मोहनमूतिमा जव नजर्‌खूृशी भेकन अद्कुमाल मनलेईषत्‌ हास्य गरी प्रजाकन नजर्‌दरवार पौचनुभो जहां त दशरथ्‌
सब्‌
पौरवासी,
पनि।

हेरों

तमाशा

भनी ॥
थीया पिताम्बर धरी।भूषण्‌ शरीरमा भरी ।३५०॥वेस्‌ मोतिका हार छन्‌ ॥देष्त भयो खूशि मन्‌ ॥आयासिताराम्‌ भनी ।हेरौ सितारम्‌ भनी ।।३५१।।सब्‌ स्त्री अटाली गई।
दशन्‌ गन्या खूश भेसब्‌ स्तरीह्धरुका पन्या।सब्‌ स्तीहरुले गन्या।३५२॥दीदेंरमानाथ्‌पनि]वस्थ्या
उही जाँ भनी॥
रथ में चठ्‌कर अयोध्या जनेकी आज्ञादी। ३४९ श्रीरामने अयोध्यातगरीमेंजंसे ही प्रवेश किया समस्त नगरवासी उनके दशंनाथं दौडपड़े । वालक, वृद्ध सभी उस उत्सव पूणं मेले को देखने के लिए निकलपड़े। श्रीरामचन्जी पीताम्बर धारण किए हुए रथ पर विराजमानथे। श्यामलगात में अत्यन्त सुन्दर आभरूपण चमक रहै थे तथा उनकेशीश पर मुकृट शोभायमान हो रहाथा। ३५०सारी अयोध्या नगरी
मे राम के आगमन कौ सूचना फल गयी । स्व्रियोनेभी इस शुभ सूचनाको पाया जिससे उनके मन प्रभुके दशंनों के लिये आतुर हौ उठे।

श्रीरामचन्द्र

कौ शोभा अतुलनीय थी। ` उनके

विशाल एवं गुलाबी

नेव अत्यन्त सुन्दर लग रहै थे। उनके वक्षस्थल पर उत्तम मोतियोंकी माला शोभायमान हो स्हीथी। उनके चारों ओर चन्दन तथा
पुष्पो की वहार थी जिसे देखते ही मनउठता था!

प्रसन्नता सेप्रफुलिलित हौ

एसे मनोरम रूप को देखने के लिये समस्त स्त्री-दल

व्याकुल हो उठा । ३५१

सभीस्तियों ने तुरन्त धरके धन्धोंको छोड

दिया ओर ऊची-ऊची अदालिकाभों पर चट्‌ गयीं। प्रेमानन्द से उमंभितहोकर लावा तथा पृष्पोंकोवे लोग पावन खूप के ऊपर वरसाने लगीं ।
हृदय में प्रेमसे ओत-प्रोत होकर वे प्रभुके दशंन करने लगीं! जिसनेउस भव्य रूपके दशंन किये, मन ही मन उनके आलिगन का अनुभवकरने लगीं । ३५२ इसी प्रकार प्रजाजनों पर दृष्टिपात करते हुए
तेपाली-हिन्दीकौसल्याहरुलाद

योग्य

रितले

सुग्रीवृको पनि वास्‌ खटाउनु भयोसुग्रीवृजीकन राख भाई तिमीलेसबलाई तिमिले खटाउ बडियाहकम्‌ येति हूंदा तहां भरतलेसन्को वासं खटन्‌ भयो सब तहांआफे श्रीरघुना्‌ हुकूम्‌ अब गरन्‌सुग्रीव्‌लाइ अद्ाउनू पनि भयोहे सुग्रीव | खटाउनू्‌ अब पन्योचारौतफं गर्द समुद्र पुगि जल्‌श्रीराम्‌चन्द्रजिलादइ्‌ राज्य अभिषेक्‌मर्जी भो र भरतृजिको उहि बखत्‌जल्‌ लीनाकन जाम्बवान्‌ र हनुमान्‌पौँच्या जल्द समुद्रमा सहज जलु
२७३
ताहनमस्कार गरी।साधं पियारो गरी ॥३५३॥पैल्हे म॒ बस्थ्यां जहाँ ।घर्‌ बस्नलाई्‌यहां ।सोही बमाजिम्‌ गम्या ।आनन्दसागर्‌ पन्या ॥ ३५४]यो मन्‌ भरत्‌ले गरी।
खश्‌ भे अगाडी सरी॥वीर्‌ वीर्‌ विचार्‌ खृप्‌ गरी ।ल्याउन्‌ कलश्मा भरी।।३५५॥।ग्न्य बखत्‌ भो भनी।ल्याई दिया जल्‌ पनि॥अंगद्‌ सूषेण्‌ चार्‌ गया।लीयेर दाखिल्‌ भया ।।३५६॥।
श्रीरामचन्द्र जीने दरबार मेंप्रवेण किया ओर उसी जगह

पहुचे जहां

राजा दशरथ विराजते थे। उन्होने माता कौशल्या से मिलकर यथायोग्य रीति से उन्हें प्रणाम किया तथा सुग्रीव के रहने की व्यवस्था करनेका अदेश दिया । ३५३ उन्होने कहा, हे भाई ! जहां पर भँ रहताथावही स्थान सुग्रीव के लिये उचित होगा । यह्‌ प्रबन्ध करने के लिये
तुरन्त सबको भेजो । अनज्ञा पति ही तुरन्तही भरतजी नेरामकी
इच्छानुसार सारी व्यवस्थाकरदी।सब लोग उचित निवास स्थानपाकर विश्राम करने लगे ओर एसे सुखद भिलनकीब्ेलामे सभी लोग
आनन्दम इूव गये! ३५४ भरत नेसारे अदेशं का पालन कियाओर पूनः उनके आदेश की प्रतीक्षा में खड़हो गये। उन्होने अग्रसरहोकर सूग्रीवसे अनुरोधकियाकिहेसूग्रीव ! अब हमे जल की व्यवस्था
करनी चाहिये ओर इसके लिये चारों दिशाओं मे वीरो को भेजना होगाजिससे वे समूद्रों तक पहुंचकर कलश मे जल भरकर ले आये । ३५५ जल
लेने कै लिये जाम्बवन्त, हनुमान, अंगद तथा सुषेण नामक वीर गये ।वे शीघ्रता से समुद्र तट पर पहुचे ओर जल भरकर नले आये।भरतजीने वीरोंद्रारा लाये गये जल को लिया गौर श्रीरामचन्द्र जी के राज्याभिषेक कौ तेयारी में लग गये । ३५६ भरत जी जल लेकर गुर
२७४

भावनुभक्त-रामायण

साम्ने भरतृजी गया ।यो विन्ति गर्दा भया॥हजुरले छरी।फेर बविन्ती करजोरि ख॒प्‌ सित गय्या ये जल्‌श्रीराम्‌चन्द्रजिलाई राज्य अभिषेक्‌ दिन्‌ हवस्‌ यस्‌ घरि।। ३५७यस्तो बिन्ति सुनी वशिष्ठ गुरुले वेस्‌ बिन्ति गछ भनी ।पनि ॥श्रीरामृचन्द्रजिलाइ राखनु भयो सिहासनेमागौतम्‌ वाल्मिकि वामदेव इ समेन्‌ जावालि ताहीं थिया।ती सबले संगभे वशिष्ठ गुले जल्दी अभीषेक्‌ दिया।।३५८॥असल्‌।कन्या ज्राह्यणले पनी तुलसिदल्‌ हालेर कुश्लेमन्वे पू्वेक खृशि भैकन छन्या रामूका उपर्‌ शुद्ध जल्‌ 1गई ।सेतो छत लिया तहां प्रभूजिको शतरध्नजीलेसुग्रीवूले र तहां विभीषणजिले हक्याचमर्‌ खुश्‌ भई।।३५९॥इन्द्रजीलेपति।माला काञ्चन वायुले पनि दिया हार्‌नाना रत्न खचित्‌ गरायर दिया परून्‌ सिताराम्‌ भनीगाञ्छन्‌ तहिदेवतागणहरू सब्‌ अप्सरानाच्तछन्‌ ।वर्ण्यो खृप्‌ सित पुष्पवृष्टि नगरा नञ्दा भयो खूशी मन्‌॥।३६०॥
त्यो जल्‌ साथ लिई वशिष्ठ गुरुकायोह चार समूद्रको जल भनी
वशिष्ठ जीके समक्ष गये ओर विनीत भाव से बताया कि यह्‌ चारसमूद्रो का जलदटहै। उन्होने उनके न्न निवेदन किया कि अप इसजल को चछिडककर शीघ्रातिशीघ्रं श्रीरामचन जी का अभिषेक करंओर इस शुभ कायं को सम्पन्न करने कीकृपा करे । ३५७ भरत जीकीविनती सुनकर गूरुजीने कहा ठीक है ओर उन्होने उसी समय श्रीरामको सिंहासन पर विठाया। गौत्तम, बात्मीकि, बामदेव एवं जावालि
सब वहीं उपस्थितथे। उन सब ने मिलकर गुरु जी के साथ इसशुभ काये कौ सफलतापूवेक सम्पन्न किया | ३५८ त्रम्हचारी ब्राह्मणोंने भी प्रसन्न होकर मन्तोच्चारण करते हुए कूशसे तुलसी-दल तथा जलइत्यादि लेकर श्रीरामचन जी के ऊपर चछिड़का। श्तृघ्न ने उसीसमय श्वेत छत लेकर प्रभ के ऊपर लगाया । आनन्द तथा प्रेम में डबकृर सुग्रीव भौर विभीषणने भी चंवर इलाया । ३५९ वायुने कचनहारप्रभ को पहूनाया तथा इन्धने प्रसन्न होकर रत्नजटित हार सीतारामको पहनने के लिये भेटकिया। देवगण गीतं गा उठे तथा अप्सरायें
नाचने लगीं, आकाश से पृष्प वर्षा होने लगी तथा नगाड़ोंकी ध्वनि गंजउठीसमस्त वातावरण एक अद्भुत रस में इव गया। ३६०

नेपाली-हिन्दी

२७१५
गम्भीर श्यामशरीर्‌ किसीट्छशिरमा माला पिताम्बर धरी)कोटी कमसमान सुन्दर स्वरूप्‌ वामूतफसीता धरी ॥सिहासन्‌ बसि सब्‌ प्रजातिर नजर दीन्‌भएथ्योजसै।दशेन्‌ गनं भनेर पावेति समेत्‌ आया सदाशिक्‌ तसे ॥३६१॥डिम्‌ डम्‌ शब्द भयो तहां उमर्को नन्दी र॒भृद्धीपनि।ताल्‌ वेतालूहर नात्न लागितगया आया सदाशिव्‌ भनी।।शम्भूका पछि देवगण्‌ सब तर्हां अआएरहानिर्‌भया।श्रीरामुको स्तुति खुप्‌ गरेरखुशि मै सब्‌ जलि्दि फर्कीगया।३६२॥बाजा खुप्‌ शब्द गष्ठेन्‌ स्तुति गरि ऋषिगण्‌ देवगण्‌ पाड पष्ठन्‌ ।वषेन्छन्‌ पुष्प वृष्टि प्रभू-उपर्‌ अनेक्‌ प्राणिले सौख्य गच्छेन्‌ ॥सिहासन्मा विराज्‌मान्‌ सकल गुणनिधान्‌ रम्‌ हूनूभो जसं ता ।सीता लक्षम्‌ संगे छन्‌ प्रभुकन हुनगो पूणं शोभा तसं ता ॥३६३॥

राजा श्रीरघुनाथ्‌ हूंदा परृथिविमा

सस्यादि

थीयानन्‌ अति गन्ध जौन फलमा

तिनूमा सुगन्धी चढचयो ॥

राज्याभिषेक के समय श्यामलगात

सुमुखि

सीता

उनकी

श्रीरामचन

महारानी

बनकर

खुब
बढचो।

जी के बायीं ओर

विराज

रहीं है।
प्रभु के तन मे पीताम्बर तथा वक्षस्थल पर सुन्दर मालासुशोभित हो रहीदहै। उनके मस्तक पर राज्य मुकुट चमक रहाहै । राज्य सिंहासन पर सीता सहित सुशोभित प्रभुने समस्त प्रजा पर
एक दृष्टि भरदेखने कौ छपा की।

उसी समय

उनके दशंनोंकी

अभिलाषा से श्री शंकर पावती के साथ उपस्थित हो गये। ३६१उनके पहुंचते ही उनके उमरू के डिम-ड्मि स्वर की ध्वनि गंज उटी।नन्दी ओौर भृगी तथा ताल वेताल उनकी उपस्थिति का आभास पाकर
नृत्य कर उठे । ततृपश्चात अन्य देवगण भी वहां पहुंच गये । सभीने
मिलकर बड़ हषं के साथ नाचते गते हुए श्रीराम के राज्याभिषेक केअवसर

पर धूमधाम से उत्सव

सम्पन्न किया।
मन से अपने-अपने निवास स्थान को लौट गये) ३६२

तत्पश्चात्‌

सन्तुष्ट

सकलगुण निधान

श्रीरामचन्द्र जी सीता तथा लक्ष्मण के साथ जंसे ही सिंहासन पर विराजे,सम्पूणं दृश्य एक अदुभुत शोभा को प्राप्तहो जाताहै। बजे गाजोंकातीत्र स्वर गूज उछा।समस्त ऋषिगण स्तुत्तिकर उनके चरणों सेंपड़ जाते हैँ । अनेकों प्राणी सुख का अनुभव करतेहै। प्रभ के ऊपर

पुष्प-वर्षा होने लगती है । ३६३

श्रीरघुनाथ के आधीन राज्य`होते हौ

२७६

भाचूभक्त-रामायण

धेनूदान्‌ वृषदान्‌ गन्या प्रभुजिलेवस्ाभूषण रत्न दान्‌ पनि ग्यादानूले ब्राह्मण खुश्‌ गराई रघुनाथ्‌माला सूयं समानको दिनुभयोमर्याद्‌ खुप्‌ गरी बाजु बन्ध दिनुभोताहीं एक अमूल्य हार्‌ दिनुभयोसीताले हनुमानलाद्‌ दिनि सूर्‌कस्तो हुन्छ हृकूम्‌ भनीकन नजर्‌जस्लाई दिन मन्‌ छ देउभनियोप्यारा श्रीहनुमान्‌ थियार्तहि दिइन्‌
तीस्‌ कोटि सुन्‌ दान्‌ गरी।दारिद्रय सवृको ह॒री ।३६४]सुग्रीवलार्दपनि ।दीन्‌ उचित्‌ हो भनी॥अद्धद्‌जिलाईपनि।सीताजिलाई पनि ॥३६५॥वरधिर हात्मा लिइन्‌।
ख्वामित्‌तरपफृखु पृदिइन्‌ ॥हकम्‌भएथ्योजसै।त्योहार सिताले तसै। ३६६॥
सन्‌ दर्जा हनुमानको तहि वढयो फेरीप्रभूतेपनि ।क्या माग्छौ वरदान माग तिमिले दिन्छूम त्यो वर्‌ भनी॥हकम्‌ वक्सनुभो तहां र हनुमान्‌ खृश्‌ भै अगाडी सम्या।जो मागन मनमा धियो हजुरमा हात्‌ जोरि विन्ती गव्या ३६७॥।~^
सारे राज्य में सुख चैन की वर्षा होने लगी।समस्त पृथ्वी"पर देश्वयं वैभव कौ वृद्धि हुई। प्रभुने तीस करोड धेनु, वृक्ष तथास्वणं दान करके तथा वस्त आमभूषण तथा सभीको एेसा दान दियाकिं समस्त दसिद्रिताका नाशो गया। जिन पुष्पोंमें दुगन्धिथी उनमेंप्रभुकीकरपासे सुगन्धि आ गयी 1 ३६४ दान दक्षिणासे ब्राम्दणोंकोप्रसन्न करके प्रभ नेसूुम्रीवकी भोर ध्यान किया जौर उन्हँ सूयं के समानमाल्यापंण किया। मन ही मन उन्होने अंगदकाभी स्मरण किया ओरउन्द एक बाजूवन्द देने कौलकरेपाकी। तत्पश्चात महारानी सीता कीयाद आई ओर उन्होने उन्है एक अमुल्य हार प्रदान करने की अनुकम्पाकी | ३६५ सीता जीने मनही मन वहु हार हनूमान कोदेनेका
निष्चवय किया किन्तु आज्ञाकी प्रतीक्षा मे उन्होने प्रभुकौ ओर देखा।प्रभु ने उन्है स्वतंत्रता प्रदान की ओौर कहा जिसेदेना चाहौोदेदो।स्वामी की आज्ञा पाते ही उन्होने प्रिय हनुमान कोजो वहीं पर उपस्थित थे,बूलाया ओौर वहु हार उनके हाथों मेदे दिया । ३९६ इसप्रकारहनुमान की स्थिति मे वृद्धि हुई ओर प्रभु ने उन्हु वरदान मांगने की.आज्ञा दी । उन्होने कहा मै वरदानदेता हूंतुम जो सांभोगे व्ही मिलेया ।प्रभ की इस आन्ञा को पाकर हनुमान प्रसन्न होकर अग्रसर हुए ओर कुछमांगने कौ इच्छासे वे हाथ जोड़कर प्रभु के सामने खड़े हौ गये । ३६७
२७७

नेपाली-हिन्दी

खवामित्‌ ! नाम हजूरको जव तलक्‌ताहींसम्म शरीर रहोस्‌ हजुरकोखवाभित्‌ ! नाम हजूरको स्मरणमात्यो आनन्द कतं मिलेन महाराज्‌यो बिन्ती सुनि लौ भनीहुकूमभेवित्ला कल्प रयौ बित्यापछ्ठि भन्याहकम्‌ यो रघुनाथको हून गयोजोजोहुन्‌ सुख भोग्‌ सवे वश रहुन्‌आशीर्वाद यति बक्सनू जब भयोआनन्दाश्रु गिरा तप्‌ गरं भनीफर्‌ ठाकरुर्‌ गुहका अगाडि गदयोजाऊ लौ धरमै बसीरहु फकत्‌यो प्रारन्ध दलोभोश नगरी

हस्थेछटौ तिति मुक्त देह पिता

उन्होने प्रभूसे इसप्रकार

लीनन्‌ जगतूमाबडा]नाम्‌ सुन्नलाई्‌ खडा.आनन्दजो .पाउष्‌।तेही नष््टोस्‌ कषु ।।२३६८॥फेरी: कृपा भो पनि।सक्तंहन्याछठौ भनीफर्‌ जानकीलेपति।तिस्रा हनूमान्‌ भनी।।३६९॥बीदाहनूमान्‌ भया।हीमालयेमागया ॥हृकूम्‌ कपालेगन्या।मन्‌ मात्र ममा धन्या।।२३७०॥
ब्देनकस्तंसंसार्‌ सहनजूमा
निवेदन किया।
गरी।तरी ॥

है स्वामी ! जब तक इस

, संसार में आपके नामकाजाप होता रहै तब तक श्रीमान काजलाम सुननेहेतु यह शरीर रहै। भपकेनाम मात्रके. स्मरणसे ही जो आनन्दप्राप्त होगा वह भौर कहीं भी नहीं । अतः यही आनन्द मृञ्चसे न छूटने
पाये । ३६८ हनुमान की भक्तिपुणं विनती सुनकर प्रभु ने तथास्तु कह्‌कर पूनः आज्ञा करनेकीकरपा की, यह्‌ शरीर समाप्त होने के पश्चाततुम मुक्ति को प्राप्त हौ जाओोगे। रघुनाथ की एेसी आज्ञा सुनकरजानकोजीने भी उन्हे यह्‌ वरदान दिया कि समस्त सुख भोग हनुमान जीके वशीभूत होकर रहेगे अर्थात किसी सांसारिक सुख की इच्छा अपनेवेशम करके उन्हुं भक्ति मागेसेहटा नहीं सकती । सीता माता सेरेसा
आशीर्वाद पाकर हनुमान हषं से गद्गद हो गये।.३६९ भगवान के एसेआशीर्वाद एवं वरदान से भरे पूरे हनुमान वहाँ से विदा हुए 1 आनर्दके अश्रुपात करते हुए वे तपस्या करने के लिये हिमालय पवेत.की ओरचले गये। प्रभुने पुनः गह्य के सम्मुख जाकर उन्हँं यह ञज्ञा दी कि
घरमे बैठकर केवल मनसेही मेराध्यान करते रहो वही प्रेम सच्चा
होगा । ३७० ये प्रारब्ध महान हैँ! जितना कु भोगना भाग्यमे.आचुका है उसे शान्तिपूर्वक भोगना' ही उचित है वह कदापि टल नहीं
सक्तादहै।
हदयसेमेरा ध्यान करनेमात्र सेही इस शरीर से मुक्ति
२७५०५

भानुभक्त-रामायण

हकम्‌ यो गरि मुख्य भक्त गरहुका सामने अगाडीसरी।आलिगन्‌ गरि भूषणादि दिनुभो राज्यं समेत्‌ थप्‌ गरी॥२३७१॥

तत्वे ज्ञात्‌ पनि वक्सनू तहि भयो

बीदा भे गृहजी गया घधरमहांयस्ते. रीत्सित स्‌ विदा तहि हदंलक्ष्मण्‌ सेवके छन्‌ सदा हजुरमाआत्मा रूप्‌ सवं के्मंका अधिपतीकर्तां भैकन लोकलाईइ उपदेशगर्नालायकअश्मेधहरजोती सव्‌ यज्ञ पनी गन्या प्रभजिलेराजा राम्‌ भद्वक्सन्‌ जव भयोजो पर्थ्या अवि ताप्‌ अनेक्‌ तरहुका

सानन्द

सागर

परी।
सन्‌ रम्‌-चरण्‌मा धरी॥सुग्रीव्‌ विभीषण्‌ गया।राम्‌ राज्य गर्दा भया।।३७२॥नि्मंल्‌ अकर्तापनि।गर्न्या उचित हो भनी ॥ट्ूला दुला यन हन्‌ ।वकि रहन्ध्यो कउन्‌।।३७३।।माणी प्रजा खुश भया।ती सव्‌ प्रजाका गया।]
पाने के पष्चात तुम संसार सागर सेपार हो जाभोगे। एसी भान्ञादेने के बाद मुख्य भक्त गृह्य के सम्मुख जाकर अगे वढ़ गौर उन्हं अपनीबाहों मे भरकर आभूपणों का दान दिया 1 ३७१ उसी समय उन्होनेउन्दं तत्वज्ञान से भी परिचित कराया । अतः सम्पूणं आनन्द में डूवकरगुह्य श्रीराम के चरणों मे अपने मन को अर्पण कर चे गये। इसीप्रकार से सग्रीवं विभीपण सभी वर्हासे विदाहौगये। लक्ष्मणजी रामकी सेवा में सदाके लिये ही उनके चरणों मे ही रहै ओर राम-
राज्य का भलौकिक आनन्द लेते हए राम की सेवा में लीन रहै। ३७२
श्रीरामचन्द्र जी प्रत्येक कायं के कर्ताहं] वे आत्मास्वरूपहुर कायंमे रहते हँ कछ बड-वड़ कायं उन्टोने स्वयं क्रिये जिसे मानव ने समला किवे कायं स्वयं प्रभ ने अपने हायो सम्पञ्च किया किन्तु कुछ कायं वे मानवके अन्दर प्रेरणा बनकर करतेरहँ। उन्होने राज्यक्ताज सम्हालने परवड़-वड़े अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किये । समस्त संसार को अपने पावन उपदेशोंसे भर दिया। सारी प्रजा.को भुव शान्ति तथा सन्तोष प्रदान किया।अब उनके लियेक्या करनारेपथा। ३७३ श्रीराम जव राजा वनेतोसमस्त प्रजामे प्रसन्नता दही प्रसन्नताछागयी। रामराज्यसे पूवं होनेवाले सारेक्ष्टों का नाशहौगया। किसी विधवा का शोक विलापनहीं रह्‌ गया। देशमेंरोग बीमारी कानाम तक नहीं रहा । किसीव्याधा का भयंकर प्रकोप भी तहींरहा। चोरीया उकैती आदि चिनौने

कायं की प्रवृत्तिभी देशसे मिट गयी

देष से मुक्ति पाकरनि्मल

होगये।

सवके हृदय छल, कपट तथा

नगरमे किसी को अपनी वस्तुये

नेपाली-हिन्दी

२७९
गर्देनन्‌ विधवा विलाप्‌ मुलुकमा लाग्देन : रोगव्याध्‌ पनि।स्‌ डाक्‌ दबिया परेन कहि ताप्‌ योचीज्‌ हरायो भनी।। ३७४बरूढो बाचि मरेन बालक कहीं यस्तो मूलुक्मा भयो।छोरा च्चै गरि पालिबक्सतु हुँदा सब्‌ ताप्‌ प्रजाको गयो॥गैन राघवको भजन्‌ जनहरू वषेन्छ मेघ्‌ ` कालमा।वर्णाश्रम्‌ सब धर्मं छन्‌ दिन विह्या सबका सुखे चालमा ।३७५॥अयुत वषत राज्‌ प्रभूको भयो।सकलताप्‌दुनिर्याहरुको ` गयो ॥शिवजिले
यति

पावंतिथ्ये

कल्या ।
सकल पाप्‌ ृटिजान्छ सुनी रद्या ।।३७६॥श्रीरामका यत्ति कथानके जो कहन्छन्‌ ।सब्‌ थोकले ति परिपूणं भई रहन्छन्‌ ॥।धन्‌ पृव्र॒राज्यहरु कसम्ति हुंदेन केही ।पाप्‌ हनंलाई पनि सख्य छ धमं येही ॥३७७॥
जन्मन्छन्‌ तर मदंछन्‌ पनि सवैतेस्ता स्वीहरुले भने यति सून्या
जस्कार्गच्छन्‌
त॒छोराहरू।पष्ठीका अरू॥
खोनेयाचोरीहो जाने की आशंकादही नहीं रही । ३७४

अकाल मृत्युस

सब छुटकारा पा गये । वृद्धोंके जीवित रहते हुए बालकों की मृत्यु कहींनहीं देखी जाने लगी । प्रजा जनों का पालन राजा अपने पत्र के समानकर रहैथे।
अतः सबके हदय दुःख तथा तापसे मुक्तथे।

समस्त

राज्यमे राघव के गीत-भजन गृंजते थे। समय पर वर्षा होतीतथा अकालसे मुक्ति मिली वनाश्रमों में .धम-कमं होते अतः सबकाजीवन सूख संतोषमय हौ गया । ३७१५ अनेकों प्रकार से लोग राजाके गुणगान करते । सबके मन सन्तुष्ट थे, सन सुखी थे कििसीको किसीप्रकारका दुःखनहीथा। एसे राज्य की प्रशंसा सुनकर शिवने पावतीसे कहा कि सुनते हैँएेसे राम-राज्य के अन्दर निवास करने सेही सकलपापों कानाश होता है। ३७६ इस संसार में धन-पूत्र आदिसे मोक्षनहीं मिलता यह सब तो क्षण भंगुर है, बड़े-बड़े राज-पाठ भी अंतिम दशाको प्राप्त होग्ये।! अपने पापों को नाश करने का एक धमं मागं
यहीहैकि प्रभु के गुणगान कयि जयेँ। श्रीराम की कथा जौ कहताहै वह मनुष्य सभी सुखों से परिपुणं रहता है । ३७७श्रीराम केभजन से मनुष्य के जीवनकी कोईभी कमी पूरी हो सकती दहै) कभीकिसी के पुत्तादि जन्म नेकर तुरन्त ही मृत्यु कोप्राप्त हो जाते कितनी
२८०

भानुभक्त-रामायण

बन्ध्या स्त्री पति पारं सुत असल्‌आधिव्याधि अनेक दुःख भय ताप्‌
गछन्‌ कृपा राम्‌ धनी।पदन कल्यं पनि ।३७८।
श्रीरामको यति कथा जतिले त सुन्छन्‌ |सब्‌ देवता तिसंग खुप्सित खूशि हृन्छन्‌ ॥जो विघ्न हुन्‌ ति पनि नष्ट भएर जान्छन्‌ |सम्पूर्णं जन्‌ पनि तिर्नेकृन आइ मान्छन्‌ ।३७९॥आधि व्याधि त दृट्तछन्‌ अरु उपर्‌ धनधान्य सन्तान्‌ पनि।बद्छन्‌ ईष्ट कृटुम्ब मितहर्का मान्या ति इन्छन्‌ भनी ॥यस्ताको त वखान्‌ कर्हतक गरू यो मनु प्रभूमा धरी।गछन्‌ राम भजन्‌ त सुक्ति पनिभे जान्छन्‌ तिसंसार्‌ तरी।।३८०॥शम्भूले सव वेद मन्थन गन्या श्रीरामकोनाम्‌ सरी।अर्को तततव मलेन केहि र लिया साह्धं पियारोगरी।सोही तत्व त पावेतीकन दिया अध्यात्म सूपूले गरी।जस्ले प्रेम्‌ गरि सुन्छ यो सहज त्यो उन्रन्छ संसार्‌ तरी ॥३८१॥।। इति युद्धकाण्ड समाप्त ॥~~~“~^ ~^
^~ ^“ = (~^ ~+
ही स्तर्या संतान पानेकेसुखमसे ही वंचित रह जाती है एक्‌ वन्ध्या काजीवन ही व्यतीत करती है। प्रभु के स्मरण करते रह्नेसे यह्‌ सभी व्याधाये,द्व तथा भय नहीं रह जाति । ३७८श्रीराम की इस पावन कथाकोजो लोग सुनते या कहते हँ उनसे समस्त देवगण सदेव प्रसन्न रहतेह ओर सदा सहायक रहते है । मानव जीवन में भाने वाली समस्तविघ्न वाधायं दूर रहती है, समाज में उनका आदर वढताहै ओौर सभीउनसे प्रेम-पृणं व्यवहार रखते है । ३७९प्रभृकीङपा सै आधि-व्याधिसभी नष्ट हो जाते हँ। धन-धान्य एवम्‌ सन्तान से मनुष्य प्रिपूणंरहता है ओर दिन पर दिन उसके जीवन में इन सुखों की वृद्धि होतीरहती है । इष्ट-मित्र तथा कुटुम्ब के सदस्य श्रद्धा-आदर तथा प्रेमदेते
हैँ। प्रभु की प्रशंसा कहां तक की जये। उनके भजन मनसेजोकरता है वह संसार की समस्त बाधाभों से मुक्ति पाकर तरजाताहै 1३८० शम्भुने भी श्रीराम नामके समान सव वेदों का मन्थनकिया अर्थात्‌ अध्ययन किया । उन्हूंभी कोई दूसरे तत्व की प्राप्ति नहींहई । अतः उसी तत्व का ज्ञान प्राप्तकर उन्होने प्रेमपूवंकं पावेतीजीक आध्यात्म रूपसे प्रदान किया । जो प्रेम-पर्वंक रामकथा को सुनता गौरकहता है वहु सहज ही संसार से पार होकर किनारे आ जाता दहै) ३८१11 इति यृद्धकांड समाप्त ॥
उत्तरकाण्डशम्भुका मुखदेखि राज्य अभिषेक्‌ रामको सुनीथिन्‌ जसे ।तसे ॥सोधिन्‌ पार्वंतिले सदाशिवनिथ्यं लीला पछठीकापुथ्वीमा कति वषे राज्‌ हुन गयो लीला तहां कुन्‌ भया।कस्ता रीतसित राज्य छोडि रघुनाथ्‌ वेकुण्ठ धाम्‌मा गया ॥ १ ॥कपालेगरी।शम्भो !श्रीरघुनाथका जति त छन्‌ लीलाआज्ञा आज हवस्‌ म सुन्छु भगवान्‌।
यो बिन्ती जब शम्भुका चरणमासब्‌ लीला .प्रभुका कल्या शिवजिलेरावण्‌ मारि उतारि भारि भुमिकोजानी एक्‌ दिनता गया ऋषि अनेक्‌दुर्वासा भृगु अद्धिराइ पनिष्न्‌
विन्ती छ पाऊ परी॥श्रीपावेतीनेगरिन्‌ ।खुप्‌ हषेमा ती परिन्‌ ॥ २॥राम्‌ राज्य गठन भनी ।भेट सिताराम्‌ भनी॥कण्यप्‌ र॒वामूदेव्‌ भया ।सप्तषि अच्री गया।॥३॥हारमा पुम्याथ्या जसं ।
विश्वामित्र असित्‌ र कण्व सहितंसब्‌ शिष्यं सहितं अगस्तिजि गयाहाजिर्‌ जल्दि पठाई मजि भई सब्‌ पच्या

हज्‌रमा

तसं ॥
~~~

जब शम्भु के मह॒ सेश्रीराम के राज्याभिषेक

के बारे में सूना,
पार्वती ने सदाशिवजीसे उसके वाद की लीला के विषय मेँ प्रष्नकिया। पृथ्वी पर कितने वषं तक राज्य किया गया ओर किस-किसप्रकारक लीला हुई ओर किस प्रकार श्रीरघुनाथ राज्य को छोडकरबेकुण्ठधाम को पारे । १ शम्भो! श्रीरघुनाथकीनो कृषछभी लीलाणएंहैँकृपाकर आज बताने का कष्ट करे, मै सुनना चाहती हूं । भगवन्‌ |आपके शरण में मेरी यही विनती है । जब इतनी विनती पार्वेती जी ने णम्भ
के चरणौ म रखी, शिवजी ते भी प्रभु की समस्त लीलाओंके बारेमे
बताया ओर ये जानकर वह अत्यन्त हर्षित हुरई।२ रावणको वध करतथा भू-भार कमे उतार कर राज्य करनेवाले भ्रीराम को जानकर एक
दिन अनेक ऋषि मनि सीतारामसे भट करने के लिए गये।
दुर्वासा,
भृगु, अंगिरा, कश्यप, वामदेव, विश्वामित्र, असित एवं कांडव सहित

सप्तऋषि अन्ति आदिभी गये। ३

समस्त शिष्यो सहित जबर अगस्तिजी

दार पर पहुचे थे, अनेकी. सूचना देने पर तुरन्त बुलाने की आज्ञा हुईओर सब प्रभूके पास पर्हुचग्ये। प्रभुजी ने समस्त ऋषियों कां^
२८२

भानुभक्त-रामायण

पूजा सच्‌ ऋषिको गव्या प्रभुजिलेघूशी सन्‌ छऋषिगण्‌ भया हजुरमापैले प्रष्न गन्या तहां कुशलकोसोध्या सन्‌ ऋषिले पनी कुशलको
सवूलाद भसन दिया।जो जो गयाका थिया।। ४ ॥रामले र आदर गरी)विस्तार्‌ वडो प्रेम्‌ गरी॥
विन्ती सव्‌ ऋषिले गन्या हजुरमा ष्वामित्‌ ! टुलो काम्‌ भयो,पुथ्वीको अति भार इन्द्रजित हो भार्‌ तेहि जदा गयौ ॥ ५॥

वीर्‌ हृन्‌ रावण कुम्भकर्णं त पनी

यो इन्द्रजित्‌ अन्‌ जवर्‌ ।
वीर्‌ हो त्यौ पति मारिवक्सनुभयो को जित्न सक्थ्यो अवर्‌ ॥लद्धामा यिनि दुष्टको मरण भो सचा विभीपम्‌ धिया।पाया राज्य कनक्‌ रई र खुशिले चाकर्‌ सदाका भया) ६॥जो दधिणा अभयको

सो पूणे गनेकन

देयां

कृताथ

अधि हयै दियाको)।
दुष्ट हरी लियाको ॥

दहुनुभो

रधृनाथ

रएद्हे)

मर्थ्या इ राक्षसहरू अर्देखि कल्े। ७॥यो बिन्ती ऋषिको सृन्या प्रभुजिले आश्चयं मान्या पनि।क्याले रावणदेखि लन्‌ अतिटुलो भो इन्द्रजित्‌ वीर्‌ भनी॥^
~
~^
^^"
~~ ~ ^ ^-^
पूजन करके सवको आसन अपित्तकिया।मरभू के पास गये अत्यन्त खुशहृए।४
समस्त ऋपिगण जो भीश्रीराम ने सर्वप्रथम सवसे
कुशलताके वारे मेँ पृष्ठा ओरआदर-सत्तारकिया!सब ऋषियों ने भी अति प्रेमपूर्वक कुशलता सविस्तारंवतायी।सव॒ऋषियों नँ विनती को, स्वामिन्‌ ! अत्यन्त वड़ा कायंसम्पन्न हुआ । पृथ्वी का अति-भारइन्धजीतभी `है ओरउसीकेचलेजानेसेभारका ह्रणहुभाहै।५वीरतो रावण तथाकूस्भकणं भी हैँ परन्तु इनसे भी महावली वीर इन्द्रजीत है, उसे भी मारने
कीकृपाकी। इसप्रकार अन्यवीर भी केसे टिकते! लंका मे इनदृष्टं का अन्त हुआ । केवल सच्चे विभीपण थे अओौर कनकरूपी राज्यपाकर तथा प्रसन्न होकर सर्देव के लिए सेवक वन गये! ६

अभयदान

के
ख्पमेंदी हई दक्षिणाको पूणं करनेकेलिएद्ष्टोका हरण किया हुमा
देखा । श्रीरघुनाथ ¡ हम कृताथ हैँ! ये राक्षसगण ओौरों के द्वाराकिस प्रकार मारे जाते। ७ ऋषियोंकी रेस्ती विनत्ती सुनकर प्रभुजी ने

आश्चयं किया । इन्द्रजीत रावण सेभी

अति महान वीर कंसे हुआ

नेपाली-हिन्दी

२८३
थिया।सोध्या सब्‌ ऋषिका अगाडि र तहां साम्ने अगस्तीयस्तो हो तब वीर्‌ भन्याँं भनि सबै विस्तार बतार्ददिया।॥ ८ ॥गया।बरह्याका युत हुन्‌ पुलस्त्य तपका खातिर्‌ सुमेरराजर्षी त्ृणविन्दुका नगिचमा आश्वम्‌ ति गर्दा भया॥तप्‌ गर्थ्यां तहि देवपुच्निहरु सव आएर खुप्‌ गान्‌ गरीनाच्थ्या हास्यकला अनेक्‌ तरहका गं नजर्मा परी॥९॥तप्को विघ्न हुभ्या पलस्त्य ऋषिले बृह्या बडा धीर्‌ धिया]जुन्‌ स्ती देख्छ म गिणी उहि हवस्‌ भन्न्या सराप्‌ पो दिया ॥भाग्या सब्‌ तृणबिन्दु पृत्नित सनी सास्ते नजीक्मा गडइन्‌ ।देष्या ताहि पुलस्त्यले रति उसं स्लट्‌ गभिणी पो भन्‌ ।। १०॥पितालेपनि।कामिन्‌ खुप्‌ डरले पितासित गदन्‌ जान्यावचनूले भनी ॥छोरी गभिणि भै आज ऋषिका साचागई |जानी छोरि पलस्त्यजीकन दिया जल्दी नजीक्माती कन्या ति पुलस्त्यले पनि लिया अत्यन्त खूरौ भई । ११1तिन्का पूवर ति विश्ववा हुन गया खुप्‌ ब्रह्म जान्न्या समुनि।

भारद्राज्‌ ऋषिले तिनेकन दिया

छोरी वडा

गुण सुनी ॥~----~ -^~~ ~~~
~~
~~ ~~~
-^~-~
कहते हुए सब ऋषियों के सम्मुख जहां अगस्ति भीथे, प्रष्न किया।तब उसकी वीरताके विषय मे सविस्तार वता दिया। ठ पुलस्त्यब्रम्हा का पुत्र तपस्या करनेके लिएु सुमेरु पवंत को गया। ' राजषितुणचिन्दु के निकट आसन की स्थापनाकी ओर वहीं तपस्या करनेलगेवहां पर सब देव-पू्नियां आदि अकर खूब गान करतीं, नृत्यकरतीं तथा अनेक प्रकार को हास्यकला करते हुए नजसों के सामनेपडतीं 1 ९ पुलस्त्य ऋषि तपस्यामें विघ्न होने की संभावना कोजान गये। वेनडे वीरथे। उन्होने यह शाप दिया कि जिसस्तीको मै देखुंगा वहु गभिणी
हौ जाये।

सवनतृण

विन्दु

भाग
गथे भौर यह्‌ देव-पृत्री यह सुनकर निकट गयी । पुलस्त्य के उसेदेखते ही तत्काल वह्‌ गर्भिणी हो गयीं । १० अत्यन्त भयभीत होकरकर्पते हुए पिता के पास गयी, पिताने भी जान लिया कि क्षिकेसत्य वचन से पत्री जज गभिणी हई है। यह जानकर शीघ्रता सेनिकट जाकर पुलस्त्य जी को पुत्री अपित कर दिया। पुलस्त्य जीनेभी उस कन्या को प्रसन्न होकर ग्रहण कर लिया। ११
नामक पत्त हुए जो ब्रह्म-गणो से परिपृणं थे।

उनके विस्रवा

भरद्वाज ऋषि ने उनके

२८४

भाचूभक्त-रामायण

तिन्का पुत्र कुबेर्‌ भया गुणनिधान्‌ब्रह्यालाद रिक्षाउंदा ति धनकामालिक्‌ दौलथका गरायर गरन्‌ब्रह्मा तहि फेरि पुष्पक विमान्‌
तेसैमाथि चटी पित्ास्षित गसब्‌ पार्या तर वास्‌ त पादन कतासून्या बिन्ति कुबेरको र खुशिभै
तिन्लेतपस्यागरी।माचिक्‌ भया तेस्‌घरि। १२॥यस्मा सयल्‌ खुप्‌ भनी ।तिन्लाद्‌

तप्को

दीया

पनि

सवे फल्‌ कल्या |

जांम भन्दा भया ।। १३ ॥
तीविश्रवालेपनि।लङ्का खालि थियो र तेहि दिनुभो लौ राज्य गर्‌ जा भनी॥लद्धुूामा अधि राज्य राक्षसहुरू गर्थ्या बडा वीर्‌ यिया।तिन्कं खातिर विश्वकमं खुशिभे लका बनाई दिया ॥ १४॥पातालमा।आज्‌कल राक्षस विष्णुले जितिलिदा भागेरलुक्ना-वातिर ग गया र शहर खाली छ यस्‌ कालमा॥आज्ञा येति दिया कुबेर्‌कन तहा तीविश्रवालेजसै। .गनंलाग्या तसे!) १५॥लंकामात्ि कुबेर्‌ गईकन वस्या राज्‌एक्‌ दिन्‌ केकसि छोरि लीकन ट्लो रक्षस्‌ सुमाली पनि।ड्ल्थ्यो यसू पृथिवीविषे सब घुमी हेरूतमाशा “ भनी॥महान गण को सूनकर अपनी पृत्री देदी। उनसे पृ दरुतैर का जन्महुजा । पणं विधान-सुसंपन्च कूबर के तपस्या कर ब्रह्मा को प्रसन्न करनेपर वे उस समय धन के मालिको गये। १२ दौलत के स्वामी वनकरउसमे सुखी रह सकं यहं सोच ब्रह्मा ते उन्हें पुनः पुष्पक विमान भी दिया।
उसी में चढ़कर पिताके साथ तप करनेहेतु गये! जो कुठ उसे फलप्राप्त हृञा, विस्तारपूवंक बताया परन्तु मृञ्ञे रहने का कोई स्थान नहींमिला मौर मँ किस ओर जाऊ, सोचने लगा। १३ कुबेरकी इस विनतीको सुनकर विखवा ने भी प्रसन्न होकर लंका जो उससमयखालीथी उसी को राज करने के लिएदे दी। इससे पूवंलंका में अत्यन्त वीर राक्षसगण राज्य करते थे। उन्हीं कै लिषएविश्वकर्मा ने प्रसन्न होकर लंका का सृजन किथा। १४ भाजकल राक्षस,विष्णु द्वारा पराजित होने के कारण भागकर छिपने के लिए पाताल कोचले गये । अतः इस समय पूराशहर खालीहै। जसे ही विक्लवा ने
कुबेर को यह्‌ आक्ञादी वसे ही कूबेर लंका जाकर राज करने लगे) १५एक दिन राक्षस सुमाली भी अपनी पत्री कंकसी को लेकर पुथ्वी-तल

नेपाली -हिन्दी

पातालूवाट सयल्‌ गरू भनि यहांपुष्पक्माथि ` चेर खुपूसित सयल्‌लाग्यो दुष्टि मालिको र मननेयस्तो वीर्‌ कलमा कसो गरि हुनन्‌लाग्यो केकृसिलाइ्‌ भन्न अहिलेकोही वर्‌ पनि आं देन गरंक्यातस्मात्‌ आजत विश्ववा ऋषिजिथ्यंहात्‌ जौरी ऋतुदान माग तिमिलयस्तं पुत्र हनन्‌ अवश्य इ उने-
२८५
आएर

इल्दा

त्हां।
गर््या कूबेरजी जहाँ ।॥ १९ ॥मान्यो बडा हन्‌ भनी ।यस्तो चितायोपनि ॥पत्री ! यती काल्‌ गयो ।यौ तवनतिम्रो्‌भयो । १७ ॥जाऊ र साम्ने गई ।दासीचरण्कीौ भई॥का पुत्र हुन्‌ वीर्‌ भनी।छोरीलाई्‌ त विश्रवा सित तहां तेस्ले पठायो पनि ॥ १८॥जल्दी कंकसि विश्रवा सित गई साम्ने खडा भै रहिन्‌।पृथ्वी तफं नजर्‌ दिई चरणले लेख्ती जमीन्मा भडइन्‌चेष्टा कंकसिको नजर गरि-तहां तीविश्रवालैेपनि।कन्या कर्कि तं होस्‌ बता किन यहाँ आइस्‌ अगाडी भनी।। १९॥सोध्या केकसिलाईइई लाज्‌ हुन गयो लाज्‌का सकस्मा परिन्‌ ।ध्यानैले सब जानिबक्सनुहवस्‌ यस्तो त ॒बिन्ती गरन्‌ ॥मे तमाशा देखने हतु पयंटन कर रहा था । सैरकरने के लिए जव यहंआकर धूम रहा था, वहीं कुवेर जी भी पृष्पक विमान पर चढ़कर खवसर करतेथे। १६ सुमालीकी दुष्टि उनपर भी पड़ी ओर मन्नसोचने लगा कि वहु एक महान हस्तीहै। एते ही अपनेकृलमें किसप्रकार होगा सोचने लगा गौर ककसी से कहा- पत्नी ! अभी काफी समयव्यतीत हो चुकादहै कोरईवर दही हीं माताहै। क्या कर तुम्हारा यौवनएसे ही वीताना रहा है । १७ अतः आज तुम विल्वा ऋषि के पासजाकर करबद्ध होकर उनके चरणों की दासीक रूपसें ऋतुदान की माँगकरो; तब एसा ही पत्र अवश्य प्राप्त होगा जिस प्रकार उनकेवीर पत है 1
इस प्रकार अपनी पूर्ती को विस्रवाके पासमेजा। १८
तुरन्त ही विस्रवा के पास गयी ओर सामने जाकर खड़ी रही

कैकसी भी

। पृथ्वीकी

ओर नजरकर अपने पाव से जमीन पर लिखने लगी।ककसी कीचेष्टा को देखकर विलवा नेभीध्रष्न कियाकितुम कौन हो?किसकीकन्यादो? ओर यहां क्यों मायी

हो? १९

ककसी

लज्जित इई ।
लज्जा के वशीभूत कंकसीने विनतीकौ कि ञाप स्वयं अपनी दष्टि से
लात करने की छृपाकरेकि भै क्या हं । यह विनती सुनकर तत्काल
२८६

भानुभक्त-रामायण

सूस्या विन्त र ज्लट्‌ विचार्‌ पनि गम्याछोरा पाउन आइषछस्‌ भनि तहांबेला दारुण पारि आज ऋतुदान्‌दोटा पुत्र हुनन्‌ भयंकर स्वरूपयस्ता बात्‌ गरि दान्‌ दिया र ऋतुकोकन्‌ रीत्‌ूले अब पाडं पुत्र बियाबन्ती ककसिले गरिन्‌ उहि बखत्‌तेस्ता पृ बुक्चाडंला म॒ कसरी
मालुम्‌ भयो सब्‌ जसे।नौल्या ऋषीले तसे ।। २० ॥मागिस्‌ म॒ दिन्छु पनि।बेला सरीकाभनी ॥
ती बात्‌ जसे ता सुनिन्‌।यस्तो बहूतं गूनिन्‌ ।॥ २१ ॥ख्वामित्‌ पती भे पनि।यो चत्‌ कठिन भो भनी |अनि।सून्या बिन्ति तहां दया पनि उट्यौ ती विश्ववाकोतेखो पुत्र हन्याछ राम्‌चरणको दास्‌ वृद्धिमान्‌ खुप्‌ भनी।।२२॥पत्नी ककसिलाइ येति ऋषिले दीया कृपा खुप्‌ गरीखृशी कंकसि भेगदइन्‌ ऋषि रह्या ध्यान्मा बहुत मन्‌ धरी ॥जन्म्यो रावण पूणं गभं जब भो शिर्‌ दश्‌ भुजा नीस्‌ धरी ।उत्का आदि भया अनेक्‌ तरह्का कामिन्‌ भुमीखुप्‌ गरी।।२३॥रावण्‌का पछि कुम्भकर्णं अत्ति वीर्‌ जन्म्यो उसकामनिजन्मी सूपणखा पष्ठी गुण निधान्‌ जन्म्या विभीषण्‌ पनि॥विचार कियाओर सभी बातोंका ज्ञान कर लिया।

ओर कहा कि तुम

यहाँ पृत्-प्राप्तिके लिए आयी हो। २० कठिन अवसर देखकर आजतूने ऋतु-दान कौर्माग कीरै जिसेर्मदेताहूं। तेरे दो भयंकर स्वरूपवाले बलिष्ठ पृत्रहोगे। इसप्रकार गहरी बात करके ऋतु-दान किया ।
कैकसी ने जब एसी बाते सुनीं तो कहने लगी कि एसे गुणी ओौर उत्तम पुत्र

अनमं किस प्रकार प्राप्त करूंगी । २१९

उसी समय

केकसीने एसा प्रष्न

किया स्वामिन्‌ ! पति होने पर भी वसे पुत्रम किस प्रकार प्रस्तुतकरूंगी, यहं मन सक्षी नहीं देताहै। रेसी विनती सुनकर विवा केसनम भी दया उत्पन्न हुई भौर कहा कि रामचरण के दास एवं
अत्यंत बुद्धिमान तेरा तीसरा पृत्रभी होगा २२ चव्छषि ने पत्नीककसी को यहं सव कृपा प्रदान की। ककसी प्रसन्न होकर चलीगयी भौर ऋषि अत्यन्त ध्यान-मग्न होकर बैठे रहै। जब गर्भ पूणंहमा, दस सिर ओर बीस भुजाएं धारण कर रावण ने जन्म लिया।अनेक प्रकार का उलकापात हुआ ओर भूमि भी अत्यन्त कम्पितहई । २३ रावण के पश्चात्‌ अतिवीर कुम्भकणं का जन्म हुआ । उसकेबाद सूर्पणखा ने जन्म लिया तत्पश्चात्‌ गुणनिधान विभीषण भी उत्पन्न)
=

नेपाली-हिन्दी

२८७
शान्तामा बिया विभीषण भया वबस्थ्या त्ति शास्ते सुनी ।दुष्टात्मा अतिः कुम्भकणं हन गौ इूलेर खान्ध्यो मनि ।। २४॥वैह्ली सूर्पणखा भई जगतमा दुष्टात्म भं इल्दथी।नवकटटी भह गै पष्ठी, हजुरका तेज्ले कहां र्वाच्तथी ॥रावणृको त बखान्‌ कहां तक गरों स्‌ लोकको रोग्‌ सरी।लाग्यो रावण वदन रोज्‌ भय दिदे तीन्‌ लोक्‌ वणैमागरी ।२५॥सर्वान्तर्यामि साक्षी हृदय हुदयमा आत्मखूपृले रह्याका ।निर्म॑ल्‌ सर्वज्ञ पूर्णं प्रभु पनि नरको रूप एेले भयाका॥।सोध्नभो आज लीला गरिकन त सबै रावणादीहरूको।विस्तार चिन्ती म गष्टुअरुपनि भगवान्‌ ! तेजूहम्यो जो अरूको।।२६॥ब्रह्म स्वप्‌ प्रभु भनेर हनज्‌राई।
जानैर उल्छु म॒ अनुग्रह केहि पाई ॥यस्तो अगस्ति ऋषिले जब बिन्ति लाया।साचा कुरा प्रभुजिले ऋषिर्यः बताया ।॥। २७ ॥मायाछयो संब जगत्‌ भनि नित्य जानी ।आनन्द यस्‌ विषयमा रतिभर्‌ नमानी ॥हुआ । विभीषण सर्वोत्तम एवं शान्तात्मा हए ओर सदव वे शास्त्ोका
श्रवण करते रहते थे ! २४ बहन शूपंणखा जगत मेँ दुष्टात्मा के रूप मेंघूमती फिरती थी । नाक कट जाने के पश्चात्‌ प्रभ के तेज-प्रकाश मेंकहाँ जीवित्त रह्‌ सकती थीसचणके बारे में कहां तक कटं ।सवलोक केरोग कै समान रावण के भय का विस्तार रोज होने लगा।हस प्रकार तीनों लोक उसके वशीभ्रूत होने लगे। २५सवेअन्तर्यामीसाक्षी जिसके. हृदय मे आत्मरूप धारण कर रहते हैँएेसे सर्वज्ञ निर्मल एवंपूणे प्रभुभी अभीनरकारूपधारण कयि हुए! एसी लीलाएं करतेहुए आज प्रष्न करने की कृपा की अतः रावण आदि तथा अन्य लोगोंकी शाक्तिकाहरण करनेके बारेमे भैं सविस्तार विनती करता हिं। २६आपको नस्रस्वरूप प्रभू जानकर आपके अनुग्रह को प्राप्तकर मै इधर-
उधर घूमता हुं। जव अगस्ति्षिने इस प्रकारकी विनत्ती कीतौप्रभु जीने ऋषिको. सत्य वात कह सुनायी । २७ सदैव इस जगतकोमायारूपी जानकर तथा इस विषय में किचित मात्र भी आनन्दित न होकरमेरे ही भजन करते रहने से सरव पापका हरण होतारहै तथा सरलतासे

भानुभक्त-रामायण

एण
मेरो भजन्‌ गरिरहोस्‌ सव पाप हर्न्या।
येही उपाय छ सहज्‌सित पार तर्न्या।॥ २८॥ .एक्दिन्‌ पष्पकमा चढाकन कुवेर आयापिताथ्य॑ जसं।देखिन्‌ कंकसिले र पृत्रसित गे क्ये, भन्न लागिन्‌ तसंदेख्यौ पुत्र ! कुवेरलाई तिमिले स्व्‌ द्रव्यका छन्‌ धनी ।गठेन्‌ पुष्पकमा सयल्‌ खुशि हुंदे तेजस्वि देख्तं पनि ।॥ २९ ॥जस्तो यत्न गरेर हृन्छ तिमिले
सो

यत्न

टएेले

गरी।
यस्तो बात्‌ तहि कंकसीसित मरीगोकर्णेश्वरमा गई दृढ भईरावण्का संग कुम्भकणं विभीषण्‌ईष्वरलाइ गरो प्रसन्न भनि खुप्‌तप्‌ गर्दा हुंदि कुम्भकणं विरको
तप्‌ गनं रावण्‌ गयो।तप्‌ गनं लाम्दो भयो॥भाई दुवे .` ती गया।तिन्ले पनी मन्‌ दिया।३१॥तार्हां अयुत्‌ वषं गो।पाचि हजार्‌ मात्र भो॥
सनको मालिक भै सयल्‌ गर अनेक्‌ यस्तं यि्नलेसरि॥रावण्ले इ वचन्‌ सुनी जननिके साम्ने प्रतिज्ञा गन्यो।हे मातर्‌ ! म बडे भएर रहुंला क्या आज चिन्ता पय्यो।।३०॥

टेकी एक चरण्‌ विभीषणजिको

संसार तरने का यही एक उपायहै। २८ एक दिन वह्‌ पृष्पक विमानमे चटृकर जैसे ही अपने पिताके पास आया ककसी ने उसे देखा ओर
पृत्र के निकट जाकर कु कहने लगी । देखा पत्र! कूवैर को तुमनेसब द्रव्यो का मालिक बना दिया है, प्रसन्न होकर पृष्पकमे पयेटन करताहै। देखने मे भी तेजस्वी प्रतीतहोताह! २९

जिस प्रकार सेभीदहो

तुम एसा यत्न करो कि सवके मालिक होकर इसी की तरह अनेकानेक
पयटन करो।
रावणने मांँके एसे वचनोंको सुनकर प्रतिन्ञाकी, हि
माता, मेँ वड़ा ही हौकर रहुगा; आप व्यथं ही चित्तित क्यों होती हैँ! ३०कंकसी के साथ इस प्रकार की वात कुकर रावणं तपं करने चला गया ।गोकणेश्वर मे जाकर दढता पूवेक तपकरने लगा। रावण के संग
कुम्भकणं तथा विभीषण दोनो भाई भी गये! ईश्वर को प्रसन्न करनेके उष्य से उन लोगौंने भी अत्यंत मन लगाकर ध्यान किया । ३१
- तपस्या करते हृए वीर कुम्भकणं को वहू अनेक वषे वीते। विभीषणजीकोएक ही चरणों पर टेककर तपस्या करते हुए केवल पाँच हजार वषंबीते! रावणके वारेमें करां तक वणेन किया जाय ? उसने तो अत्यंत
एकाग्र होकर प्रतिदिन प्रभुजी का ध्यान मन मे धरकर

तपस्या

(तपरान्नी-हिन्दीःः
८९
:रावण्‌को तःबखान्‌ कहांतक गरौ. टल `" तपस्याः.- ग्यःखुप £ एकृग्र; भएुसःयेन्‌ ;्रभुलिका ध्यान्मा बहुत्‌ मन्‌ धव्यो।।३२॥` दश्‌ हज्जार्‌जब दिव्य, वषं वितिगोः -र्एक्‌ शिर्--तसे. हीम्‌ गरी ।यस्तं रीत्स्ितत्नौ त शिर्‌ पनि म्यो --भक्तो :; - प्रभूमाः धरी ॥नौ शिर होम्‌-गरिणिरःदणे पनि तहां =दीनेःः.तयार्‌ ; भो जसं ।
ब्रह्मा जाइ हटा धविर्‌ -दिनः तयार्‌ . हन्‌भयो. पोः तस्तं।॥ ३३ ॥
है.्राच्रण्‌ (वर्‌-साग दिर्छृःअहिलेः. ईच्छा ; ~ बमोजिम्‌ः -भनीःबह्यावाट ्दय्रा भयो रः खशि भै. माग्यो- तहां वर्‌: पनि.॥
हेःनाथ्‌ः ! वृरुतःअमर्‌ म पुाडनमद्ध---क्वे <}: वीरदेखीः.

करसैः

ब्रह्माले पकि्लौ भनेर. वरदान्‌

दिया।
मानिसूकोः-त.-उरमः मन्दिने रती-.-मेरासदाः छन्‌ व्रसै ।। ३४ ॥मागे; बमोजिम्‌
कृटूयाकास॒नि शिर्‌तयार्‌गरिदिया). जस्तं ~ ~ अगाडी ¢< थियाः।ब्रह्माजी तहिः्फेर्‌ विभीषणजिका<. साम्ने + नजीक्मा-:- गया ]इच्छा -क्यामनरमु) छरा उहिवर्‌ दिन्छ म-भन्दाः भया ॥३.५॥मागे--वर्‌-खुशि,भे विभीषणजिलेः ` हे"टनाथू ';` निरन्तर्‌ मतिःशर्म ६ तफ रहस्‌ अधमतिर ताः कैत्यैः . नलागोस्‌ . रती ॥की ।, ३२६ ज्ञब-दस‡ हजारः; दिव्य -वषे , व्यतीत. हुए तब एक सिर अपंणकिया = ईसीःप्रकार' प्रभू.-में भक्ति दर्शाकर रेषनौसिरोंको भी हुवनकरर दिया तों स्षिरों; क्रो; हवनः करने. केः पश्चात्‌ ` जव दसवां तिरभींदेने केलिए तैयार हु्रा- तब ब्रह्मा, ने वहां आकर उसे' हटाया ओरचरदानं दिनः के प्लिए (तयार हुए 1 ३ेर- दिःरावण [ तू वरमांगले, जैतेरी इच्छाः के,मुताबिक्‌.-{अभी प्रदान करताहूं। ब्रह्मा की. इसं दय;दुष्ट .सेःप्रसन्न- होकर उसने; भी, चर मागा 1; ; हे नाथ] मून आपरएेसाव्ररद्यन देकिंरमैःअमरं हो जाऊः-ओौर किसी
भीवीरकेदट्वारान मङ।
मनुष्यों कौ तो मृ्ञे किचित मात्र भी, भयनहीं.-है क्योकि वेसवमेरेहीवेस मे.हैः। ३४ `ज्नह्याजी ने भी.तथास्तुः कहकर उसकीर्मांग के अनुसार
वरदानःदियाः। .जो -सिर कट ःचुका था उसे ःभी- पुनः पहले के समानंठीक करं दियां अर्थात्‌ वना. दिया ।- 'ब्रह्मा जी ` फिर वहीं पर विभीषणजी.के तिंकट- गयेओर कहने लगे कि, मनमेंजो-. च्छा हो मगिलोमै `तुम्हे ` वही -वरदान द्रूगा । ३५ --विभीपण जीने भी प्रसन्न होकर वर
मागि--हेनाथ 1: मेराः ध्यान निरन्तर धमकी

ओर रहै तथा मेरी

दधि. कदाचित्‌ भी; अधमं को,ओर्‌ः आषृष्ट नहो!

त्र्या जी-नेभी

२९०

भावुभक्त-रासायण

बरह्माले अधिकं दया गरिदिया होलातलाई. ` भनी।सागेनन्‌ त्रपनी तहां भरिदिया कल्पान्त आयू पनि ।॥ ३६ ॥फर्‌ कुम्भकणं .विरका अगि जल्दि आई।भन्ञा भयो अवत दिन्छुम वर्‌ तंलाई॥क्या माग्दछस्‌ भनि दया हुन गो जसँ ता।|जिह्वाविषे गयर वाणि बसिन्‌ तसं ता॥ ३७॥वाणीले जब मोह खुप्‌ सित भयो घत्‌को विघतृको पनि।थाहा केहि भएन तेस्‌कन तहांमाग्यो मूढ भएर येहि वरदान्‌
एक्‌ दिन्‌ मात्र मलाइ खान पिनकायस्तो वाक्य सुनेर तेहि वरदान्‌सून्या त्यो वरदान देवगणलेजिह्वादेखि सरस्वती जब गन्‌इच्छा ईश्वरकं रहैषछठ बलवान्‌नाब्रू केकसिको समालि खुशिभोआयो जट्दि तहां प्रहस्तहरुधेर्‌
यस्तो म माग भनी ॥निद्रा छ मेहुना . परोस्‌ ।
खातीर निद्रा टरोस्‌ ॥३८॥दीयाप्रभरूलेजं।खृंशी भयासब्‌ तसं ॥वेद्‌ तेस्‌ बखत्‌मा पव्यो।भन्या विचार्‌ यो गव्यो।।३९॥पायो र यो सब्‌ खबर्‌।सब्धमा थिया वीर्‌ जबर्‌ ॥
अत्यधिक दया करते हुए उनका" कल्याण किया ओर अन्य कोई वरनमागन पर भी उसे वरदान दिया । ३६ पुनः वीर कुम्भकणेको, भागेशीघ्रतापूवेक आकर आज्ञा देने की कृपा की कि अब तो मै तुक्चवरदान दुंगा।
अतःक्यार्मागतेहो एेसा कटनेकी छपा हुई तो उसी
समय जिह्वा के बीचमें जाकर वाणी ने वास किया । ३७

वाणी ने जब

मन-ेमन अनेक प्रकार से अपने मोह के वशीभूत किया, उसे कभी
ज्ञान नहीं हाकिम अमुक वर मागू। वरन्‌ मूखं होकर एेसा वरदानमांगा जिससे उसे छः महीने तक निद्रा आ जाये ओौर केवलं भोजनआदिके लिए मेरी एक दिनि निद्राटटे!1 ३८ एसे वक्यो. को सुनकरपरभुनेभी उसे वही वरदान दिया। देवगण भी उस वरदानके बारे
मे सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए । जिह्वा से जब सरस्वती निकलकरचली गयीं उस समय उसे अत्यधिक वेद हुभा भौर सोचा कि ईश्वरकी इच्छा ही बलवान है । ३९ कैकसी के दरबारियों को इसकाआभास हुआ ओर यह सब समाचार लेकर अनेक जन्वर वीर साथमे
कर भेदिये लोग वहां अये।

रावण के सम्मुख जाकर प्रसन्नता-पूर्वंक

कटने लगे, हे पच } तुमने एक महान काम कियाहै।

पहले तो विष्णु

नेपाली-हिन्दी

२९१
रावण्‌का अधि गे भन्यो खुरि हंद हे पत्र! खप्‌ काम्‌ गव्यौ।विष्णुको अधि उर्‌ थियो अव गयो सन्ताप्‌ तिमीले हन्यौ ।।.४०॥लङ्कामा अपि राज्य राक्षसहरू, गर्थ्या वडा खुश थिया।वष्णूले गड्‌ चछिञ्चभिन्न गरि सब्‌ राक्षस्‌धपारईदिया 4.क्यारी जोर्‌ तपुगेर भागिकन सब्‌ पाताल्‌ गयाकाधियौ]तिस्रो आज सहाय पादकनपोआज्‌काल्‌ राज्य कुबेरकोछतिमिले
आईमागी
बतारईदियौं | ४१.।।,बलात्कारगरी।
जुन्‌ पाट्ले गरि हुन्छ लेउ अहिलेराजाकोत हुदैन वन्धु सितकोयो सन्देह नमान कति कसरीयस्तो बिन्तिसुमालिको सुनिभन्योदाञ्यु हुन्‌ पित्र तुल्य छन्‌ तहि बसुन्‌यस्तो रावणको वचन्‌ सुनि तहांरावण्‌को मन फर्‌ फिराउन बहुत्‌हे नाथ्‌ ! कश्यप पुतरहुन्‌ इ जति छन्‌
स्थान्‌ छेन लका सरी +;बन्धुत्वंधर्मोपनिलङ्काम लीऊं भनी। ४२॥लंकाकसोरीहरू ।अन्तंवसूलाबर ॥साम्नेप्रहस्तंसन्यो।सिप्‌ लाइ बिन्ती गञ्यो।।४३।।यौताराक्षसूहरू।

लड्थ्या ती पनि ता भन्यातअरूको

विन्ती

कर्हँतक्‌

गर!
का उरथा परन्तु अब तुमने सम्पूणं संतापको हरण कर लिया है । ४०आदिकराल मे लंका मेँ राक्षस आदि राज्य करते थे ओर बड़े खुशरहते थे परन्तु विष्णुने जाकर सबको छिल्-भिन्न कर दिया ओर सव.रासो को भगा दिया। क्याकिया जाय, णक्तिविहीन ओौर लाचारीके कारण भागकर हम सब पाताल को चले गये थे, परन्तु आजतुम्हारा सहयोग पाकर यहां आकर ये सब वता दिया । ४९१ आजकलकुबेरका राज्यरहै अतः तुम बलके पभ्रयोगसेहो अथवा जिस उपायसेभीहो लेलो क्योकि इस समय लंकाके समान ओर कहीं स्थाननहींहै। राजा के बन्धुओं के साथ किसी प्रकार का वन्धुत्व नहींहोता है यद्यपि धमं के अनुसार उसे निभानाही पड़े। इसकी मनकिचित मात्र भी शंका उत्पन्न नकरो किम लंकाको किसप्रकार ते.

लू । ४२

सुमाली की एेसी विनती को सुनकर रावण कहने लमा कि लंका
को कंसे हूरण करूं वर्हां भ्राता जी रहते हँ जो पितृ तुल्यहै अतःवे
वहीं रहे मै कहीं अन्यवरदही रह्‌ लृंगा। रावण के इस वचन को सुनप्रहुस्त ने सामने अग्रसर होकर रावण के मन में परिवतंन लाने के उहेश्य सेअत्यन्त चातुय्यं पूर्वक विनती की । ४३ हे नाथ ! देवता एवं राश्चस आदिजितनेभी हये सब कष्यप-पूत्र हैँ । वे भीतोपरस्पर लडतेथे तव अन्य लोगों
२९२

भानुभक्त-रामार्यण

तस्मात्‌ आज कुबेर छन्‌ त पनि सो. लङ्खा `चिन्या 7 हो भनीहात्‌ जोरी विनती गव्यो र सुनिःत्यो : बिन्ती तःमान्यो पनि. ॥1४४॥बेस बिन्ति.गरिस्‌ भनी उहि बखत्‌ ~ -दौडी ` `तिकूटमा-‡गयोः
छोडो दूत प्रहस्तलादइ र-कुबेर्‌- : ` लाई ~ उनिकेल्दो =,भयीःाबाब्रको मतलब्‌ `बुक्चीकन ":कुबेर्‌ ` छोडर "` कलास्‌ 5:† गयाः।तप गर्दा शिव खश्‌ गराइ शिवथ्येः बिन्ती,ति.गर्दाः भयाः-।। ४५इच्छा माफिकको बनाउन कुशल्‌ ` जी. ˆ विश्वकर्मा८थियं ।तिन्ले वेस्‌ अलकापुरी पनि कूबेर्‌- - लाई ˆ बनाई -` `दिया.दिक्पाल्‌ भति कुबेर र्या शिवजिले . तिनूमाः. दयां -खुप्‌ गव्यो |शम्भूको करणा .हदा त अरर चन्‌ ¦ आनन्द सागर्‌ पच्या ॥-४६ ॥सयावण्‌ राक्षस सब्‌ लिएर खशि भे ` लकाः ` सहरमा ~ 'ब॑स्थो |
तप्‌को जोर्‌ बलवान्‌ जित्यो सबं जगत्‌ संताप्‌ ` -संबमाः. ' पस्यो 1विदयुज्जिह् टृलो निशाचर थियो _ तेसंलाइ `..`बेनी “ˆ-दिथो।ती मन्दोदरिलाई `आइ `मयले
+
॥र
““दोयो रं तेसूले चिथो ।(*४७*॥
ती ˆमन्दोदरिलाईइ दीकनं 'दियो .. शक्ती -अमोघ खश -भरई।बीहा भो पछि कुम्भकणं `विरको " प्रह्लाद `.कुलुमा "` गईके बोरेमे कहाँ तक विनती करू।उसलेकाकोतो

“यंदि वहां कुवेर , भीः" हौ तंथापि

लेना ही. हीगा 1“ `इंस प्रकार हाथं.जोड़कंरे विनतीकी
भौरं उसे सुनकर रावण'ने मान भी लिया । ४ ¦ यह्‌ कहते हुए किं तमनेठीकं ही कहा है उसी क्षण दौड़कर च्विकूटे को चला गयां ¶ 'दते प्रहस्ते चादिं
कोप द्वारा प्रसन्न करे उससे विनंती करने लगे ।-४५।*

कूःशले विश्व

कर्माजो'.था उसने `इच्छा।'के ¦अनुरूप कुबेर :के .लिए "अलेकापुरी रकीसृजन कर दिया । ` क्रुबेर दिगपाल .होकर वहाँ रहा

शिवे जी ते!उन

पर महान `कृपाकौ । ` शम्भुकी कंरंणासे-वेः ओर भी अंनन्दंसागरमे इव गये 1 ४६.
रावण `संव रक्षसो को लेकर" प्र॑सत्ततोपूवंक लंका
शहर मे रहने लगा । :'तप केः बलः से बेलंवोनोंःको जीता, सम्पूर्णं जगतं
मे संताप. छां गेया ˆविद्ेज्जिह "एक अयंकरः-निशार्चरन्था" 5 सनेअपनी -बहन 'मंदोदरी को उसे" (रावण को) (दिया ओर" उन्होनिः लनीस्वीकारां 1*४७ _उसे मंदोदरीः कोः देकर "अत्यन्तं त्रसन्तः द्ोकरः कभमो `शक्तिं भी प्रदान कौं 1' "वीर (कुम्भकर्णे-के' विवाहं के # पचत्‌

;नैयोली-हिन्दी "

ररर
ज॑न्म्थो रावणलाई पुत्र 'बलवान्‌ '-जो _` `जन्मदेका ^` घरि 4लीग्यौरून र शब्द भो अतिः ठेलो : प्‌ ~गजेन्या “मेध्‌ `सरि ॥1मेघ. चैशब्द गय्यो भनेर तहि नाम्‌ » तेस्को रंह्यो, मेघनाद्‌ः1.यस्को-त्रल्‌ यतिसम्मंको छंमनि यो :'लागेनःतेस्कोत साध्‌-। ४९11
नि्द्रले पनिः:कुम्भकणंकन `चुप्‌ ¦ वेकंडयो ˆ :संकस्मा `पवेन्यो 4:हेनाथ्‌! सुत्छं म ठोउंपाडं भनि यो : हत्‌: जोरि चिन्त रगेत्यीतेस्‌ःबीच्मा तहि सुत्तलाइ बडिया ^> गूफा >: तयारी?=गन्य्ोऽःताहीं "भेकन ) -कुमभ्रकणं ¡विरको घुष्‌; मस्त.निद्राः पन्यो ५०॥इष्द्रादी सर्वदेव दंत्यहरुको'-- जौ श्री थियो सन्‌ हरीलाग्योःराव्णप्नाश्‌ गराडन-अनेक्‌“ रङ्कु `;? उपद्रव्‌ 7: गेरीपाया.--थाह कुबेरले र॒क्रिन योगस्‌ - ~ उपद्रव, = नगर:भृत्चा-खातिर दत्‌ -पठाउनुभयो£--बोलाक्‌-च्रत्‌रो जबर्‌।।; ५.९.प्रह्वाद-कैल. मे चले गये । ` वहां 'एक 'महा `बलवान सैलुस नमकगंधव राजो थे 1. उनकी `एकं {कन्यां थी । विभीषणं को बडा {समेकर उस क्न्याकोदे दिथा। ४८ रावण को एक बहुत बलवान पचत4
करनेर्वीले इंसं बलकं का 'नामं मेघनदिं रवा: यह्‌ व्नुमानं लगानीकंर्टिन था कि "इसको" शक्ति की `सीमा करटा तके है 1 -४टु कुर्भकेणःको नि्द्रीर्ते वशीभूत किया निंससे :वंह अत्यन्तं संकटं मे पडलाहै नाथं ! »अब ै“सोतीहुं नुदं स्थानि. देने की कृपां केर ।थःजोड़कर एसी विनंती की ¶. उसी क्षणे ;सोनेऽके लिए "वर्ह कं सुन्दरं
गुका का "निर्माणं करं दिया. गेया 1 ` वहाँ जंकिर 1 वीर कुर्मकरण-अत्यनकतः
मस्तः निद्र मे मग्न हो गयो 1०आदिः देवो ःएकंः दत्यो. कींजो; संहानता थीं सं" हुरणं करके रावण उन सबेको नेष्टे करने कैलिः "अनेके प्रकार के उपद्रव `केरने.लगाः। कुबेर कौं 'जब येह मालूरः

हुंभो तवे! 'अप्रते

एकः -चतुर्‌ दतः बोलाक `को ,भजा

ताकि वर्हे

(रावणको); जाकर कहै कि एसो क्यो केरकतेः हो, उपद्रव जदि र्तःकरे 1१दूत ने. जोकेर"जव -उसंसेः विनती की ।तक आरः भी रुषं
हीकेरः अत्यन्तः करोधिते, षहो .उठाः (1. शीघ्रतापूर्वकं जौकंर उसनेकिः पंराजितः-करः पुष्पक विमो का भीःहरणे कियो ५४ कुबेरं कीं

भानूभक्त-रामायण

२९४

त्‌ गैविन्त गग्यो त क्षन्‌ विखुशिभं

ऊव्यौ दलो रिस्‌ गरी।

जल्दी गे ति कूबेरको जिति लग्यो

कबेरलाइ जिती यमे पनि जित्योपौँच्या स्वगैविषे पनी खुशि हदंएक्‌ ठक्कर्‌ लडि इन्दरिलित सहजेहुरम॑त्‌ रावणको गयो खुशि भई

पृष्पक्‌

विमानं

हरी ॥
जीत्योवरूणपनि।फेर्‌ इन्द्र जित्छ्‌ भनी । ५२॥पक्डेरपाताकस्या।सम्पूणं देवतावस्या ॥

यो थाहा भई मेघनाद रिसले

आयो

अगाड़ी

सरी।
जीत्यो इन्द्रजिलाइ तेस्‌ बखतमारावण्लाईइ फुकादइ इन्द्रकन लीजीत्यो इन्द्र र इन्द्रजित्‌ भनि दटुलोब्रह्मालाइ खनर्‌ भयो र खनकाधेरै वर्‌ दिदई्‌ मेघनाद्कन खुशीबरह्मा इन्द्रजिलाद्‌ फोदकन फर्‌लाग्यो रावण फर्‌ जगत्‌ जितुंभनीकलास्‌ पर्वतयो टुलो छ गरहको
भारी लडाई गरी । ५३॥

कलास्‌ हातम्हां

एक्दिन्‌ त ततौल्यो पनि।५५॥

लिएर सहजे

फकरलंकानाम्‌ ताहि्देखीखातीरदौडी
गयो।भयो ॥गया।
गदं फुकाडंदा भया ॥ ५४॥जान्‌भयो धाममा।संग्रामकाकाममा ॥होला कहां तक्‌ भनी।1

जीतकर यमराज एवं वरुण कोभी

जीता।

इस प्रकार प्रसन्न होते

हुए स्वगं मे भी पहुंच गया ओर इन्द्रको भी जीत लेने की ठनी। ५२
एकर ही बार लड़कर इन्द्रने सरलता से पकड़कर उसे बांध लिया)
रावण की मर्यादा नष्ट होते देख सम्पूणं देवगण प्रसन्न हए । यह्‌
मालूम होने पर मेघनाद क्रोधित होकर सामने आया।

उस समय

घमासान युद्ध के पश्चात्‌ इन्द्र जी को पराजित किया । ५३रावणको प्रशमूक्तं करके इन्द्रको भी साथलेकर लंका लौीटगया। इनकोजीतने के कारण उसी समयसे वहु इन्द्रजीत के नाम से प्रसिद्धहमा । ह्या को जब यह मालूम हुआ तो अपने रक्त के लिए दौडकर
गये भौर मेघनाद. को अनेक वरदान देकर प्रसन्न करते हुए अपनीजीर आकर्षित किया । ५४ ब्रह्मा इचधजी को मुक्त कर पुनः स्वगंधामकीमोर
गये!

रावण

पूनः जगत

विजय करने के लिए संग्राम की

तेयारी में जुट गया । कंलाश पव॑त अत्यन्त विशालहै।!

यह्‌ जानने के

लिए कि वहु कितना भारीदहै, एक दिनि कंलाश पवेत को सरलता सेअपने हाथमे लेकर तोल भी लिया। ५५ नंदीश्वर को क्रोध उत्पन्न
हा ओर क्रोधित होकर शाप भी दिया कि मनुष्य एवं वानर तैरे
२९५

नेपाली-हिन्दी

नन्दी श्वरकन रिस्‌ उद्यो र रिसले

मानिस्‌ वानर शत्‌ भेकन सहज्‌ताहाँ -देखि त कातवीर्य सित गो
दीयामाख्न्‌

संग्राम

सरपंतलाई

खातिर्‌

पनि।भनी]
जसे।
पुर्यो तिनूसित जोर्‌ कहाँ सहजमा पाता कस्या पो तसे ।। ५६॥वन्तीमरी ।मेरो नाति भनी पुलस्त्य ऋषिले आएरबन्धनूदेखि पफुकादइ्‌ बक्सनु हदा लाज्‌ भै फिव्यो तेस्‌ धरि॥फेरी रावण बालि जित्छु भनि गो साथ्मा अनेक्‌ वीर्‌ गयाः।बालीले पनि पक्रि तेस्कन तहां खुप्‌ काचि चेप्ता भया।।५७॥।जसकाखीमा भिचि चार्‌ समुद्र घुमि फेर्‌ छोडी दियाथ्यामैत्री गछ भनी मित्यारि गरि खुप्‌ लाज्‌ मानि फर्व्यो तसै ॥ई बाहेक्‌-अरु वीर्‌ सवै वश गव्यो तीन्‌ लोक्‌विषे छम्‌ जति ।यस्ता वीरहर्‌ मारिबक्सनु भयो चिन्ती गरू यो कति ।। ५८-॥नारायण्‌ हुनुहन्छ विष्णु भगवान्‌ सब्‌ यो चराचर्‌ पनि.।दहो „ भनी ॥जो देखिन्छ करिन्छ शास्वरहुरुले नारायणेख्वामित्‌का अधि नाभिमाकमलभो ब्रह्माजिताहींभया।वाणीले संग अग्निता हजुरका मूख्‌ देखि निल्की गया।।५९॥णत होकर तुञ्जे सहज ही मार डालें । उसके पश्चात्‌ वहां से कातिवीयं के साथ संग्राम हेतुः प्रस्थान कियाबेचारे का कात्तिवीयंसे क्याजोर चल सकता था, उसे सहज ही बध दिया गया। ५६ जबपुलस्त्य ऋषि अपना पोता कहकर वहां अयि मौर विनती करने के
बाद उसे उस वन्धन से मक्त कराया तब उस समय उसे अत्यन्तलज्जा हई । रावण पुनः बालि पर विजय पाने के उदेश्यः से अनेक
वीरं को अपने साथ लेकर गया। ओर बालि ने उसे वहां पकड़करसपने बगल के नीचे कसकर दवा दिया । ५७इस प्रकार अपने
बगल के नीचे दवाते हुए वे चार समुद्रकी परिक्रमा लगाकर वहाँआये ओर पुनः उसे तब मक्त किया तब उसने मित्रता का सम्बन्धकायम करने की प्राथंना कौ ओर बालि से तदनुसार मित्रता करने
के पश्चात लज्जित होकर लौट गया। इसके अतिरिक्त अन्य सभीवीरो ५ भी अपने वशमेंक्तियाजो कि तीनों लोक में रहते हैँ। आपनेएसे वीरो कोमारने की कृपा की 'हइससे अधिक क्या विनती कर । ५८भगवान्‌ विष्णु नारायण ओर ये चराचर आदि जो भी दुष्टिगत हतेहै शास्त्रज्ञ लोग उन्है भी नारायण कहते हैँ । पहले श्रीमन्‌ जी के
नाभि से कमल उत्पनन हुजा ओौर उसी से ब्रह्मा जी प्रकट हुए ।

धानुभक्त-राप्रायण

~ ‰‰६

बहदेखि लोकपाल्‌

हुन: गया ईः

चद सुय पनिः

आखादेखि भयां दिशाहर्‌ भन्याः : कान्‌ दिवि: शब्दः अनीस्वको प्राण-तेयार्‌ भयोः-हजुरकाः रप्राण्देिः; ~ मुक्तेः; नई
न्नासादेविःतः वैय अश्वितिकुमार्‌: वेदाद्धमा~व्रारुः गीदरी &० >जंद्ध जानुःउरू 'जघन्‌ यंति शरीर्‌ “देखी = : भूवर्लोक्‌ 7: >हवृणेन्‌ ` 'कहतिक्‌ > गोन
कोचदेधिं त ¦चारः समृद्रः हुन गो:

दुवे <~ दिशाका 'ण्--पक्तिन

निया स्तन्‌ दुंददेखि इन्द्र र॑वरुण्‌रेतदेखि त :पर्बालिंवित्यहंरः

सन्‌ ˆ निस्क्या तपस्वीःअंति {दश

घर्माधिमं .विवेकका इ यमराज्‌

ती ˆ. लिद्खदेवीं

लतां गुददेि"ख्रत.हेनूर्‌-

का ` रीसदेखी

भया

~ भर्या

हाड देखी जति `पवंतादिंहर छन्‌ केश देखिः संब्‌'मेष्‌ तपनि;जो छन ओषधिं रोम देवि तिं सया ` नखं देखि संव स्वर प॑नि।।९२।।~
~न
~~ "~~
~ ~~ न
४]
प्त
विष्वारत्मा हमूहुन्छ नाथ्‌ !पुरुषरूप्‌ माया त_-शक्ती _-लिन्या।खृशी.

भैकन__ देवताक्रन्‌-_

सदा ` अमत्‌ ~~. विरद |

ख्ामित्कं त छ सृष्टि संब्‌जतिछयो

~~~ ~~
|
-बच्ाको 'पनिं देखिदन्छ भ॑गवान्‌ !
~

संसार्‌

=
चराचर.
“-धुरी।9
-आधार्‌ हज्‌रकै .गरी ।।६३।
वौणीः केः प्रभावःसे "आपके मुख सै अग्तिःःनिकलकरःचला)गर्या । ४९
बहो सेतो लोकपालः प्रक्रट हुए ओर अखों.से चन्द्र सूर्य॑ः-तथाः"दिशाभों
का ्ञेनि हुजा-- तथा, -कनिः से-शब्दों कपु: उच्चारण हुः 1) उइन सबणोः कारसंचारः हुमा- जिसमें श्रीमन्‌ काः प्राण तसुख्य हु । <त्ताक.सेवैद्यं अश्विनी कुमारः जो-वेदीङग `में ~प्रवीण-थे, 7हुए । ६० { <रनाघत्से

उरू जघनः

पकी; ओरः शरीरः

से. भू-लोक `हुआ ॥7> बगल सि चार

संभूद्र का निर्माण हृआ,.कर्हा' तंक -वणंन "किया-जाय? 7-स्तन-से दीनंदिशाभों के पतिः इन्द्र-खौ रःवरुण्‌. उत्पन्न- हुओं ।; <वालू-से बांलंखिव्य आदिनिरकेले जः अत्यन्त तपस्वी "ये 1.६१: धमं-अधमे क्ट विवेक -कोः रक्षकयमराज -लिग हारा-प्रकटः हुभा,1 मृत्यु -मलःसे.-उत्पन्ने हुआ गौरःश्रीमन्‌ के करोधःसेःहुआ 1 हड्डियों, सेः जितने प्रवेतः-जादि है. वनेः ओरकेशे-से मेष-उत्पन्न हुमाः। जो.गौषधिः-हैः वहः शरीर के-खिद्र से हूंभाओौरनावृनो सेस स्वर बने।-६२- हे नाथ्‌! भाप है पुरुव-रूपीःविष्व-अंत्सो ह॑,सयाः तो-केवल शक्ति माह । उसके वल पर्‌ प्रसन्नः होकर देताओंरःको'लापं सदा अमृत-पान कराते रहते ह। जो कुछ भी इस.संसारः में येल्चराचर
हः सर्वः श्रीमन्‌ कीन ही तो सृष्टि है 1. आप-हीः;के-आधारः. परजीविती

नेपाली-हिन्दी

२९७
उही

जस्त इूधविषे . रहन्छ. भरिपुर्‌

घी

सब चीञ्मा हजुरे पसी रहनुभो

सर्वान्तरात्मा `

रीत्‌ गरी।हरि ॥
-हन्छन्‌ सूथ्यंहरू प्रकाश्‌ हजुरकं तेजूले हजुर्‌ सन्‌ धनी ।ख्वामित्‌ लादतनाथ्‌ ! प्रकाश्‌ गरिदिन्या छनन्‌ अरूकवेपनि ।। ६४॥सरी ।अन्धाज्ञानी जनूहर देख्तछन्‌ सकल रूप्‌ ` अज्ञातिदेख्तैनन्‌. ` प्रभुलाइ मूढ - हुन" चुम्छन्‌ विपत्मा परीवेदंशीषेहरुले खोज्छन्‌ त ॒देख्छन्‌ पनि।योगी ..भैकनयस्ता रीत्‌ सित यो चराचर विषे श्रीराम्‌ रह्याछन्‌ भनी ।।६५॥बक्वाद्‌ ग्यां प्रभु ! हजूरसित रिस्‌ नमानी।रक्षा हवस्‌ `प्रभु ! अनुग्रहपात्र जानी ॥चिन्मात्र अद्वितियं नित्य हनूरलाई।भज्छ्‌ निरन्तर टहल्‌ गरी हषं पाई ।। ६६॥वाली सुग्रिव इन्द्र सूय्ये-सुत हुन्‌ भन्स्या सुन्याको त श्ठुं।कस्ता रीत्‌सित्त जन्मभो इ दूइको विस्तार समेत खोज्दष्ु ॥।विस्तार सन्न मपाडंसब्‌ भनि हुकूम्‌ . राम्को

भएथ्यो

जसे.।
विस्तार्‌ खृशि भई अगस्ति ऋषिले बिन्ती गव्या स्‌ तसै ।६७॥ब्रह्मा चार्‌ सय कोशको गरि सभा सूमेर्‌माथीथिया।ईश्वर्लाइ ` रिञ्चाउनाकन तहां खृप्‌ योगमा मन्‌ दिया ॥
को भी देखा जाता है.। ६३ सब चीनों मे. श्रीमन्‌ ही विराजित,सर्वान्तरात्मा हरि दहैँ। सूयं तथा प्रकाश श्रीमन्‌ ही के तेज से उत्पश्चहै अत्तः आप ही इन सबके स्वामी टहैँ। अतः श्रीमन्‌ को प्रकाशप्रदान, करनेवाला ओर कोई नहीं है। ६४ज्ञानीजन सबकोहरि-रूप मे देखते है परन्तु अज्ञानी जन अधे के समान प्रभ
को नहीं देखते हैँ ।. मूखं वनकर विपत्तियों में . धिरे घूमते रहते हैँ ।योगी होकर वेद शीषं आदि लोग -दूढते हँ देखते कुछ नहीं हैँ । इसरीति से चराचरमें श्रीराम वसते ह। ६५ ` एेसी वकवास मैने क्रोधरहित होकर श्रीमन्‌

के साथ की है, अनूग्रहु"का पात्र

जानकर

श्रीमन्‌ मेरी रक्षाकरं ।., चित्तम नित श्रीमन्‌ को रखकरर्मै निरन्तरभजता रहँ तथा सेवा करके मुञ्चे हषं प्राप्त हो । ६६ - वालि-सुग्रीव के इनदरओर सूर्यं के पत्रहोनेके बारेमे र्मँनेसुनातोदहै। कित्र प्रकार इन लोगोंका जन्म हुआ सविस्तार जानना चाहता हं । श्रीराम ने जव सविस्तार
वणेन सुनने की आन्ञा दी , तब अगस्ति ऋषि ने प्रसन्न होकर सम्पूर्ण
२९०

भानुभक्त-रामायण

योगमा चित्त बढयो र भक्तिरसलेओंसुको तहि वीर वानर बल्योबरह्याका मनसा दया पनि उब्योमेरा नित्य नजीकमा रह यहाँब्रह्याका इ वचन्‌ सुनेर खुशिभैफल्‌ एूल्‌ खायर तेहि पवत विषेलाग्यो पानि पियास कूप नजिकेआपना छादंविषे नजर परिगयोआके वीर्‌ सरि मानि तेहि कुपमा
आर्को कोहि नदेखि फेरि स्लटपट्‌निस्क्यो बाहिर कृपदेखि त असल्‌लाग्यो सेद्‌ मनमा कसो गरि भयांदेख्या इन्द्रजिले र॒तेहि बिचमा
पक्च्या ` इन्द्रजिले र वीयंत गिरीताहाँ वीर्य त एक्‌ कुमार्‌ हुन गयोबालैदेखि भयो भनीकन रह्यो
जसूखसायाजसै।आश्चयं मान्या तसै ।। ६८ ॥नोल्या वचनूलेपनि।कल्याण

होला

भनी\
वाही नजीक्मा रह्यो।त्यो नित्य इल्दो भयो ।॥६९॥देख्यो र पौँच्यो तहाँ।त्यो कृप दहैर्या मर्ह ॥कदीपसेथ्योजसै।
उफरेर निस्व्यो तसै ॥ ७० ॥
स्तीको स्वरूप्‌ पो बनी ।स्तीको स्वरूप्‌को भनी ॥तिनूमा बहुत्‌ मन्‌ भयो ।स्‌ बाल देशमा गयो ।७१॥
बालूमा शभिव्याको पिंनाम्‌ वालि वीर्‌ भो भनी॥
विस्तार वणंन किया 1 ६७ ब्रह्मा चारसौ कोस दुर पवेत मे तपस्या कररहैथे। ईश्वर को प्रसन्न करनेके उदेश्यसे योग में अत्यन्त ध्यानदिया । योगम रुचि वदी भौर भक्ति रससे जैसे ही अश्रु प्रवाहकिया उन अश्रुभों से एक वीर वानर की सृष्टि हर्द जिसे देखकर

वे अत्यन्त आश्चयं चक्तित हुए । दऽ

ब्रह्माके हृदय में दया भी उत्पन्न

हुई "ओौर आपने कहा कि नित्य मेरे निकट रहौ जर्हां तुम्हायकल्याण होगा । च्रह्या के इन वचनों को सुनकर प्रसन्नता के साथवहीं निकट रहने लगा।फल-फूल खाकर उसी पवंत में वह घूमनेलगा। ६९जव उसे प्यास लगी निकट ही उसने कंभा देखा ओरपहुंच गया । उस कुएमे जव स्ाकातो उसे भपना प्रतिबिम्ब दिखाईदिया । उस प्रतिविम्ब को दूसरा वीर सोचकर वहु उसकृंएमेंजसेही कृदपड़ा वैसे ही किसी. को वहां न देखकर शीघ्रता से बाहर निकलआया । ७० कूंए से बाहर निकल तो आया परन्तु सचमुच वह स्तीकासरूपधारण किए हृएथा। मनम भच्यन्तवखेद हुआ किम किसं प्रकार
स्त्रीकेरूपमें परिवतितिहोगया हूं! इन्द्रजीने उसे देखा ओर उसपरउसी क्षण मन्र-मुग्धहो गये। इन्रजी ने उसे पकड़ लिया भौर वीयंपात हौकर सव वालदेश्र (केशोंमे) में चला गया। ७१ ` उसी वीयं
नैपाली-हिन्दी ,
२९९८
माला काञ्चनि पत्र जानि बद्या एक्‌ इन्द्रजीलेदिया ।बाब्रुको करणा वुन्ञेर खृशिभै त्यो बालि वीर्‌ले लिया।(७२॥तेस्‌ बीचमा तहि सूयं आयर नजर्‌ लाया. उसं स्त्रीमरहाः।सूर्य्येको पनि वीय्यंपात्‌ हन गयो ग्रीवाविषे पो तहाँ।एक्‌ जसं।तेही बीज्‌ पनि बेस्‌कुमार्‌ जब बन्यो ग्रीवाविषेग्रीवादेखि भयो भनेर तिनको सुग्रीव नाम्‌ भो तसं ॥७३॥,सूख्येले पनि पृत्रलाइ्‌ बलवान्‌ साहायदिन्‌ भनी ।,दीयापतनि॥वीर्‌ मध्ये बलवान्‌ धिया र हनुमान्‌, ज्यूलाइसुग्रीव्‌का संगमा र्या ति हनुमान्‌ श्रीसूय्ये धासूमा गया ।वाली सुग्रिव दइ पत्र सहजे ती वानरीका भया 11७४]वाली सुग्रिव दूद्‌ पृत्र

संगमा

ली सत्न

खातिर्‌ गडइन्‌।
प्रातःकालविषे त फेरि अधि जं ती स्त्री पुरूषे भडइन्‌ ॥स्तीरूप्‌ भकन वालि सुभ्रिव दुवे जन्म्या इ पुरुष्‌ भया ।बरह्मालाइ गरू प्रणाम्‌ भनि दुवे छोरा संगे ली गया ।७१५।]गरायापनि।बरह्मालाई्‌ खबर्‌ भयोर खुशि मन्‌ तिन्कोकिष्किन्धापुरि दीन मनूसुव भयो अश्रित्‌ अनाथ्‌ हो भनी ॥एक कुमार उत्पन्न हज जोकेशोंमेगभिराथा। बाल से उत्पन्न होनेके कारण ही उसकानाम वीर बालि पड़ा। माला कांचिनि का पुत्रजानकर इन्धजी ने उसे एकमाला अपण क्रौ। पिता की करुणा
समक्षकर वीर बालिने उसे प्रसन्नतापूरवैक स्वीकार कर लिया। ७२
उसी बीच सूयं ने वहाँ आकर उस्रस्त्री पर दृष्ट्पतकिया। सूयंकाभीउसके ग्रीव (गरदन) पर वीयंपात हुआ । उस वीयंसेभीजोग्रीवा परगिराथा एक उत्तम कुमार उत्पन्न हुआ। ग्रीवा से उत्पन्न होने केकारण उनका नाम भी सुग्रीव पड़ा । ७३ सूयेने भी यह्‌ कहकर कि इसपूत्र को एक बलवान सहायक दुगा, हनूमान जीको जो वीरौं मे अत्यन्त
बलवान था, दे दिया।
वह्‌ हनुमान श्री सूयंधाममे जाकर सुग्रीव के
साथ रहने लगे बालि भौर सुग्रीव दो पत्र इस प्रकार उस वानरीको प्राप्त हुएु। ७४ वह्‌ बालि ओर सुग्रीव दोनों पोको साथमे लेकरसोनेके लिए चली गयी 1 परन्तु प्रातः होते ही व्ह स्त्री पूर्ववत्‌पुरुष हो गयी । स्तीरूप पाकर बालि ओर्‌ सुप्रीव दोनों उत्पन्न हृएओर इसके पश्चात्‌ वह पुनः पुरुष हो गया।इस तरह दोनों पुत्रौको साथ लेकर ब्रह्मा को प्रणाम करने के लिए चला गया। ७५
३५५

भानुभक्त-रामायंण

थीए एक्‌ तहि देवदूत बलवान्‌ब्रह्याको दून गो लगेर गरिदै
हाजिर र मर्जी पनि।यसूलाइ राजा भनी ।७६॥
किष्किन्धा पुरिमा लगी तिलक दे खृप्‌ राज सीख्मा परोस्‌ ।
सात्‌ द्रीपूमा जति वानरादिहुरू छन्‌ईश्‌ नारायण भार हनं भुमिको
तिनूमा हृकूम्‌ यो गरोस्‌.॥राम्‌चन्द्र॒ हनन्‌ जसं ।तत्पर्‌ हवस्‌ यो तसं ॥७७॥
तीनंलाईद सहाय दीनकन ताकिष्किन्धापूरिमा लगी तिलक दे भन्न्या हृकूम्‌ भो भनी।
राजावनायापनि॥त्यो ऋक्षाधिपका ति पुत्र दुद्‌ हुन्‌ वाली र सूग्रीव्‌ भनी।सब्‌ विस्तार गरीस्क्यां हजुरमा मालुम्‌ थियो तापनि॥७८॥छन्‌ तहां।किष्किन्धा तहिदेखि वानरकि भ सूग्रीवृहरूसर्वेष्वर्‌ हुनुहन्छ ता हजुरमा क्या धेर्‌ बताॐ यहां ॥नित्यानन्दं चिदात्म नाथ्‌ | हजुरले लीला स्वरूप्‌ यो धरी।ब्रह्याजीकन खुश गराउनुभयो सम्पूणं भ्रूभार्‌ हरी ।॥७९॥बाली र सुग्रिव दुवैकन धमं जानी।कोतंन्‌ गरोस्‌ त गुण जन्म सवं बखानी ।तेस्‌ ऋक्षाधिपलवाईइ लगीकन त क्चट्‌
ब्रह्मा को यह समाचार सुनकर मनमें खृशीहूर्ई। आधित एवं अनाथजानकर किष्किन्धापुरी देनेकी इच्छाकी। एकं बलवान देवदूत जौनिकटही बवैठाहूयाथा उसे ब्रह्मा नेञआज्ञादीकिडइसे ले जाकर राजाबना दो। ७६ किष्किन्धापुरी मेले जाकर तिलक करदो ताकि यह्‌राज्य कायंमे व्यस्त होजाये।

सात द्वीपौंमें जितने भी वानर आदि

है उन .पर यही-शासन करे। श्री नारायण भू-भारहरण करने हतुजर्तं रामचन्धजी होकर आयेगे उन्हींको उस समय सहायता देनेकेलिए तत्पर रह । ७७
किष्किन्धापुरीमें ले जाकर तिलक कर देने की
अज्ञा होने पर उस रिक्षाधिपको ले जाकर तुरन्त राजा बना दियाउसी रिक्षाधिप केवे दो पूवर बालि ओरसुग्रीव हैँ। इसप्रकार जोकुछ मन्न मालूम था श्रीमन्‌ की सेवा में सविस्तार वर्णेन कर चुका । ७८उसी समय से किष्किन्धा बानरकाहो गया मौर वहीं सूप्रीव आदि दहै।प्रभु सर्वेश्वर द अतः इस विषय पर मै अधिके क्या बताङ।नित्यानन्द तथा आत्मानाथ प्रभु ने अपना लीला-स्वरूप धारण कियाब्रह्माजी को भी खुश करते की कृपा की तथा सम्पूणं भू-भार काहरेण किया । ७९ बालि भौर सुग्रीव दोनों धमं को जानकर जन्म-गुण

नेपाली-हिन्दी

३०१
सम्बन्ध केहि रधुनाथ सित पनं जाई।पाप्‌ टृ धमं पनि बद्दछ ` तेसलाई ॥८०॥तापनि 1:वणेन्‌ या यति क्मंले हजुरको हूदेनथ्योवणेन्‌ गं जगत्‌ यहां कि रधुनाथआर्को आज कथा कहन्छु रघुनाथ्‌ ।रावणूले हरि चीगयो त यहिदहोरावण्‌को र सनत्कुमार ऋषिकोसोध्यो रावणले परी चरणमाब्रह्मन्‌ ¡ को बलवान्‌ छ देवेहरूमाजित्छन्‌ सन्‌ रिपुलाईइ देवगणलेकस्को पूजन गदन्‌ द्विजहरूकस्को ध्यान्‌कन गदंछन्‌ सहजमायस्को निश्चय क्ति पाइनं अनेक्‌ट्लो कृन्‌ छ वताइबक्सनु हवस्‌सून्या प्रष्न सनत्कुमार ऋषिलेजान्या रावणको र आशय उस
सब्‌ ताप्‌ हरोला भनी ॥सीताजिलाईपति ।तेसूको इरादा भनी ॥८१॥एक्‌ दिन्‌ भयो भेट कहीं ।
क्ये बात्‌ ऋषीथ्ये तहीं ॥ 'आधारकस्को ` गरी।सामने अगाड़ी सरी ।॥८२॥जो योगि हृन्‌ ती पनि।संसार्‌ तरौला भनी ॥कस्तेविचार्य पनि।
येही छ टूलो भनी ॥८३॥यस्ता उबलृकोजसँ |माफिक्‌

बताया

तसै ॥
सबकी व्याख्या करते हुए कीतंन करं जिससे श्री रघूनाथके संग कुष्ठसंबंध स्थापित हो जाता ओर

वह पापसेमूक्तहो जाता। ८०

उसमे.
धमं-वृद्धि होती।प्रभु का वर्णन इतने ही कमं से नहीं होताथातथापि यहाँ जगत वर्णन करताहँ कि रघुनाथ पापओौर तापकाहूरणकरेगे | ' आज मै एक अन्य कथा कहता हूँ रघनाथ ! रावण सीताजी को हरण कर ले गया ओौर यही उसका इरादा भी था। ८१रावण
ओर

सनत्कुमार ऋषि की एक दिनि

कहीं भेंट हो गयी)

रावणने चरणोंमे पड़्करऋषिसे कुष बात पष्ठी)मेसे बलवान कौनदहै?

ओर किसके आधारसे

होकर समस्त शलओं को जीतेगे? ८२

ब्राह्मण]

देवों:

देवगण सामने अग्रसर

योगी होने के लिए द्विज

लोग किसका पूजन करते है, सहज संसार तरते की इच्छा से किस्काध्यान करते हँ। अनेक प्रकार से विचार करने पर भी मँ यह्‌निश्चय नहीं कर सका किकौन बड़ाहै, अतः यहु बतानेकी कृपा करें
कि यही श्रेष्ठ है । ८३ जब सनत्कुमार ऋषिने इस प्रकार के महत्व `पूणं प्रष्न को सुना तव रवण के आशय को जानकर उसी प्रकारबताया-सुनौ रावण } एक हरि के समान महान अन्य कोई नहीं

भानुभक्त-रमियण

३५२ `
कवै।सूर्यौ रावण ! एक्‌ हरी सरि ट्लो मिल्दैन आर्कोदानवादिहुरुका आधार्‌ इनं हुन्‌ सवे ॥८४॥दयौताका तवपदा गरी।जस्ले नाभिकमल्‌ विषे त भगवान्‌ ब्रह्याजिती-द्वारा जगते बनाउनु भयो ठट््‌ला तिनं हुन्‌ हरि ॥इन्द्रादीहर जित्तछन्‌ रिपु सवं माधार्‌ यिनं हन्‌ हरि।ध्यानूले योगिहृरू तिनकन भजी जान्छन्‌ सह्‌ पार्‌ तरी ।1८५॥रावण्‌ले इ वचन्‌ सुन्यो र ऋषिका विन्ती गव्यो फर्‌ तहां ।विष्णृूले जति . मार्दछन्‌ रणमर्हां ती वस्त जान्छन्‌ कर्हाँ॥दोस्रो प्रश्न सुन्या तहां ति ऋषिले यस्ता प्रकारको जतं।उत्तर्‌ फेरि दिया कृपा गरि तर्हा तेस्‌लाइ तिने तसं ॥८६॥दयौताले जाति मादंछ्न्‌ ति त अनेक्‌ स्वर्गादिको भोग्‌ गरी।कालान्तर्‌ पछि जन्म हुन्छ तिनको पृथ्वी त्लमा्लरी॥जसूलाई हरि मादेछन्‌ उ त तसै जान्छन्‌ तुरन्तं अनि,मुक्तं भैकन वस्छ जन्म तस्तको हूं देन कंले पनि ॥८७॥ `यस्ता सत्य वचन्‌ सुनी मन वुह््यो रावण्‌ भयो खुश्‌ अनि।संग्राम्‌ श्रीहररि्ये गरी तहि मरी मुक्तं म॒ हुन्छ भनी॥है; देवों तथा दानव आदि के आधार सव वही हैँ । ८४ जिसकीकृपासे भगवान के नाभि से उत्पन्न कमलने ब्रह्मा जी को पैदाकिया उन्हीं के हारा जगत के सुजन काहैतु वही महान हरिदहै।इन्द्रादि भी अपने शतुओं पर उन्दींहरिकेही आधार पर विजय प्राप्तकरतेओर योगी लोग उन्हींका ध्यान एवं भजन करके सहजनदहीपारतरजातेहैं। ८५ रावणने इन व्चनोंको सुना ओौर पुनः ऋषिसे;विनती की । विष्णृद्ारा रणम जितनेभीमारे जातेरहैँ वै रहुनेकेलिए कहां जातें ।

इसप्रकारका

दूसरा प्रणन सुनकर श्षिने उन्हे

पुनः कृपापूवक उत्तर दिया । ८६ देवताओं द्वारा जितने भी मारे जातेहैः वे अनेक स्वर्गादिको भोग करते हए कालान्तरमें पृथ्वी तल परजल्मं लेते हँ। हरि जिसे मारते हैँ व्ह तो, तुरन्त मक्त हो जाता दैआर उसका कभी भी जन्म नहीं होता । ८७
सूनंकर रावणके मन में सन्तोष हुआयह्‌ सोचकर कि

एेसे सत्य वचनो को

ओर
साथ ही प्रसन्नता भी।

श्रीहरि के साथ संग्राम कर

उनके हारा मारे जाने

पर्‌ सूक्त. हो जाऊंगा, एसा निश्चय मनमें कर दृढ़ संकल्प लिया जो
ऋषि ने भी जान लिया ओौर प्रसन्न होकर सनत्कुमार ऋषि ने उसे

नेपाली-हिन्दी |

यस्तो सुर्‌ मनमा जसँ दृढ गम्योखृशी भे ति सनत्कुमार ऋषिलेहे रावण्‌ ! युन वत्स! जोष मनमातिस्रो लौ परिपू्णं हुन्छ मनमारूप्‌ जस्तो हरिको छ भन्ु अहिलेस्थावर्‌ जद्धम सूये चन्द्र पृथिवी
जान्याआशीष
३०३
ऋषीलेपनि।दीया पनि ।5८।।
स्वाभीष्ट' सिद्धी सवे॥शंका नामन्याक्वयस्ता ` हरी
छन्‌ सनी ।
शेष्‌ दैत्य दानव्‌ पनि ॥८९॥योरूप्‌ विराट्‌ रूप हो।देख्छ्‌ कृपेले छ यो॥
ईखूप्‌ हुन्‌ हरिका अनेक्‌ तरहकापीताम्बर घनष्याम्‌ त सृक्ष्मस्पहोकुलूमा हरि।योरूप्‌ देखन मन्घुबा छ त हनन्‌ इक्ष्वाकुछोरा हुन्‌ दशरथूजिका भनि जगत्‌ भन्नन्‌ तिराम्‌नामगरी।।९०॥हुकूमूले गरी।सीता लक्ष्मण साथमा लिड पिता जीकाजानन्‌ दण्डक वन्‌महाँ भजिलिया चीन्ह्या तिनं हन्‌ हरि ॥यो विस्तार . सनत्कुमार ऋषिका मुख्देखि जस्स सुम्यो ।चीन्ह्यो ख्वामितलाई तेस्‌ बखतमा तेसूले र यस्तो गन्यो ॥९१॥हातदेखीमरी ।श्रीराम्‌चन्द्रसितं विरोध्‌ गरि तिनं कासंसार्‌ सागर पार्‌ तरेर सहजं जान्छ्‌ जहां छन्‌ हरि ॥यस्तो आशयले सिताकन हव्यो रावण्‌ त हो बुद्धिमान्‌ ।लक्ष्मी हुन्‌ इ सिता भनीकन चिन्ह्यो मान्थ्यो करटा हो अजान्‌॥।९२।।सुनो वत्स, तुम्हारे मन मे जो भीआकांक्षा है वह सव परिपूणं होगी, कभी मनमेंशका न करो। हरिकारूपकंसादहै? मेँ अभी तुम्हं वताताहंकि हरि एसे ह-ग्रह, सूयं, चन्द्र,

आशीषमभी दिया । प्म

हे रावण

पृथ्वी, देव, दानव आदिभी । ८९ येरूपजौ हरि का है अनेक प्रकारकेये रूपवचिराटरूपरहैँ। पित्ताम्बर, घनश्याम आदि सूक्ष्म रूप, ये सबउन्हीं कींकृपा से दिखायी देते है) यह्‌ रूप देखने की इच्छा यदि

हो तो इक्षवाक्‌

कूल. में हरि का जन्म होगा।
राम-नाम धारीसीता-लक्ष्मण को
को दशरथ जी का पुत्र जानकर जगत कहेगा । ९०साथमे लेकर पिताजी की आज्ञा के फलस्वरूप राम दण्डकवन मे जायेगे.।
उनको ही हरि जानकर पहचानो । एेसा विस्तार सनत्कुमार ऋषि के महसे सुनते ही उस समय उसने स्वामी को पहचान ओर एसा मनै
सोचा। ९१ श्रीरामचन्द्रजीका विरोध करके उन्हींके हाथों मरकरसंसार-सागरसे पार तर कर सहज हीः हरि जरह है वहीं जागा । इसी
कारण सीता.का हरण क्या।

रावण तो बुद्धिमान व्यक्ति है, सीता

३०४

भाचुभक्त-रामायण

जो यो कथाकन खुशी भइ पाठ य्त्‌ |सुन्छन्‌ कहीं करहि युनायर पाप हुन्‌ ।।खुप्‌ आयु वदु तिनको अति सौख्यं हन्छन्‌ ।धन्‌ लाभ हृन्छ बहुत जब नित्य सुन्छन्‌ ।॥।९३॥। ~एक्‌ दिन्‌ नारदजी इली सकल लोक्‌ आयानजीक्मा जसे.।ःदेख्यो रावणले र पाड परि एक्‌ विन्ती गव्यो यो तसैः।हे स्वजन मूने!लडाकि बलिया वीर्‌ छन्‌ कहाँ सो कहीपाऊलागरनु हुवस्‌ गव्यो विनति यो खृप्‌ लड्न इच्छा भई ।।९४॥रावण्का इ वचन्‌ सुनेर मूनिलेभन्छत्‌ को भनु छेन वीर अरुता

तिस्रो मनूयुव पूणं गने सकन्या

मनले विचार खुप्‌ गरी।याहं : तिमीलैे सरी॥

वीर्‌ श्वेतद्रीपूमा

गया।
; मिल्छन्‌ जाउ तहीं नजाउ कहि लौ खुप्‌ लड्न मगसूब्‌ भया॥।९५॥जोः विष्णुको पूजन नित्य गछन्‌ ।जोविष्णुका वाहुलिदेखि ` मछन्‌ ॥तेस्ता

महात्मा

तैलोक्यका

तहि

बस्त

जान्छन्‌।

वीर्‌ तति

तुच्छ

.मान्छन्‌ ।९६॥
को लक्ष्मी जानकर पहचान लिया । - वृह अन्जान कर्ह हो सकता था ९२जो इस कथा को प्रसन्नतापूवेक पाठ करता है तथा कहीं सुनता है भौर कहींइसे सुनाता है उसके पापो को हरते है, उसकी आयु में वृद्धि होती हैतथाअत्यन्त सुख पातारहै। धनकाभी नित्य उसे लाभ होतादहै। ९२ एकदिन नारद जी सकल लोकोंका भ्रमण कर जंसेही उनके निकट अयेरावण उन्हें देखते ही तुरम्त उनके पाँवों पर गिर पडाओर विनती करने
लगा । दे सर्वग्य मुने ! लड़ाक्‌ वलिष्ठ वीर करां ह, बताने की कृपा करेमेरा प्रणाम स्वीकार करे; मूज्ञं लड़ने की अव्यन्त इच्छाहौ रहीहै। ९४राणके इस वचन को सुनकर मूनिने मनमें गम्भीरता से-विचार
कर॒ कहा कि किसको वताॐ, तुम्हारे समान तो यहाँ ओौर कोई वीरनहीं है! तुम्हारी मंशा पूणं कर सकनेवाला वीर. शवेतद्वीप मेंचला गयादहै।!अतः वहीं जाओ, मिल जयेगा। मौर कही. न
जायो,
यदि सचसुच दही तुम्हँ लने की इच्छाहौ। ९५;`जो.- विष्णु
का पजन नित्य करते ह जो चिष्णु की वाहं हारा मरते. र्है.-वेमहात्मा वहीं रहने के लिए जतिर्हँ।च्रिलोककेवीरों को तो-वे

वहत ही तुच्छ मानते हँ! ९६

नारदके इस वचन को -सुनकर शीघ्रता

नेपाली-हिन्दी

३०५
नारद्का इ वचन्‌ पुनीकन त ञ्लट्‌ पुष्पक्‌ विमानूमा
इ्वेतद्रीप्‌ पनि पुग्दष्ल्‌ भनि चल्योइ्वेतद्रीप नजीक्‌ पुगेपछ्ि विमान्‌ओर्त्यो पृष्पकदेखि हिक्मत धियो

ए्वेतद्वीप

पुगी प्रवेश्‌ गरं भनी

धाया सुन्दर नारि घेरि चहंभोर्‌अर्कालि पनि देखि पक्रिकन सबअर्कलि अन्न अकरिले धरिलिदा

रावण्‌ त

चढी1ं

तेसं घडी ॥
पुष्पक्‌ नचलूत्या भयो ।पंदल्‌ दगृर्दे गयो।९७॥मनूसुब्‌ गरेथ्यो जसे ।'आश्चयंमान्यो तसे ॥'वृत्तान्तसोद्धी भई।चेत्यो वहां पो गई ।९८।(
आश्चयं मन्यो पनिं।मष्ट मै पनि विष्णुदेखि र यहां आएरब्ख्छ्‌भनी ॥जल्दी मनं निमित्त खुप्‌ छल गरी सीताजिलाईहुन्यो ।लंकामा लगि मातृवत्‌ जननिको सेवा पनी खुप्‌ गव्यो ॥९९॥राम्‌ नामृले परमेश्वरे हृनुभयो मालुम्‌ छ सबका पति।क्या विन्ती गरु धेर हजुर त सबका सक्षी जगत्‌का पनिमेरो येहि चरि गायर रहोस्‌ यो लोक संसार्‌ भनी।गरनूहुन्छ यहां अनेक्‌ तरहूका संसारि लीला पनि ॥१००॥उमक्यो स्ीहरुदेखि बल्ल र यहाँ
से पुष्पक विमानमें सवार होकर शवेतद्वीप ही पहूंचूंगा, एेसा सोचकररावण उसीक्षण चल

पड़ा

शवेतद्रीप के निकट पहुंचने के पश्चात्‌

पुष्पक विमान चलना बन्दहो गया । अतः पुष्पक से उतरा-साहसीथा अतः पैदल दही दौडता हुभा गया! ९७ शवेतद्रीप॒ पहुंचकर उसमेंप्रवेश करने की इच्छा करते ही सुन्दर नारियों ने आकर उसे चारोओरसे घेर लिया, यह देख उसे आश्वं हआ । दूसरी भी उसे पकड
कर सव वृत्तान्त पृष्ठने लगीं। इसप्रकार सभीके एकके बाद एकदारा पकड लेने पर उसे वहां जाने पर पश्चाताप हुजा। ९८ बड़ी:कठ्नितासे उन स्वरियोंसे छुटकारा मिला ओर उसे बहुत ही आश्चयंभीहुआ। भी विष्णू द्वारा ही मसूगा अतः यहीं आकर रहताहं एेसा सोचकर तुरन्त ही मरने के लिए अत्यन्त छल द्वारो सीता जीकाह्रणकिया। लंकामें ले जाकर मातु व जननीकी सेवा भी लगनसेकी। ९९ राम-नामके हारा परमेश्वर का जन्म हुभा, यहु सबको ज्ञातही है अधिक क्या विनती करू श्रीमन्‌ सवके साक्षी ओर जगतपति है ।वेही मेरे चरित का गान करते हुए यह लोक-संसारमे रहेँ। वे यहांअनेकं प्रकारकी सांसारिकलीलाभी करते! १०० इसी रीतिसे
३०६

भाचुभक्त-रामायण

येही रीत्‌ सित रामको स्तुति गरीसंसारी सरिभं अनेक्‌ विषय-भोग्‌फवर्यो पुष्प विमान्‌ कूबेर्‌ सित गईफकर्या नाथ्‌ | म कुवेरका हुकूमलेपट्टे रावणले जितीकन लियो

खश्‌ भं अगस्ती

गया।

श्रीराम

भया

गर्दा

रामकं हजुरमा

गयो ।
यो बिनित गर्दो भयो।१०१॥
सेवाउसको गरिस्‌।एेल्दे श्रीरघुनाथलेलितिलिदा उन्का अधीन्मा परिस्‌ ॥गरी ।खुप्‌ यो योग्यभय अक्ष पनि तजा सेवा प्रभूकेआउन्‌ तदंले यहां जव त राम्‌ वेकुण्ठ जान्छन्‌ हरि ।१०२॥हकम्‌ येति कूबेरले पनि गन्या ख्वामित्‌ पुग्यार््यां जसं!मजूर सोहि हकम्‌ गरीकन फिर्व्यां खश्‌ भे हनूर्मा. तसं ॥पुष्पक्को विनती सूनर रघुनाथ्‌ जीको हुकूम्‌ . भो पनि।पले जातम सम््ुला त उ बखत्‌ चांडोतंआएस्‌ भनी ।१०३॥पुष्पक्लादइ विदा दिया र रघुनाथ्‌ ले राज्य को भोग्‌ गन्या।जस्‌का राज्यमहां बडा पछि रही बालक्‌ न क्ल्य मय्या ॥यस्तो रान्‌ प्रभुले गव्या सकलको आनन्दमैकाल्‌ ` गयो।श्रीराम्‌का तहि राज्यमा पनि टुलो आश्चयं एक्‌ दिन्‌ भयो ।।१०४॥अगस्ति प्रसन्न होकर राम की स्तुति करते हए चले गये। श्रीरामसांसारिक मनुष्यों के समान अनेक प्रकार .के विपय-भोग आदि करनेलगे। कूवेरके पास जो पृष्पकतिमानथा लौटकरपुनः राम दही केपास चला गया भौर कर्हुने लगाकि, हे नाथ | भैँकुवेर की अल्ला सेआपके पास लौट आया हँ । १०१पहले रावण के जीतने केकारण उसे दिया गया ओर उसीकी सेवाकी। अभी श्री रघुनाथजीत लेने पर उनके अधीन हो गया।अव अत्ति योग्य हौकर
अभी तु जाकर प्रभुकी सेवा कर।तु यहां तव॒ आना जवराम रूपी हरि वैकुण्ठको चले जायें । १०२ मैँजसेही पहुंचा कुबेरकीइतनी आज्ञा हू्ईद। स्वामी | मै उसकी आज्ञा को शिरोधायं करप्रसन्नता से श्रीमन्‌ के पास लौट'आया। पुष्पक की देसी विनती सुनकरश्री रधुनाथ की भी अक्ञा हर्ई-अभी तो तु चला जा, ैँःजिस समयःतुजे. स्मरण करूंगा तुं उसी समय तुरन्त आना) १०३ इस -प्रकारपृष्पक को विदाकर रघुनाथ राज भौगने लगे। जिसके राज्य मेंवृद्धाओंको पै रखकर वालकों की कभी मृ्यु नहीं हृई। प्रभु.हारा एसे राज्य का सञ्चालन किया गया जिसमें सकल जनों का समयआनन्दमय व्यतीत हज । श्रीराम कै भी उसी राज्यम एक दिन.

नैपाली-हिन्दी

ब्राह्मणको लड़का मरे र पिता रूढा रह्याछन्‌ कहीं 1प्रभूले तहीं।देख्या श्री रघुनाथले तव विचार राख्याक्यालेयो विधिभो भनीकन विचर्‌ गर्दा भयो याद्‌ जसें।तप्‌ गर्थ्यो तहि शूद्र जङ्खलविषे उस्लाइ मास्या तसे ।( १०५॥लडीका अनितप्‌ गर्दा जब शूद्र मारिदिनुभो, उटेयोब्राह्मण्‌ खूशि भया, गयो परमघाम्‌ त्यो शूद्र चाहं पनि॥।यस्तं ॒रीत्‌ सित पालना गरि लिदा दुःखी भएनन्‌ . करहीं।कोटी लिङ्क पनि स्थले स्थलविषें थाप्या प्रभूले तहं ।। १०६॥संसारको सुख भोग्‌ गराउन भयो सीताजिलाईपनि,येही गायर लोक्‌ तर्न्‌ भनि गञ्या स्थापन्‌ कथाको. पतिसोता मात्र थिदन्‌ प्रिया प्रभुजिकी राजषिको चाल्‌ धरी।शिक्षा खातिर गादिमा बसि अने क्‌ राज्का अनेक्‌ काम्‌ गरी।।७।दशृहज्जार्‌ जब वषे राज्‌गरि बित्या काल्‌ ता यसं ॒बीच्‌ यहाँ ।सीतालेरधघुनाथका चरणमा विन्ती गरिन्‌ एक्‌ तहां ॥ख्वामित्‌ ! नित्य हजूरका चरणमां दासी म॒ हँ तापनि।पठेत्‌ आयर पाउमा मसिति खृप्‌ ब्रह्मादि द्यौता पति । १०८॥~~~

अत्यन्त आगएच्येजनक घटना घटी । १०४

~ ~~~ ~
~

एक ब्राह्मण के ल्के की मृत्यु

हुई थी ओर श्री रघुनाथने. उसके पिताको रोते विलाप करते देखमपने.मनमे विचार क्रिया ओर सोचने लगे कि यह्‌ सबं कुछ क्यों
ओर
कैसे हुआ ।

तब उन्हं याद आयाकरि

एक जंगल में एक चूदर

तप करता था ओौर श्रीरामने उ्तेमाराथा। १०५ तप करते हूएउस शद्रकेश्चीराम द्वारा मारेजानेके कारण, अव वह मृत लड़काजी उठा, यह्‌ देख वह्‌ ब्राह्मण अत्यन्त प्रसन्न हआ ओौर इसः प्रकार
वह्‌ शुद्र बन्धु परमधाम-को चलागया।देसे ही रीति से लोगोंकापालन करते के कारण कहीं कोई भी दुखी. नहीं हृमा।प्रभु नेस्थान-स्थान में कोटि लिगोकी स्थापना भी की । १०६सीता जीको भीसंसारके सुखभोग करातेकी कृपा की। इसी कथा की स्थापना करके ओर इसीका गान करते हुए लोकं को संसार तर जानेकी बात कही गयी है । माता सीता प्रभु जी कौ प्रिया. हृं ।
राजश्रीका वेश धारण कर शिक्षाहैतु गही पर बैठ अनेक प्रकार केकायं करिये । १०७ जब राज्य करते हुए दस हजार वषं व्यतीत हृए-
इसी वीचमे सीता ने श्री रधुनाथके चरणोंमेे एक विनती की, हस्वामी!प्रभु की नित चरण की दासी'होते हुए भी ब्रह्मा आदि
३०८

भानुभक्त-रामायण

गष्ठैन्‌ बिन्ति हज्‌र्‌ अघी गददियापाऊ लागु हुम्या छ युक्ति यहिहो
आफ प्रभू राम्‌ पनि।वेकुण्ठ जान्या भनी॥

भन्छन्‌ विन्ति गर्भ्यां हनूर्‌ सित सबं

न्रह्यादिको मत्‌पनि।उहि हवस्‌ ख्वामित्‌ ! जनायां भनी ।।९॥
जस्तो गने उचीतहोसीताले बिनती गरित्‌ र रघुनाथ्‌वेस्‌ भन्छन्‌ सब गर्न पदं यसोलोकको एक्‌ अपवाद्‌ लगायरतिमी

ज्यूको हकम्‌

भो तर्हा।
वैकुण्ठ जादा मर्हाँ।लाईब्रडो वन्‌महांँ।लान्छ त्याम्‌ पनि गष्टुनानु तिमिले वाल्मीकि आश्रम्‌ जहां | ११०॥एेले गभे छ जन्मनन्‌ दंड कुमार वीर्‌ वीर्‌ तिमीले पनि।लोकूको यो अपवाद मेट्छुंअबता पस्छ्‌ म॒ नीया भनीपसौलीजसं ।याही आयर लोकका विचमहांँ न्यायंफाट्निन्‌ धरति र ताहिबाट तिमिल वेकुण्ठ जानू तसं ॥१११॥यसूरीत्‌लेतिमि जाउली जब अघी क्यं काल्‌ बसी मै पनि।आला किन बस्त कहिसक्यां ये सुर्‌ छ मेरो भनी॥जानाको यहि सूर निश्वय गरी श्रीमान्‌ सभामा गया।हाम्रो यश्‌ अपयेशके छ दुनियां मा येहि सोद्धा भया ।॥११२॥
देवगण भी आकर मेरे पांव पड़ते । १०८ प्रभ राम स्वयंही यदिआगे चले जाते तो पांव पड़करप्रभु से विनती करते ओर इसी उपायदवाराबैकुण्ठ को जाते। सव ब्रह्मादि की ओरसे मैने प्रभु से विनती कीहै भतः स्वामी जो आप उचित समञ्ञं उसे बताने की कृपा करे । १०९

सीताने एसी विनती की ओर ध्री रधूनाथ जीकी

भी. आज्ञा हई

कि सही कहते है-अब वही करना होगा- वैकुण्ठ जाने के पहले लोगोंपर एक अपवाद

थोपकर

तुम्हुं बियाबान वनम

ले जाकर

परित्याग

कृं ओर तुम बाल्मीकि के आश्रम मेँ चली जाओ । ११० सीता इससमय गर्भिणीरदो वीर कुमारो को जन्म देगी, लोक के इसअपवादको

मिटाने के लिए अब

न्याय हेतु प्रवेश करता

हूं।

यहीं

भाकर जवतुम लोकके बीच न्याय पाने के लिए प्रवेश करोगी, वैसेही धरती फट जयेगी ओर वहीं से तुम बेकृण्ठ चली जाना । १११इस रीतिसे तुम जाओगी भौर मै कूठ समय तक रहकर आङ्गा।यहाँ क्यो रहना चाहता हूं यह्‌ मै बता चुका हूं मौर यही मेरा विचारहै।! जनेका निश्चय कर श्रीराम सभामेंचलेग्ये। दुनियामें यशअपयशक्यादहै यही सव प्रष्न करने लगे। ११२ सबने विनतीकी किं

.नेपाली-हिन्दी

२०९
सबले विन्ति पनी ग्या हजुरमा बोल्छन्‌ यशेयशू भनी ।एकाले पछि क्याभन्योकि महाराज्‌ एक्‌ सुन्छुं अपूयश्‌ भनी ॥रावण्ले वनमा हरी लगिगयो क्य दिन्‌ त राख्यो पनि)ल्याएचोखी भनी । ११३।॥।यस्ती हुन्‌ . इ सिता उनेकन घरंयस्तीस्ती पनिचोखिहो भनि यहाँ राजं त॒ राख्छन्‌ भन्या।वेश्ये बन्या॥चोखी कुन्‌ रहली यहां अब उपर्‌ सम्पूणंजके ।भन्छन्‌ अपृयश येहि मात्र नियो विन्तौ गरेथ्योलक्ष्मण्‌ जी कनडाकिल्याउन हुकूम्‌ दीया प्रभूले तसै ।॥११४८॥रघुनाथकाहकूमूलेहजुरमा लक्ष्मण्‌ पुग्याथ्या जसं ।सुत्नेलाइ कठिन हन्या अति कठोर्‌ हकम्‌ भयो यो तसे ॥हे भाई ! इ सिताजिलाइ अहिले त्याग्‌ गनं मेले पन्यो ।चोखी जानिलिदात दुयेश बहुत्‌ लोकूले मलाई गव्यो । ११५॥सीतालाद्‌ चढाद्‌ जल्द रथमा वाल्मीकि आश्रम्‌ जहाँ ।हो ताहीं नजिके

गएर वनसा

उत्तर्‌ केहि गव्यौ भन्या त तिमिलेभाई ¡ भोलि बिहान लानु वनमा

छाडेर

आऊ
यहाँ।॥

माग्यौ म॒

एेले

मन्याँ।
हकूम्‌ येहोग्यां ॥११६॥
प्रभुमे यशही यश व्याप्तहै। परन्तुएकने बादमें कहा किं महाराज!मुञ्ञे तो एक अपयश सुनायीदेताहै।रावणने बन में हरण करके
जिसेले जाकर कुछ दिनिरखाथा वैसीस्त्रीजो सीता है, उसको पवित्नमानकर वापसनले आये। ११३ एेसीस्त्ीको भी पवित्र कहकर राजदरबारमे रख लियाजातारहै तो फिर अब आगे सम्पूणं वेश्या बननेपर कौन पवित्र रहेगी । अतः एसे अपयश मात्र को सुनकर यह्‌ विनती
करते ही प्रभुने लक्ष्मषणकोब्ुला लनेकी अकज्ञादी। ११४ श्री रघुनाकौ आज्ञा के अनुसार लक्ष्मण जसे ही उनके सम्मुख पहुचे थेवसे ही सुननेमे अति कठोर एवं कठिन अदेश देनेकी कृपा की1
हे भाई!
मूके इसी समयसीता जीकोत्याग करनाहै क्योकि पवित्र
जानकर अपना लेने पर लोगों ने मृन्न पर अपयश लगाया । ११५ सीताको अविलम्ब रथमे चढ़कर बाल्मीकि-आश्चम के निकट बन में छोड-
कर चले आभो! यदि तुमने मृज्षपे प्रतिवाद क्रिया तो तुम जानोकिमै अभी मरा। 6 अतः भाई ! कल सुबह हीते ही बनमें ले

जाना, यही मेरी तुम्हे आज्ञा है । ११६

तोवे एक महान संकटमे पड़गये।
लक्ष्मण ने जव यह आदेश सूनाप्रातःकाल उठे ओर एक उत्तम
३१०५

भानुभक्त-रामायण

लक्ष्मणले जब यो हुकूमूकन सून्याप्रातःकालमहां

बह्िया

उठेर

टूलो

सकसूमा

एक्‌ रथ्‌ तयारी

परी ।
गरी॥
सीतालाइ्‌ चढादइ जल्दि वनमालागिन्‌ गनं विलाप्‌ सिताजि वनमा
छोडरभयापरनि।छाड्या मलाई भनी । ११७॥

रुन्थिनूवाल्मिकिशिष्यलेघुनिकह्या

= वात्मीकिजीर््यं

सून्या वाट्मिकिले र पूजन गन्यात्याया आश्वममा र लोकजननी
गई |
सीताजिको याद्‌ भई॥सीता इन हन्‌ भनी।
स्त्री जन्‌लाईइ लगाई खुपसित गन्या सेवास्िताको अनि ।११८॥ती विप्रपतिनिहुरुले पति लक्ष्मि जानी।पजा सतकन गन्या अति भाग्य मानी ॥
सीतापती पनि विरक्त भएर सुख्‌ भोग्‌ ।छोडी मुनी सरि भया मनले लिई योग्‌ ॥११९॥अथ

रामगीता

लीला मेरि भनी सुनीकन तरून्‌ ई लोक

संसार्‌ भनी।
लोकैका हितका निमित्त भगवान्‌ मानिस्‌ स्वरूप्‌का वनी ॥लीला गर्नृभयौ र वृद्धहर्ले जो गद्या सो मरी।सत्‌कामै गरि दिन्‌ विताउनु भयो वाधा सवेको हरी ॥१२०॥र्थं तैयारकिया। सीताजीको उसीमें चाकर वनमेंलते गये ओरछोडकर चले अये। सीताजी वनमें अपने को छोड़ी गयी जानकरविलाप करने लगीं । ११७ बाल्मीकि महूषि के शिष्य ने उनके रुदनको सुनकर तुरन्त वाल्मीकिजी के पास जाकर सूचनादी। यह्‌ सुनकरसीताजीको याद.करके पूजन किया ओौर जाकर उन्हँ आश्रम मेंले आये । लोकजननी सीता यहीं हँ एेसा जानकर उनकी सेवा मेंस्त्रियों को लगा दिया। ११०५ उन विप्र-पत्तियोंने भी लक्ष्मी जानकरतंथा सौभाग्य सानकर सीताजीकौ पुजाकी। सीतापति श्रीरामभी
विरक्त होकर सुख-भोगों को व्यागकर मुनिके समानदहो गये ओर मनमे योग ले लिया) ११९इस लोकमें संसार इन लीलां कोसुनकर कहता है कि लोकर्हित के निमित्त भगवान नते मनुप्यका स्वरूप
धारण कर लीलायें कीं ओर वृद्धो हारा किए गये कर्मो के समानसत्काये करते हए ` दिन व्यतीत कयि; यही सवके हरि थे। १२०लक्ष्मणजी प्रभुके पास ही थे)

उन्होने, प्रश्न किया कि सवसे महान

नेपाली-हिन्दी

२११
साथ्मा लक्ष्पमणजी धिया प्रभुजिथ्ये कुन्‌हो ट्लो विष्‌ भनी।सोध्या लक्ष्मणले र॒सब्‌ कटनुभो विस्तार्‌ प्रभूले पनिः॥ब्रह्मस्वे विष हो भनी नृगजिको विस्तार सुनाथ्या जसे ।तस्यो चित्त र फेरि लक्ष्मणजिले क्यै सोध्न लाग्या तसे ।२१॥हे नाथ्‌ ! ज्ञान स्वरूप देहहरका आत्मा अधीन्‌ भै पनि.।भूभार्‌ हर्नृभयो अनेक्‌ तरहृका यस्‌ आकरतीका बनी ॥।लीलाहो इत आत्मरूपि भगवान्‌ भक्तं फगत्‌ जान्दछन्‌ ।यो लीला त दया तिभित्त हुनगो यस्तो पनी मान्दछन्‌ ।। १२२॥।यस्ता मालिक जानि पाड तलमा ख्वामित्‌ ! प्याको मछ ।तदं ॥संसार्‌ रूपि गभीर्‌ समुद्र सहजे कुत्‌ पाठ्लेसोही युक्ति बताइ बक्सनु हवस्‌ जुन्‌॒ पाठ्ले यो तरी ।पुरन्याद्ल्‌ पछि धाममा सहजमा आनन्दको भोग्‌ गरी ॥१२३॥गरी ।लक्ष्मण्‌का इ वचन्‌ सुनेर रघुनाथ्‌ मूख . हेंसीलोआपना भक्त ति भाद्‌ लक्ष्मणजिको सम्पूणं सन्ताप हरी ॥तत्त्वज्ञान पनी

तहीं

दिनुभयो

भन्छन्‌ लोक्‌हरुलाई तनं सजिलो

जुन्‌लाईइ, वेद्ले पनि।साधू छ येही भनी । १२४॥.
विष कौन है। प्रभु ने तब विस्तारपुवेके वताने कीक़पाकी कि ब्रह्मस्वही महान विषदहै। इस प्रकारनृगजीके बारेमे विस्तारपुवंक सुनाओर मनमें सन्तो करने के पश्चात पुनः लक्ष्मणजी कू ओौर (पूछनेलगे! १२१हे नाथ | ज्ञानरूपी देह आदि आत्माओं के अधीनहोने पर भी एेसी आकृति धारण कर अनेके प्रकार के भरु-भार हरणकरते कीषृपाकी। केवल भक्त लोग ही जानते हैँ कि यही तो आत्मिकभगवान की लीलादहै। ये भी माना जाताहै किये लीला द्याकेनिमित्त की गयी । १२२ रेते मालिक जानकर है स्वामी!मै भापकेचरणतलमे पड़ाहुं। संसार रूपी गम्भीर समृद्रकिसि पाठके द्वारासहज ही तर सक्ते हँ वही युक्ति सिखाने की कृपा करें ताकि उसी पाठके द्वारा आनन्द भोगकर सहजही उस्र स्थान पर पुव सकं । १२३.
लक्ष्मण के इन वचनों को सुनकर रघुनाथ प्रसन्न मुद्रा मे अपने भक्त
व॒ भाई लक्ष्मण जी के सम्पूणं तापका. निवारण कर तत्वज्ञान आदिही बताने की कृपाकी। जिनके वारेमेवेदोंमेंभी कहा गया है. कियही मनुष्यों के लिंएु एक सरल साधना है। १२४इस वर्णाश्रम
कौ क्रियायेंजो कुष भी हँ उन्हे पहले करे दशेन््ियों एवं मन. कौ<

भानुभक्त-रामायण

३१२
ई वर्णाश्चमका क्रिया जतित छन्‌ तिनूलाइपैल्हे गरीदश्‌ इन््रीय र मन्‌ जितेर गुरुका सामूने अगाडी परी॥आत्मज्ञान मिलोस्‌ भनेर गुरुको सेवा निरन्तर गव्या।आत्मन्ञान्‌ पनि मिल्छ येहि रितले संसार कतीले तन्या १२५॥फल्‌ इच्छा गरि कमं गछ यदिता फर्‌ देह यस्तैः चिई।त्यो फलू भोग्‌ पनि गं गछछेअर फेर्‌ कर्मं वहत्‌ मन्‌ दिई॥तेस्को फर्‌ पनि बन्छ देहु करले येसेजगत्‌मा परी।यस्तं रीत्‌सित घुम्छ त्यो भृवनमा अत्यन्त चक्रंसरी ॥१२६॥अन्नानै छ घुमाउन्या सकलको णत्‌सरीकोयहांँ।ज्ञा्नैले गरि नष्ट हु्ठ पनि सो लीन्‌ यही मनमर्हां॥अज्ञान्‌को र इ कमेको छ कति फेर्‌ तस्मात्‌ क्रियाले गरी।अज्ञान्‌ नष्ट हुंदैन छेन अरु थोक्‌ ऊपायये ज्ञान्‌ सरी ॥१२७॥अज्ञान्‌ नष्ट हुवसूनराग्‌ न त छुटोस्‌ अन्नानकाकर्मले ।कर्मे गं त॒ धुम्छ यै जगतमा त्ये कर्मंकाधर्मले॥तस्मात्‌ ज्ञान विचार गनुं जनले ज्ञानूले कती पार्‌ भया ।ज्ञान छाडीकन क्मलेः जनहुरू संसारपार्‌ को गया ॥१२८॥ककल
जीतकर गुरुके सम्मुख आगे जाकर निरन्तर गुरु कीसेवा करते हुएआत्मज्ञान कौ प्राप्ति की कामना करने से आत्मज्ञान भी मिल जाता
हे ओर इसी रीतिसे अनेक लोगोंने संसार तर लिया। १२५
यदि
फल की इच्छा करके कमंकोकरतेहैँ तो एेसीदेह्‌कोधारणकरकेभीउस फल काभोग करते है ओौर अत्यन्त मन लगाकर अन्यकर्मोको भीकरते है _जिसके प्रभाव से इसी जगत में उन्है पुनः देह प्राप्त होतीहै। इसी रीतिसे चक्रके समान वह जगमे घूमता रहता है। १२६ ।
अज्ञान ही शतू के समान दहैजो सवके मनको घुमाता रहता है। अतः
मन मे यह्‌ समन्ष लेना कि ज्ञान से ही अज्ञान का नाश होता है
ओर इन कर्मो का कितना महत्व है-माव्र क्रिया को करने से अज्ञान नष्टनहीं होता है, अतः ज्ञानके समान अन्य कोई उपाय नहींहै। १२७अज्ञान-कर्मोसे नतो अज्ञानताही नष्ट होतीहै गरन ही रोगसे
छुटकारा भिलतारहै।

कमेदहीसव

कृष करता है, कर्म के ही धमं

सेप्राणी इस जगत भे घूमता रहता है । ` अतः लोग यह विचार कर ले
किः ज्ञानके द्वारा कितने लोगः तरगये। ज्ञान को छोड़कर कमेकेदीद्वारासंसारमें कौन लोग तर गये १२८ वेदभी कहता है किं
नेपाली-हिन्दी ,
३३
वि्यालाई सहाय कमं छ टुलो भन्छन्‌ इ- वेद्ले पनि।तस्मातु" क्रमं अवश्य गनुं जनले साहाय होला भनी ॥सदै सो पनि धन्दछन्‌ त ति भनन्‌ साहायकोहीरती)नञ्च यो

विद्यालाइ तचाँहिदन

विस्तार्‌ बताऊॐंकति।१२९॥
हुन्छन्‌ कमं त देह गेहहर्माविद्याहृन्ठ तजो छ तेहि अभिमान्‌
पराअभीमान्‌कोदेहादिमा
भरई्‌।गई॥

विद्याको रइ क्मको तषछविरोध्‌

साहाय

कर्हुं।
विदे एक्‌ छ समथ मुक्ति दिनमाबाजीका श्रुति तंत्तिरीय कहिन्याभन्छत्‌ येहि कुरा सहायअसरुकोतस्मात्‌ कमं विरोधि जानि जनलेविचय मात्र टृलो बुक्षेर यसमाजो यो तत्त्वमसी छ वाक्य यसकोयस्मा तीन्‌ पद छन्‌ ति तीन पदकातत्‌को अथं परात्महो ति पदमा

हृुन्ध्यो

ये जान्नु सनूले यहाँ ।॥। १३०।।श्रूतीहरूलेपनि ।खोज्देन विद्या भनती॥सवब्‌ कमंछाडीदीन्‌।योमन्‌ लगाई लन्‌ ॥१३१॥वाक्यार्थंजानी लीन्‌ ।तात्प्यमा/ मन्‌ दिनू॥त्वं भन्न जीवात्म हो।इनको एेक्य बुञ्ञाउन्या असि छ पद्‌ रातूदिन्‌ विचार्‌ गनुंयो।। १३२॥विद्याका सहायक कमंहीदहै। अतः लोग अवश्यही कमं करे ताकिवह॒ सहायक बन सके। कोई लोग एेसा भी कहते हैँ किं विद्या (ज्ञान)को क्रिचित मात्र भी सहायक की आवश्यकता नहीं होती है। -इसीविस्तारको समनो भौर कहां तक बताॐं। १२९
है ओौर देह मे अभिमान व्याप्त हो जत्ताहै।

कमतो

देह हता

ओौर विद्या जो दै

उसी अभिमान-यृक्त देहादिमे जाकर जव मिल जातीहै तो परस्परविसोध होतारहै। इस प्रकार विद्याभओौर कमं के परस्पर विरोधमेंएक दूसरे के कहां सहायक हो सक्तेदहैँ। विदा ही एक मूकितिदे
सकने मे समथंहै, यही सब लोग जान ले । १३०लोग भी यही बात कहते हैँ।

श्रुतियों को सुननेवाले

विद्या (ज्ञान) को छोड़कर अन्यकिसीका

सहारा नहीं दढते है । अतः कमं को विरोधी जानकर लोगों को चाहिएकिसवकर्मो को छोड दें ओर केवल विद्याको ही महान समक्चकर इसी मेंमन को लीन करे। १३१ जो ये तत्वमसी वाक्य हैँ इसके वाक्यांको जान लेना चाहिए।
इसमे तीन पद विद्यमानदहैँ।

उन तीनों

पदों का तात्पयं मन कोञपंण्‌ करना है। तत्‌ का अथं परात्माहै,उस पद मे, “त्वम्‌"' कहना जीवात्मा है । इनको एक ही बोध करनेवाले “जिस जो पद मेह उसका रात दिन ध्यान करना। १३२

भानुभक्त-रामायण

३१४
आखीर्‌ छ मर्त्या पनि।प्रकारको बनी ॥देख्नू पञ्च॒ म्रहाभुतं छ सवमा थस्तासंसारको सुख दुःख साधन स्वरूप्‌ देखिन्छ जो देह यो!सृक्ष्मोपाधि भनी कदिन्छ सवरल यो नाम्‌ यस्तैकोत हौ १३३दश्‌ इन्द्रीय र सन्‌ अपल्चिकृत भूत्‌ यो सोह जम्मा छजो।स्थूलोपाधि भनी करहिन्छ सवको मूल्‌ भोग साधन्‌ छयो॥येसै स्थूल उपाधि भित्र छ सदा टनृको वियोग्‌ भो जसे ।स्थूलोपाधि गलेर जान्छ सवको टिक्तैन एक्‌ भण्‌ कसँ ।। १३४॥गरीजीव्‌ ता मुक्त छ शुद्ध निमेल फटिक्‌ जस्तो उपाधीउपाधीसरि॥सो निमल्‌ पनि हन्छ सङ्क गुणले उस्तंईनै दद उपाधिदेखि वुक्च जब्‌ होला फरक्‌ जीव्‌ जसे ।तस्स मृक्त हुन्याछठ छेन नहिता आर्को उपायै कसं ॥१३५॥रातं सरि।राताका सेंगमा र्या स्फटिक रीक्‌ देखिन्छतस्तै आत्म पनी उपाधि संगरं हृन्छन्‌ उपाधी सरि॥आत्मामा छ उपाधि केहि न फटिक्‌ मा क्ये छ रातो कते।, इद मात्र छत्यो ञ्चलक्‌ यहि विचार्‌ खुप्‌ राख्नु जत्ताततें ।। १३६॥सायाले त बल्यो

शरीर सवयो

माया ही शरीर कासृजन हृधाहैजौर जन्त मँयह्‌सव मूत्छु कोप्रप्तहोता है! देखना, इन सवोंमे पंचमहाभूत व्याप्त है। इसप्रकारसंसार के सुख दुःख, साधन-स्वरूप इस देहमें दृष्टिगोचर होता है।सवं इसे 'स्थूलोपाधि" कहते हैँ ओर इसका यही तो नाम है। १३३दशदइन्द्रिय ओर मन ओौर पञ्चभरुत-ये कुल सोलह है ओर इन सवको““सृक्ष्मोपाधि'” कहते है ओर इनका साधनदही मूल भोग है। इसस्थूलोपाधि के अन्दर सदा ही इनका वियोग होता रहता दहै सवकास्थूलोपाधि गलकर विलीन हो जातादहैक्षण धर भी तहीं टिकता है) १३४
जीवतो शुद्ध, निमंल एवं फटिक के समान मुक्त उपाधि युक्त है।धतः सद्गुणो के प्रभावसे उसी उपाधि के समान निमेल भी होताहै।इन दोनों उपाधियों के द्वारा समन्ञने पर जीव को हम पृथक्‌ जबअनुभव करेगे तव ही मुक्ति प्राप्त होगी अन्यथा ओौर कोई उपाय नहींहै। १३५ रल्तिके संगमे रहने पर स्फटिक भी ठीक उसी राचके समान दिखायी देता है, उसी प्रकार आत्मा भी उपाधिके संग उपाधिके समानहौ जाताहै।अत्मादही उपाधि है जैसे स्फटिकमे कहींभीलाल दागं नहीं होता है केवल वह्‌ चमक ्यूठी हैयही मन में समन्न लो । १३६
जागृत-स्वप्न-सुसुप्ति-वृत्तियां ये ही बुद्धि के तीन अंशहै।

श्रमसेही

नेपाली-हिन्दी

जाग्रत्‌ स्वप्न सुषुप्ति वृत्ति तिन छन्‌सुदं देखिलिइन्छ नित्य सुखरूप्‌जानी वृत्ति निरोध्‌ गरेर जनलआत्मा भित्र उपाधिलादइ्‌ त टाआत्मा हो सुखरूप दुःख रुपकोअज्ञानूले गरि मात्र सत्य रुपलेज्ञान्‌ले लीन्‌ पनि हुन्छ डोरिकन सप्‌तेस्तं ईषए्वरमा अनेक्‌ तरहूकाअध्यास्‌ हृन्छ चिदात्ममा इ सबकोइच्छादी पनि बुद्धि धमं बुञ्लनूआलत्मासाक्षि छ यो पृथक्‌ इ सवमाजस्ते घुस्तछठ अग्नि लोहहरमायै आलत्माकन चिह्न पष्ठं गुरूका
३१५
यस्‌

बुद्धिका

ई पनि

यस्‌ ब्रह्य ङपूमा भनी ॥यो आत्म जानी लिनू।
जानेर छोडी दिन्‌ ।१३७॥संसार्‌ छ उस्मा कहां ।

स्ल्कन्छ

आत्मामं ।
बुन्‌ छ जस्तो फगत्‌ ।देखिन्छ नाना जगत्‌ । १३८॥जो छन्‌ अहुंकारका।छेनन्‌ कने सारका॥सबूमा घुस्याको पनि।तस्ते प्रकार्को बनी ।।१३९॥वेद्का वचनूले गरी ।आत्मालाई्‌ चिन्ह्यो भन्या बुक्लिलिन्‌ त्यो भक्त भोतेस्‌ घरि 1तस्मात्‌ आत्म विचार गु जनले यस्‌ रूपको हूँ भनी।अज्ञान्‌ नष्ट गराउनाकन अवर्‌ छेनन्‌ उपायै पनि ।1१४०॥।
इस

ब्रह्म-ल्प मे नित्यसुख का स्प धारण

किया जाता है!
वृत्तियों को रोककर लोग इस अत्मा को पहचान लें।अन्दर उपाधिको

च्यृठ जानकर दरस छोड़ दो । १३७

इन

आत्मा के

आत्मा सुख का

रूप है--उसमे दुःख-लूपी संसार कहां है । अज्ञानता के कारण आत्मामे सव कुछ सत्य-रूप क्चलकता है । ज्ञानस्पंको भी समेटकरले लेताहै, केवल इसे समक्न रखो । वैसे ही ईश्वर में यह जगत अनेक प्रकार

का दिखायी देता है १३८

इन सबको जो अभिमान है उसे आत्माके

अन्दर पहचानने का अभ्यास होतादै।
जानना जिसका कोईसार नहीं!

इच्छा आदिभी बुद्धिधर्म भी

अत्मा साक्षीदहै किं इन सबभें यह्‌

अलगरहै भौर सवम व्याप्तभीदहै) जिस प्रकार अग्नि लोहा में व्याप्तहो जाताहै। १३९ गुरु के वेद-वचनोंके द्वारा इसी आत्मा को पहुचानना चाहिए । अत्मा को पहुचानने से यह समञ्च लेना कि वह्‌ उसी
क्षण मुक्तहो गया। अतः लोगों को यह विचार करना चाहिए किआत्मा का रूप इस प्रकारका है ओर अज्ञान नष्ट करने के लिए अन्य कोरउपाय भी नहीं । १४० आत्मा कौ इस प्रकार पहचाना जाता है कि वह्‌पहले एकान्त मे जाकर बैठ जाये, दशडद्रियो को वणमें करमन को
९१६

भानुभक्त-रामायण

वसोस्‌ ।आत्मा यस्‌ रितले चिद्धिछठ पहिले एकान्तमा गेदश्‌ इनद्रीय जितेर मन्‌ पनि जिती आत्मे विचार्मा परस्‌ ॥जानोस्‌ जो छ जगत्‌ प्रकाश्‌ सकल यो हो आत्म सत्ता भनी।येही तत्व बक्षी त पूणं रूपको होडन्छ आपू पति ॥१४१॥अवस्थामहां ।ओङ्कार वाचक हौ सबं जगतको अज्ञान्‌जञानोत्तर्‌ हून सक्छ वाचक कहाँ लीन्‌ हृन्छ आत्मे मर्ह ॥आत्मामा जब लीन्‌ भया अउम तीन्‌ विश्वादि साक्षी सहित्‌।आत्मै मात्र रहन्छ तेस्‌ वखतमा निमंल्‌ उपाधी रहित्‌ ।। १४२॥सोही आत्म म हं भनी दृढ भयो ज्ञान्‌का विचारले जसंँ।कसै॥जीवन्‌ मुक्त भनी कदिन्छ जन त्यो पर्दन तपूमासन्‌ इन्द्रीय शमन्‌ गरेर वलवान्‌ कासादिको नाश्‌ गरीअभ्यास्‌ गर्नु समाधिमा त सहजं देखिन्छ सामने हरि ।॥ १४३॥येही पूर्णं अनन्तआत्मरुपको ध्यान्‌ नित्य गदं रहस्‌ ।जो प्रारन्ध छसो बज्ेर बलियो ई दःख युख्‌ सन्‌ सहोस्‌ ॥येही रीत्सित दिन्‌ वितारंछ भन्या यो देह छुटूला जसँ ।संसारका सब दुःख छोडिकनत्यो लीन्‌ हुन्छ मैमा तसे ॥ १४४॥।~
+^
जीतकर आत्मा के विचारमें लीन हो जाये। सकल लोक यहु जाननेकिजो जगते प्रकाशै वही आत्मसत्तारहै। इन्ही तत्वों को समज्नकरकेहीतो स्वयंभी पुणेरूपको प्राप्त होतादहै। १४१ सवेजगत कोजज्ञान अवस्थामें कहे जने वाला शब्द भकार है। ज्ञान का उत्तर
मर्था वाचक आत्मा में कंसे लीनहो सकताहि।

जव आत्मामं लीनदहौ

जाताहै तब अ-ऊ-म इन तीन विश्वे के साक्षी-सहित उस समय केवल'आत्मा' ही उपाधि-रहित निर्मल रहतीहै। १४२ ञसेहीन्ञन द्वाराविचार करने से यह्‌ वात दहो जाती है किम ही व्ह आत्माहं तब कहा जाता है कि जीव जीवनमृक्त हो जता है ओौरवह्‌ मनुष्य कदापि ताप से पीडति नहीं होता है। सब इद्धो
को एकाग्र एवं सशक्त करके कामादि को नाश करते हुए समाधिमे अभ्यास करनेवाला सहज ही अभ्यास करता हृभा मँ दिखता हँ । १४३हमेशा इसी आत्मरूप का ध्यान करते रहो भओौरनजो कुष भी कटिओर सरल अर्थात्‌ जौ कुछभी सुख-दुःख तुम्हें मिलेगा उसे साहसकेसाथ सहन करो। इसी तरह यदि तुम सम्पूणं समय व्यतीत कर
लोगे तो एक दिन संसारके सारेदुःखोंकौ छोड़कर तुम्हारा शरीर मक्त,

नेपाली-हिन्दौ

आदीमान त अन्त्यमा न निचमापणनिन्द हदे जान्नु सबलेतस्मात्‌ यो विधि छोडि गर्नु जनले
३१७
यो

देहधारी

बनी ।
यो सत्य बात्‌ हो भनी॥आस्मै विचार्‌ घुष्‌ गरी।त्यो मैमा मिलिजान्छ जल्‌ जलधिमा पौँचेर मील्या सरि ॥४५॥आत्मा मात्र छ सत्य यो सब जगत्‌ सृट्टे छ . ्ूटो पनि।डोरी सपं बुकया सरी बिबुञ्चमा देखिन्छ सांचो भनी ॥चरण॒मा परी ।जान्न जानिइएन यो भनि भन्या मेरासेवा गनुंर॒ जान्दछन्‌ नतर्‌ता टदन कस्ते गरी ।॥ १४६॥वेद्को सार रहस्य यो सब. कल्यां जो ग्रो विचार्‌ ग्दछन्‌ ।कोटी जन्म सहख्का सकल पाप्‌ तिन्का सहज्‌ टदंछन्‌ ।॥तस्मात्‌ भाइ) विचार योसब जगत्‌ सुटो चटक्‌ ञ्जं भनी।मैमा भक्ति सदा लगायर रू आनन्द रूपी बनी । १४७॥मेरो येहि सगुण्‌ स्वरूपूकन खुशी मानी भजन्‌ जो गरून्‌ ॥वा निर्गम्‌ परिपूणं आत्मरुपमा लाएर यो सन्‌ धरन्‌ ॥ती दवै मद्‌ तुल्य हन्‌ ति मड हन्‌ ती मै सरीका बनी ।गठन सब्‌ भुवनं पवित्र॒ तिने कुल्ची दिदामा पनि ॥१४८॥
हो जायेगा भौर सृन्लमे लीन हो जाओगे | १४८४ प्रारम्भमे,न तो अन्तमेन बीच, यह्‌ देहधारी बनकर पूणे आनन्द को प्राप्त नहीं होता ओौरयह्‌ सत्य बात सानकर सब लोग इसे जानल)

इसलिए इस विधि

को सवेजन त्यागकर आत्मा मे गम्भीरतासे विचार करे। वैसेहीलोग मुक्षमे विलीन हो जाते है जिस प्रकार जल जलधि में पहुंचकर । १४५ यह्‌ सवंजगत बूटा है, केतवरल आत्माही सत्य है। जसेडोरीको सपं समक्चने के समान अज्ञानतामें सचदही दिखायी देताहै।यदिज्ञानकी बात ज्ञात न कर सकने पर मेरे चरणों से (क्ति द्वारा) पड़करसेवा करेगा । तभी उसे सवंज्ञाने प्राप्त होगा भस्यथा वहु किसी प्रकार तर

नहीं सक्ता । १४९६

वेदों का सार-रहस्य सव कुछ कह चुका हं।
जो इसे विचार करता है, उसके कोटि जन्मों के सह सकल पाप सहन हीविनाशहयी जाते हैँ। इसलिए भाई! इस जगतको ठे जादू केसमान समज्ञकर सदा मेरी भक्ति में मन लमाकर ओर अनन्त-रूपीबनकर रहना ! १४७ मेरे इन सद्गुणी से पुणेस्वरूप को प्रसन्नता सेभजन करं अथवा निगुण गाये । परिपूणे आत्मरूप में ते जाकर इस
मनकोरखे। वे दोनोमेरेही समानँ भौर वह मँहीह। अतःवेजो मेरे समान बन सम्पूणं भुवन को अपने पांवसे कुचल देने पर
३१८

भानुभक्त-रामायण

श्रद्धा भक्ति रहोस्‌ गुरू चरणमायसलाई श्रुतिसार्‌ बुक्चीकनं पास्‌यस्ता रीत्सित यो पद्या पत्ति भन्यामैरेरूप्‌ बनिजान्छ जान्छ सहजं

मेरा

वचनृसा

पनि।
मूल्‌ तततव यै हो भनी॥
अन्नानको ताश्‌ गरी।संसार सागर्‌ तरी ।१४९॥

इति रामगीता

एक्‌ दिन्‌ श्रीयमूनाजिका तिरमहांभागेवृमा च्यवने थिया इ संगमाआयाश्रीरघुनाथकाहजुरमा

वसून्या

मूनीश्वरहृरू ।
वस्त्या धिया जो अरू॥आपत्ति ृट्‌नन्‌ भनी ।आदर्‌ खृप्‌ रघृनाथबाट रहूदा खुश्‌ भो ऋषीगण्‌ पनि ।॥५०॥धन्यहोसेवक्‌ ब्राह्मणको म हूं अति कृपा गनूंभयोसेवक्लाद्‌ अदराइ्‌ वक्सनुहवस्‌ कन्‌ काम्‌छ च्छाछनजो।सेवक्‌ हूँ सव सिद्ध गुं भियो रामृको हुक्म्‌ भो जसे ।आपत्‌ बिन्ति ग्या तहँ च्यवने राम्‌काहज रमा तसं ।।१५१॥हे नाथ्‌ | क्वे मधूनाम दैत्य शिवका प्यारा महात्मा थिया।तिन्लाई शिवले विशूल्‌ पनि अमोष्‌ खूशी हुंदामा दिया ॥रावण्की बहिनी थि कुस्मिनसि एक्‌ बीहा गय्याको थियो ।जस्म्यो पुत्र त॒ लोक कण्टकं सबं चालू राक्षसैको लियो ॥५२॥पवित्र हो जाते है! १४८ गुरुचरणो में तथा मेरे वचन में श्रद्धाभक्ति रहे इसे श्रुति-सार समञ्चकर पटे ओौर इसे मुल तत्व समञ्चं ।इस रीतिसे पठनेसे भी अज्ञानताका नाश् होकरमेराही ह्पधारणकरलेताहै ओर संसार-सागरसे

सहज ही तरजाताहै। १४९

एक
दिनि यमुनाजीके तीर पर रहुनैवाले मुनीश्वर आदिजो भार्गव तथाच्यवन ऋषियों के साथथे, श्री रघुनाथकी सेवामे आये ताकि उनकोविपत्तिसे छटकारा प्राप्तहो! रधघृनाथके द्वारा अत्यन्त आदर-सत्कारमिलने पर वे ऋषिगण प्रसन्न हुए । १५० ब्राह्मणों का मै सेवक हूं।आपलोगों ने अति कृपाकी है जिसके लिए अति धन्यवाद!सेवक कोअदेशदेने की कृपा करं किक्या कामहै ओौर क्या इच्छाहै! सेवक
हुं सन कृष सिद्ध कर दगा, कहते हृए जब राम की आज्ञा हुई तबच्यवनने श्रीरामके समक्न विपत्तियों के बारे में विनती की । १५१हे नाथ!मधु नामक को. एक दैत्य शिव का बहुत प्यारा भक्तथा। उसे शिव ने अत्यन्तं प्रसन्न होकर एकं अमोघ चिशुल प्रदानक्ियिथा। रावण की बहिन कूम्भनखी के साथ विवाह किया था।

नेपाली-हिन्दी

तेस्को नाम-लवण्‌ छ राक्षसि छ चाल्‌आपद्‌ सब्‌ ऋषिलाइ गष रघूनाथ्‌यो आपत्ति छृटोस्‌ भनी हजुरमातेस्को ताप नसमान्तु मरां अहिलेयै बीचूमा सब भादलाई रघुनाथमाष्ठौ कण्टक तेस्‌ लवण्‌कन ऋषीहात्‌ जोरी विनती गव्या भरतलेताहीं फर्‌ विनती गन्या अति उचित्‌
लक्ष्मणले पनि काम्‌ रज्या अधिवडादुःखे भोग भरत्‌जिले पनि गव्याष्वामित्‌! आज हुकूम्‌ भया तखुशिभैराम्‌ ठकूर्‌ बहते खुशी हुनुभयोयस्तो हृकूम भो बहुत्‌ खृशि भईगादी आजम दिन्छ राज्‌ पछि गन्यापले जल्द तं मारिहाल लवणैवाणूमा सख्य जउन्‌थियो उहि किकी
२३१९
तेस्ते च्रिशूल्‌ त्ये लिई।बाधा

अनेकन्‌

दिरई।॥
आयौ भन्याध्याजसं।यस्तो हुकूम्‌ भो तसे ।।५३॥ले सोधूनुभो को गई।का प्राणदाताभई ।स्वामित्‌ ! म जान्छ्‌ भनीशतृघ्नजीले पनि ।१५४॥।साथेहजूरमागई।योगीसरीका भर्ई॥जन्््‌ म॒ ले तहाँ।यो बिन्ति सुन्दामर्हां ।५५॥शतुष्नला्हतहां ।पूरीबनाईतहां ।लैजाउ यो वाण्‌ पनि)दिनूभयो वाणूपनि ॥ १५६॥
उससे लोककण्टक नामक पत्र का जन्म हुआ ओर उसका सम्पूणं व्यवहारराक्षस के समान था। १५२ उसका ताम लवण है, व्यवहार रक्षस काह)वह्‌ उसी त्रिशूल को लेकर सब ऋषियों को सतारहादहै।हे रघुनाथ!
अनेक वाधा उत्पन्न कर रहा है।

अतः इन भपत्तियों से षृटकारा

प्राप्त करने की अभिलाषा से आपके पास आये)एसी विनतीसुनते ही आज्ञा हुई कि आप उससे भयभीतन हो, अभी मै उसका
वधकरताहं) १५२ इसी बीच रधुनाथने सब भादयोंसे प्रश्न क्रियाकि कौन जायेगा ओर उस कण्टकं लवणको मारकर ऋषियों काप्राणदाता बनेगा 1

भरतने

हाथ जोड़कर चिनतीकी, स्वामी)

रैं
जाता हूं। उसी समय शतृध्नने भी अत्ति उचित विनती की । १५४पहले श्रीमन्‌ के साथ जाकर लक्ष्मणने भी अनेक महान कायं क्ियि।दसी प्रकार भरतने भी योगी के समान बनकर दुःख भोग किया।
स्वामी! अज्ञा देने की कृपा करे। मै अति प्रसन्नतापूवेक अभीवहां जाता हं । इस विनती को सुनकर राम ठाकुर अत्यन्त प्रसन्नहए 1 १५५

अत्यन्त प्रसन्न होकर शतुघ्न को

यहु आज्ञा दी, आज

मे तुम्हें गद्दी देता हूं, बाद में वहाँ नगर बनाकर राज करना । सवरथम इभ वाणको लेकर जाभौो ओर लवणका वध शीघ्र ही कर डालो।
३२०

भानुभक्त-रामायण

अर्त क्या दिनुभो कि भाइ ! शिवकोपूजा नित्य गरेर जान्छ वनमातेस्ले त्यो शिवको विशूलू लिन भनी
तीशूल्‌ छ तेस्का घरं।आहारखात्िर्‌ ` परे॥जनै.नपावस्‌ घर]
फिर्यामा तहि लड्नु हाश्च यहि शर्‌ मर्ला र भिर्ला परे ।॥१५७॥पायोत्यो शिवको विशृल्‌ लिन भन्या तेसेवत्रिशूलूले गरी।सबको नष्ट गराउन्याछठ यहि सुर्‌ राखून्‌ विचार्‌ खुप्‌ गरी॥यो मान्या पछि तेसु मधूवनमहां एक्‌ वेस्‌ वनाऊ शह्र्‌।जस्मा बस्न मिलोस्‌ भनी सकलले ुप्‌ बस्न मानून रह्‌ ॥५०५॥तेस्को नाम्‌ मथुरा हून्याछठ नगरी त्यै राजधानीगरीराज्‌ गर्त तिमिले अनेक्‌ तरहका सबका विपत्ती हरी ॥एकल गे अधि मार राक्षस पछी आञ्छसेनापनि।तीस्‌ चालीस हजार राज्‌ गर तहां रामूले दिया राज्‌भनी ॥५९॥आशीर्वाद दिद साथ जाऊ ऋषिका भन्न्या हुकूम्‌ भो जस
हकम्‌ माफिक काम्‌ ग्या संग गई शतुघ्नजीलेतसै ॥राक्षस्‌ मार्नुभयो तुरन्त र तहां पूरीमधराबनी।हकम्‌ माफिकर राज्‌ गर्या तहि वसी शतुषघ्नजीले पनि ।।१६०॥
बाणोँमेजो मूख्यथा वही निकालकरदेनेकी कृपा की । १५६ भाई।तुमह क्या शिक्षा दू उसके घरमे शिव कातिञ्रूलरहै, नित्य पूजाकरके आहारके लिए वह वनम जतादहै। अतः वहु उस्र शिवकफे
चरिगुल को लेने घरन जाने पवे-लौटते समय वहीं उसके साथ लड़ना
ओर इसी बाणसे प्रहार करना तभी वहु धराशायी हौ जायेगा । १५७यदि उसे शिवके उस चिगूल को लेने का अवसर मिल गया तब
उसी विशूल से सवको नष्ट करेगा ।

इस बात क्रा खूब विचार

तथा ध्यान रखना । इसे मारने के पश्चात्‌ उसी वन में एक उत्तम शहर
का सृजन करो जिसमें लोग रहने के लिए उत्सुक होकर रहने लगे । १५८
उसका नाम मथुरानगरीहोगा, उसेही राजधानी बनाकर अनेक प्रकारके लोगों की विपत्तियोंका हरणकर तुम राज करनाअक्ले आगेजाकर राक्षस को मार डालो पीे-पीचै तीस चालीस हजार सेनायंभी आ जा्येगी।ओर वहीं राम का दिया राज्य करना । १५९
आशीर्वाद देकर ऋषि के साथ जाने के लिए जसे ही आज्ञा हुई वैसेही आज्ञानुसार शवृघ्न जी ने ऋषि के साथ जाकर कायं किंया।तुरन्त राक्षस का वधकिया
ओर

वहीं तथुरा नगरी की स्थापना

आज्ञानुसार शवृघ्न जी ने भी वहीं रहकर राज्य किया । १६०
हृई।

सीताजी

नेपाली-दहिन्दी,
३२१
सीताका पनि दूद्‌ पत्र सुकुमार्‌ जमूल्याहवाल्मीकी ऋषिले ति पूत दुदको नाम्‌-कमंजेठाको वृश्च नाम्‌ धरया लव भनी
पैदा भया।ग्य भया॥
जुन्‌ चाहु कान्छा थिया।
तिनृको ताम धरया क्रमैसित अनेक्‌ शास्ते पढाई दिया ।।१६१॥वेलैमा ब्रतबन्ध कमं पति भो वेदाथंजानन्‌भनी ।लाग्या वैद्‌ पनि पदन शास्वहरुको तात्पयं जान्न्या पनि॥उत्तम्‌ निमेल सू्यं-वंश विचसा पदा भयाकाथिया ।यो अभ्यात्त थिएन भन्न त उसं फो्रोकुरापो थिया।१६२॥' वाल्मीकिलेसकलराम-चरिवलाई

गान्‌ गनं काव्य रितले कविता

गन्‌ गद्या खशित्यो गाङंदा िभुवने
बनाई ॥
भएर पडादइदीया।वश पारिलीया ॥१६३।।
जम्त्याहा दुद भाइ सुन्दर कुमार्‌ हात्मा सितारा `लिई।पुरा सुर्‌ सित गाउंथ्या दुदइजना ताल्‌ सुर्‌ सिलाई दिई॥खृश्‌ इन्थ्या ऋषिगण्‌ सबेति वनक्रा सूनर तेस्‌गानले ।प्यारो खुप्‌ सित गद्या ति दुदको
यै

रीतले

सम्पूणेको

टला भनी मानले । १९४

रामचरित्र

मन्‌ पनि

खश्‌
गाई ।
मराई॥
केभीदो जुडवे सुकूमार पुत्र पदा हृए 1 बाल्मीकि ऋषि ने उन दोनौंपुत्रों का नामकरण किथा।ज्येष्ठ का नाम करुश' रखा ओर जोकनिष्ठ था उसका नाम 'लव' रखा} क्म-से उनके नाम रखे गये ओरउन्हे अनेक शस्तो की शिक्षादी गयी । १६१ वेदाथं आदि जानने केलिएसमयसे ही उनका व्रतवन्ध कमं भी किया गया। वेदों का मननकरने लगे ओर शास्त्रोके तात्पयंवे जान गये। उत्तम एवं निर्मलसू्॑वंश कूल के बीच पैदा हुएथे। वसे कहते का अभ्यास नहीं थायद्िपिये बाते व्यथंही थीं) १६२

बाल्मीकि ने सकल रामचरित का

गन करते हतु कान्यरीति से कविता बनायी । प्रसन्न होकर उसका गानकरते थे!
अतः

पदठकर

उसका पूणं

ज्ञान प्राप्त किया)

उसे
गाकर चिभुवन को अपने वण में कर लिया। १६२ दोनों जुडवे सुकूमारभाई हाथों मे सितार लेकर पूरे स्वर से एवं सुरोंकौो भिलाकर गातेघूमतेथे। वनके वे ऋषिगण उस गान को सुनकर प्रसन्न हौतेये भौरउन दोनों को महान समक्लकर प्यार से आदर करते थे | १६४ इसी रीत्ति,

भानूुभक्त-रामायण

३२२

वाल्मीकिकं

जाश्रमसमा

गर्थ्या सधं वाल्मिकि जो त॒

यै बीच्मा सब अष्वमेधूहस गरासीताजी वनमा यिइन्‌ र सुनकीबरह्यर्षी रबडा बडा पृथिविकाब्राह्मण्‌ क्षत्रिय वेष्य सन्‌ तहि पुग्यावाल्मीकी ऋषिका संगति कुशलव्‌पाया फुसंत सोधूनको र कुशलेहे सर्वज्ञ गरो ! कन्‌ तरहलेकुन्‌ पाट्ले सब बनधनै पनि सहन्‌बाधिन्छन्‌ यहि रीतले यति य्यायसको तत्तव॒ बताई वक्सनु हृवस्‌यस्तो प्रष्न सन्धा जसं ति कूशकोयस्को तत्त्वत वुन्ञाइं बक्सनुभयोयस्‌ जीबृले बिहकं बिचार नगरीमन्त्रीले जति आफुमा गुण थिया
रहन्थ्या ।भन्थ्या ।१६५॥
रामूलेः अनेक्‌ दान्‌ दिया ।सीताबनार्दलिया ॥राजाहरूती पनि।हेरी तमासा भनी ।१६६॥हिडथ्याति जान्ध्या जहाँ ।सोध्या कुरा क्यं तर्हा॥

बन्धन्‌

विषे

पदंछन्‌ ।

तोडेर पार्‌ तदंछ्न्‌ ।॥ १६७

संसारःतछन्‌जानूं म मूढो
भनी।पनि॥
ती वाट्मिकीलेपति।वाधिन्छ यस्ले भनी । १६८॥

मंत्री

अहङ्कार

जीवमा

लिदा।
मिलारईदिदा ॥
से रामचरिवका गान करते हुए सम्पूणं जन के मनोंको भी प्रसन्नकरतेथे। बाल्मीकिकेही आश्चम में रहते थे। बाल्मीकि जी जोकहते थे, सदेव वही केरते थे। १६५ इसी बवीचमें रामने अश्वमेध, यज्ञ करके अनेक दान द्यि। सीताजी वनमेंथीं अतःसोनेकी सीताबनायी । वड़-बड़ ब्रह्मि एवं पृथ्वी के बड़-वडे राजाभों मौर अन्यब्राह्मण, क्षिय, वैश्य सव वर्ह तमाशा देखने पहुवे । १६६ कृश गौर
लव बाल्मीकि ऋषि के संग, जहाँ वे. जतेथे वहीं चल पड्तेथे। प्रश्नकरने का अवसर मिला ओर कूशने कृ बात पषछठी-हे सर्वज्ञ गुरु!किस प्रकारसे लोग बन्धन में पड़जतेदहेँ। कौनसा पाठ करनेसे सभीवन्धनों को सहज ही तोड़कर जीव पार तर जाता है। १६७ जिस रीतिकोकरनेसे बन्धनमें फंस जति भौर जिसको करनेसे संसार सेतर जाते ह इसके विषयमे जो तत्व हैँ, बतनेकी कृपा करें ताकिमेरे एेसे मखं भी इसे जान सके।

बाल्मीकि ने" भी कृशके एेसे प्रष्न

को सुनकर वन्धनमें बंध जनेके बारेमे जो तत्व थे, सविस्तार समस्ानेकी कृपा की । १६८
कयि
विना,

अहंकार

इस जीव द्वारया किसी बात पर विचार

मंत्री की मंत्रणा से उसमे

जो. भी गण,

` नेपाली-हिन्दी

३२६
मन्त्रीका वशमा परेर यहि जीव्‌ मै हूं अहङ्कार्‌ भनी ।लाग्यो भच्च भन्या भिथ्यो विषयमा बांधिन्छ यो जीव्‌ पनि।१६९॥जो छन्‌ सत्त्व रजस्‌ तमस्विगुण यी खूप हुन्‌ अहंकारका.।यी तीन मनले विचार्‌ गरिलिदा छन्‌ कूने सारका॥इच्छा सत्व विषे धन्या पनि भन्या रेश्वयं भोग्छन्‌ पनिसंसारकं व्यवहार बदृषठ रजले स्ती पुत्र मेराभनी ।१७०॥जोताचछन्‌ तमगृणमा खृशिहुन्या तस्ता त कीरा भई)फिष्ठन्‌ नित्य विपत्तिमा सुख सयेल्‌ भिल्देन काहीं गर्ई॥जो यो तीन्‌ गुणलाइ तुच्छ बुल्ञि खुप्‌सन्‌ बन्धनूहरुलादई तोडि सहज- तस्मात्‌ अहङ्कुार्‌कन
आत्मं विचार्‌ गदंछन्‌ ।संसार्‌ तिने तदंछन्‌ । १७१॥तुच्छ मानी।
आत्मा म हूँ पूणे भनेर जानी ॥आत्मे विचार्मा तिमि चित्त देऊ।संचो .भर्न्यां यो तिमि जानिलेऊ ॥१७२॥वाल्मीकिदेखीयतितत्व पाई)जलान्‌भेगयोतीकुशवीरलाई ॥^~ ~~~
थे उसी जीवमेंमिलादेताहैओौर मन्त्ीके ही वशम आकर अपनेकोजहंकारी बनाता है । विषय आदि में उसी अहंकारके कहने से ही लग जानेसे यह्‌ जीवभी बन्धनम बंध जाताहै। १६९ सत्व, रज एवं तमयेत्रिगुण इसी अहंकार के रूप हँ)! इन तीनों के बारे म मने विचार
करने से इनमे कोई तथ्य दिखायी नहीं देताइच्छा करने पर दही देश्वयंका भोग करताहै।
सत्व, विषयकी ओररजोगुणसे संसार के
व्यवहार में वृद्धि होत्तीहै ओर स्ती पत्र को अपना बताता

जो तम गणम

है। १७०

प्रसन्न हौतादहै वैसे लोग तो कीड़े होतेह।

नित्य

विपत्तियं से धिरे रहते है, कहीं भी सयूख-शान्ति नहीं मिलतीहै!
जो
इन तीन तुच्छ गुणों को समश्चकर अपनी अत्मा म गम्भीरतापूरवेक
विचार करतादहै वह्‌ सब बन्धनोको तोड़कर सहजदही संसारसे, तरजाता है । १७१ इसलिए अहंकार को तुच्छं समञ्चकर अत्मा को स्वतः
पूणे जानकर आत्मिक विचारमें तुम अपने चित्त को लगाओ-ये नने
सत्य वणंन किया हैः अतः तुम इसे जान लेना ¡ १७२

बाल्मीकि दारा

इन तत्वों को पाकर उस वीर कश को ज्ञानका बोधदहौ गयां।
नित्य वे मुक्तदहीधे, तथापिसंसारमे वे कायं करते रहे । १७२
एक
३२४

भानुभक्त-रामायण

मुक्तं धिया नित्यतथापियहांगर्दरह्या कयंलोकमाहाँं ॥१७३।एक्‌ दिन्‌ बाल्मिकिले त अत्िदिनुभो है पत्र हो! गाउंछौ।तिम्रो गान्‌ सुनि खृशि हुन्छ दुनियां अत्यन्त यश्‌ पाउंछो॥श्रीराम्‌का पनि गान सुन्लकन मन्‌लाया गाउन यो भन्या दुद्‌ जना
आयो र गाऊ भनी।मीलेर गाया पनि ॥ १७४]
गान्ले खुश्‌ भद्‌ केहि बक्िसिस भयोचीज्‌छन्‌ सब्‌ तृण च्च गरेर तिमिलेअर्तीं वात्मिकिदेखि पाई कुशलव्‌लाग्या गाउन दद भाई ऋषिकासून्या तेहि अपुवं गान्‌ र रघुनाथ्‌मेरो मन्‌ पनि गानले हरिलियासाम्ने डाकिम सृन्छु फेरि यहि गान्‌राजा पण्डित वृद्ध जनहरु बहुत्‌गान्‌ सुन्छ्‌ अब डाक यादिति कूमार्‌
बक्‌सिस्‌ भयाको जति ।केही

नलीया

रती ॥
अत्यन्तखृशीभई |सास्ते अगाड़ी गई ।॥ १७५॥ज्युका पनी मन्‌ गयो।को हुन्‌ इ भन्न्या भयो॥भन््या

इरादा

धरी |

राखी सभा खुप्‌गरी ।॥ १७६॥आन्‌सभामा भनी ।आया सभामापति ॥आश्चयंसान्या पनि ।रामे सरीका भनी ॥१७५७॥

हकम्‌ भो र हकूमले दुद कमार्‌

देख्या सूति कूमारका र सबलेकस्का हुन्‌ इ कुमार्‌ कसो गरि भया
दिन बात्मीकिने शिक्षादेनेकीटकृपाकी।
हे पूत्रो!

तुम लोग माति

हौ । तुम्हारा गान सुनकर दुनियाके लोग प्रसन्न होगे-ओर तुम अत्यन्त
यश प्राप्त करोगे।

श्रीरामको भी गान सुनने का मन हुआ ओर आकर

उन्हे गाने के लिए कहा ओर उन दोनों जनोने मिलकर गाया । १७४गान सुनकर प्रसन्न होकर क्रु उपहार देगे। उपहार मेँनजोभी
वस्तु होगी, सडको तृण समक्चकर कुछ भी नलेना।शिक्षा को पाकर कुश ओर लव

बाल्मीकि की .इंस

अत्यन्त प्रसन्न हुए ओर

आगे चलते हुए

दोनों भाई गान करने लगे । १७५ उस अपूवं गान को सुनकर रधुनाथ कामन भी उस ओर आङ्ृष्ठ हुआ। रसे गानसेमेरे मनकोह्र लेने वालेये बालक कौन दहै? सामने ब्ुलाकर यही गान मै पूनः सुनूंगा! एेसामन मे निश्चय कर॒ राजाओं, पंडितो तथा अनेक वृद्धजनो को ब्ुलाकरसभा का आयोजन

किया । १७६

वे कुमार सभाम

आ जायें ओर

अब यहीं उनके गान काश्रवण करताहुं। ठेसीबान्ञाको सुनकर दोनीकमार सभामें अये। इन कुमारोंकी मृति देखकर सभी आश्चयंमें

तेपाली-हिन्दी

२३२५
रामैका सरि वस्व भूषण भया राम्‌चन्द्र कन्‌ हुन्‌ भनीः।चिन्हैलाई कठिन्‌ हुन्याछ यहि बात्‌ सब्‌ बोल्न लाग्या पनि.॥लाग्या गाउन भाई दद्‌ जबता गान्धार सरले गरी ।गान्‌ सुन्दा बहुते खुशी हुनुभयो त्रैलोक्यका नाथ्‌ हुरि।। १७५॥हकम्‌ ताहि भरतूजिलाई, दिनुभो लौ देउ चिल्वत्‌ भनी „|दस्‌ हज्जार्‌ रुपिया लगीकन दिया जल्दी भरतूले पनि ।दस्‌ हज्जार्‌ रुपियां दिया तपनि त्यो सब्‌ तुण्‌ सरीको गरी)जाहांँ वाल्मिकिजी धिया उहि गया धन्‌ छोडि तेसं घरि ॥१७९॥जन्या श्रीरघुनाथले इ त सिता- जीका कुमार्‌ हुन्‌ भनीः।पनि ॥स्यं बीचमा प्रभुले हुकूम्‌ दिनुभयो शतुष्नलाईहै भाई तिमिः जल्दि जाइ अहिले वात्मीकिजी छन्‌ जहाँ।सीताजी रति वाल्मिकीकन लिरई दौडेर आ यहां ॥१८०॥सीतालाई्‌ नियांम दिन्छ अहिले सीताजि नीयां पसून्‌ ।
आपनू दोष अफालि निमंल भई खृश्‌ भं सिताजी बसून ॥हकम्‌ श्रीरघुनाथको यति हदा शतुघ्न जल्दी गया ।वाल्मीकी ऋषिको परी चरणमा
सन्‌ बविन्ति गर्दा भया।१८१॥
पड़ गये ओर कहने लगे किये कुमार किसकेहै । १७७

जो रास के समान दिखते

यदि रामके समान वस्त्र-जाभूषणों से सुसज्जित होतेतो
राम कौनर्है, पहचानना भी किनि होता।

यही चर्चा सब लोग करने

लगे! जब दोनों भाई गान्धवे स्वरोमें गाने ले। सुमधुर गान सुनकरवरेलोक्यनाथ हरि अत्यन्त प्रसच्र हुए । १७८ उसी समयभरत जी कोअज्ञादी कि उन्हँं यह पुरस्कारदेदो। भरतनेभीशीधघ्रतासे दस हजारमुद्राले. जाकर दीं। दस हजार सुद्धादेनेपर भी उसे तृण बरारसमञ्चकर उस धन को वहीं छोडकर उसी समय वे कुमार, जहां वाल्मीकिमुनि थे, चले गये । १७९ ध्रीरघूनाथ ने तो जान लिया किये कुमार सीताजीकेरहँ। उसी वीच प्रभूने शतृष्नको अनज्ञादी-हे भात! . तुमशीघ्र वाल्मीकि जीके य्ह जाभो ओर वाल्मीकि जी एवं सीता को साथ
में लेकर शीघ्र यहाँ आओ। १८० मँ सीताको न्याय प्रदान कङ्गा।अव परीक्षादेनेके लिए सीता जी अपने दोषों का परित्यागकर निर्मल एवंप्रसन्न होकर रहँ । श्रीरघुनाथ की एसी आज्ञा पाकर शतृध्न तुरन्त चले गयेभौर बाल्मीकि ऋषि के चरणों मेँ पड़कर विनती करने लगे । १८१

विनती

सुनकर रामका जो भाशय था, मनि ने वहु जान लिया ओौर तुरन्त उत्तर
३२६

भानुभक्त-रामायण

सून्या बिन्ति र जुनूत आशयथियो राम्को उ जानी लिया ।परस्लिन्‌ भोलिनियां सिताभनि तहां उत्तर्‌ तुरन्त दिया ॥गया ।उत्तर वाल्मिकिदेखि पाइकन ता णतृधघ्न फर्काश्रीरामृचन्द्रजिका पगी हजुरमा त्यो बिन्ति गर्दा भया।१८२॥पनि।सून्नूभो जव उत्तरा ति ऋषिको ताहीं प्रभूलेपस्छितूमोलिसितानिर्यांभनि हृकूम्‌ भो लोक जानून्‌ भनी॥तमासाभनी।क्म्‌ येति सुग्या र लोक पनि सव्‌ हेरौब्राह्मण्‌ क्षत्रिय वैश्य शूद्र जति छन्‌ आया महर्षी पनि ॥१८३॥चिरई ।आया वाल्मिकिताहि तेहि विचमा सीताजिलाईसीताजी पनि यज्ञमा पुगिगदन्‌ श्रीरामसा मन्‌ दिई्‌ ।सीताजीकन देखि लोकहर सन्‌ वेस्‌ भो वहूुत्‌ वेस्‌ भनी ।लाग्या बोत्न तहँ तसं बखतमा तीवाट्मिकौीजी पनि।॥ १८४॥श्रीरामूजीसित विन्ति गरदं भनी

रामूका

अगाडी

सथ्या।
सीताजी अति शुद्ध छन्‌ भनि वहत्‌ विन्ती हजूर्मा गव्या ॥छोरं हन्‌ कुश लब्‌ पनी हजुरका विन्ती कर्हतिक्‌ गर ।क्ये शंका मनमा र्या हजुरमा गरु शपथ्‌ मे बरु ।॥१८५॥बोल्यां केहि ज्रुटो भन्या हजुरमा बोल्यो सुटो वात्‌ भनी ।पनि ॥निष्फल्‌ आज गरून्‌ प्रभू जतिथिया मेरा तपस्या~^
दिया कि कल सीता परीक्षा देगी।
+~ ^~ ^~ ~~~
~~ ~^

वाल्मीकि से उत्तर पाकर शतुघ्न

लौट गये गौर श्रीरामचन््रजी कीसेवा में उपस्थित होकर वहु विनती

करने लभे । १८२

जवप्रभुने भीव्छषिके उत्तरोंकोसुननेकौ छपा

की तभीसीताद्वारा कल परीक्षा द्यि जाने की सूचना से लोगोकोअवगत कराने की आज्ञाहई। रेसी अज्ञाको सुनकर सवेलोकजन भीकौतुकं देखने के लिए, ब्राह्मण, क्षच्चिय, वैश्य, शूद्र जो भी थे तथा महषिगण, सभी चले आये । १८२३ कछ क्षणो के पश्चात्‌ सीताजी को लेकरमहर्षि बाल्मीकि भी व्हा आ गये। सरीताजीभी श्रीराममे ध्यान धरˆ कर यज्ञ के निकट पहुंच गयीं । सीताजी को देख सवंजन परस्पर कहने
लगे कि यह वहत ही उत्तम हुआ । १८४ उसी समय वाल्मीकि भीश्रीराम से विनती करनेके लिए उनके आगे आये। विनती करते हएकहने लगे किं सीताजी अति शदढधदैं। कुश-लव भी अपदही के पृत्रहै। इस विषय पर कहां तक विनती करं । श्रीमन्‌ अपने मन मेंकिचित्‌ मात्र भी शंकान रखें, इसके लिए मँ शपथ

देताहूं | १८५

यदि

नेपाली-हिन्दी

३२७
सून्या वात्मिकिको शपथ र रघुनाथ्‌ ञ्यूको हकम्‌ यो भयो ।मेरो संशय छन क्ति मनसा संचो शपथ्‌ हुन्छ यो ।८६॥लंकामा पनि एक्‌ तिया अधि दिदा जीतिन्‌ र॒ सीता लिर्यां।एेले पो अपवाद्‌ गन्या र जनले सो मेट्न छाडीदियां ।अकलि अपवाद्‌ गय्या भनि उसे सच सिता त्याग्‌ गय्या।तेस्तं भो त पनी रिसानि नहवस्‌ यसूमा क्षमापन्‌गय्या ।८७॥मेरं पुत्र तहन्‌ दुवे इ कुश लव्‌ जस्ल्याहपदाभया ।सीताजी पनि शुद्ध छन्‌ सब बुर्यां सन्देह मेरागया ॥तापनि।हकम्‌ यो रघुनाथको हुन गयो हकम्‌ भयोसीताजी त तयार भन्‌ तस बखत्‌ पस्छ्‌ म नीयां भनी ॥१८८॥ब्रह्मादीहरलोकपालृहरसबं आया सीता छन्‌ जह ।ब्रह्यादीहुर्का अगाडि ति सिता क्ये बोल्न लागिन्‌ तहां ॥जस्तो भक्ति छ रामका चरणमा मेरो उ जानीलिउन्‌।साची ष्ट्‌त मलाई जान अहिले बाटो भुमीले दिउन्‌ । १८९यस्तो वाणि सिताजिको पृथिवि सूनीसकीथिन्‌ जरसंबेस्‌ सहासन एक्‌ तयार गरि सिता जीलाइ्‌ राखिन्‌ तसं \मन श्रीमन्‌ से कुछ भी असत्य कहादहै तौ मेरे असत्यसे जो भी मेरी
तपस्या है उसे आज आप निष्फल करदं । बाल्मीकि की शपथ को सुनकर रधुनाथ की यहु आज्ञा हृईौकि मेरे सनमें कुछ भी संशय नहीं है, यह्‌शपथ सब सत्य है । १८६ पहले लंकामें भी एक बार परीक्षा लेने परसीता सफल उतरी गौर सीताको स्राथले आया। परन्तु उसके बादलोक द्वारा अपवाद किये जनि के कारण उसे मिटाने हेतु परित्याग किया ।भौर अन्य लोगों कै द्वारा अपवाद किये ही मैने सीताका त्याग किया!एसा होने पर आप कृपया कोधितन हों ओर इसके लिए सुङ्ञे क्षमाकर । १८७ कुश-लव ये दोनों मेरेही तो पत्र हँ जो जुड़वे उत्पन्न हुए ।सीताजी भी शुद्धरहै। मै सव समन्न गया ओर मेरासन्देह भीदुरहौगया । एसा रघुनाथ द्वारा कहे जाने पर सीता जी परीक्षाके लिए इस समयभी तत्पर हो गयीं । १८८ सीता जहा थीं वरहा ब्रह्मादि एवं लोकपालसब आ गये।ब्रह्मादि के सम्मुख सीता कुछ कहने लगीं कि मेरीजसी भक्ति राम के चरणमहै उपे जानले गौरम सच्चीहूं तो मुञजानने के लिए भूमि मूञञे अभी माभेदे। १८९ सीत्ताजीकी एसी वाणी
जव पृथ्वी ने सुनी तो एक सुन्दर सहासन प्रकट कर सीताजी को उसी में
ददत

भानुभक्त-रामायण

त्यै सिहासनमा बसी

जननिले

जानलाईइ

बहिया

सीताजीकन

यस्‌ रीतूले जननी सीता जव गन्‌इन्द्रादिहस्ले त खु वुपृशि हंदसीताको तहि शोक्‌ गन्याप्रभुजिनेबुञ्ञाउनुभयोबरह्यादीहरुलेसूञ्ञीबक्सनु भो र शोक्‌ पर गरीसन्‌ सम्पूणं गरेर नान्‌ दिनुभयोजो ता यज्ञमा धिया जनहरूबीदा बक्सनुभो र देशि जति हन्‌
जौदास्य मनूमा लिदन्‌ |वाटो भुमीले दिदन्‌ ।।१९०॥
खृप्‌ मोहमा लोक्‌ पव्या ।वेस्‌ पुष्पवृष्टी
गत्या ॥
संसारिजस्ताभरई।सामने अगाडी गई । १९१वकीरह्याका थिया।
ब्राह्मण्‌ तहँ सव्‌ धिया ॥
घनूले ति पूर्णं भया।बीदा हंद सब्‌ गया ॥१९२॥सीताजी सितको वियोग्‌ जब भयो श्रीराम्‌ विरक्तं भया]यज्ञस्थान्‌कन छोडि पुत्र संगली जल्दी अयोध्या गया ॥

कौसल्या जननी पनी खुशि भडइन्‌ श्रीराम

लक्षण्‌ अन्त्य निहारि ज्ञानक कथाकौसल्या रामलाई विभुवन पत्तिकाकून्‌ पाटले बन्ध ष्टृटूला भनिकन
आया
भनी ।
चर्चा गरिन्‌ वेस्‌भनी ।।९३॥
नाथ्‌ रमानाथजानी ।मनमा खृप्‌ टृलो पीर मानी ॥।.
रख लिया । उसी सहासन पर वेठकर जननी सीताने अपने मनमउदासीनता का अनुभव किया । तदनन्तर भूमिने सीताजी को जानेके लिए एक सुगम मागे खोल दिया । १९० इसी रीत्तिसे जव सीताचली गयीं, सब लोग अत्यन्त मोह में पड गये । इन्द्रादि ने अत्यन्त प्रसन्न
होते हए उत्तम पुष्पवृष्टि को । वहीं प्रभु जीने सांसारिक मनुष्य कीभाति सीताके लिए शोक किया ओौरः ब्रह्मादि ने आगे आकर प्रभुकोसमज्ञाया 1 १९१ सबको समन्ञाकर, शोकको दूर करके जो भी कायं
शेष ये, सब पूणं किये ओर जो ब्राह्मण वर्ह थे उन्हँ दान आदि दिये।यज्ञम जोलोगये उन्हंधनसे पूणं कर दिया। वन्धु-बान्धव जो भीधे सबको विदादेने की कङ्पाकी। इस प्रकार सब विदा होकर चलेर्ये! १९२, सीताजी से जब वियोग हृभा, श्रीराम पर विरक्ति छागथी । यज्ञ स्थान को छोड़कर पृत्रोंको साथ में लेकर तुरन्त अयोध्या

चले गये 1 जननि कौशल्या श्रीराम के आ जाने

पर प्रसन्न हुईं ।'

लक्ष्मण की ओर घ्यानसे देखकर ज्ञान की चर्चा की। १९३ कौशल्याराम को चिभुवन पत्तिके नाथ रमानाथ अत्यन्त जानकर क्लेषयुक्त मन
से यह्‌ जानने के लिए कि किस विधि से बंधने षूटकारया प्राप्त.

नेपाली-हि्दी

३२९
आइन्‌. पाऊ परी फर्‌ विनति पनि गरिन्‌ रामजीका चरण्‌मा।कुनपाट्लेबधषृट्छन्‌, , यतिमकनू्‌ कहू जज आयां शरण्‌मा॥९४॥।यस्तो बिन्ती सुनी खुपखृशि पनि हुनुभो बन्ध षृट्न्या उपाई ।माद्रलाई ॥सव्‌भन्दा येहि रूलो भनि कहनुभयो भक्तियोग्‌भक्तीयोगूमा पनी जौ तिगुण रदितकी भक्ति छन्‌ सोहि गन ।गङ्खाजीक्रा प्रवाहै सरि गरि यस मन्‌लाई मेसाथि धनू्‌।। १९५॥मै माथी चित्त धरन्यां जनहर सहजे भक्तिमान्‌ होदजान्छन्‌ ।चार्‌ छत्‌ मूक्ती ति चारेकन पनि तिने त्रम्‌ सरीका त मान्छन्‌ ।।मे म्राथी चित्त धर्न्यां भनिकन बृ्चिल्यौ साधनां गर्नमाहां ।तस्करो व्णेन्‌ म ग्ट अजब सब बुक्चिल्यौ सन्‌ खुलस्ता -छ याहं ।।९६॥इच्छा काहि नराखनू्‌ विषयमा सन्‌ धमे भामूनू पनि।भनी ॥सत्‌ काम्‌ गन विचार राख मनमा हिसा घटीयामेरो दशन गनं खुप्‌ स्तुति पूजा गनू स्मरण्‌ खुप्‌ गरी ।पाऊमा परि दण्डवत्‌ गरिलिनू्‌ जान्छन्‌ यले तरौ ।१९७॥मव्‌ प्राणीहरुमा म छ यति विचार्‌

राखून्‌

असद्धी

भई |.

सात्र बोल्नु, बडा मिल्या चरणमा

पन्‌

तुरुन्तं

गर्द ॥
~~~ ~~~
~~ ~~ ~~ ~

होगा, राम के पास आकर

उनके पाव मे पड़कर विनती करने लगीं ।
किप पाठके द्वारा बन्धन मक्त होता है, बस यही आज मुञ्चे बतादें।
इसीलिए शरण मे आयी हूं । १९४ राम एेसी विनती सुन अत्यन्तप्रसन्न हए ओर बंधनसेष्टकारा पनेका उपाय जो सबसे महान्‌ है,
उसे भक्तियुक्तं साता को बतानेकीकृपाकी।रहित भव्ति है उसेहीकरना।कर मुक्षपर ही लगाना । १९५
भक्तिसे युक्तहोजातिरहैँ।

भक्तियोगमेंभी जौ चिगुण-

सरन को, गंगा के प्रवाह के समान बनामुञ्च पर मन लगनेवाले जन सहजदही
मुक्तिचार प्रकारकीदहै।

फिर भीडउन

चारोकोतुृणके समान मानकर मुज्ञ पर चित्त लगानेके

लिए साधना

को समञ्चते हुए व्यागकृर उसके सम्वन्धमें मँ यहाँ वणेन करता हूं। जो
वल्कल स्पष्ट है उसे समन्न लो 1 १९६इच्छा के प्रेरित न होनेदेना।

अन्य किसी विषयकी ओर

सबधर्मोका पालन करना, मनमें

हिसा को बहुत ही कद्र समञ्लकर सदैव सत्कायं करना।

मेरे दशन

केरना तथा ध्यान से स्मरण करके परजा एवं स्तुति भी करना।पातिम नतमस्तक होकर दण्डवत करना जिसके फलस्वरूप संसारसे तरण हो

जायगा । १९७

भै सन प्राणियों प्रे व्याप्त हूं, यही विचार निस्संकोच
३३०

भानरुभक्त-रामरायण

गरन्‌ दुःखि-उपर्‌ दया सम भयासेवा गरन यमादिको पनि असल्‌वेदान्तैकन सुन्तु गर्नु खुशि भसज्जनृको सतसङद्क गरनृ-दिन दिन्‌मेरो देह भन्याउन्या अति टुलोयो मन्‌ शुद्ध गरा बुह्तु जति छन्‌जस्त गन्ध ॒ रहन्छठफूलहरमावायुका वशमसापरीकन उडीतेस्तो योग विषे दियो मन न्यागन्धै सं गरि मन्‌ उडायर सहज्‌सर्वात्मा मछ जोत येति नबुक्चीतीदेखी खुश हु क्ति ति गरत्‌
तिन्मा त मैत्री पनि ।वाटा यिनं हृन्‌ भनी ।१९८॥
कीतंन्‌ पनी नामको ।सोक्षो भई कामको ॥छोडन्‌ अहङ्कार पनि ।सब्‌ धमं मेरा पति ॥१९९॥फूलूमा रद्याको पनि ॥आज्छ नाकमा पनि ॥त्यै योग॒ वायु बनी ।ट्यां सेमा अनि ॥२००॥पूजाफकत्‌ गदेछन्‌ ।व्यर्थं शरीर्‌ हेन्‌ ॥पुजा गर्नु त तेहि हो उ नग्या तिन्ले पूजा कृन्‌ गघ्या।मृत्यूको भय हुन्छ तिन्‌कन सदा संसारमा ती प्या ।२०१॥सर्वत्मा मु येति जाति सब्‌ जीव्‌ लाई नमस्कार्‌ गरून्‌ ।धरून्‌ ॥जीवात्मा परमात्म एक्‌ बुञ्चि सदा अन्तःकरणूमा
अपने सन में रखना । सच बोलना, वडों से मिलने पर तुरन्त चरण परपड़ जाना; दृखियों पर दया करना ओर शत्रु होने पर भी उनसे मिवतारखना, यम आदिकी सेवा करना भी एक उत्तम मागं सम्नना। १९८वेद आदि का श्रवण करना, प्रसन्न होकर सदव उस नाम का कीतंन करना,सज्जनो कौ संगत करना तथा प्रतिदिन कतव्य के प्रति निष्ठावान्‌ रहूना ।मेरा देहु अतिमहान्‌ दैः कहकर अहंकार न करना!इस मन को शुद्धकरके सव धर्मोकोजोभी हौं अपना ही समज्नना। १९९ जिस प्रकारफल तथा फलों की सुगंध वायु के वशीभूत होकर उडते हए नाकम आजातीरहै, उसी प्रकार जिस योग विषयकी ओर ध्यान दिया जाता दहैवही योग वायु भी महकके समान ही मन को उडाकर सहज ही मूञ्षमें

ले आती है । २००

सर्वात्मा तोरम हूं ओौर जो इसे बिना समश्च पुजा
नहीं करते दै उससे मै किचित्‌ भी प्रसन्न नहीं होता हं! देसे लोग भपनेशरीरको व्यथंही गंवातेहैँ। वहीतौ पूजाहै ओररसे भीन कियातो उसने कौन सी पूजा की।रेके लोग जब संसार में अतेदहै
तो सदेव एय से भयभीत रहते हैँ । २०१ सर्वत्माम हूं यही जानकरसव जीवों को नमस्कार करना।जीवात्मा त्था परमात्मा को एक

नेपाली-हिन्दी

२३२१
मातर्‌ ! मागं त तनंलाईइ सजिलो ये हौ छ यस्तं गरी।संसारका कति पार्‌ गया सहनमा संसार सागर्‌ तरी ।२०२॥याहूलाइ त न्‌ सहन्‌ छमतहुं प्रे रपते भनी।संज्ञी मात्र दिन्‌ हवस्‌ यत्ति गन्या दृदट्नन्‌ इ बन्धन्‌ पनि॥कौसल्या रधुनाथको यति हृकूम्‌ सूनिन्‌ र मुक्ते भडइन्‌ |कैकेयी पनि देह छोडि दशरथ्‌ जीका हजूरमा गइन्‌।॥२०३२॥तस्तं सुमित्रा दशरथूकि रानी ।संसारका सौख्‌ पनि तुच्छ जानी ॥- प्रारब्धका बन्धनलाइतोडी ।` पौँचिन्‌ पतीथ्ये यहि देह छोडी ।२०४॥।पापात्मा अति दुष्ट शत्रु सबका तीन्‌ कोटि गन्धव छन्‌ ।ई सबलाइ मराउन्‌ अब पन्यो बहुनन्‌ नमाव्या त स्न्‌ ॥यस्‌ सरले रघुनाथका हजुरमा एक्‌ दिन्‌ युधाजित्‌ मया।पाय्या बिन्ति भरत्‌ गई हृकुमले गन्धव मार्दा भया ॥२०१५।।पूरी एक्‌ तहि पुष्करावति बनी पुष्कर्‌ त॒ राजा भया।अर्की तक्षशिला पुरी बनि तहां राज्‌ तक्ष गर्दा भया॥ही समन्चकर सदव अपने अन्तःकरणमें ध्यान रखना।ह माता |यही सव मागं है जिसके हारा संसारसे सरलतापूवेक तर सक्ते है।संसारके कितने ही लोग इस प्रकार सहजही संसारसागरसे पारदोगये । २०२ माता} आपके लिएतो ओरभी सरल हैमने अपना
पुत्र ओर पत्री जानकर केवल स्मरण मात्र यदिकरतीदहै तो इन बन्धनोंसे सूक्ति मिल जायेगी । रघुनाथ के इन वचनो को कौशल्या ने सुनलिया ओौर सुवित प्राप्तकी। कंकेयी भी देह त्यागकर दशरथ जी के
पास चली गथीं । २०३ उसी प्रकार दशरथ की रानी सुमित्रा संसारकेसवंसुख-भोगो को जानकर प्रारब्ध के उन समस्त बन्धनो को तोड़कर शरीरयहीं त्यागकर पति के पहुंच पास गयीं । २०४ अत्यन्त दुष्ट शत पापात्मागन्धर्वो की संख्या तीन कोटिहै इन सनको अन मार डालना होगा,अन्यथा इनकी संख्यामें ओौर वृद्धिहोगी। इस विचारसे एक दिनपुधाजित रघुनाथ के समक्ष गये ओौर्‌ विनतीकी। इस पर आज्ञानुसार भरत ने जाकर गन्धर्वो का संहार कर डाला } २०५वहींएक पृष्करावति पुरी की स्थापनाभी हुई, ओौर उस पुरी का राजापुष्कल हुआ । दूसरी तक्षशिला पूरी बनी जर्हां तक्ष राज करने लगे।
३२२

भानुभक्त-रामायण

छोरा पुष्कर तक्षलाद तिमिलफर्कीश्रीरघुनाथका हजुरमालक्ष्मणलाइ पनी हुकूम्‌ तहि भयोछारालाई्‌ लगेर पश्चिम मुलुक्‌पश््िमूमा अति दुष्ट भिल्लहरु छन्‌दूई्‌ पुरि बनाउनू पनि तहांराजा अंगद चित्रकेतु इ दुवैछोरालाइ रजाईं दीकन तिभीहकम्‌ श्रीरघुनाथको यति हुंदाजो जो हुन्‌ अतिदुष्ट भिल्लहर सब्‌
राज्‌ गर्नु याहीं भनी 1पौँच्या भरत्‌जी पति ॥२०.६॥भाई । तिमीले प्रति 1मा राज्य देऊ भनी ॥
पूरी दूद्‌ बनाइ लक्ष्मणजिलेछोरालाइ्‌ र जलिदि लक्ष्मण गथा

ताहीं

एकूदिन्‌ कालू ऋषिङ्ञे भएर रयुनाथ्‌आया श्रीरघूनाथूजिका पुरिमर्हापौँच्या दवार तलक्‌ जसे प्रभुजिकादवारमा एक्‌ ऋषि छन्‌ खडा भनि गई
तिनूलाइ संहार गरी.।रत्नादि दौलत्‌ भरी ।२०८।।लाईबनायातहँ ।
आयातुरुन्तं यहाँ ॥लक्ष्मण्‌ तुरन्त गया।तिन्‌लाइ मार्दा भया ॥२०८॥

रजाई

दिया 1

जाहां रघूनाथ्‌ थिरा ॥ज्युलाइ भेटभनी ।चिन्देन कोही पनि ।२०९॥चौकी त॒ लक्ष्मण्‌ थिया।हाजिर्‌ पूव्याई दिया ॥
पुत्र पुष्कल तथा तक्ष को वहीं राज्य करने की अनुमति देकर भरतलौटकर पुनः रघुनाथ के पास पहुंच गये । २०६ उसी समय (भगवान्‌रामने) लक्ष्मण जी कोभीञआज्ञा दी-भाई। तुम भी अपने प्रकोले जाकर पश्चिम देशका राज्यदेदो।पश्चिम में अति दुष्ट मल्लआदि है, उनका संहारकर रत्न आदिसे भरपूर करदो नगरियों कीस्थापना करो 1 २०७ अंगद एवं चित्रकेतु इन दोनों को वहाँका राजाबनाओ; ओौर पुत्र को राज्य देकर तुम तुरन्त यहां लौट आयो। श्रीरधुनाथ की इतनी आज्ञा होने पर लक्ष्मण तुरन्त चले गये ओर जितने भीअति दुष्ट मल्ल आदि थे उन सबोंकावध किया । २०८ दो नगरियोंकी स्थापना कर लक्ष्मण जीने अपने पत्र को राज्य सौँपकर तुरन्त जहांरघुनाथ थे, चले आये । एक दिन काल ऋषि का रूप धारणकर रधुनाथसे भेट करने के लिए आया । उसने यह सोचा कि श्रीरधुनाथनजी कीनगरी मे उसे कोई पहचान नहीं. पायेगा । २०९ जब दार तक पहुंचा,
उस समय प्रभुजीके रक्षकके रूपमे लक्ष्मण वर्हांथे। दवार पर एकचषि के आने की सुचना तुरन्त जाकर .रघुनाथको देदी। ये समाचारसुनकर प्रभुजीने उन्हंतुरन्तले अनेकीअज्ञादी। लक्ष्मण भी शीघ्रता

नेपाली-हिन्दी

३३३
हाजिर सूनि हकम्‌ भयो प्रभृजिको ल्या तुरुन्तंभनी।लक्ष्मणूले पनि जल्दि गै हजुरमा ल्याया इने हुन्‌ भनी ।॥।२१०॥पौच्या श्रीरघृनाथका हजूरमा काल्‌ विप्रह्पूले जसँ ।^त्वं वधंस्व' भनेर आशिष दिया श्रीरामलांईतसं ॥सत्कार्‌ श्रीरघुनाथले पनि गव्या पत्ये कुशल्‌ क्षेम गरी।तिनृको आशय बुक्नलाईइ हरिले सोध्याअगाडीसरी।२११॥कून्‌ काम गनूछ र जल्दि आई .\भेट्‌ गर्नृभो आज यहां मलाई ॥हकम्‌ प्रभुको जब येति पाया ।ती काल्‌ पुरुषले पनि बिन्ति लाया।२१२॥हे नाथ्‌ | चरणूमा अहिले म पष्ठुं।एकान्त बक्स्या हूंदि -बिन्ति गष ॥
मेरा कुरा कोहि नसुन्न पाउन्‌ ।सुच्चन्‌ त॒ मारीदिनु दूर जाउन्‌ ।॥२१३॥।ती कालूपुरूषूको यति बिन्ति सूनी |वेसं इ भन्छन्‌ भनि भित्र गूती॥हकम्‌ भयो लक्ष्मणलाद ताह ।कोही नञाउन्‌ अब भित्र

याहं । २.९४

से जाकर (ऋषिखूपी) कालको प्रभुके सम्मुखले आये। २१० जैविप्र रूप काल ध्रौरघुनाथकौ सेवामे पहुंचेवैसेही श्रीराम को प्तम्‌वंधंस्व' कहकर आशीर्वाद दिया । श्रीरघुनाथ ने भी प्रथम उनका स्वागतसत्कार किया ओर उनके आने का आशय समज्नने के लिए सवंप्रथम कुशल-

क्षेम पूछा । २११

कौनसा कायं शीघ्र करनादहै, जिस हतु यहं आकर
आज आपने मृक्षसे भेट करने की कृपा कौ। जब प्रभु की इतनी आज्ञा पायी
तो उस काल पुरूष ने विनती की । २१२ हे नाथ! यैँचरण में उपस्थितहं, यदि आप एकान्त का अवसर देने की कृपा करं तो कुष विनती कर|मेरी वार्ता अन्य कोन सुननेपाये। यदि कोरईसुन लेगातो उसकाजीवन हरण कर लूँगा । अतः दर ही रहना चाहिए । २१३ उस काल. पुरुष की यहं विनती सुनकर तथा अन्तरात्मा मे यह जानकर किये ठीकन्हीकहते है, लक्ष्मण को आदेशदेने कीङक्पाकी किं अव य्ह अन्दर किसीकाप्रवेश न होने पाये । २१४ यदि कोई अन्दरआताहै "ततो वहुये जाननेकि उसे मरना है। वहु अत्यन्त संकटे फंस जायेगा! एकान्त र्हा
३३४

भानूमक्त-रामायण

क्वे आउनन्‌ भित्र त मरनं जानन्‌ ।अच्यन्त गोता विहकं ति खानन्‌ ॥एकान्ततक्‌ कोहि यहां नभाउन्‌ ।यो उदि सूले तिमिदेखि पाठन्‌ ॥२१५॥सून्थो हुकूम्‌ येति र काल वोल्यौ ।आपफना सबं आण्य
ताहि खोल्यो ॥
हैनाध्‌ | महं काल्‌ सवलाई हर््या।मालुम्‌ छ यो सव्‌ किन विन्ति ग्न्य ॥२१६॥ब्रह्याजिको विन्ति लिएर

आयां |

खुप्‌ भाग्यले दशन भाज पायां ॥बरह्माजिको विन्तिम आज गुंहोला हुकूम्‌ जो उदहिशीर धषु ।२१७]सृष्टीदेखि अगाडि पूणं रुपले आल्रा स्वरूप्‌ एक्‌ धियो ।नारायण्‌ जलशायि सूपतपाषछठी यै सृष्टि खात्तिर्‌ लियो॥ख्वामित्‌का तहि नाभिका कमलमा एक्ले म॒ पैदा भ्यां ।सृष्टी गनं हृकूम्‌

हदा हृकुमले

लोक्‌ मुष्टि गदं गयां ।।२१८॥
जसूले दुःख दिया प्रजाकन तिनैयुग्‌ युगूमा अवतार्‌ समेत्‌ लिनुभयो
लाई म मारूं भनी।यस्तं अगाडी पनि ॥
कोई भीन अये। एसी आज्ञा की जानकारी सव लोग तुमसे प्राप्तकरं । २१५ यह्‌ आज्ञा सुनने के पश्चात्‌ काल ने अपना सम्पूणं आशयसविस्तार वणेन क्िया। हैनाथ! मैँसव्रकाहरण करनेवालाहं। येसवको मालूम है । अतः क्या विनय क्रूं । २१६ मैँब्रह्याजीका संदेशलेकर आया हूंओर अत्यन्त सौभाग्य से आज आपके दशन प्राप्त कर
रहाहूं। आज मे आपके सम्मुख ब्रह्मा जी की विनति प्रस्तुत करताहं; जो आज्ञाहोगी उसेही शिरोधार्यं करूगा। २१७ (ब्रह्माजी का
कथन है-) आप सृष्टि के पूवं आत्मस्वर्प एकही पृग्रंर्पथे। जलमे विराजमान नारायण क्रा रूपतो इसी सृष्टि के निमित्त वाद में आपनेधारण कियादहै, स्वामीके नाभिसे निकले हुए कमलसे यै अकेलाहीउत्पन्न हआ । उपरांत सृष्टि रचने की आना हुई, गौर तदनुसार भलोक-सुष्टि करता गया । २१८ प्रजाओों को जिन्होने सतताया उन्हं मारनेके निमित्त युग-युग में अवतारमभीलेनेकीकृपाकी। इसी प्रकार पहले भीअवतरित हीते रहे । अभी भी यह्‌ अवतार पृथ्वीके भार हरनेकेलिएही

नेपालो-हिन्दी

३३५
एेले यो अवतार्‌ पनी पृथिविकं भार्‌ हनं. खातिर्‌ धरी ।भको भार्‌ पनि टारिवक्सनुभयो सब्‌ दुष्ट संहार्‌ गरी ।\२१९॥एवारे म हजार वषं रहा जादा हकम्‌ जो भयो।सोही वषं गणीतले गनिलिदा एधार हज्जार्‌ गयो ॥बस्तैको अरुमन्‌छपोत भगवान्‌! इच्छा हजूरको हवस्‌ ।याहा आउन मन्‌ भया बखत भो लौ जलद पाल्नूहवस ॥२०॥ब्रह्याको विनती सूनेर रधघुनाथ्‌सामने बातचित गर्नृभो पनि बहुत्‌दुर्वासा यहि बीचमा तहि गयालक्ष्मण द्वारमर्हां धिया र ऋषिलेलक्ष्मण्‌लाइ तहा भन्या त॒ ऋषिलेलक्ष्मणलाइ कठिन्‌ भयो कठिनले

भितै जान

हूँदेन जाडं कसरी

हसीतिने कालका ।सब्‌ जानके चालका |राम्‌लाई्‌ भेट्छ्‌ भनी ।तिनूलाई भेट्या पनि ॥२२१॥हाजिर

गराऊ

भनी।
बिन्ती लगाया पनि॥विस्तार्‌ कहांतक्‌ गरू ।सो पूणं गर्छ बरु ।२२२॥
जुन्‌ काम्‌ खातिर आज आउनु भयोलक्ष्मणे यति ती मुनीकन तहां विन्तीदुर्वासा ऋषि हुन्‌ बडा त पनि खृप्‌ रीसाइ
गय्याथ्या जसे ।बोल्या तसै ॥
आपने लिया है) भू-भारको भी सव दुष्टां का संहार के करने बाद हरणकीकृपा की | २१९ आते समय यह्‌ अज्ञादेते कीकपा कीथीकिमे ग्यारह हजार वषं रहंसा। गणित के अनुसार उक्त वर्षोकीगणना करने पर ग्यारह हजार कायुगपुराहो गया।अतः भगवन्‌ |यहा रहने की ओर इच्छातो नहींहै? बतनेकी कृपा करे । यदियहाँ से चलने की इच्छाहोतो समयहो गयाहै तुरन्त चलनेकी कृपाकरे । २२० ब्रह्मा कौ इन बातों को सुनकर रघुनाथ जी हसते हुए उसकाल के समक्ष इस प्रकार बोले, जिससे उनके वास्तवमें जाने का संकेतहज । इसी बीच दुर्वासा ऋषि रामस भेट करनेके लिए वहं बाये।
द्वार पर सक्ष्मणनजीथे, अतः ऋषिकी उन्हींके साथ भट हई २२१ऋषि ने लक्ष्मण जी क्षे श्रीरामके समीपले चलने के लिए कहा।
लक्ष्मण जीको कठिनाई अनुभव हृई। अतः असमंजस के साथ उन्होनेइस प्रकार विनती ककि महाराज ! अन्दर जानेके लिए निषेध दहैअतुः किस प्रकार जाया जये ओर इस सम्बन्धमें मै कहां तके विस्तार

कहूं । जिस कायंके लिए आपने यहां अनेकी

मही पूणैकर्ताहेतु प्रस्तुत हूं । २२२

आज्‌ कृपाकीरहै उसे

लक्ष्मणनेमुनिसे जैसेही इतनी

भानुभक्त-रामायण

३३६
लैजाऊ अञ्न रामका चरणमालैजान्नौ त मलाई भित्र त कुलैसून्या येति वचन्‌ र॒लक्ष्मणजिलेकुलूकोनाश्‌नहवस्‌ कुशल्‌ सब रहून्‌एलेः भित्र त जान निश्चय पय्यो

लक्ष्मण्‌ भित्र गया जहां प्रभुथिया

दवार्‌मा हाजिर छन्‌ ऋषी भनि तहां

ती कालूलाद बिदा गरेर रघुनाथ्‌दुर्वासासित भेट्‌ भयो जब तहांसोध्न्‌ भो षिलादइ आउनु भयोइच्छा भोजनमा थियोति ऋषिकोभोजन्‌ बक्सनुभो र॒ भोजन गरीयै बीचमा तहि संज्ञि बक्सनुभयोलक्ष्मणूलाइ कसोरि मारं अहिलेसन्ताप्‌ श्रीरघुनाथमा जव पन्योमारीनक्सनुहोस्‌ मलाइ भगवान्‌ |
वाहं शरण्‌पदु ।को भस्म स्न्‌ गद्‌ ।२२३॥मनूमा विचार यो गव्या।क्या हृन्छ मै एक्‌ म्या ॥यस्तो विचार्‌ सुपर्‌ गरी।तैलोक्यका नाथूहरि ॥२४॥विन्ती गन्याथ्या जसै. |वाहीरभायातै ॥गरी ।रामूले नमस्कारकस्तो इरादा धरी ॥>२२५॥सो विन्ति

ऋषी खुशी

रामृले

गर्दा भया ।
भे गया ॥

प्रतिज्ञा

पति ।
ये हो विपत्ती भनी ॥२२६॥लक्ष्मण्‌ चरणूमा पत्या ।यो ताहि विन्ती गन्या॥
विनतीकीथी, वैसे ही दुर्वासा ऋषि अत्यन्त क्रोधित होकर कहने लगेकि अभीदही सन्ने रामके चरणोमेंले जाओ, वहीं शरण प्डंगा। यदिमक्षे अन्दर तहींले जाओगेतोर्मैँ सम्पूणं वंश को (शाप से) भस्मकर
दगा । २२३ इन वचनों को सुनकर लक्ष्मण जीने मन में विचारक्िया- मेरे जसे एकके मरनेसे क्याहो जायेगा, सब कुशलसे रहै,वंश॒का नाश न हौस्रा विचारकर उसी समय अन्दर जाने कातनिश्चय किया ओौर लक्ष्मण जहाँ प्रभ त्रैलोक्यनाथ हरिये, अन्दर चलेगये । २२४ हार में ऋषि की उपस्थिति की सूचना देते हुए विनती करते
ही, उस काल को विदा देकर श्रीरघुनाथ बाहर निकल आये । जव दुर्वासाजीसेभेटहुरईदतोरामने नमस्कार करते हुए ऋषिसेप्रष्न करनेकी कृपाक्री कि माप किस विचार को लेकर यहाँ पधारेहँ) २२५ उस ऋषिकाविचार भोजन की ओर था अतः विनतीकी कि भोजनदैनेकी कृपा करे।तदनुसार ऋषि भोजन कर प्रसन्न हौकर चले गथे। इसी समय रामको
प्रतिज्ञा का स्मरण हुआ गौर सोचने लगे कि लक्ष्मणको कंसे मालृमहो?ग्रह एक महान्‌ विपत्ति आ

गयी है । २२६

जव रधूनाथको यह संताप

हुभातो लक्षप्णने तुरन्त चरण मे पड़कर यह्‌ विनतीकी कि भगवन्‌ |

नेपाली-हिन्दी

३३७
रलो भन्न धमं हो उह रहोस्‌ विन्ती गव्या यो जस ।यस्को निश्चयगनेलादइ्‌ हृनगो रलो सभा एक्‌ तसे ।।२२७॥सबूले विन्ति गव्या बुञ्ली हुजुरमा त्याग्‌ मातत गनूं हवस्‌ ।मारीहाल्तु त योग्येन अधिराज्‌ ज्यान्‌ आज इन्को रहोस्‌ ॥ज्यान्‌ हनू र वियोग गर्नु इ बरा- वर्‌ हुन्‌ भन्याथ्या जसँ ।लक्ष्मणूलाइ्‌ पनी विदा दिनुभयो श्रीरामजीले तस ॥२२८॥लक्ष्मण्‌जी सरथ गया तस्र बखत्‌ रासूका चरणूमा परी ।प्राणायाम्‌ त्िरमा गरीकन गया जाह रहन्थ्या हरि ॥यस्‌ रीतूले नरलोक छोडिकन ती लक्ष्मण्‌ जस ता गया ।भेट्ना-खातिर शेषका हजुरमा बरह्यादि जम्मा भया ॥२२९॥लक्ष्मण्‌जी सितको वियोग्‌ जब भयो दुःखी सरीकाबनी ।सां दिक्कं भएर मन्तिहस्थ्यें यस्तो हकम्‌ भो पनि ॥जान्छ्‌ लक्ष्मण छन्‌ जताम त उता यो राज्‌ भरत्‌ूले गरून्‌ ।राजा भैकननजो प्रजाहरु इ छन्‌ यिन्को सबे ताप्‌ हरून्‌।।२३०॥जस्स येति हुकूम्‌ सन्या भरतले मित्‌सरीका भई ।यस्ता बिन्ति गच्या तहां भरतले राम्‌का हज्‌र्मा गई ॥मुज्ञे मार उालनेकी कृपाकरं । धमं ही महान्‌ है, अतः प्रतिज्ञाकापालन करने की कृपा करे)

जंसेही यह विनती की गयी, तव इसे

निश्चित करनेके लिए एक विराट सभा

का

आयोजन

हुभा ) २२७

सबने विचार-विमशे करने के पश्चात्‌ विनती कीकिं श्रीमन्‌ | केवलनिर्वासित करने की कृपा करे। हं अधिराज ! इन्हुं मार डालनाउचित नही. है, अतः आज इनके प्राण रहनेदे | प्राणोका हरण करना
तथा पृथक करना दोनों ही समान कहै जातेहैँ।

एसे कथन को सुनकरं

श्रीरामजीते लक्ष्मणजी कोविदा किया! २२८ उस समय रामकचरण में नत्तमस्तक होकर लक्ष्मण जी सरयू की ओर चलेग्ये। नतदीकेतट पर प्राणायाम्‌ करके जहां हरि थे, उसी धामको चले गये। इसप्रकार नरलोक क्रो छोडकर जसे ही लक्ष्मण परमधाम पहुंचे, ब्रह्मादि शेषकी सेवामे भट करतेके लिए एकत्रहो गये | २२९ जव लक्ष्मण जीके साथ वियोग हुआ तब भगवान्‌ राम ने अति दुखी होकर, अत्यन्तव्यथित होकर, मन्तियोंको एसी जज्ञादी कि मै तो जहाँ लक्ष्मण गयेहै, वहीं जाताहं। यहं राज्य अव भरतकरे। वे ही राजा होकर

इन सव प्रजाजनों कै तापोंको दरं करे । २३०

जब भरत ने इस

३३८

भानुभक्त-रामायण

तीन्‌ लोक बक्स्या पनि।छोरे छन्‌ अधिराज्‌ प्रभू ! हजुरका राजकाइन हुन्‌ धनी ।२३१॥जेठा पुत्र हज्‌रका इ कुश वीर्‌ राज्‌ कोसलैमा गरन्‌ ।उत्तरमा बसि राज्‌ गरी इ लवले सम्पूणंको ताप्‌ हरन्‌ ॥दूर भाइ चलाउंछन्‌ इ जतिघछन्‌ सब्‌ राज्यको काम्‌ यहाँ ।दूत्‌ जाउन्‌ मथुरा विषे किन उसे शतुष्न बस्छन्‌ तहा ।।२३२॥सूनून्‌ लक्ष्मणको पनी ति समचार्‌ पच्या परम्‌ धाम्‌ भनी।सार्थं जान हजूरका चरणमा दौडेर आऊन्‌ पनि ॥यस्तो बिन्ति हजूरमा भरतले गर्दाप्रजालेपति ।पाया थाह र ताप्‌ भयो मनमहां जानन्‌कि छोडी भनी ॥२३३॥बिन्ती एक वशिष्ठ्ले तहि गव्या लान्‌छन्‌ कि छोडछन्‌ भनी ।रन्छन्‌ सन्‌ दुनियां यहां हजुरको पाउन्‌ प्रसाद्‌ ई पनि॥सुल्ुभो तहि यो वशिष्ठ ऋषिले बिन्ती गच्याको जस ।ठाकुरको पनि खुप्‌ दया हून गयो ती सन्‌प्रजामातसं ॥२३४॥बस््यां ख्वामितलाई छोडि म कहाँ
आज्ञा को सुना तब मूरति के समान उन्होने राम की सेवा में उपस्थितहोकर एेसी विनती की कि यदि सज्ञे तीनों लोक भीदेने की कृपा करेंतब भीँ श्रीमन्‌ को छोड़कर कर्हां रहता? अधिराज प्रभु श्रीमन्‌ केपुत्र रवे ही इस राज्य के स्वामीरहै। २३१

श्रीमन्‌ के ज्येष्ठ पुत्र वीर

कश कोशला मे राज्यकरं।उत्तर मेँ रहकर कुमार लव सम्पूणंलोककेतापको ह्रे! ये दोनों भाई राज्यके सम्पूणं कायंजोभीहो, संचालन करेणे।मथुरा में जहाँ शवुध्न रहते है, दूतको भेजाजाये । २३२ लक्ष्मणके परमधामको चले जानेका समाचारभी सुनले ओर आपके प्रस्थान होने की सूचनासे भी अवगतहौ जायें, ताकिवे तुरन्त दौडइकर आपके चरणोमे आस्के। भरतद्वारा भ्रीरामकीसेवामे एेसी विनती करने पर प्रजाओंकोभी उनके छोडकर जनेकीबात का पतता चल गयाओर वे सब मन मे अत्यन्त पीडित हुए । २३३उसी समय वशिष्ठजी ने विनती कीकिं वे सबको अपने साथ लेतेजा्येगे अथवा सबको छोड़ देगे।यहाँ सारा लोक रुदन करेगा।
श्रीमन्‌ का प्रसाद प्राप्त कररमेके लिएवशिष्ठ जीके द्वाराकी गयी इस
विनती को सुनने पर उन सब प्रजाओंके) ऊपर ठाकुर (रामको) को

बहुत दया आयी । २३४

बताओ, क्या इच्छादै?
सब पूणं करूगा।
फेस आज्ञा होने पर सवने साथ जने के लिएप्रभु से विनती कौ, ओर

नेपाली-हिन्दी

३२९
इच्छा क्या छ बताउ पूणं गरा भन्न्या हुकूम्‌ भो पनि।सबले विन्त गव्या प्रभू सित तहां सब्‌ साथ जान्छौ भनी॥इच्छा पूणं हवस्‌ भनी हुकुम भो सब्‌ ती प्रजा खुश्‌ भया।उत्तर कोसलमा दवै ति कुश लव्‌ राज्‌ गनं खातिर गया।॥२३५॥केही दत्‌ मथुरा तरप्‌ प्रभुजिले जल्दीपठार्ईदिया ।दूत्‌ पौँच्या रघुनाथका हुकूमले शतृघ्न जाह धिया ॥जीले जसे ।दूत्‌ देखी समचार्‌ सुन्या प्रभुजिको गतृघ्नतसे २३६छोरालाइ रजा दी प्रभुजिथ्यं ती जान आंट्यांदिया ।जेठा पुत्र सुबाहुलाइई मथुरा ने राजधानीयुप्लाई विदिशाद्ियारति गया जाहां रघूनाथ्‌ थिया ॥जल्दी गैकन पाडमा परि तर्हां यो बिन्ति लाया पनि ।साथे जान भनेर आज रघुनाथ्‌ आयां हज्‌र्‌मा भनी ॥२३७॥।लौ मध्याह्न हुंदा तयार्‌ भइ रह्या यस्तो हृकूम्‌ भो तहां ।आया राक्षस ऋक्ष वानरहरू सब्‌ एति सुन्द महां ।जान्छौ आज संगे प्रभो ! हजुरका ये विन्ति सबले गव्या ।सुग्रीव्‌जी पनि बिन्ति गनं रघुनाथू- जीका अगाडी सव्या ।॥३८॥।अद्खद्लाइ रजा दीकन यहां जालां म॒ साथै भनी ।आयाको छु दयानिधान्‌ ! हजुरमा यो बिन्ति लाया पनि॥प्रभु ने सबकी इच्छा पूणे होने का आशीर्वाद दिया । वे सब प्रजाजन भीप्रसन्न हुए । उत्तर कोशलमे वे दोनों दंश ओर लव राज्य करतेकेनिमित्त चले गये । २३५ कुछ दरूतोको प्रभुजीने मथुराकी ओर तुरंतभेज दिया । रधुनाथ जी कौ आज्ञा से दूत शतृघ्न के समक्ष पहुंचे । जसेही शवघ्न जीने दूत के द्वारा प्रभू जी का समाचार सूना, उन्होने भी अपनेपूत को राज्य सौँपकर प्रभुजी केसाथ जानेकी तैयारी की। २३६ज्येष्ठ पुत्र सुबाहु को मथूरा कौ राजधानी सौपदी।

ओरयूप

को
विदिशा सौपने के पश्चात्‌ वे शीघ्र रघूनाथके पास चले गये। तुरन्तजाकर पावो मे पड़कर यह्‌ विनती कौ किह रघुनाथ ! मै भाज आपकेसाथ जानेके लिए सेवामे उपस्थित हुआ हं । २३७ मध्याह्न होने परतयार रहने की आज्ञा दी गयी । यह्‌ सुनते ही सब राक्षस, रिक्ष तथा वानर
आदि आ पहुचे ओर सबने सेवामें यही विनती कीकि प्रभु! हमभीसब साथदही चलेगे। सूुप्रीवजी भी रघुनाथ जी के सम्मुख विनती करनेहेतु अग्रसर हृए । २३८
उन्होने अनुरोध किया कि अंगद को राज देकर+
३४२

भानुमक्त-रामायण

विन्ती सुन्याथ्या जसे ।प्यारा भक्त जहाँ विभीषण धिया ताह गया राम्‌ तसं ।२३९॥ताहाँ गैकन यो हुकूम्‌ पनिभयो वस्तू तिमीले यहींप्रारब्धै बलवान ` छं जान सवको छृट्तेन सो ता कहीं॥जार्हासम्म रहन्छभूमि तहि तक्‌ राज्‌ गर्नु याहं बसी ।शिक्षा गनं सवे प्रजाकन बहूत्‌ अन्यायिलाई कसी ।२४०॥भएथ्यो जस ।यस्को उत्तर छेन चुप्‌ रह भनी हकम्‌तेसं ठं महाँ तुरन्त हनुमान्‌ जीलाइ देख्या तसे ॥हकम्‌ भो हनुमानलाइ हनुमान्‌ । चीरज्जिवी भै र्या ।मेरो जन्‌ छ हुकूम्‌ उ गनं सब दिन्‌ अत्यन्त तत्पर भया ।\२४१॥बृद्धीमान्‌ तहि जाम्बवान्‌ पनिथिया जालां म॒ सथं भनी।तिनूलाई पनि यो हृकूम्‌ हून गयौ वस्तू तिमीले पनि ॥दापर्मा कष युद्ध गनं तिमिथ्यं पर्व्याछठ सोही गरी |स्वर्गेमा तिमि जाडला पछि भन्या ले त यस्तं परी ॥२४२।॥

सुप्रीव्‌को अर्को ति ऋक्षहृरुको

यस्ता रीत्‌ सित जो अद्ाउनु धियोसन्‌ प्राणहर साथमा हिड भनी
सो
सब्‌ अद्टाई वरी।
हकम्‌ भयो तेस्‌ घरी ॥~~ ~ ~~~
~~~
भीं साथ जागा । अतः दयानिधान, मँ श्रीमन्‌ को सेवामे आयाहूं । इस प्रकार सुग्रीव तथा अन्य रिक्ष आदिकं का कथन सुनने के बाद
राम, उनके परम भक्त विभीषण जहाँ थे, वहाँ चले गये । २३९ वहं जाकरआकज्ञादेनेको कृपाकीो कि तुम यहीं रहूना। समय अत्यन्त बलवान रहै,अतः कहीं भी सबको छुटकारा नहीं मिलता । इसे जानो । जव तकधरती रहेगी तव तक यहीं रहकर रास करना । सम प्रजाजनों को शिक्षादेना ओर अन्यायियो को अनुशासित करना । २४०इस्षकां कोई उत्तरनहीं है! अतः जैसेही चुप रह्नेके लिए आनादेनेकी कृपा की, उसीस्थान पर तुरन्त हनुमान जी को उपस्थित पायाहनुमान को आज्ञादीकिदे हनुमान | चिरंजीवी होकर रहौ ओौर यैँजो कहूं उसका पालनकरने के लिए सदव तत्पर रहना । २४१बुद्धिमान जामवंतभी साथदहीजानेके उद्यसे वर्हांआ गये थे परन्तु उन्हंभी वहीं रहने की अज्ञाहई, कहा किं हापरयुग में तुम्हारे साथ युद्ध करना होगा ओर उसके समापनहोने पर तुम स्वगं कौ जाओगे, अतःअभी इसी प्रकार रहौ । २४२
इस रीतिसे जो कुछ भी बताना था, सव कहने के पश्चात्‌ सन प्राणियोंको साथ मे चलने की ञआन्ञादी।श्रीरघुनाथ की आज्ञा सुनकर

नेपाली-हिन्दी

हकम्‌ श्रीरघुनाथकोआफाफ्ना

जब सन्या

परिवार्‌ लिएर संगमा

३४१

मानी

तब ।

जम्मा भए ती सव

२४२)

आनन्द

पुरोहित्‌ ति वशिष्ठलाई ।हकम्‌ भयो मद्धल गनेलाई्‌ ॥मद्धलू्‌ अनेकन्‌ ऋषिले गराया ।राम्‌ स्वगं जानाकन निस्कि आया ॥२४४॥सीताजिले रूप अधिको छ्िपाइन्‌ ।लक्ष्मी भई वामृतिर बस्न आडइन्‌ ॥दक्षिण्‌ तरफ्‌ भूमि बसिन्‌ हरीका।सब्‌ ताहि आया भुवनं भरीका ।॥२४५॥शस्त्रास्त्र ब्‌ ती पनि रूप धर्दे।हिड्दा तहां मंगल शब्द गदे ॥गायत्रि चार्‌ वेद्‌ पनि ताहि आया ।रूप्‌ धारि मंगल्‌ यश॒ शब्द गाया ।२४६॥।जो ता अयोध्या पुरवासि थीया।आप्ता
तिनूले संगे सन्‌ परिवार लीया॥
बालो बृढो कोहि रेन ताहाँ।- सबको गयो मन्‌ हि राममहं ।२४७॥सुग्रीवृहरू वानर मुख्य आया ।सब्‌ पाप ्टृट्यो भनि हर्षं पाया ॥सब आनन्दित हए ओर अपने-अपने परिवारों को साथ लेकरवे सबएकच्चित हृए । २४३अपने पुरोहित वशिष्ठको मंमल करनेके लिएअल्ञादी।
ऋषिने भी अनेक प्रकारसे मंगल किया।
ने स्वगं जाने के लिए प्रस्थान किया । २४८४

भगवान्‌ राम

सीताजीने पहूलेके श्प

का त्याग किया ओौर लक्ष्मी बनकर वँयीं ओर बैव्नेके लिए ञं गयीं।हरिके दक्षिण की ओर धरती विराजमान्‌ हृई। भुवन भर कै सवप्राणी वहीं आ गये । २४५ शस्त्रास्त्र भी सव रूप धारण करते हुए मंगल-
शब्दों का उच्चारण करते हूए चले!

मायी तथा

चार वेद सभी

अये भमौरसरूप धारणकर मंगल-यश का गान करने लमे। २४६
जो
अयोध्यापुरी के निवासी थे, उन्होने सव परिवारों को साथ ले लिया।नाल-वृद्ध कोई भी वहां शेष नहीं रहा! सभीके मन भगवान्‌ राममेंसमा गये । २४७ सुग्रीव तथा वानर आदि मुख्यल्पसे आये ओौर यह्‌

भायुभक्त-रामायण

2४२
जो लोक्‌ थियो रामसित जान गेगो ।गुलूजार्‌ अयोध्या पनि न्य भगो ॥२४८॥छोडी शहर क्ये गई भूभिमाहां ।देख्या

आपनो

प्रभूले सरयू

तहां ॥
विराट्‌ रूपूकन संक्चिलीया ।आफ त सवृका पनि नाथ थीया ॥२४९॥।
ब्राह्मा ऋषी देव र सिद्ध आया ।
आकाश्‌ विमानूले भरि ट्ट छाया ॥।श्रीराम्‌ उपर खुप्सित पुष्पवृष्टि ।सव्‌ गनं लाग्या हि लाइ दृष्टि ।।२५०॥गाछन्‌ कहि नाच्‌तच्छन्‌ प्रभूजिकं यश्‌ मात कीतेन्‌ गरी ।यै बीचमा रघुूनाथ्‌ पस्या सरथुमा सनूका अगाडी सरी॥ब्रह्माको पनि ताहि ओौसर पञ्यो हात्‌ जोरि बिन्ती गस्या।सबको ताप्‌ अब गगयो सकल लोक्‌ आनन्द सागर्‌ पच्या ॥२५१॥भनी ।ख्वामितूले अब विष्णुको रुप लिने बेला भएथ्योपा्या बिन्ति र होड बक्सनु भयो श्रीराम्‌ चतुर्भुज्‌ पनि. ॥जो शतृध्न भरत्‌ धिया दुद्‌ जना ती शंख चक्रं बनी ।
ठवामित्‌का तहि बाहुमा बसिगया7
बस्न्या यहीं हो भनी ।।२५२॥
।_ राम केजानकर कि सब पापोंसे ष्ुटकारा मिला, अत्यन्त हर्षित हएसाथ जो जानेवाले थे, सब साथ चले गये । रमणीक अयोध्या में निस्तन्धताशहर छोड़कर कुठ दुर चले जानेके बाद प्रभु नेछा गयी 1 २४८सरथू के दशंन किये भौर वहं अपने विराट्‌ रूप का स्मरण किया, जो
स्वयं दही सवके नाथ थे। २४९ ब्रह्मा, ऋषि, देव तथा सिद्ध लोगमभीञाये। आकाश विमानोंसे घिरगया। श्रीराम के उपर महान्‌ पृष्पवृष्टि की गयी । सब लोग उन्हीं की ओर दुष्ट लगाये थे । २५० सबलोग प्रभुके यश का कीर्तन ओर नृत्य करतेदहैँ। इसी बीच श्रीरघुनाथ
ते सवके समक्ष आगे बढ़कर सरथ मेँ प्रवेश किया। ब्रह्माको भी वहीअवसर प्राप्त हुजा ओर हाथ जोड़कर विनती की। सबका ताप अबहरण हौ गया है तथा सकललोक आनन्दसागरं मे मग्न है। २५१

श्रीमन्‌

दारा अब विष्णु का रूप धारण करने का समयहो गयाहै। एेसीविनती करने पर चतुर्भुज श्रीराम ने हसने की कृपा कौ । शतृध्न ओौर
भरत दोनो शंख ओर चक्त बन गथे ओौर स्वामी की बाहों मे विराजमान
३४३

नेपाली-हिन्दी

बरह्याण्डं सब देवगण्‌ खुशि भयाब्रह्मालाइ हुकूम्‌ ग्या. प्रभुजिले

यौ रूप

देख्या जसं ।
सन्‌ प्राणि खातिर्‌ तसे ॥सब्‌ साथ छान्छौं भनी।
हे ब्रह्मन्‌ जति जन्‌ थिया शहरमाआया सन्‌ परिवार्‌ लिएर संगमा लाग्या पछाडीं पति ।२५३॥यिनूलाई शुभ लोक देउ तिमिले सत्‌ लोकमा वास्‌ गखन्‌ ।आपना सन्‌ परिवारले संग रही भआनन्दमा ई परून्‌ ॥बरह्माले प्रभुको हुकूम्‌ यति सूनी हकम्‌ शिरोपर्‌ लिया ।सबलाई सुखभोग गनंकन एक्‌ लोक खटाई दिया ।॥२५४।।ती लोक्ले पनि खश्‌ भएर सरयू- समा स्नान सन्ने गरा ।जुन्‌ सान्तानिक लोक हो उहि पृगी आनन्दमा ती पव्या ॥गरी ।सुग्रीव्‌ सूथ्येविषे गई मिलिगया अष म हुनाले

भूभार्‌ य रितले हरेर रघुनाथ्‌

वैकुण्ठ पौच्या हरि ।॥२५५॥

येती मात्र

ती

कल्या सदाशिवजिले

जसूले यसूकन पाठ गं मनलेतिन्‌का जन्म सहका जति त छन्‌सब्‌ षट्शास्तर बताउंछन्‌ पटिलिया

पार्वतीथ्यै

पनि
अत्यन्तखूशी बनी ॥पाप्‌ भस्म हृन्छन्‌ भनी ।तछन्‌ दुनीर्यां पनि ।॥२५६॥

हो गये, क्योकि उनका वही स्थान था । २५२

ब्रह्मा के सब देवगण उस

सूपको देखकर प्रसन्न हृए । प्रभृजीने सब प्राणियोंके लिए ब्रह्याकोबल्ञादी।
हिब्रह्या ! शहरमेंजो लोग थें सब साथ चलने के लिए सब
जो सांतातिकमग्नहोगये।
(वंशं उत्पन्न करनेवाले) जन थे, वहाँ पहुंचकर आनन्द मेंसुप्रीवसूयंका अंश होने के कारण उसीमें जाकर विलीन
परिवारोंको साथ लेकर पीछे-पीले चले अये २५३ इन्हे तुम ञुभलोक दे देना जिसमे ये सव जन रहं । अपने सब परिवारोंके संग रहकर आनन्दम मग्न रह। प्रभूकी इस आक्ञाको सुनकर ब्रह्माने इसेशिरोधायं किया । सबको सुख भोग करनेहेतु एक लोकही की सृष्टिकरदी। २५४ उस लोकमें भी सबने प्रसन्न होकर सरयु में स्नान करिया ।'हो गये! इस रीतिसे भू-भारको हरण करके श्रीरघुनाथ बैकुण्ठपुरीपहुचे । २५५ सदाशिवने पावंतीजीसे कहा किजो मनसे इस राम-
चरित्र को अत्यन्त महान्‌ समक्चकर इसका पाठ करता है उनके सहसजन्मोके पाप जो कुभीहों, सब भस्महो जातेहै। सब षटशास्तरंकाकथनदहै कि इसके पाठसेसंसारसे तरणहो जाता है । २५६ शम्भ
दारा पावती को अत्यन्त प्रसन्न होकर प्रेमपूवैक कही गयी ये सब बातें

भानुभक्त-रामायण

२८४

शम्भले

पारव॑ती््ये खृशि

भई

बहुत प्रेम पूर्व॑क्‌ कद्ाको |

सबकन सजिलो सधु ञ्चभंरह्याको॥संसार पार तनैलाइदजानी यसलाई जोता जनहरु बहुत प्रेमले पाठ गछन्‌ |संसारका सौख्य सब्‌ भोग्‌ गरिकन दुनियां सब्‌ सहन्‌ पार तछठेन्‌ ॥|| श्री उत्तरकाण्ड समाप्त ॥
----~
-----------------------------------
~---~-~~-~-~--~-~-~-~-~--~--------„~

सवे लिए

संसारपार तरनेके लिए एक सरल मागं सू्पदहँ।
इसे
जानकर जो लोग अस्यन्त प्रेमसे पाठ करते, संसारके सब सुखों कोभोगकर संसारसे तर जातेरहैं। २५७
।॥ भानुभक्त विरचित नेपाली रामायण समाप्त ॥

डाउनलोड: PDF EPUB मूल पाठ (TXT)
स्रोत: — · सार्वजनिक डोमेन (असत्यापित)